हज़रत ईमाम मूसा अल-काज़िम अलैहिस्सलाम का जीवन परिचय

नाम व अलक़ाब (उपाधियाँ) हज़रत इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम का नाम मूसा व आपकी मुख्य उपाधियां काज़िम, बाबुल हवाइज व अब्दे सालेह, अबुल हसन (III) अबू इब्राहीम हैं।
माता पिता हज़रत इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम के पिता हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम व आपकी माता हज़रत हमीदा खातून हैं।
जन्म तिथि व जन्म स्थान हज़रत इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम का जन्म सफ़र मास की सतवी (7) तिथि को सन् 128 हिजरी मे मक्के व मदीने के मध्य स्थित अबवा नामक एक गाँव मे हुआ था।
शहादत (स्वर्गवास) हज़रत इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम को हारून रशीद ने 14 वर्षों तक अपने बन्दीगृह मे बन्दी बनाकर रखा। जहाँ पर आप ने अत्याधिक यातनाऐं सहन की।और अन्त मे रजब मास की 25 वी तिथि को सन्183 हिजरी क़मरी मे बग़दाद नामक शहर मे हारून रशीद के बन्दी गृह मे सन्दी पुत्र शाहिक नामक व्यक्ति ने हारून रशीद के आदेश पर आपको विष मिला भोजन खिला कर आपके संसारिक जीवन को समाप्त कर दिया। शहादत के समय आपकी आयु 55 वर्ष थी।
समाधि हज़रत इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम की समाधि बग़दाद के समीप काज़मैन नामक स्थान पर है। प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु आपकी समाधि के दर्शन कर आप को सलाम करते हैं।

 पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजन वास्तविकता व सच्चाई के मार्ग को स्पष्ट करने वाले हैं। वे मानवता को मुक्ति एवं कल्याण तक पहुंचने के मार्ग को दिखाते हैं। पवित्र क़ुरआन के साथ-२ इन महापुरुषों के सदाचरण भी धार्मिक शिक्षाओं को पहचाने एवं कल्याण के मार्ग को तय करने के दूसरे साधन व माध्यम हैं। इसी कारण विभिन्न क्षेत्रों में इनसे संबंध, परिपूर्णता चाहने वालों के ध्यान का केन्द्र है और ज्ञान एवं श्रेष्ठताप्रेमी इसी संबंध की छत्रछाया में अपने ज्ञान व अध्यात्म में वृद्धि करते हैं।निः संदेह इन महापुरुषों की छोड़ी हुई मूल्यवान धरोहर से संबंध, लोक-परलोक में मनुष्य की भलाई एवं सफलता का कारण बनेगा। सर्वसमर्थ व महान ईश्वर का धन्यवाद है कि आज पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के पावन जन्म दिन पर आपकी सेवा में उपस्थित हैं, और उसने हमें यह कृपा प्रदान की है कि आज के कार्यक्रम में हम उनके जीवन के महान व्यक्तित्व के कुछ आयामों पर प्रकाश डालें। 

हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम कहते हैं" जो भी ईश्वर के लिए विनम्रता करता है, ईश्वर उसे उच्च स्थान प्रदान करता है" हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम का जन्म सात सफ़र सन् १२८ हिजरी क़मरी को मदीना के समीप अबवा नामक क्षेत्र में हुआ था। हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने सुपुत्र इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम के जन्म के अवसर पर कहा था"ईश्वर ने उपहार स्वरुप मुझे सर्वोत्म शिशू प्रदान किया" हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम ने अपने पिता हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद ३५ वर्षों तक इस्लामी समाज के मार्ग दर्शन का महान ईश्वरीय दायित्व संभाला। आपकी इमामत अर्थात नेतृत्व का काल उतार- चढ़ाव से भरा रहा और उनके काल में अब्बासी शासकों की सत्ता अपने चरम बिन्दु पर थी। अब्बासी शासक हारून रशीद जैसे व्यक्तियों ने विदित में धार्मिक मुखौटे के साथ अपनी धूर्ततापूर्ण एवं कुटिल चालों के माध्यम से अपनी ग़लत नीतियों को जारी रखने और अपने अत्याचारों को और विस्तृत करने का प्रयास किया। अब्बासी शासकों ने विदित में अपने धार्मिक मुखौटे एवं नारों के साथ सत्ता की बागडोर हाथ में ले ली परंतु लोगों पर अत्याचार करके और इस्लामी शिक्षाओं व आदेशों को परिवर्तित करके अपने दावों के विपरीत कार्य किया।उनका पूरा प्रयास था कि स्वयं को वे पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों का प्रेमी दर्शायें परंतु व्यवहार में उन्होंने इसके बिल्कुल विपरीत किया और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के पवित्र परिजनों को बड़ी ही कठिन व दयनीय दशा में रखा। एक आदर्श इस्लामी समाज की तुलना में इन शासकों का व्यवहार उससे बहुत दूर था जिसकी उनसे अपेक्षा थी।भव्य महलों का निर्माण और महंगी दावतों जैसे ग़ैर आवश्यक कार्यों में लाखों दिरहम व दीनार ख़र्च किये जाते थे परंतु अधिकांश लोग ग़रीबी व निर्धनता में जीवन व्यतीत करते थे।हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम का कृपालु हृदय उन लोगों के साथ था जिन्हें अब्बासी शासकों के अत्याचारों एवं भेदभाव का सामना था।यही कारण था कि लोग भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम का पौत्र होने के नाते हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम से अगाध प्रेम करते थे।क्योंकि ये महापुरुष अपने सदाचरण से लोगों के मस्तिष्क में पैग़म्बरे इस्लाम की याद जीवित करते थे। इसी कारण अब्बासी शासकों ने हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम से लोगों को दूर करने के लिए उन्हें कई बार गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया। हज़रत इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्लाम ने लगभग १४ वर्ष बहुत ही कठिन स्थिति में जेल में व्यतीत किये। कठिनाइयों में धैर्य करने और क्रोध को पी जाने के कारण आपको काज़िम की उपाधि से ख्याति मिली।

हज़रत इमाम मूसा काज़िम (अ) और तशकीले हुकूमते इस्लामी का अरमान

ज़हूर मेहदी मौलाई

तारीख़ी और रिवाई हक़ायक़ इस पर शाहिद हैं कि सरकारे मुरसले आज़म (स) और मौला ए कायनात (अ) की अज़ीमुश शान इलाही व इस्लामी हुकूमत के वुक़ू पज़ीर होने के बाद, इसी तरह इलाही अहकाम व हुदूद (दीन व शरीयत) के मुकम्मल निफ़ाज़ व इजरा की ख़ातिर इस्लामी हुकूमत की तशकील का अरमान हमारे हर इमामे मासूम (अ) के दिल में करवटें लेता रहा है। जिस के कसीर नमूने हमें आईम्म ए अतहार (अ) के बयानात व फ़रामीन में जा बजा नज़र आते हैं।

मसलन इमाम हसन (अ) अपने सुस्त व बे हौसला साथियों से ख़िताब करते हुए फ़रमाते हैं कि अगर मुझे ऐसे नासिर व मददगार मिल जाते जो दुश्मनाने ख़ुदा से मेरे हम रकाब हो कर जंग करते तो मैं हरगिज़ ख़िलाफ़त मुआविया के पास न रहने देता क्यो कि ख़िलाफ़त बनी उमय्या पर हराम है। [1]

इमाम हुसैन (अ) ने भी मुहम्मद हनफ़िया के नाम अपने वसीयत नामे में इसी अज़ीम अरमान का इज़हार यह कह कर फ़रमाया है:

ओरिदो अन आमोरा बिल मारूफ़ व अनहा अनिल मुन्कर......। [2]

इस्लाहे उम्मत, अम्र बिल मारुफ़, नही अनिल मुन्कर और सीरते रसूल (स) व अमीरुल मोमनीन (अ) का इत्तेबाअ, यह सब दर हक़ीक़त बनी उमय्या की ग़ैर इस्लामी और ज़ालेमाना हुकूमत की नाबूदी और इलाही व इस्लामी हूकूमत के क़याम ही की तरफ़ एक बलीग़ इशारा है।

इमाम सादिक़ (अ) ने सदीरे सैरफ़ी के ऐतेराज़ के जवाब में जो कुछ फ़रमाया है उस से भी यह ज़ाहिर होता है कि इस्लामी हुकूमत की तशकील व तासीस आप की दिली तमन्ना व आरजू़ थी।

सुदीर कहते हैं कि एक दिन मैं इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की ख़िदमत में हाज़िर हो कर कहने लगा कि आख़िर आप क्यों बैठे हैं? (हुकूमत के लिये क्यों क़याम नही फ़रमाते) आप ने फ़रमाया: ऐ सुदीर, हुआ क्या?

