ईद-ए-ज़हरा (स:अ) की ख़ुशी और ईमाम मोहम्मद अल-मेहदी (अ:स) की ईमामत की शुरुआत

हमारे मुआशरे में बहुत सारी ईद आती है जैसे ईद-उल-फितरईद--कुर्बान, ईद--गदीर, ईद--मुबाहला, ईद--ज़हरा (:) वगैर वगैरा! यह सारी ईद किसी किसी ख़ास वाकया की तरफ इशारा करती हैं!जैस -

ईद-उल-फितर - पहली शव्वाल को एक महीने का रोजा तमाम करने का शुक्राना और फितरा निकाल कर गरीबों को ईद का सामान जुटाने के एक ज़रिया है 

ईद--कुर्बान - 10 जिल'हिज्ज को हज़रत ईस्माइल (:) को खुदा ने बचा लिया था और इनकी जगह एक भेड़ (दुम्बा) ज़बह हो गया था, जिस की याद मुसलामानों पर हर साल मनाना सुन्नत है

ईद--गदीर - 18 जिल'हिज्ज को गदीर ख़ुम में मौला--कायनात हज़रत अली (:) की ताजपोशी की याद में हर साल मनाई जाती है, इस दिन रसूले खुदा (::वव) ने गदीर ख़ुम के मैदान में मौला--कायनात को सवा लाख हाजियों के दरम्यान, अल्लाह के हुक्म से अपना जानशीन और खलीफा मुक़र्रर किया था 

ईद--मुबाहला - 24 जिल'हिज्ज को मनाई जाती है, इस रोज़ अहलेबैत (:) के ज़रिया इस्लाम को ईसाइयत पर जीत नसीब हुई थी!

ईद--ज़हरा (:) - 9 रबी'उल अव्वल को मनाई जाती है और इस ईद के मनाने की मुख्तलिफ वजहें ब्यान की जाती हैं, जैसे

कुछ लोग कहते हैं की रबी'उल अव्वल को दुश्मन हज़रत ज़हरा (:) हालाक हुआ लिहाज़ा यह ख़ुशी का दिन है और इस रोज़ को ईद--ज़हरा (:) के नाम से मौसूम कर दिया गया! इस बारे में उलमा और मो'अर्रेखीन के दरम्यान इख्तालाफ पाया जाता है! कुछ लोग कहते हैं की उम्र इब्न खत्ताब की मौत 9 रबी'उल अव्वल को हुई थी, इनकी यह बात सही नहीं है, अल्लामा मजलिसी इस बारे में फरमाते हैं की, " उम्र इब्न खत्ताब के क़त्ल किये जाने की तारीख के बारे में शिया और सुन्नी उल्माओं के बीच मतभेद पाया जाता है" 

अल्लामा मजलिसी ने बहार अल'अनवार में भी इब्न इदरीस की किताब "सराइज़" के हवाले से लिखे है की :               

"हमारे बाज़ उलमा के दरम्यान उमर बिन खत्ताब की वफात का दिन के बारे में इख्तिलाफ पाया जाता है यानी यह लोग यह गुमान करते हैं की उम्रर बिन खत्ताब 9 रबी उल-अव्वल को फ़ौत हुए थे, यह नज़रिया ग़लत है" (बहार अल'अनवार जिल्द 57, पेज 372, चैप्टर 13,  ईरान में प्रकाशित) 

अल्लामा मजलिसी की किताब "अनीस अल'आबेदीन" के हवाले से मजीद लिखते हैं की :

"अक्सर शिया यह गुमान करते हैं की उमर बिन खत्ताब 9 रबी उल-अव्वल को क़त्ल हुए और यह सही नहीं है........" तहकीक 26 ज़िल हिज्ज को क़त्ल हुए.......और इस पर "साहबकिताब गर्रह" "साहब किताब मो'अज्जम" "साहिब किताब तबक़ात", "साहिब किताब मिसार अल'शिया" और इब्न ता'उस की "नस" के इलावा शियों और सुन्नियों का इज्मा भीहासिल है!
 

