हज़रत ईमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का जीवन परिचय﴿

ज़्यारत हज़रत इमाम नक़ी अलैहिस्सलाम ईमाम अली नक़ी (अ:स) की हदीसें   
     
     
     
नाम

अली (अ:स)

अलक़ाब (उपाधियाँ) हादी, नक़ी 

वालिद (पिता) का नाम 

मोहम्मद तक़ी (अ:स) 

माँ का नाम   समाना मग़'रबिया 

विलादत की तारीख़ 

15 जिलहिज्ज 212 हिजरी / 5 रजब 214 हिजरी 

विलादत की जगह 

मरयेद, मदीना के नज़दीक

ज़ौजा का नाम 

सलील 

बेटों के नाम - 

हसन अस्करी (अ:स), हुसैन, मोहम्मद, जाफ़र 

बेटी का नाम 

मासूमा 

उम्र 

42 साल

शहादत 

3 रजब 254 हिजरी,  शहादत का कारण अब्बासी शासक मोतज़ का शत्रुता पूर्ण व्यवहार था । उसने मोतमद अब्बासी के द्वारा आपको विष खिलवाया था।
दफ़न  सामरा (ईराक़), ईमाम हसन अस्करी (अ:स) के बग़ल में 

हज़रत ईमाम अली नक़ी अलैहिस सलाम 

ईमाम अली नक़ी (अ:स) की विलादत
आपकी विलादत 5 रजब 214 हिजरी मंगल के दिन मदीना मुनव्वरा में हुई थी! (किताब नुरुल अबसार, पेज 149, किताब दामेअ साकेबा पेज 120)

शेख़ मुफ़ीद का कहना है की मदीना के क़रीब एक छोटी जगह है जिसका नाम सरया है, आप वहाँ पैदा हुए थे (किताब अल-इरशाद पेज 494)

 

इसमे गिरामी, कुन्नियत और अलक़ाब 

आप का इसमे गिरामी "अली", आपके वालिदे माजिद हज़रत ईमाम मोहम्मद तक़ी (अ:स) ने रखा, इसे इस तरह समझना चाहिए की सरवर कायनात ने जो अपने बारह जानशीन अपनी ज़ाहिरी जिंदगी के ज़माने में फ़रमाई थी इनमें से एक आपकी ज़ाते गिरामी भी थी! आपके वालिदे माजिद ने इस पहले से तय नाम से जोड़ दिया! अल्लामा तबरी लिखते हैं की चौदह मासूमीन (अ:स) के नाम लौहे महफ़ूज़ में लिखे हुए हैं! सरवरे कायनात ने इसी के मुताबिक़ सबके नाम तय फरमाए थे और हर एक के वालिद ने इसी की रौशनी में अपने फरज़न्दों के नामों को रखा है! (किताब अलाम उल वरा पेज 225) 

 

किताब काशिफ़ अल'गिता में पेज 4 पर है की आँ-हज़रत ने सबके नाम हज़रत आयशा को लिखवा दिए थे! आपकी कुन्नियत "अबुल हसन" थी! आपके अलक़ाब बहुत ज़्यादा हैं जिन में नक़ी, नासेह, मुवक्किल, मुर्तज़ा, और अस्करी ज़्यादा मशहूर हैं (किताब  काशिफ़ अल'गिता पेज 122, किताब नुरुल अबसार पेज 149, मतालिब अल'सुएल पेज 291)!

 

आपकी हयात और आपके वक़्त के बादशाह 

आप जब 214 हिजरी में पैदा हुए तो उस वक़्त बादशाह मामून रशीद अब्बासी था! 218 हिजरी में मामून रशीद ने इंतेक़ाल किया और मोतसिम ख़लीफ़ा हुआ! 272 हिजरी में वासिक़ बिन मोतसिम ख़लीफ़ा बनाया गया, 232 हिजरी में वासिक़ का इंतेक़ाल हुआ और मुतवक्किल अब्बासी ख़लीफ़ा बनाया गया (अबुल फ़िदा के अनुसार)! फिर 247 हिजरी में मुंतसिर बिन मुतवक्किल और 248 हिजरी में मुस्ताइन और 252 हिजरी में ज़ुबैर इबने मुतवक्किल अल-मकनी बह मुतज़ बिल्लाह अलल तरतीब ख़लीफ़ा बनाये गए (किताब अबुल फ़िदा,  किताब दामेअ साकेबा पेज 121), 254 हिजरी में मो-अतिज़ के ज़हर देने से ईमाम अली नक़ी (अ:स) शहीद हुए (किताब तज़किरतुल मासूमीन)  

