नबी की ज़रुरत
  नबी की ज़रुरत हम सब जानते हैं कि ख़ुदा ने इस फैली हुई दुनिया को बे मक़सद पैदा नही किया है और यह भी वाज़ेह है कि इंसान को पैदा करने से ख़ुदा को कोई फ़ायदा नही पहुचता है। इस लिये कि हम पिछले सबक़ों में पढ़ चुके हैं कि ख़ुदा किसी चीज़ को मोहताज नही है लिहाज़ा इंसान को पैदा करने का मक़सद और उस का फ़ायदा इंसान को ही मिलता है और वह फ़ायदा व मक़सद यह है कि तमाम मौजूदात अपने कमाल की मंज़िलों को तय करे। ख़ास तौर पर इंसान हर लिहाज़ से कमाल तक पहुच सके। लेकिन यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि इंसान किस तरह और किस के सहारे से हर लिहाज़ से अपने कमाल की मंज़िलें तय कर सकता है? वाज़ेह है कि इंसान उसी वक़्त अपने कमाल तक पहुच सकता है जब उसे आसमानी क़वानीन और सही तरबीयत करने वाले के ज़रिये सहारा मिले, उस के बग़ैर इंसान के लियह मुम्किन न होगा कि वह कमाल तक पहुचे। इस लिये कि ग़ैर आसमानी रहबर अपनी अक़्ल और समझ के महदूद होने की वजह से सही तौर पर इंसान की रहनुमाई नही कर सकता और चुँ कि वह भूल चूक और ग़लतियों से महफ़ूज़ नही होता लिहाज़ा रहबरी के लायक़ भी नही है। (मगर यह कि वह आसमानी रहबरों की पैरवी करे।) लेकिन अल्लाह के नुमाइंदे (दूत) ग़ैब की दुनिया से राब्ता और हर तरह की ख़ता व ग़लती से महफ़ूज़ होने की वजह से इंसान को हक़ीक़ी कमाल और ख़ुशियों तक पहुचा सकते हैं। इन सब बातों का नतीजा यह हुआ कि इंसान की हिदायत व तरबीयत उस पैदा करने वाले की तरफ़ से होना चाहिये जो उस की तमाम ख़्वाहिशों से वाक़िफ़ है और यह भी जानता है कि कौन सी चीज़ इंसान के लिये नुक़सान का सबब है और कौन सी चीज़ उस के फ़ायदे का सबब है और यह इलाही क़वानीन भी ख़ुदा के उन नबियों के ज़रिये ही लागू होने चाहिये। जो हर तरह की ख़ता और ग़लतियों से महफ़ूज़ होते हैं। इंसान एक समाजी मख़लूक़ है सभी का इस बात पर इत्तेफ़ाक़ है कि इंसान एक समाजी मख़लूक़ है यानी किसी कोने में अकेला बैठ कर ज़िन्दगी नही गुज़ार सकता बल्कि वह मजबूर है कि दूसरे इंसानों के साथ ज़िन्दगी गुज़ारे, इसी को समाजी ज़िन्दगी कहते हैं। अकसर इंसान नफ़सानी ख़्वाहिशों की वजह से इख़्तिलाफ़ात और ग़ैर आदिलाना कामों में फँस जाता है। अब अगर सही और आदिलाना क़ानून न हो तो यह समाज और मुआशरा हरगिज़ कमाल और सआदत की राह पर नही जा सकता। लिहाज़ा वाज़ेह हो जाता है कि एक ऐसा सही और आदिलाना क़ानून लाज़िम व ज़रूरी है जो शख़्सी और समाजी हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त करे लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि यह क़ानून कौन बनाये? बेहतर क़ानून बनाने वाला कौन है? उस की शर्त़े क्या हैं? क़ानून बनाने वाले की पहली शर्त यह है कि वह जिनके लियह क़ानून बनाना चाहता है उन की रूहानी और जिस्मानी ख़ुसूसियात और ख़्वाहिशात वग़ैरह से आगाह हो, हम जानते हैं कि