अगर यह फ़र्ज़ कर भी लिया जाए की वोह 9 रबी उल-अव्वल को फ़ौत हुए ( जो की गलत है) तब भी हज़रत फातमा ज़ाहरा (स:अ) की शहादत पहले हुई, और आपके दुश्मन एक के बाद एक करके बाद में हलाक हुए ..... तो फिर अपने दुश्मनों की हलाकत से  हज़रत फातमा ज़ाहरा (स:अ) किस तरह खुश हुईं ..... लिहाजा ईद-ए- ज़ाहरा (स:अ)  की यह वजह गैर माक़ूल नज़र आती है!

बाज़ लोग यह कहते हैं की 9 रबी उल-अव्वल को जनाब मोख्तार (र:अ) ने ईमाम हुसैन (अ:स) के कातिलों को जहन्नुम रसीद किया था, इसलिए यह रोज़ शियों के लिए खुशियों का दिन है! हम लोगों ने मातेबर तारीख की किताबों में बहुत तलाश किया लेकिन कहीं भी यह बात नज़र नहीं आई की जनाब मुख्तार (र:अ) ने 9 रबी उल-अव्वल को ईमाम हुसैन (अ:स) के कातिलों को क़त्ल किया था, इसलिए यह वजह भी गैर माकूल है!

 

बाज़ लोग यह भी कहते हैं की जनाब मोख्तार (र:अ) ने इब्न ज्याद का सर इमाम जैन अल-आबेदीन (अ:स) की खिदमत में मदीना भेजा और जिस रोज़ यह सर चौथे ईमाम (अ:स) की खिदमत में पहुंचा वोह रबी उल-अव्वल की 9 तारीख थी, ईमाम (अ:स) ने इब्न ज्याद का सर देख कर खुदा का शुक्र अदा किया और मोख्तार (र:अ) को दुआएँ दीं और ठीक इसी वक़्त इन औरतों ने बालों में कँघी और सर में तेल डालना और आँखों में सुरमा लगाना शुरू किया जो वाकये कर्बला के बाद इन चीज़ों को छोड़े हुए थीं!
 

अल'गर्ज़ अगर इसे सही मान लिया जाए तब भी यह ईद जनाब जैनब (स:अ) और जनाब सैय्यद सज्जाद (अ:स) से मंसूब होनी चाहिए थ, और हमें भी ईमाम जैन अल-आबेदीन (अ:स) की पैरवी करते हुए ज़्यादा से ज्यादा शुक्र खुदा का अदा करना  चाहिए था और जनाब मोख्तार (र:अ) के लिए दुआये खैर करना चाहिए थी, लेकिन न तो यह ईद चौथे ईमाम (अ:स) से मंसूब हुई और न जनाब जैनब (स:अ) के नाम से मशहूर है लिहाजा ईद-ए-ज़हरा (स:अ) की यह वजह भी ग़ैर माक़ूल है!

बाज़ उलमा की तहकीक के मुताबिक 9 रबी उल-अव्वल को जनाब रसूल ख़ुदा (स:अ:व:व) की शादी जनाब ख़दीजा (स;अ) से हुई थी और हज़रात फ़ातमा ज़हरा (स:अ) हर साल इस शादी की साल गिरह मनाती थीं, और जशन किया करती थीं, नए लिबास और अच्छे खानों का इंतजाम किया करती थीं, इसलिए आप की सीरत पर अमल करते हुए शिया औरतों ने भी यह साल गिरह मनानी शुरू की, और यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा, आप (स:अ) के बाद यह ख़ुशी आप (स:अ) से मंसूब हो गयी और इसी तरह 9 रबी उल-अव्वल का रोज़ शियों के दरम्यान ईद-ए-ज़हरा (स:अ) के नाम से रख दिया गया, इसलिए  ईद-ए-ज़हरा (स:अ) की यह वजह मुनासिब मालूम होती है, चुनान्चेह एक शख्स ने आयतुल्लाह काशिफ अल'गितह से सवाल किया :

मशहूर है की रबी उल-अव्वल की नवीं तारीख जनाब फ़ातिमा ज़हरा (:) की ख़ुशी का दिन था और है और यह सवाल इस हाल में है की उमर के 26 ज़िल-हिज्ज को ज़ख़्म लगा और 29 ज़िल-हिज्ज को हलाक हुआ लिहाजा यह तारीख हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (:) की वफ़ात से बाद की तारीख है तो फिर हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (:) अपने दुश्मन की मौत से किस तरह खुश हुईं?