 

हज़रत ईमाम मोहम्मद तक़ी (अ:स) का बग़दाद का सफ़र और  हज़रत ईमाम अली नक़ी (अ:स) की वली-अहदी 

मामून रशीद के इंतेक़ाल के बाद मोतासिम बिल्लाह ख़लीफ़ा हुआ तो इसने भी अपने आबाई किरदार  को सराहा और खानदानी परंपराओं को बरक़रार रखा! इसके दिल में भी आले मोहम्मद की तरफ़ से वो जज़्बात उभरे जो इसके पूर्वजों के दिल में उभर चुके थे, इसने भी चाहा की आले मोहम्मद में से कोई भी दुन्या में बाक़ी न रहे, इसलिए इसने तख़्त पर बैठते ही हज़रत ईमाम मोहम्मद तक़ी (अ:स) को मदीना से बग़दाद तलब करके नज़रबंद कर दिया !  हज़रत ईमाम मोहम्मद तक़ी (अ:स) ने जो अपने आबाओ अजदाद की तरह क़यामत तक के हालात से वाक़िफ़ थे मदीना से चलते वक़्त अपने फ़रज़न्द को अपना जानशीन बना दिया और वह तमाम तबर्रुकात जो ईमाम के पास हुआ करते हैं आप ने  हज़रत ईमाम मोहम्मद नक़ी (अ:स) के हवाले कर दिए! मदीना से रवाना होकर आप 9 मुहर्रम 220 हिजरी को बग़दाद पहुंचे! बग़दाद में आपको अभी एक साल भी नहीं हुआ था की मोतासिम अब्बासी ने आपको 20 ज़िलक़अद ज़हर से शहीद कर दिया (किताब नुरुल अबसार पेज 147)!

 

किताब उसूल अल-काफ़ी में है की जब ईमाम मोहम्मद तक़ी (अ:स) को पहली बार मदीना से बग़दाद बुलाया गया तो रावी ए ख़बर इस्माइल बिन मेहरान ने आपकी ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया की मौला आपको बुलाने  वाले आले मोहम्मद के दुश्मन हैं, कहीं ऐसा न हो की हम बग़ैर ईमाम के हो जाएँ! आप ने फ़रमाया की हमको इल्म है तुम घबराओ नहीं, इस सफ़र में ऐसा नहीं होगा! इस्माइल का ब्यान है की जब दोबारा आपको मोतासिम ने बुलाया तो फिर मैं हाज़िर होकर फिर से अर्ज़ की के मॉल यह सफ़र कैसा होगा? इस सवाल का जवाब अपने आँसूओं से दिया और नाम आँखों से कहा ऐ इस्माइल मेरे बाद अली नक़ी को अपना ईमाम जानो और सबर व ज़ब्त से काम लेना! 

 

हज़रत ईमाम अली नक़ी (अ:स) का इल्म :

बचपन का वाक़्या - यह हमार मानना है की हमारे ईमाम को ग़ैबी इल्म होता है, यह ख़ुदा की बारगाह से इल्म व हिकमत लेकर कामिल और मुकम्मल दुन्या में तशरीफ़ लाते रहे हैं इन्हें किसी से इल्म हासिल करने की ज़रुरत नहीं होती है, और इन्होने किसी दुन्या वाले के सामने इल्म पाने के लिए नहीं झुके! ज़ाती इल्म व हिकमत के अलावा अपने आबाओ अजदाद से मज़ीद शरफ़े कमाल हासिल किया, यही वजह है की इन्तेहाई कमसिनी में भी यह दुन्या के बड़े बड़े आलिमों को शिकस्त देने में हमेशा कामयाब रहे और जब किसी ने अपने को इनकी किसी फ़र्द से ऊपर समझा तो वोह ज़लील होकर रह गया, फिर इनके आगे सर झुकाने पर मजबूर हो गया!  