मैं ने कहा कि आप अपने दोस्तों और शियों की कसरत तो देखिये। आप ने फ़रमाया कि तुम्हारी नज़र में उन की तादाद कितनी है?

मैं ने कहा एक लाख।

आप ने ताअज्जुब से फ़रमाया एक लाख।

मैं ने कहा जी बल्कि दो लाख।

मैं ने अर्ज़ किया जी हाँ.... बल्कि शायद आधी दुनिया।

मौला सुदीर के साथ यही गुफ़तुगू करते करते जब मक़ामे यनबअ में पहुचे तो वहाँ आप ने बकरियों के एक गल्ले (रेवड़) को देख कर सुदीर से फ़रमाया: अगर हमारे दोस्तों और शियों की तादाद इस गल्ले के बराबर भी होती तो हम ज़रूर क़याम करते। [3]

इस रिवायत से यह अंदाज़ा लगामा मुश्किल नही है कि इस्लामी हुकूमत के क़याम व तासीस की दिली तमन्ना व आरज़ू, असबाब व हालात की ना फ़राहमी की वजह से एक आह और तड़प में बदल कर रह गई थी।

अलावा अज़ इन तक़रीबन सारे ही आईम्म ए मासूमीन (अलैहिमुस सलाम) के यहाँ यह अहम और अज़ीम अरमान बुनियादी मक़सद व हदफ़ के तौर पर नुमायां अंदाज़ में नज़र आता है। लेकिन अब हम अपने मौज़ू की मुनासेबत से उस की झलकियां सिर्फ़ इमाम मूसा काज़िम (अ) की हयाते पुर बरकत में देखना चाहते हैं।

तारीख़ व सेयर का मुतालआ करने वाले बेहतर जानते हैं कि इस्लामी हुकूमत के क़याम व तशकील के लिये बा क़ायदा जिद्दो जिहद इमाम मूसा काज़िम (अ) की ज़िन्दगी में आप से पहले आईम्मा की ब निस्बत, ज़ाहिरन इंतेहाई दुश्वार बल्कि ना मुम्किन मालूम होती है। चूं कि आप का अहदे इमामत, अब्बासी हुकूमत शदायद व मज़ालिम के लिहाज़ से इंतेहाई बहरानी, हस्सास और ख़तरनाक दौर था। ऐसा ख़तरनाक कि आप की हर नक़्ल व हरकत पर हुकूमत की कड़ी नज़र रहती थी, लेकिन क्या कहना ऐसे संगीन और कड़े हालात पर भी यही नही कि इमाम काज़िम ने सिर्फ़ अपने पिदरे बुज़ुर्गवार इमाम सादिक़ (अ) के हौज़ ए इल्म व दानिश की शान व शौकत को बाक़ी रखा। [4] बल्कि इस्लामी हुकूमत के क़याम व तहक़्क़ुक़ के लिये भी आप हमा तन कोशां और फ़आल रहे और आप ने इस की तासीस व तशकील के लिये किसी भी मुमकिना जिद्दो जिहद से दरेग़ नही फ़रमाया। यहाँ तक कि अब्बासी ख़लीफ़ा हारून रशीद भी यह समझने लगा कि इमाम मूसा काज़िम (अ) और उन के शिया जिस दिन भी ज़रूरी क़ुदरत व ताक़त हासिल कर लेंगें उस दिन उस की ग़ासिब हुकूमत को नाबूद करने में देर नही लगायेगें। [5]

हुकूमते इस्लामी की तशकील के सिलसिले में इमाम काज़िम (अ) के बुलंद अहदाफ़ व मक़ासिद का अंदाज़ा, इस मुकालमे से भी ब ख़ूबी लगाया जा सकता है जो मौला और हारून के दरमियान पेश आया है। जिस की तफ़सील कुछइस तरह है कि एक दिन हारून ने (शायद आप को आज़माने और आप के अज़ीम अरमान को परखने के लिये) इस आमादगी का इज़हार किया कि वह फ़िदक आप के हवाले करना चाहता है। आप ने इस पेशकश के जवाब में फ़रमाया कि मैं फिदक लेने को तैयार हूँ मगर शर्त यह है कि उस के तमाम हुदूद के साथ वापस किया जाये।