इस का जवाब आयतुल्लाह काशिफ अल-गिताह ने इस तरह दिया की : " शिया पुराने ज़माने से रबी उल-अव्वल की नवी तारीख को ईद की तरह ख़ुशी मनाते हैं .... किताब इकबाल में सैय्यद इब्न तावूस ने फरमाया है की, " 9 रबी उल-अव्वल की ख़ुशी इसलिए है की इस तारीख में उमर फौत (मरा) हुआ है और यह बात एक ज़ईफ़ रिवायत से ली गयी है जिस को सदूक (:) ने नकल किया है, लेकिन हकीकत अमर यह है की 9 रबी उल-अव्वल को शियों की ख़ुशी की  शायद इस वजह से है की 8 रबी उल-अव्वल को ईमाम हसन अल-अस्करी (:) शहीद हुए और 9 रबी उल-अव्वल को ईमाम ज़माना (::) की ईमामत का पहला दिन है! इस ख़ुशी का दूसरा एह्त्माल यह है की 9 और 10 रबी उल-अव्वल पैग़म्बर इस्लाम की जनाब खदीजा से शादी का रोज़ है और हज़रत फातमा ज़हरा (:) हर साल इस रोज़ ख़ुशी मनाती थीं और शिया भी आपकी पैरवी करते हुए इन दिनों में ख़ुशी मनाने लगे, मगर शियों को इस ख़ुशी की वजह मालूम नहीं है" 

 

सवाल जवाब का रेफरेंस अयातुल्लाह उल-उज़्मा काशीफ़ अल-गितह पेज 10 और 11, तर्जुमा मौलाना (डाकटर) सैय्यद हसन अख्तर साहब नौगान्वी, मिन्जानिब इदारा--तबलीग इशा'अत - नौगावां सआदत 

 

इस सिलसिला में कुछ लोग गलत बयानी से काम लेते हुए यह कहते हैं की इस दिन जो चाहे गुनाह करें, इस पर अज़ाब नहीं होता और फ़रिश्ते लिखते भी नहीं हैं, और यह लोग अल्लामा मजलिसी की किताब बहार अल-अनवार की इस तवील हदीस का हवाला देतेत हैं जिस को अल्लामा मजलिसी ने सैय्यद बिन तावूस की किताब "ज़वा'इद अल-फ़वा'एद" से नकल किया है! हाँ बहार अल-अनवार में एक हदीस ऐसी ज़रूर लिखी हुई है, मगर यह हदीस कुछ वजहों से काबिल ऐतबार  नहीं है!

1. इस हदीस में लिखा है की 9 रबी उल-अव्वल को जो गुनाह चाहें करें इस को फ़रिश्ते नहीं लिखते और ही अज़ाब किया जाता है!

अगर हम कुरान मजीद के सुराः ज़िल्ज़ाल की आयत 7 और 8 पढ़ते हैं :

  "जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर भी नेकी की वो इसे देख लेगा और जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर भी बदी की है तो वोह इसे देख लेगा"

फ़मन या'अमल मिस'क़ाला ज़र'रतीन खै'रय यराह,  मन या'अमल मिस'क़ाला ज़र'रतीन शर'रय यराह 

فَمَنْ یَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَیْراً یَرَرَہ وَمَنْ یَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرَّاً یَرَ ہ

और हमारे सामने रसूल खुदा की वोह हदीस भी है जिस में आप ने फरमाया है की : "अगर किसी से ऐसी हदीस सुनो जो हम से मंसूब हो और कुरान से टकरा रही हो तो इसे दीवार पर दे मारो यानी इसपर अमल करो! चूँकि यह रोवायत कुरान से टकरा रही है इसलिए काबिल अमल नहीं है! 