 

अल्लामा मसूदी का ब्यान है की हज़रत ईमाम मोहम्मद तक़ी (अ:स) की वफ़ात के बाद ईमाम अली नक़ी (अ:स) जिनकी उम्र इस वक़्त 6-7 साल की थी मदीने में मरजा ए ख़लाएक़ बन गए थे, यह देख कर वह लोग जो आले मोहम्मद से दुश्मनी रखते थे यह सोचने पर मजबूर हो गए की किसी तरह इनकी मरकज़ीयत (महत्त्व) को ख़तम किया जाए और कोई ऐसा पढ़ाने वाला इनके साथ लगा दिया जाए जो इन्हें तालीम भी दे और इनकी अपने उसूल पर तरबियत करने के साथ इनके पास लोगों के पहुँचने का दरवाज़ा बने, यह लोग इसी ख़याल में थे की उम्र बिन फ़राज रजा-इ हज से फ़ारिग़ होने के बाद मदीना पहुंचा, लोगों ने इस से अपनी बात रखी, आखिरकार हुकूमत के दबाओ से ऐसा इंतेज़ाम हो गया की हज़रत ईमाम अली नक़ी (अ:स) को तालीम देने के लिए ईराक़ का सबसे बड़ा आलिम, अदीब (साहित्यकार) उबैदुल्लाह जुनैदी को एक बड़ी तनख़्वाह पर लगाया गया! यह जुनैदी आले मोहम्मद से एक ख़ास दुश्मनी रखने के लिए मशहूर था! 

 

हुकूमत ने जुनैदी के पास ईमाम अली नक़ी (अ:स) को रख दिया और जुनैदी को ख़ास तौर पर यह हुक्म दिया की इनके पास राफ़ीज़ी नहीं पहुँचने पाएं! जुनैदी ने आपको क़सर ए सर्बा में रखा! होता यह था की जब रात होती थी तो दरवाज़ा बंद कर दिया जाता था और दिन में भी शियों के मिलने की इजाज़त नहीं थी, इस तरह आपके मानने वाले की आवाजाही का सिलसिला बंद हो गया और आपका फ़ैज़ ए जारी बंद हो गया, लोग आपकी ज़्यारत और आपसे फ़ायदा पहुंचाने से महरूम (वंचित) हो गए!

 

रावी की ब्यान है की मैंने एक दिन जुनैदी से कहा ग़ुलाम ए हाश्मी का क्या हाल है, इसने निहायत बुरी सूरत बना कर कहा इन्हे गुलाम ए हाश्मी न कहो वो रईस ए हाश्मी हैं! खुदा की क़सम वह इस कमसिनी में मुझ से कहीं ज़्यादा इल्म रखते हैं! सुनो मैं अपनी पूरी कोशिश के बाद जब अदब का कोई बाब (अध्याय) इनके सामने पेश करता हूँ तो वो इसके बारे में ऐसे ऐसे बाब (अध्याय) खोल देते हैं की मैं हैरान रह जाता हूँ! "यज़-नास अति इलमेह व अना वल्लाह तआलाम मेह" यानी लोग यह समझ रहे हैं की मैं इन्हें तालीम दे रहा हूँ, लेकिन खुदा की क़सम मैं इनसे तालीम हासिल कर रहा हूँ, मेरे बस में यह नहीं की मैं इन्हें पढ़ा सकूँ! "हिज़ा वल्लाह ख़ैर अहलील अर्ज़ व अफ़ज़ल मं बिक़ा अल्लाह" यानी खुदा की क़सम वो हाफ़िज़ ए क़ुरआन ही नहीं वो इसकी तावील और तंज़ीम को भी जानते हैं! और मुख़्तसर यह है की वो ज़मीन पर बसने वालों में सबसे बेहतर और कायनात में सबसे अफ़ज़ल है (किताब - इसबात अल वसियह और किताब दामेअह साकिबह पेज - 121) 

 

हज़रत ईमाम अली नक़ी (अ:स) की करामतें और आपका ईलम:

 

ईमाम अली नक़ी (अ:स) तक़रीबन 29 साल मदीना में रहे! आपने इस मुद्दत (अवधि) में कई बादशाहों का ज़माना देखा! तक़रीबन हर एक ने आपकी तरफ़ आने से मना किया! यही वजह है की आप अपनी ईमामत के कामों को अंजाम देने में कामयाब रहे! यानी दीन की तब्लीग़ और इसकी हिफ़ाज़त की ! आप अपने आबाओ अजदाद की तरह इल्म बातिन और इल्म ग़ैब भी रखते थे इसलिए आप अपने मानने वालों को होने वाले वाक़ेयात से बा'ख़बर कर दिया करते थे ताकी आपके माने वालों को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुँचने पाए! इस सिलसिले में आपके करामात बेशुमार हैं जिसमे से हम यहाँ किताब काशिफ़ल ग़ुम्मा से कुछ करामातों का ज़िक्र करेंगे! 