ज़ाते ख़ुदा के अलावा कोई और नही जो इंसान के मुस्तक़बिल में होने वाले उन हादसों से आगाह हो, जो समाज को एक मुश्किल में तब्दील कर देते हैं लिहाज़ा सिर्फ़ उसी को हक़ है कि इंसान के लिये ऐसा क़ानून बना यह जो उसकी पूरी ज़िन्दगी में फ़ायदे मंद साबित हो और उसे नाबूदी से निजात दे। ख़ुदा उन क़वानीन को इंसान तक अपने बुलंद मर्तबे, मुम्ताज़ और ख़ता व लग़ज़िश से मासूम मुन्तख़ब बंदों के ज़रिये पहुँचाता है ताकि इंसान उन क़वानीन की मदद से कमाल तक पहुँचे। इंसानों की रहबरी में पैग़म्बरों का दूसरा अहम किरदार यह है कि वह ख़ुद सबसे पहले क़ानून पर अमल करते हैं यानी वह उन क़वानीन के बारे में इंसान के लिये ख़ुद नमून ए अमल होते हैं ताकि दूसरे अफ़राद भी उनकी पैरवी करते हुए ख़ुदा के नाज़िल किये गये क़वानीन को अपनी ज़िन्दगी में लागू करें, यही वजह है कि हर मुसलमान का अक़ीदा है कि ख़ुदा ने हर ज़माने में एक या चंद पैग़म्बरों को भेजा है ताकि आसमानी तालीम व तरबियत के ज़रिये इंसानों को कमाल व सआदत की मंज़िलों तक पहुँचाये। एक शख़्स ने इमाम सादिक़ (अ) से सवाल किया: पैग़म्बरों के आने का सबब क्या है? इमाम ने उसके जवाब में फ़रमाया: जब मोहकम और क़तई दलीलों से साबित हो गया कि एक हकीम ख़ुदा है जिसने हमें वुजूद बख़्शा है जो जिस्म व जिस्मानियात से पाक है, जिसको कोई भी देख नही सकता तो उस सूरत में ज़रूरी है कि उसकी तरफ़ से कुछ रसूल और पैग़म्बर हों जो लोगों को ख़ैर और सआदत की तरफ़ हिदायत करें और जो चीज़ उनके ज़रर व नुक़सान का सबब है उससे आगाह करें। ऐसे आसमानी हादी व रहबर से ज़मीन कभी ख़ाली नही रह सकती। [1] ख़ुलासा - तमाम नबियों की नबुव्वत और रिसालत पर ऐतेक़ाद रखना उसूले दीन में से है । - ख़ुदा वंदे आलम ने जिन असबाब की ख़ातिर पैग़म्बरों को भेजा है वह यह हैं: 1. इंसान कमाल की मंज़िलों तक पहुँचे। 2. इंसानों के लिये पैग़म्बर नमून ए अमल बनें। 3. इंसानों की सही हिदायत व रहनुमाई हो सके। - सिर्फ़ ख़ुदा ही को हक़ है कि वह इंसानों के लियह क़ानून बनाये। इस लियह कि उसी ने उन्हे पैदा किया है और वही उन की रुहानी व जिस्मानी हालात, ख़्वाहिशों, उन की पिछली, हाल की और आईन्दा की ज़िन्दगी और सारे हालात के बारे में पूरी तरह से जानता है। - ख़ुदा अपने बनाये हुए क़ानून को अपने ख़ास बंदों के ज़रिये इंसानों तक पहुचाता है जो बुलंद मर्तबा, मुम्ताज़ और ख़ता व ग़लतियों से महफ़ूज़ और मासूम होते हैं। सवालात 1. क्या नबियों की नबुव्वत व रिसालत पर ऐतेक़ाद रखना उसूले दीन में से है? 2. हमें नबियों की ज़रुरत क्यो है और ख़ुदा ने उन्हे क्यो भेजा है? 3. सिर्फ़ ख़ुदा ही को इंसानों के लिये क़ानून बनाने का हक़ है? 