 

2. इस हदीस के रावी के गैर मातेबर हैं, चुनान्चेह जब मैंने कुम में आयतुल्लाह शाहरूदी साहब से पूछा तो आप ने ज़बानी तौर पर मुझ से फरमाया की : "इस रिवायत को अल्लामा मजलिसी ने किताब इकबाल से नकल किया है और इसके रावी गैर मातेबर हैं...... 9 रबी उल-अव्वल मरफूए कलम होना ( लिखा जाना) अज़हर मं अल-शम्स है (बिलकुल सामने की बात है), इसलिए ऊपर लिखी रिवायत गैर मातेबर है"  

 

3. इस रिवायत में एक जुम्ला इस तरह आया है की : "रसूल अल्लाह (:::) ने ईमाम हुसैन (:), ईमाम हसन (:) (जो की 9 रबी उल-अव्वल को आपके पास बैठे थे) से फरमाया की इस रोज़ की बरकत और सआदत तुम्हारे लिए मुबारक हो क्योंकि आज के दिन खुदा वंद आलम तुम्हारे और तुम्हारे जद के दुश्मनों को हलाक करेगा" रसूल अकरम (:::) अगर मुस्तकबिल में होने वाले किसी वाकये या हादसे की खबर दें तो सौ फीसद सही, सच और होने वाली हैं, जिस में किसी शक की कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि आप (:::) अपने वादे और कौल के सच्चे हैं! लेकिन मातेबर तारीख में किसी भी दुश्मन रसूल (:::) और आले रसूल (:) की हलाकत 9 रबी उल-अव्वल को नहीं मिलती है इसलिए रिवायत काबिल एतबार नहीं है 

4.  इस रिवायत के आखिर में ईमाम अली (:) के हवाले से 9 रबी उल-अव्वल के 57 नाम ज़िक्र किये गए हैं जिन में "यौम रफ़ा' उल-कलम - गुनाह लिखे जाने का दिन", "यौम सबील अल्लाह 'आला - अल्लाह के रास्ते पर चलने का दिन", "यौम क़त्ल अल-मुनाफ़िक़ - मुनाफिकों के क़त्ल का दिन", "यौमुल ज़हद फिल कबाएर - गुनाहाणे कबीर से बचने का दिन", "यौमुल मो-अज़'ज़ह - वा'अज़ नसीहत का दिन", "यौमुल इबादत - इबादत का दिन" भी शामिल हैं जो आपस में मिलते जुलते हैं यानी 9 रबी उल-अव्वल को गुनाह लिखने का दिन कह के सब कुछ कर डालने की तशवीक़ भी है तो यौम नसीहत इबादत शहद कह कर गुनाहों से रोका भी गया है और यह त्ज़ादिम कलाम मासूम (:) से ही मुमकिन है इसके अलावा कत्ल मुनाफ़िक़ का रोज़ भी कहा गया है जिस की तरदीद आयतुल्लाह काशिफ अल-गितह और आयतुल्लाह शाहरूदी के हवाले से हम कर ही चुके हैं, इसलिए यह रिवायत भी गैर मातेबर है!

5. इस रिवायत में एक जूमला यह भी आया है की : "अल्लाह ने वही के ज़रिये रसूल से कहलाया की :" मोहम्मद! मैंने कराम कातेबीन को हुक्म दिया है की वोह 9 रबी उल-अव्वल को आप (:) और आपके वासी (:) के एहतराम में लोगों के गुनाहों और इनकी खताओं को लिखें" जबकि दूसरी तरफ कुरान मजीद में सुरह हाशिया की आयत 29 में खुदा वंद आलम इस तरह इरशाद फरमाता है की  