 

1. मोहम्मद बिन फ़रज रजई का ब्यान है की हज़रत ईमाम अली नक़ी (अ:स) ने मुझे तहरीर फ़रमाया की तुम अपने तमाम उमूर और मामलात को दुरुस्त कर लो और अपने हथियारों को संभाल लो, मैंने इनके हुक्म के मुताबिक़ तमाम दुरुस्त कर लिए लेकिन यह न समझ सका की यह हुक्म आपने क्यों दिया है! लेकिन कुछ दिनों के बाद मिस्र की पुलिस मेरे यहाँ आई और मुझे गिरफ़्तार करके ले गयी और मेरे पास जो कुछ था सब कुछ ले लिया, और मुझे क़ैदख़ाने में बंद कर दिया! मैं आठ साल इस क़ैदख़ाने में बंद पड़ा रहा, एक दिन ईमाम (अ:स) का ख़त पहुंचा जिस में लिखा था की ऐ मोहम्मद बिन फ़रज तुम इस नाहिया की तरफ़ न जाना जो मगरिब (पश्चिम) की तरफ है, ख़त पाते ही मेरे हैरानी की कोई हद न रही, मैं सोचता रहा की मैं तो क़ैदख़ाने में हूँ, मेरा तो उधर जाना मुमकिन ही नहीं है फिर ईमाम ने क्यों मुझे खत लिखा! आपके खत आये हुए अभी दो चार दिन ही हुए थे की मेरे रिहाई का हुक्म आ गया और मैं इनके हुक्म की मुताबिक़ मना किया गए रास्ते पर नहीं गया! क़ैदख़ाने से रिहाई के बाद मैंने ईमाम (अ:स) को लिखा की हुज़ूर मैं क़ैदख़ाने से छूट कर घर आ गया हूँ, अब आप ख़ुदा से दुआ फ़रमायें की मेरा ज़ब्त किया हुआ माल मुझे वापस मिल जाए, आपने इसके जवाब में लिखा की जल्दी ही तुम्हारा माल तुम्हें वापस मिल जाएगा और ऐसा ही हुआ!               

 

2. एक दिन ईमाम अली नक़ी (अ:स) और अली बिन हसीब नामी शख़्स साथ साथ रास्ता चल रहे थे! अली बिन हसीब आप से कुछ क़दम आगे बढ़ कर बोले आप भी क़दम आगे बढ़ा कर जल्दी आ  जाइए! हज़रत (अ:स) ने फ़रमाया की बिन हसीब "तुम्हें पहले जाना है, तुम जाओ" इस वाक़्या के चार दिनों के बाद बिन हसीब की मौत हो गयी!

 

3. एक शख़्स मोहम्मद बिन फ़ज़ल बग़दादी का ब्यान है की मैंने हज़रत ईमाम अली नक़ी (अ:स) को लिखा की मेरे पास एक दूकान है, मैं इसे बेचना चाहता हूँ, आपने इस ख़त का कोई जवाब नहीं दिया! जवाब न मिलने पर मुझे अफ़सोस हुआ लेकिन जब मैं बग़दाद वापस पहुंचा तो वह आग लग जाने की वजह से जल चुकी थी!

 

4. एक शख़्स जिसका नाम अबू अय्यूब था उसने ईमाम (अ:स) को लिखा की मेरी ज़ौजा (पत्नी) हामला है, आप दुआ फ़रमा दीजिये की लड़का पैदा हो! आप (अ:स) ने इरशाद फ़रमाया, "इन्शा अल्लाह, अल्लाह तुम्हारे घर लड़का ही पैदा करेगा और उसकी पैदाइश के बाद तुम उसका नाम मोहम्मद रखना"! बाद में उसे लड़का ही पैदा हुआ जिसका नाम उसने मोहम्मद रखा! 

 

5. यहया बिन ज़करिया का ब्यान है की मैंने ईमाम अली नक़ी (अ:स) को लिखा की मेरी बीवी हामेला है, आप दुआ फरमाइए की लड़का पैदा हो, आप ने जवाब में लिखा की कुछ लड़कियाँ लड़कों से बेहतर होती हैं, बाद में उसके घर में लड़की ही पैदा हुई!