4. ख़ुदा अपने बनाये क़ानून को किन लोगों के ज़रिये इंसानों तक पहुचाता है? तेरहवाँ सबक़ नबियों का मासूम होना हम पिछले सबक़ में पढ़ चुके हैं कि नबियों के आने का मक़सद लोगों की हिदायत व रहबरी है और यह बात भी अपनी जगह मुसल्लम है कि अगर ख़ुद रहबर और हादी गुनाहों में फंसे हों तो वह अपनी क़ौम की हिदायत नही कर सकते और उन्हे नेकी और पाक दामनी की तरफ़ दावत नही दे सकते। हर नबी के लिये ज़रुरी है कि वह सब से पहले इस तरह लोगों का ऐतेमाद हासिल करे कि उसके क़ौल व अमल में ख़ता और ग़लती का ऐहतेमाल भी न दिया जाये, अगर नबी मासूम न हो तो दुश्मन उन की ख़ता और ग़लती को बुनियाज बना कर और दोस्त उन की दावत को बे बुनियाद समझ कर दीन को क़बूल नही करेगें। लिहाज़ा ज़रुरी है कि अल्लाह के नबी मासूम हों यानी हर तरह की ख़ता, ग़लती और भूल चूक से पाक हों ता कि लोग उन की पैरवी करते हुए सआदत व ख़ुशियों की मंज़िलों तक पहुचें। यह कैसे मुम्किन है कि ख़ुदा बिला क़ैद व शर्त किसी इंसान की इताअत का हुक्म दे दे जबकि उसके अंदर ख़ता का इम्कान व ऐहतेमाल भी पाया जाता हो? ऐसी सूरत में क्या लोगों को उस की इताअत व पैरवी करना चाहिये? अगर पैरवी करें तो गोया उन्होने एक ख़ता कार की पैरवी की है और अगर न करें तो नबियों की रहबरी बे मक़सद हो जायेगी। यही वजह है कि मुफ़स्सेरीन जब आयत اطیعوا الله واطیعوا الرسول و اولی الامر منکم इताअत करो ख़ुदा की और इताअत करो रसूल और उलिल अम्र की, (सूर ए निसा आयत 59) पर पहुचते हैं तो कहते हैं कि ख़ुदा ने बिला क़ैद व शर्त रसूल की इताअत का हुक्म दिया है और यह इस बात की दलील है कि रसूल भी मासूम हैं और उलिल अम्र यानी आइम्म ए मासूमीन (अ) भी वर्ना ख़ुदा हरगिज़ उन की बिला क़ैद व शर्त पैरवी करने का हुक्म नही देता। नबियों की इस्मत को साबित करने का एक रास्ता यह है कि हम ख़ुद को देखें, जब हम अपने अंदर ग़ौर व फ़िक्र करेंगे तो देखेंगे कि हम भी बाज़ गुनाहों या गंदे और बुरे कामों में मासूम हैं जैसे क्या कोई अक़्लमंद इंसान बैतुल ख़ला की गंदगी या कूढ़ा करकट खा सकता है? क्या कोई समझदार इंसान बिजली के नंगे तार को छू सकता है? क्या कोई समझदार और मतीन इंसान नंगा हो कर सड़क व बाज़ार में आ सकता है? ऐसे बहुत से दूसरे सवाल जिनका जवाब क़तई तौर पर नही में होगा यानी ऐसे काम समझदार लोग कभी नही करेंगे और अगर कोई शख़्स ऐसे काम अंजाम दे तो यक़ीनन या तो वह दीवाना होगा या फ़िर किसी मजबूरी में वह अफ़आल अंजाम दे रहा होगा। जब हम ऐसे कामों का तवज्जो करते हैं तो मालूम होता है कि इन कामों की बुराई हमारे लिये इस क़द्र वाज़ेह व ज़ाहिर है कि हम उसे अंजाम नही दे सकते। इस मक़ाम पर पहुँचने के बाद हम यह कह सकते हैं कि हर अक़्ल मंद व समझदार इंसान बाज़ गंदे और बुरे कामों से महफ़ूज़ है यानी एक तरह की इस्मत का हामिल है । इस मरहले से गुज़रने के बाद हम देखते है कि बाज़ लोग बहुत से दूसरे कामों को भी अंजाम नही देते हैं जबकि आम लोगों के लियह वह मामूली सी बात होती है जैसे एक माहिर और जानकार डाँक्टर जो हर तरह के जरासीम के बारे में जानता