"यह हमारी किताब (नामा--आमाल) है जो हक के साथ बोलती है और हम इसमें तुम्हारे आमाल को बराबर लिखवा रहे थे! हाज़ा कितुब्ना यन'तेक़ो अलैकुम बिल'हक़्क़े इन्ना कुन्ना नस'तन-सेखों माँ कुंतुम ता'-मलून 

” ھٰذَا کِتٰبُنَا یَنْطِقُ عَلَیْکُمْ بِالْحَقِّ اِنَّا کُنَّا نَسْتَنْسِخُ مَا کُنْتُمْ تَعْمَلُوْنَ

इससे मालूम होता है की इंसानों के अमाल ज़रूर लिखे जाते हैं और किसी भी रोज़ को मुस्तस्ना नहीं किया गया है!

    और अल्लाह सुरह कहफ़ की आयत 49 में फरमाता है :

"और जब नामा--आमाल सामने रखा जाएगा तो देखोगे की मुजरेमीन इसके मंदारजात को देख कर खौफ्ज़दाह होंगे और कहेंगे, "हाय अफ़सोस! इस किताब ( नामा--आमाल) ने तो छोटा बड़ा कुछ नहीं छोड़ा है और सब को जमा कर लिया है और सब अपने आमाल को बिलकुल हाज़िर पायेंगे और तुम्हारा परवरदिगार किसी एक पर भी ज़ुल्म नहीं करता है"

वज़'अल किताबो फ़तारा अल-मुजरेमीना मुशफे'क़ीना मिम्मा फीहें यक़ूलूना या'वै-लताना माली हाज़ल किताब ला योग़ा'देरो सगीरौ वल कबीरतः ईल्ला अह्साहा वा वाजादो वा मा आमेलु हाज़ेरन वला यजलेमो रब'बका अहदन

وَوَضَعَ الْکِتٰبُ فَتَرَیٰ الْمُجْرِمِیْنَ مُشْفِقِیْنَ مِمَّا فِیْہِ و َ یَقُوْلُوْنَ یٰوَیْلَتَنَا مَالِ ھٰذَا الْکِتٰبَ لَا یُغَادِرُ صَغِیْرَةً وَّ لَا کَبِیْرَةً اِلَّا اَحْصٰھَا وَوَجَدُوْا مَا عَمِلُوْا حَاضِراً وَلَا یَظْلِمُ رَبُّکَ اَحَداً

सुरह ज़िल्ज़ाल आयत 5-18 में फरमाता है

" इस रोज़ सारे इंसान गिरोह गिरोह करके क़ब्रों से निकलेंगे ताकि अपने आमाल को देख सकें फिर जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर भी नेकी की है वोह इसे देखेगा और जिस ने ज़र्रा बराबर भी बुराई की है इसे देख लेगा" "यौ मा-एज़िन यस्देरोन नासो अश्तातल ला यू'रवा ' मालोहुम 'मैय यामल मिसकाला शर'रतीन खै'राइ यरह  'मैय यामल मिसकाला ज़र'रतीन शर'राइ यरह"

یَوْمَئِذٍیَّصْدُرُ النَّاسُ اَشْتَاتاً لِّیُرَوْا اَعْمَالَھُمْ فَمَنْ یَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَیْراً یَّرَہ وَمَنْ یَّعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرّاً یَّرَہ