 

 6. वासिक़ के ज़माने का वाक़्या - अबू हाशिम का ब्यान है की मई 227 हिजरी में एक दिन हज़रत ईमाम अली नक़वी (अ:स) की ख़िदमत में हाज़िर था की किसी ने आकर कहा की तुर्कों की फ़ौज गुज़र रही है! ईमाम (अ:स) ने कहा की ऐ अबू हाशिम चलो इनसे मुलाक़ात करें! मैं ईमाम (अ:स) के साथ तुर्कियों के लश्कर तक पहुंचा! हज़रत ने एक तुर्की ग़ुलाम से इसकी ज़ुबान में बातचीत शुरू की और देर तक बातें करते रहे! इस तुर्की सिपाही ने आपके क़दमों का बोसा (क़दमों को चूमा) दिया! मैं इस ग़ुलाम से पुछा की वो कौन सी चीज़ है जिसने चखे ईमाम का गरवीदा (प्रशंसक) बना दिया है, इसने कहा " ईमाम ने मुझे इस नाम से पुकारा जिस का जानने वाला मेरे बाप के अलावा और कोई नहीं था! 

 

7. तिहत्तर (73) ज़बानों की तालीम - अबू हाशिम कहते हैं की मैं एक दिन हज़रत की ख़िदमत में हाज़िर हुआ तो आपने मुँह से हिंदी ज़बान में बातचीत की, जिसका मैं जवाब न दे सका तो आपने फ़रमाया की मैं तुम्हें अभी अभी साड़ी ज़बानों का जानने वाला बना देता हूँ, यह कह कर आप ने एक पत्थर उठाया और अपने मुँह में रख लिया इसके बाद पत्थर को मुझे  फ़रमाया की इसे चूसो, मैं ने मुँह में रख कर इसे अच्छी तरह से चूसा, इसका नतीजा यह हुआ की मैं तिहत्तर (73) ज़बानों का आलिम बन गया जिनमें हिंदी भी शामिल थी! इसके बाद से फिर मुझे किसी ज़बान के समझने और बोलने में दिक़्क़त नहीं हुई! (पेज - 122 से 125 तक)

 

8. ईमाम अली नक़ी (अ:स) के हाथों में रेत का बदलना - अईम्मा ताहेरीन (अ:स) के उलूल अम्र होने पर क़ुरआने मजीद की नसे सरीह मौजूद है, इनके हाथों और ज़बान में ख़ुदा वंद जो इरादा करें इसकी तकमील हो जाए, जो हुक्म दें इसकी तामील हो जाए! अबू हाशिम का ब्यान है की एक दिन मैं ईमाम अली नक़ी (अ:स) की ख़िदमत में अपनी तंगदस्ती की शिकायत की! आपने फ़रमाया बड़ी मामूली बात है, तुम्हारी तकलीफ़ दूर हो जायेगी इसके बाद आपने रेट की एक मुठी ज़मीन से उठा कर मेरे  दी और फ़रमाया इसे ग़ौर से देखो और इसे बेच कर अपना काम निकालो, अबू हाशिम कहते हैं की ख़ुदा की क़सम जब मैंने इसे देखा तो वो बेहतरीन,  मैंने इसे बाज़ार ले जाकर बेच दिया (किताब-मुनाक़िब इबने शहर आशुब - हिस्सा 5, पेज-119)

 

9. ईमाम अली नक़ी (अ:स) और इस्मे आज़म (अल्लाह के नाम) - हज़रत सिकताउल इस्लाम अल्लामा कुल्लिनी अपनी किताब उसूल काफ़ी में लिखते हैं की ईमाम अली नक़ी (अ:स) ने फ़रमाया इस्मे अल्लाहुल आज़म 73 हुरूफ़ में से, सिर्फ एक हर्फ़ हज़रत सुलेमान के वसी आसिफ़ बरख्या को दिया गया था जिसके ज़रिये से इन्होने पलक झपकते ही मुल्के सबा से तख़्ते बिल्क़ीस मँगवा लिया था और इस मंगवाने में हुआ यह था की ज़मीन सिमट कर तख़्त को क़रीब ले आई थी, ऐ नौफ़िली (रावी) ख़ुदा वंद आलम ने हमें इस्म आज़म के बेहतरीन हरूफ़ दिए हैं और अपने लिए सिर्फ़ एक हरफ़ महफ़ूज़ रखा है जो इल्म ग़ैब से मुत्तालिक़ है! मसूदी का कहना है की इसके बाद ईमाम ने फ़रमाया की ख़ुदा वंद आलम ने अपनी क़ुदरत और अपने इज़्न से हमें वो चीज़ें अता की हैं जो हैरत अंगेज़ और ताज्जुब ख़ेज़ हैं, मतलब यह की ईमाम जो चाहे कर सकते हैं इनके लिए कोई रुकावट नहीं हो सकती (किताब - उसूल काफ़ी, मुनाक़िब इबने शहर आशुब जिल्द 5, पेज-118, दामेअ साकेबा पेज-126) 