हारून ने पूछा उस के हुदूद क्या हैं? आप ने फ़रमाया कि अगर उस के हुदूद बता दूँ तो हरगिज़ वापस नही करोगे।

हारून ने इसरार किया और क़सम खाई कि मैं उसे ज़रूर वापस करूगा, आप हुदूद तो बयान करें, (यह सुन कर) मौला ने हुदूदे फिदक़ इस तरह बयान फ़रमा दें।

उस की पहली हद अदन है।

दूसरी हद समरकंद है।

तीसरी हद अफ़रीक़ा है।

चौथी हद अलाक़ाजाते अरमेनिया व बहरे ख़ज़र हैं।

यह सुनते ही हारून के होश उड़ गये बहुत बे चैन व परेशान हुआ, ख़ुद को कंट्रोल न कर सका और ग़ुस्से से बोला तो हमारे पास क्या बचेगा? इमाम (अ) ने फ़रमाया: मैं जानता था कि तुम क़बूल नही करोगे इसी लिये बताने से इंकार कर रहा था। [6] इमाम (अ) ने हारून को ख़ूब समझा दिया कि फ़िदक सिर्फ़ एक बाग़ नही है बल्कि इस्लामी हुकूमत के वसीअ व अरीज़ क़लमरौ का एक रमज़ो राज़ है।

असहाबे सकीफ़ा ने दुख़तरे व दामादे रसूल (स) से फिदक छीन कर दर हक़ीक़त अहले बैत (अ)का हक़्क़े हुकूमत व हाकेमियत ग़ज़ब व सल्ब किया था लिहाज़ा अब अगर अहले बैत (अ) को उनका हक़ दे दिया जाये तो इंसाफ़ यह है कि पूरे क़लमरौ ए हुकूमते इस्लामी को उन के सुपुर्द किया जाये।

हैरत की बात तो यह है कि सारी इस्लामी दुनिया पर अब्बासी हुकूमत का तसल्लुत व तसर्रुफ़ होने के बावजूद दूर व नज़दीक हर तरफ़ से अमवाले ख़ुम्स और दीगर शरई वुजूहात इमाम की ख़िदमत में पेश किये जाते थे और ऐसा लगता था कि जैसे आप ने संदूक़े बैतुल माल तशकील दे रखा है। [7] जो यक़ीनन इस बात की दलील है कि इस्लामी हुकूमत तशकील देने के लिये आप ने ऐसे इलाही, इस्लामी और अख़लाक़ी किरदार व असबाब अपना रखे थे जो इस्लामी दुनिया के समझदार और हक़ शिनास, हक़ीक़त निगर तबक़ा आप की तरफ़ मुतवज्जे किये हुए थे बल्कि उसे आप का मुतीअ व फ़रमां बरदार बनाये हुए थे। यब और बात है कि हुकूमती पावर उस अज़ीम तबक़े को बा क़ायदा खुलने और उभरने नही दे रहा था।

आख़िर कलाम में अल्लाह तबारक व तआला से ब हक़्क़े अहले बैते ताहेरीन (अ) से दुआ है कि अपने वली ए बरहक़ सरकारे इमाम अस्र का जल्द अज़ जल्द ज़हूर फ़रमा कर सारी कायनात पर हुकूमते इस्लामी को मुसतौली व मुसतदाम क़रार दे। आमीन।

मनाबेअ व मआख़ज़

[1] जलाउल ऊयून शुब्बर जिल्द 1 पेज 345 मकतब ए बसीरती, क़ुम, ईरान।

[2] बिहारुल अनवार जिल्द 44 पेज 329 मकतबे इस्लामिया तेहरान, ईरान।

[3] उसूल काफ़ी, जिल्द 2 पेज 242 तबअ 2 मकतब ए सदूक़ तेहरान, ईरान।

[4] मुख़्तसर तारिख़े अरब पेज 209 तबअ 2 दारुल इल्म, बेरूत लेबनान।

[5] सीरये पीशवान पेज 461 तबअ 2 मुअस्से इमाम सादिक़ (अ) क़ुम, ईरान।

[6] तज़किरतुल ख़वास पेज 350 मकतब ए हैदरिया नजफ़े अशरफ़ इराक़।

[7] सीरये पेशवान पेज 463 तबअ 2 मुअस्स ए इमाम सादिक़ (अ) क़ुम ईरान।


 

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