है, हरगिज़ इस बात पर राज़ी नही होगा कि सड़क पर लगे नल का गंदा पानी पिये जब कि मुम्किन है कि एक आम इंसान उस पानी को हमेशा पिये और उस में किसी तरह की कराहत का अहसास भी न करे। इससे मालूम होता है कि इंसान का इल्म जितना ज़्यादा होगा वह उतना ही बुरे और गंदे कामों से अमान में रहेगा लिहाज़ा अगर किसी का इल्म और उसका ईमान इतना ज़्यादा बुलंद हो जाये और ख़ुदा पर उसका यक़ीन इस क़द्र ज़्यादा हो जाये कि वह हर जगह उसको हाज़िर व नाज़िर जानता हो तो यक़ीनन ऐसा शख़्स महफ़ूज़ होगा, अब उसके सामने हर बुरा काम और हर गुनाह बैतुल ख़ला की गंदगी, कूड़ा करकट खाने, बिजली के नंगे तार को छूने या कूचे व बाज़ार में बिल्कुल बरहना होने के मानिन्द होगा । इन तमाम बातों का नतीजा यह हुआ कि हमारे अंबिया अपने बे पनाह इल्म और बे नज़ीर ईमान की वजह से गुनाहों और हर तरह की भूल चूक से महफ़ूज़ हैं और कभी भी गुनाहों के असबाब उन पर ग़लबा हासिल नही कर सकते और यही अंबिया की इस्मत का मफ़हूम है। ख़ुलासा - अंबिया ए इलाही (अ) का मासूम होना लाज़मी है इस लिये कि : 1. जो शख़्स ख़ुद गुनाह अंजाम देता हो उसमें ख़ता का इम्कान हो वह दूसरों की हिदायत नही कर सकता। 2. ख़ुदा ऐसे शख़्स की बिला क़ैद व शर्त पैरवी करने का हुक्म नही दे सकता जिसमें गुनाह अंजाम देने का इम्कान हो। - अंबिया ए इलाही (अ) अपने बे पनाह इल्म और बे नज़ीर ईमान की वजह से गुनाह अंजाम नही देते। सवालात 1. हादी व रहबर को ख़ता व ग़लतियों से क्यों महफ़ूज़ होना चाहिये? 2. ख़ुदा ख़ताकार शख़्स की बिला क़ैद व शर्त पैरवी करने का हुक्म क्यों नही दे सकता? 3. किस तरह आक़िल और बाशऊर इंसान बाज़ गंदे और बुरे कामों को अंजाम देने में मासूम होता है? चंद मिसालों से वाज़िह करें। चौदहवाँ सबक़ नबी को पहचानने के रास्ते किसी भी दावा करने वाले के दावे को ग़ौर व फ़िक्र के बग़ैर क़ुबूल कर लेना अक़्ल व शऊर के ख़िलाफ़ है। मुम्किन है कि नबुव्वत व रिसालत का दावा करने वाला सच्चा हो और ख़ुदा की तरफ़ से ही भेजा गया हो लेकिन उसके साथ यह ऐहतेमाल व इम्कान भी पाया जाता है कि नबुव्वत व रिसालत का मुद्दई झूठा हो और ज़ाती मफ़ाद के पेशे नज़र अपनी नबुव्वत का दावा कर बैठा हो, लिहाज़ा ज़रूरी है कि सच्चे नबी को पहचानने के लियह हमारे पास चंद मेयार मौजूद हों। जिनमें से दो बहुत अहम हैं : 1. मोजिज़ा पैग़म्बरों की नबुव्वत और आलमे ग़ैब से उनके राब्ते को साबित करने वाले चंद रास्तों में से एक रास्ता मोजिज़ा है। मोजिज़ा वह काम है जिसे अंबिया (अ) ख़ुदा वंदे आलम के हुक्म से अपनी हक़्क़ानियत और आलमे ग़ैब से अपने राब्ते को साबित करने के लिये अंजाम देते हैं और दूसरे अफ़राद उसे अंजाम देने से आजिज़ व मजबूर होते हैं। क़ुरआन करीम में मोजिज़ा को आयत यानी अलामत से ताबीर किया गया है। हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं: ख़ुदा ने अपने पैग़म्बरों और जानशीनो को मोजिज़ा इनायत किया ताकि उनके दावे की सदाक़त पर गवाह हो, मोजिज़ा एक ऐसी अलामत है जिसे ख़ुदा अपने पैग़म्बरों, रसूलों और अपनी हुज्जतों के अलावा किसी और को नही देता ताकि उसके ज़रिये सादिक़ व सच्चे नबी को झूठे मुद्दई से जुदा कर सके और सच्चे और झूठे में पहचान हो सके।