 

10. हज़रत ईमाम अली नक़ी (अ:स) और सहीफ़ए कामेला की एक दुआ : हज़रत ईमाम अली नक़ी (अ:स) के एक सहाबी सबा बिन हमजा क़ुम्मी ने आपको तहरीर किया की मौला मुझे ख़लीफ़ा मोतासिम के वज़ीर से बहुत दुःख पहुँच रहा है और मुझे इसका भी अंदेशा है की कहीं वो मेरी जान न ले ले, हज़रत ने इसके जवाब में तहरीर फ़रमाया की घबराओ नहीं और दुआए सहीफ़ए कामेला "या मन तुहिल्लो बिह उक़ादुल मुक़ारेहपढ़ो मुसीबत से निजात पा जाओगे!  सबा बिन हम्ज़ा का ब्यान है की मैंने ईमाम के हुक्म के मुताबिक़ सुबह की नमाज़ के बाद इस दुआ की तिलावत की, जिसके पहले ही दिन यह नतीजा निकला की वज़ीर खुद मेरे पास आया, मुझे अपने साथ ले गया और अच्छे लिबास पहना कर मुझे बादशाह के बग़ल में बैठा दिया! 

 

हुकूमत की तरफ से ईमाम अली नक़ी (अ:स) की मदीना से सामरा में तलबी और रास्ते का एक अहम् वाक़्या  मुतवक्किल 232 हिजरी में ख़लीफ़ा हुआ और उसने 236 हिजरी में ईमाम हुसैन (अ:स) की क़ब्र के साथ पहली बार बे अदबी की, लेकिन इसमें पूरी कामयाबी हासिल न होने पर अपने हसद और जलन की वजह से जो आले मोहम्मद के साथ था, वो हज़रत अली नक़ी (अ:स) की तरफ मुजवज्जा हुआ! मुतवक्किल 243 हिजरी से इमाम अली नक़ी (अ:स) को सताना शुरू किया और इसने हाकिमे मदीना अब्दुल्लाह बिन मोहम्मद को ख़ुफ़िया हुक्म दे कर भेजा की फ़रज़न्द रसूल ईमाम अली नक़ी (अ:स) को सताने में कोई कसर न छोड़े! इसी वजह से हाकिन ने पुरे ज़ोर व शोर के साथ अपनी पूरी ताक़त लगा कर अपना काम शुरू कर दिया! पहले खुद ही जिस क़दर सत्ता सकता था उसने सताया और आपके ख़िलाफ़ एक पूरा रिकॉर्ड बना कर लगातार मुतवक्किल को शिकायतनामा की शकल में भेजता रहा!

 

अल्लामा शिबलिंजी लिखते हैं की ईमाम अली नक़ी (अ:स)  को यह मालूम हो गया की हाकिमे मदीना ने आपके ख़िलाफ़ साज़िशें शुरू कर दी और इस सिलसिले में इसने मुतवक्किल को आपकी शिकायत भेजनी शुरू कर दी तो आप ने भी एक तफ़्सीली ख़त लिखा जिसमें हाकिमे मदीना के ज़ुल्म और बर्बरियत का ख़ास तौर पर ज़िक्र किया! मुतवक्किल ने आपका ख़त पढ़ कर आपके जवाब में यह लिखा की हमारे पास चले आइये! इस खत में हाकिमे मदीना के करतूतों के लिए माफ़ी भी थी! यानी जो कुछ वो कर रहा है अच्छा नहीं करता और हम इसकी तरफ़ से माफ़ी चाहते हैं! मतलब यह था की इसी बहाना से इन्हें सामरा बुला ले! ख़त में इसने इतना नरम लहजा लिखा था जो एक बादशाह की तरफ़ से नहीं हुआ करता है! यह सब एक साज़िश सिर्फ इसलिए की आप मदीना छोड़ दें और सामरा पहुँच जाएँ (किताब- नुरुल अबसार -पेज-149)

