ईश्वरीय दूत और पाप
 
 
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स प्रकार से हम देखते हैं कि ईश्वरीय दूत ज्ञान की उस सीमा पर होते हैं जहां उनकी सूझबूझ और वास्तविकता का ज्ञान उन्हें पाप नहीं करने देता
और उनकी दूरदर्शिता व सम्पूर्ण बुद्धि इस बात का कारण बनती है कि वे हर प्रकार की ग़लती से भी सुरक्षित रहते हैं क्योंकि ग़लती भी अज्ञानता का परिणाम है।
उदाहरण स्वरूप कोई व्यक्ति वर्षों तक अपने घर में रहने और प्रतिदिन आने- जाने के बाद अपने उस घर के मार्ग के बारे में कभी गलती नहीं कर सकता क्योंकि
अपने घर के मार्ग के बारे में उसका ज्ञान सम्पूर्ण होता है किंतु ईश्वरीय दूतों का ज्ञान हर मामले में सम्पूर्ण होता है इसलिए वे किसी भी मामले में ग़लती नहीं करते।
पैग़म्बरों अर्थात ईश्वरीय दूतों के पापों से पवित्र होने की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए हम अपनी बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए पाप,पुण्य ,भलाई व बुराई जैसे कामों की
इरादे से लेकर काम करने की पूरी प्रक्रिया पर एक दृष्टि डालते हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ईश्वरीय दूत स्वेच्छा से पापों से दूर रहते हैं और जो शक्ति उन्हें पापों से दूर रखती है
वह उनकी अपनी होती है और इससे शक्ति के प्रभावशाली होने के कारण, मनुष्य को प्राप्त चयन अधिकार समाप्त नहीं होता।
वास्तव में हर काम चाहे वह सही हो या ग़लत इरादे और इच्छा से आरंभ होता है और काम करने पर जाकर समाप्त होता है किंतु इस पूरी प्रक्रिया में कई चरण आते हैं जो वास्तव में
प्रत्येक मनुष्य की मानसिक दशाओं के अनुसार कम या अधिक होते हैं। उदारहण स्वरूप जब एक मनुष्य कोई काम करने का इरादा करता है तो उसकी अच्छाइयों और बुराईयों और
परिणाम के बारे में सोचता है यदि उसका ज्ञान कम किंतु दूरदर्शिता अधिक होती है तो वह उस बारे में जानकारी रखने वालों से भी पूछताछ करता है
अन्य लोगों से सलाह- मशविरा करता है फिर अपने हिसाब से उचित समय की प्रतीक्षा करता है और समय आने पर वह काम कर लेता है किंतु
यदि उसमें आत्मविश्वास की कमी होगी तो यह प्रक्रिया उसके लिए लंबी होगी और वह बार- बार अपने फैसले को बदलेगा किंतु यदि उसमें आत्मविश्वास होगा तो
वह प्रक्रिया अपेक्षाकृत छोटी होगी और इसी प्रकार यदि किसी के पास उस काम के बारे में पर्याप्त जानकारी के साथ होगी तो उसके लिए
काम करने की प्रक्रिया और अधिक छोटी होगी और उसके लिए ढेर सारे इरादों और मनोकामनाओं में से संभव व सरलता से पूरी की जाने वाली कामना तक पहुंचना सरल होगा।
इस प्रकार से यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान व जानकारी, जहां गलतियों से बचाव को सुनिश्चित करती है वहीं सही मार्ग के चयन की संभावना को अधिक करती है।
इसलिए जानकारी व अनुभव जितना अधिक होगा गलतियों से दूरी उतनी ही निश्चित होगी तो यदि हम किसी ऐसे व्यक्ति की कल्पना करें जिसकी
जानकारी व अनुभव पूर्ण हो और उसमें किसी प्रकार की कोई कमी न हो तो फिर उससे गलती की संभावना नहीं होती किंतु उसमें संभावना न होने का
अर्थ यह नहीं है कि वह गलतियों से दूर रहने पर विवश होता है और उसमें चयन शक्ति का विशेष अधिकार ही नहीं होता। यह ठीक उसी प्रकार है
जैसे यदि कोई बुद्धि रखने वाला व्यक्ति किसी शर्बत में विष गिरते अपनी आंखों से देख ले तो वह कदापि उस शर्बत को नहीं पीएगा।
अर्थात हम यह कह सकते हैं कि बुद्धि रखने वाला मनुष्य उस शर्बत को पी नहीं सकता किंतु पी नहीं सकता कहने का अर्थ यह नहीं है कि
उसमें वह शर्बत पीने की क्षमता ही नहीं है और वह शर्बत न पीने पर विवश है और शर्बत पीने या न पीने के मध्य निर्णय का अधिकार ही उसके पास नहीं है
यह अधिकार उसके पास है किंतु बुद्धि व विष के होने का ज्ञान उसे शर्बत पीने से रोक देता है
यही स्थिति ईश्वरीय दूतों की भी होती है एक मनुष्य होने के नाते और ईश्वर द्वारा मनुष्यों को प्रदान की गयी चयन शक्ति व अधिकार के दृष्टिगत यदि वे चाहें तो पाप कर सकते हैं
किंतु उन्हें जो वास्तविकताओं का पूर्ण ज्ञान होता है और पापों की बुराइयों से चूंकि वे अवगत होते हैं इसलिए पूर्ण ज्ञान उनके भीतर पाप की इच्छा को जन्म ही
नहीं लेने देता किंतु इसका अर्थ यह नहीं होता कि वे पाप करने में अक्षम और मनुष्य को प्रदान किये गये चयन अधिकार से वंचित होते हैं।
वास्तव में पापों की बुराई ईश्वरीय दूतों के लिए उसी प्रकार स्पष्ट होती है जैसा बुद्धि रखने वाले के लिए विष की बुराईयों और जिस प्रकार
बुद्धि रखने वाला व्यक्ति शर्बत में अपनी आखों से विष गिरते देखने के बाद अपनी इच्छा से उसे नहीं पीता उसी प्रकार ईश्वरीय दूत भी पापों से अपनी इच्छा से दूर रहते हैं
और उनकी इस इच्छा का कारण उनका ज्ञान होता है।