[2] 2. ग़ुज़िश्ता पैग़म्बरों की पेशीनगोई नबी को पहचानने का दूसरा रास्ता यह है कि उसके बारे में गुज़िश्ता नबी ने ख़बर दी हो । पैग़म्बरे इस्लाम (अ) ने भी जब अपनी नबूवत का ऐलान किया तो गवाही के तौर पर यह दलील पेश की कि मैं वही पैग़म्बर हूँ जिसका नाम तौरैत व इंजील में आया है लेकिन बहुत से यहूदियों और ईसाईयों ने न सिर्फ़ यह कि अपनी आसमानी किताबों की तरफ़ रुजू न किया और पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हक़्क़ानियत को क़बूल न किया बल्कि इस्लाम व मुसलेमीन से बहुत सी जंगें लड़ीं, उन की किताबों में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के इस्में गिरामी के मौजूद होने के बारे में क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है: و اذ قال عیسی ابن مریم یا بنی اسرائیل انی رسول الله الیکم مصدقا لما بین یدی من التوراه و مبشرا برسول یاتی من بعدی اسمه احمد فملما جاءهم بالبینات قالوا هذا سحر مبین याद करो उस वक़्त को जब ईसा (अ) बिन मरियम ने बनी इस्राईल से कहा: मैं तुम्हारी तरफ़ ख़ुदा का भेजा हुआ रसूल हूँ, तौरैत की तस्दीक़ करता हूँ और तुम्हें अपने बाद आने वाले पैग़म्बर की बशारत देता हूँ जिसका नाम अहमद है लेकिन जब वह पैग़म्बर मोजिज़ात और निशानियो के साथ आया तो उन लोगों (यहूदियों और ईसाईयों) ने कहा कि यह तो ख़ुला हुआ जादू है। उन्हीं यहूदियों की नस्ल ‘’इसराईल’’ आज भी पूरी दुनिया में मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िश में मसरूफ़ है और इस्लाम को तबाह करना चाहती है लेकिन जिस तरह से पैग़म्बर (स) के ज़माने में यहूदी कामयाब न हो सके। उसी तरह आज भी वह इस्लाम व मुसलेमीन के सामने ज़लील व बेबस नज़र आ रहे हैं। ख़ुलासा - सच्चे नबी को इन रास्तों से पहचाना जा सकता है : 1. मोजिज़ा 2. गुज़िश्ता पैग़म्बरों की पेशीनगोई - मोजिज़ा वह काम है जिसको अंजाम देने से आम इंसान आजिज़ व नातवाँ होता है। - अंबिया (अ) अपनी हक़्क़ानियत और आलमें ग़ैब से अपने राब्ते को साबित करने के लि यह ख़ुदा के हुक्म से मोजिज़ा दिखाते थे। - गुज़िश्ता आसमानी किताबों में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के आने की बशारत दी गई है, इस सिलसिले में क़ुरआन में आयत भी मौजूद है। सवालात 1. नबी को पहचानने के कौन कौन से रास्ते हैं? हर एक पर मुख़्तसर रौशनी डालें। 2. मोजिज़ा किसे कहते हैं? 3. अम्बिया मोजिज़ा क्यों दिखाते थे? 