 

अल्लामा मजलिसी लिखते हैं की मुतवक्किल ने यह भी लिखा था की मैं आपकी ख़ातिर से अब्दुल्लाह इबने मोहम्मद को बर्ख़ास्त करके इसकी जगह पर मोहम्मद बिन फ़ज़ल को मुक़र्रर कर रहा हूँ (किताब जिलाउल अ-यून पेज 292)

 

अल्लामा अरबली लिखते हैं की मुतवक्किल ने सिर्फ यही नहीं किया की अली नक़ी (अ:स) को ख़त लिखा हो की आप सामरा चले आइये बल्कि इसने 300 का लश्कर यहया बिन हरिसमा की की क़यादत में मदीना भेज कर इन्हें बुलाना चाहा! यहया बिन हरिसमा का ब्यान है की मैं मुतवक्किल का हुक्म पा कर ईमाम (अ:स) मदीना से सामरा लाने के इरादे से निकला और मेरे साथ 300 का लश्कर था और उसमें एक कातिब (किताब लिखने वाला) भी था जो इमामिया मज़हब रखता था! हम लोग अपने रास्ते पर जा रहे थे और इसी उधेड़ बन में थे की जल्दी से जल्दी मदीना पहुँच कर ईमाम (अ:स) को ले आयें और मुतवक्किल के सामने पेश करें! हमारे साथ जो शिया कातिब था इस से एक लश्कर के अफ़सर के साथ रास्ते भर मुनाज़रा (मज़हबी बहस) होती रही!

 

यहाँ तक की हम लोग एक अज़ीम वादी में पहुँचे जिसके आस पास मीलों कोई आबादी नही थी और वो एक ऐसी वादी थी जहाँ से इंसान का मुश्किल से गुज़र होता था, बिलकुल जंगल और सेहरा था, हमारा लश्कर जब वहाँ पहुंचा तो इस अफ़सर ने जिसका नाम "शादी" था और जो कातिब से मुनाज़रा करता चला आ रहा था कहने लगा, ऐ कातिब तुम्हारे ईमाम हज़रत अली (अ:स) का यह क़ौल है की दुन्या की कोई ऐसी वादी न होगी जिसमें क़ब्र न हो या जल्दी ही वहाँ क़ब्र न बन जाए! कातिब ने कहा बेशक हमारे ईमाम (अ:स)  ग़ालिब कुल्ले ग़ालिब का यही इरशाद है! इसने कहा बताओ इस ज़मीन पर किस की क़ब्र है या किसकी क़ब्र बन सकती है? तुम्हारे ईमाम यूँही कह दिया करते हैं! इबने हरिसमा का कहना है की चूँकि मैं "हशवी" ख़्याल (मज़हब) का था लिहाज़ा हम ने जब यह बात सुनी तो हम सब हँस पड़े और कातिब शर्मिन्दा हो गया! लश्कर बढ़ता रहा और इसी दिन मदीना पहुँच गया! मदीना में दाख़िल होने के बाद मैंने मुतवक्किल का ख़त ईमाम अली नक़ी (अ:स) की ख़िदमत में पेश किया, ईमाम (अ:स) ने इसे पढ़ कर लश्कर पर नज़र डाली और समझ गए की दाल में कुछ काला है! आप ने फ़रमाया, "ऐ इबने हरिसमा, चलने को तैयार हूँ लेकिन एक-दो रोज़ की मोहलत ज़रूरी है" मैं ने अर्ज़ किया, हुज़ूर ख़ुशी से, जब हुक्म फ़रमायें मैं हाज़िर हो जाऊँ और रवानगी हो जाए!

 

इबने हरिस्म का ब्यान है की ईमाम (अ:स) ने मेरे सामने नौकरों से कहा की दर्ज़ी बुला दो और इस से कहो की मुझे सामरा जाना है लिहाज़ा रास्ते के लिए गर्म कपड़े और गर्म टोपियाँ जल्दी से जल्दी तैयार कर दे! मैं वहाँ से वापस आकर अपने ठहरने की जगह पर पहुंचा और रास्ते भर यह सोचता रहा की ईमामिया कैसे बेवक़ूफ़ हैं की एक शख़्स को ईमाम मानते हैं जिसे (मआज़ अल्लाह) यह तक तमीज़ नहीं है की यह गर्मी का ज़माना है या जाड़े का! इतनी सख़्त गर्मी में जाड़े के कपडे सिल्वा रहे हैं और इसे अपने साथ ले जाना चाहते हैं! फिर मैं दुसरे दिन इनकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ तो देखा की जाड़े के बहुत से कपडे सिले हुए रखे हैं और आप अपने सफ़र का सामान तैयार कर रहे हैं, और अपने नौकरों से कहते जाते हैं देखो सर्दी और बरसात के कपडे रहने न पाएं, सब साथ में बाँध दो!इसके बाद मुझ से कहा की ऐ यहया बिन हरिसमा जाओ तुम भी अपना सामान तैयार करो ताकि मुनासिब वक़्त में रवानगी हो जाए! मैं वहाँ से निहायत बद-दिल वापस आया, दिल में सोचता था की इन्हें क्या हो गया है की इस शदीद गर्मी के ज़माने में सर्दी और बरसात का सामान अपने साथ ले जा रहे हैं और मुझे भी हुक्म दे रहे हैं की तुम भी इस क़िस्म का सामान अपने साथ ले लो! 


जब सफ़र का सामान तैयार हो गया और रवानगी हो गयी तो मेरा लश्कर ईमाम (अ:स) को घेरे में लिए हुए जा रहा था और इसी तरह हम उस वादी में पहुँचे जिसके बारे में कातिब ईमामिया और अफसर शादी में यह बात चीत हुई थी की यहॉँ पर किसकी क़बर है या किसकी होगी! इस वादी में पहुँचना था की क़यामत आ गयी! बादल गरजने लगे, बिजली चमकने लगी, और दोपहर के वक़्त इस तरह अँधेरा छाया की कोई एक दुसरे को देख नहीं सकता था, यहाँ तक की बारिश हुई और ऐसी मूसलाधार बारिश हुई की कभी ऐसे न हुई थी! ईमाम (अ:स) ने इसके आसार पैदा होते ही नौकरों को हुक्म दिया की बरसाती और सर्दी की टोपियाँ पहन लो और एक बरसाती यहया बिन हरिसमा और एक कातिब को दे दो! ज़बरदस्त बारिश हुई और हवा इतनी ठंडी चली की जान के लाले पड़ गए! जब बारिश थमी और बादल छंटे तो मैंने देखा की मेरे लश्कर के 80 लोग हलाक हो गए थे!


ईमाम (अ:स) ने फ़रमाया की ऐ यहया बिन हरिसमा अपने मुर्दों को दफ़न कर दो और यह जान लो की ख़ुदाए तआला इसी तरह ज़मीन के हर हिस्से को क़ब्रों से पाट देता है और इसी लिए मेरे जद ए नामदार हज़रत अली (अ:स) ने फ़रमाया की ज़मीन का कोई टुकड़ा ऐसा नहीं होगा जिस में क़ब्र न बनी हुई हो!


यह सुन कर मैं अपने घोड़े से उतर पड़ा और ईमाम (अ:स) के क़दमों के पास गया और इनकी ख़िदमत में अर्ज़ की, मौला आज आपके सामने मुसलमान होता हूँ, यह कह कर मैंने इस तरह कलमा पढ़ा, "अशहदो अन ला इलाहा इल्लल लाहो व अनना मोहम्मदन अब्दुहु व रसूलोह व इन्नाकूम ख़ुलफ़ा-अल्लाहो फ़ी अर्ज़ेही" और यक़ीन कर लिया की यही हज़रत ख़ुदा की ज़मीन पर ख़लीफ़ा हैं और दिल में सोचने लगा की अगर ईमाम (अ:स) ने जाड़े और बरसात का सामान न लिया होता और अगर मुझे न दिया होता तो मेरा क्या हशर होता! फिर वहां से रवाना होकर "अस्कर" पहुंचा और आपकी इमामत का क़ायल रह कर ज़िन्दगी भर आपके जद का कलमा पढ़ता रहा! (किताब-काशिफ़ल ग़ुम्मा, पेज-124)

 

 

 

 

 

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