4. क्या पैग़म्बरे इस्लाम के बारे में गुज़िश्ता आसमानी किताबों में बशारत दी गई है? पंदरहवाँ सबक़ पैग़म्बरे इस्लाम (स) आख़िरी नबी पैग़म्बरे इस्लाम हज़रते मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) आख़िरी नबी हैं यानी आप पर सिलसिले नबूवत ख़त्म हो गया । इसी लिये आपको (स) ख़ातिमुल अम्बिया कहा जाता है । यह बात दीने इस्लाम की ज़रूरियात में से है यानी हर मुसलमान के लिये ज़रूरी है कि जिस तरह वह तौहीद का इक़रार करता है उसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम (स) की ख़ातेमीयत का भी इक़रार करे । दर हक़ीक़त पैग़म्बरे इस्लाम (स) के मबऊस होने के बाद क़ाफ़िले बशरीयत ने एक के बाद एक (आहिस्ता आहिस्ता) आपने कमाल की राहें तय कीं और इस मक़ाम पर पहुच गया कि अब वह अपने रुश्द व नुमू की राहों को इस्लामी तालीमात के सहारे ख़ुद तय कर सकता था यानी इस्लाम एक ऐसा क़ानून बनकर सामने आया जो ऐतेक़ादात के लिहाज़ से भी कामिल था और अमल के लिहाज़ से भी इस तरह मुनज़्ज़म किया गया था कि हर ज़माने के इंसान की ज़रूरतों को पूरा कर सके। पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ख़ातिमुल अंबिया होने की दलीलें 1. हुज़ूरे अकरम (स) की ख़ातेमियत पर बहुत सी क़ुरआनी आयात गवाह हैं मिसाल के तौर पर इरशाद होता है: ما کان محمدا ابا احد من رجالکم ولکن رسول الله و خاتم النبین (सूर ए अहज़ाब आयत 40) ‘’हज़रते मोहम्मद (स) मर्दों में से किसी के बाप नही हैं बल्कि वह सिर्फ़ रसूले ख़ुदा और ख़ातिमुल अम्बिया हैं।’’ मज़कूरह आयत से मालूम होता है कि जिस तरह लोगों के लिये पैग़म्बरे इस्लाम (स) की रिसालत वाज़िह व ज़ाहिर थी उसी तरह आप (स) की ख़ातेमीयत भी साबित व उस्तुवार थी । 2. बहुत सी रिवायतें मौजूद हैं जो आप (स) की ख़ातेमीयत पर वाज़िह दलील हैं । यहाँ सिर्फ़ चंद रिवायात ज़िक्र की जा रही हैं : अ) जाबिर बिन अब्दुलाहे अंसारी ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से एक मोतबर हदीस नक़ल की है कि आपने (स) फ़रमाया: ‘’मैं पैग़म्बरों के दरमियान उसी तरह हूँ जैसे कोई ख़ूबसूरत घर बना डाले, उसे कामिल कर दे लेकिन उसमें सिर्फ़ एक ईट की जगह छोड़ दे, अब जो भी इस घर में दाख़िल होगा तो कहेगा कि कितना ख़ूबसूरत घर है लेकिन इसमें एक कमी है कि यह जगह ख़ाली ह , मैं भी इमारते नबूवत की वहू आख़िरी ईट हूँ और नबूवत मुझ पर ख़त्म होती है’’। ब) इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं: حلال محمد حلال الی یوم القیامة وحرامه حرام ابدا الی یوم القیامة [3] ‘’हलाले मोहम्मद ता क़यामत हलाल और हरामे मोहम्मद ता क़यामत हराम है’’। स) शिया व सुन्नी किताबों में एक मारूफ़ और मोतबर हदीस मौजूद है जिसमें नबी अकरम (स) हज़रत अमीरुल मोमीनीन (अ) को ख़िताब करते हुए फ़रमाते हैं: انت منی بمنزلة هارون من موسی الا انه لا نبی بعدی ’ऐ अली (अ) तुमको मुझसे वही निस्बत है जो हीरून (अ) को मूसा (अ) से थी बस फ़र्क़ यह है कि मेरे बाद कोई नबी न होगा।‘’[4] ख़ुलासा - पैग़म्बरे इस्लाम हज़रते मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) आख़िरी नबी हैं इसी लिये आपको (स) ख़ातिमुल अम्बिया कहा जाता है । ख़तिमीयते रसूले इस्लाम (स) पर ईमान रखना ज़रूरियाते दीन में से है। - इस्लाम ऐतेक़ादात और आमल के लिहाज़ से इस तरह मुनज़्ज़म किया गया है कि हर ज़माने के इंसान की ज़रूरतों को पूरा कर सकता है । इसी लिया इस्लाम आख़िरी दीन और नबी अकरम (स) आख़िरी रसूल हैं । - पैग़म्बरे इस्लाम (स) की ख़ातेमीयत पर बहुत सी आयात व रिवायात दलील के तौर पर मौजूद हैं। सवालात 1. पैग़म्बरे इस्लाम (स) को ख़ातिमुल अम्बिया क्यों कहा जाता है? 2. क्या पैग़म्बरे इस्लाम (स) की ख़तिमीयत पर ईमान रखना ज़रूरीयाते दीन में से है? 3. दीने इस्लाम के आख़िरी दीन और नबी अकरम (स) के आख़िरी रसूल होने का क्या सबब है ? 4. नबी अकरम (स) की ख़तिमीयत पर दलालत करने वाली वह हदीस लिखें जो आपने हज़रत अली (अ) को ख़िताब करके बयान फ़रमाई थी। सोलहवाँ सबक़ पैग़म्बरे इस्लाम (स) का सबसे बड़ा मोजिज़ा तमाम उलमा ए इस्लाम इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) का सबसे बड़ा मोजिज़ा क़ुरआने मजीद है इस लिये कि: 1. क़ुरआन एक ऐसा अक़्ली मोजिज़ा है जो लोगों की रूह व फ़िक्र के मुताबिक़ है। 2. क़ुरआन हमेशा बाक़ी रहने वाला मोजिज़ा है। 3. क़ुरआन एक ऐसा मोजिज़ा है जो चौदह सदियों से आवाज़ दे रहा है कि अगर तुम कहते हो कि यह किताब, ख़ुदा की तरफ़ से नाज़िल नही हुई है तो उसके जैसी किताब लाकर दिखाओ। क़ुरआने मजीद ने अपने मुन्किरों को कई मक़ाम पर चैलेंज किया है, एक जगह इरशाद होता है: قل لئن اجتمعت الانس والجن علی ان یاتو بمثل هذا القرآن لا یاتون بمثله و لو کان بعضهم لبعض ظهیرا (सूर ए इसरा आयत 88) ‘’कह दो कि अगर तमाम इंसान और जिन मिल जुल कर इस बात पर तैयार हो जायें कि इस क़ुरआन जैसी किताब ले आयें तो वह उसके जैसा नही ला सकते। अगरचे वह एक दूसरे की मदद ही क्यों न करें।’’ दूसरे मक़ाम पर क़ुरआने मजीद अपने उस चैलेंज को आसान बना कर पेश करता है: فاتو بعشر سور مثله مفتریات وادعو من استطعتم من دون الله ان کنتم صادقین (सूर ए हूद आयत 13) ‘’तो तुम उसके जैसे दस सूरह ले आओ और ख़ुदा के अलावा जिसको चाहो मदद के लिये बुला लो अगर तुम अपने दावे में सचे हो।’’ फ़िर क़ुरआन ने एक जगह चैलेंज को और आसान कर दिया , इरशाद होता है: و ان کنتم فی ریب مما نزلنا علی عبدنا فاتو بسورة من مثله (सूर ए बक़रा आयत 21) ‘’अगर तुमको इस उसमें शक व शुबहा है जो हमने अपने बंदे पर नाज़िल किया है तो उसके जैसा एक सूरह ही ले आओ।’’ क़ुरआन में इतने चैलेंजों का आना इस बात की तरफ़ इशारा करता है कि अगरचे पैग़म्बरे इस्लाम (स) को बहुत से दूसरे मोजिज़े भी अता किये गये थे लेकिन उन्होने अपनी हक़्क़ानियत को साबित करने के लिये क़ुरआन के इजाज़ पर ही सबसे ज़्यादा तकिया किया है।