इस सुरह से भी ज़ाहिर होता है की इंसानों के हर एक छोटे बड़े आमाल ज़रूर लिखे जाते हैं! चूँकि यह रिवायत आयत कुरानी से टकरा रही है, इसलिए गैर मातेबर है!यह भी मुमकिन है की कुछ हजरात यह एतराज़ करें की इतनी मातेबर शख्सियतों जैसे अल्लामा इब्न तावूस, शेख सदूक़, अल्लामा मजलिसी वगैरा ने किस तरह ज़ईफ़ रिवायतों को अपनी किताबों में जगह दे दी?इसका जवाब यह है की शिया उलमा ने कभी भी यह दावा नहीं किया है की हमारी किताबोब में जो भी लिखा है वो सब सही है, बल्कि हमें इनकी छान बीन की ज़रुरत रहती है, क्योंकि जिस ज़माने में यह किताबें मुरत्तब की गयीं वो बहुत पुराशोब दौर था, और शियों की जान माल, इज़्ज़त आब्रो के साथ साथ सकाफत (व्यापार) भी गैर महफूज़ थी जिसकी मिसालों से तारीख का दामन भरा पड़ा है, मुसलमान हुक्मरान शियों के इल्मी सरमाया को नज़र आतिश करना हरगिज़ भूलते थे, ऐसे माहौल में हमारे उल्माए कराम ने हर इस रिवायत और बात को अपनी किताबों में जगह दी जो शियों से ताल्लुक रखती थी, जिसमें कुछ गैर मातेबर रिवायतों का शामिल हो जाना कोई ताज्जुब की बात नहीं है, चूँकि उस ज़माने में छान पटक का मौक़ा था इसलिए यह काम बाद के उल्माओं ने फुर्सत से अंजाम दिया, जभी तो आय्तुलाह काशिफ अल-गितह और आयतुल्लाह शाहरूदी के अलावा दूसरे मरजा--कराम 9 रबी उल-अव्वल वाली इस रिवायत को ज़ईफ़ मानते हैं!

हमें चाहिये की इस रोज़ भी इसी तरह अपने आपको गुनाहों से बचाएं जिस तरह दुसरे अय्याम में बचाना वाजिब है, हमारे 'ईम्मा (:), फुक्हा--आज़म और मराजे-कराम का यही हुक्म है, चुनान्व्चेह जब मैंने इस बात के लिए मराजे कराम आयतुल्लाह उल-उज़मा सैय्यद अली खामनई, अयातुल्लाह मकारंम शीराज़ी,अयातुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी, अयातुलाह इराकी, और अयातुल्लाह साफी गुल्पायेगानी से कुम में इस बाक को पूछा की : "कुछ लोग आलिम और गैर आलिम इस बात को मानते हैं की 9 रबी उल-अव्वल से (जो की ईद--ज़हरा (:) से मंसूब है) 11 रबी उल-अव्वल तक इंसान जो चाहे अंजाम दे चाहे वो काम शर'अन ना'जाएज़ हो तब भी गुनाह शुमार नहीं होगा और फ़रिश्ते इसे नहीं लिखेंगे, बराए मेहरबानी इस बारे में क्या हुक्म है ब्यान फरमाइए" तो इनके जवाबात इस तरह के थे :

आयतुल्लाह उल-उज़मा सैय्यद अली खामनई - "शरियत की हराम की हुई वोह चीज़ें जो जगह और वक़्त से मखसूस नहीं हैं, किसी मखसूस दिन की मुनासबत से हलाल नहीं होंगी, बल्कि ऐसे महरेमात हर जगह और हर वक़्त हराम हैं, और जो लोग बाज़ अय्याम में इनको हलाल की निस्बत देते हैं वोह कोरा झूट और बोहतान है, और हर वोह काम जो बी'ज़ाते खुद हराम हो या मुसलमानों के दरम्यान फूट की वजह बनता हो शर'अन गुनाह और अज़ाब का बा'इस है! 

अयातुल्लाह मकारंम शीराज़ी : यह बात (की 9 रबी उल-अव्वल को गुनाह लिखे नहीं जाते) सही नहीं है और किसी भी फ़क़ीह (आलिम) ने ऐसा हुकन नहीं दिया है, ब्लकि इन अय्याम में तजकिया--नफ़्स और अहलेबैत (:) के इखलाक से नज़दीक होने और फ़ासिक़ फ़ाजिरों के तौर तरीकों से दूर रहने की ज्यादा कोशिश करनी चाहिए!

अयातुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी : यह एतेक़ाद  (की 9 रबी उल-अव्वल को गुनाह लिखे नहीं जाते) गैर सही है, इन अय्याम में भी गुनाह जाएज़ नहीं है, मज्कूरह ईद (ईद--ज़हरा (:) बगैर गुनाह के मनाई जा सकती है 

अयातुलाह इराकी : वोह काम जिन को शरियत--इस्लाम ने मना किया है और मराजे कराम ने अपनी तौज़ीह-अल'मसाइल में ज़िक्र किया है किसी भी वक़्त जाएज़ नहीं है, और यह बातें ((की 9 रबी उल-अव्वल को गुनाह लिखे नहीं जाते) मातेबर नहीं हैं!

अयातुल्लाह साफी गुल्पायेगानी : यह बात की (9 रबी उल-अव्वल को गुनाह लिखे नहीं जाते) अदल--एहकाम के उमूमात इत्लाकात के मुनाफ़ी हैं और ऐसी मातेबर रिवायत की जो इन उमूमी मुतलक़ दलीलों को मखसूस या मुकैय्यद कर दे साबित नहीं है बिल'फ़र्ज़ अगर ऐसी कोई रिवायत होती भी तो यह बात अकल शरियत की खिलाफ है और ऐसी मुकैय्यद मुखास्स दलीलें मुन्सरफ हैं"

 हमें  ईद-ए-ज़हरा (स:अ) की ख़ुशी और ईमाम मोहम्मद अल-मेहदी (अ:स) की ईमामत की शुरुआत का जशन कैसे मनाना चाहिए ?

यह बात साफ़ हो जाने के बाद अब एक सवाल और बाक़ी रह जाता है, वोह यह की :

1. इस ख़ुशी को किस तरह मनाएं? इस तरह जैसे अक्सर बस्तियों में मनाई जाती है या फिर इसमें तब्दीली होनी चाहिए?

2. जिन हस्तियों से यह ख़ुशी मंसूब है उन के किरदार की झलक बी इस ख़ुशी और ईद में नज़र आनी चाहिए या नहीं?

3. यह ख़ुशी ईमाम ज़माना (::) और हज़रत फ़ात्मा ज़हरा (:) से मंसूब है तो क्या हमें इन मासूमीन (:) के शायाने-शान इस ख़ुशी को नहीं मनाना चाहिए?

 हमें क्या हो गया है ? अपने ज़िंदा ईमाम की ख़ुशी को इस अंदाज़ से मनाते हैं? दुन्या की जाहिल तरीम कौमें भी अपने रहबर की ख़ुशी इस तरह मनाती होगी............. 

अफ़सोस सद हज़ार अफ़सोस ! आज कल अगर किसी स्यासी या समाजी शख्सियत के 'ज़ाज़ में जलसे और जुलूस किये जाते है तो इनको उसी के शायाने शान तरीके से इख्ताताम तक पहुंचाने की कोशिश भी की जाती है! 

लेकिन ईद--ज़हरा (:) ! जो खातूने जन्नत, जिगर गोशा--रसूल (:::), ज़ौजा--अली--मुर्तज़ा (:), उम्मुल-आइम्मा (:) ज़हरा बतूल (:) के नाम से मंसूब है वोह इस तरह मनाई जाती है की इसमें शरीफ इंसान शरीक होने की जुर्रत भी कर सके! इस के अलावा आलम--ईस्लाम पर जिस तरह ख़तरात के बादल छाये हुए हैं वोह अहले नज़र से पोशीदा नहीं है, कितना अच्छा हो अगर ईद--ज़हरा (:) अपने हकीकी मानोँ में इस तरह मनाई जाए जिस में तमाम मुस्लेमीन शरीक हो सकें! तबर्रा, फरू'--दींन से ताल्लुक रखता है और फरू'--दींन का ताल्लुक अमल से है.......अगर कोई मुसलमान सिर्फ ज़बान से कहे की नमाज़, रोंज़ा, हज, ज़कात, ख़ुम्स वगैरा वाजिब हैं तो यह तमाम वाजिबात जब तक अमली सूरत में अदा हो जाएँ गर्दन पर क़ज़ा ही रहेंगे.........फरू'--दींन के वाजिबात वक़्त और ज़माने से मखसूस हैं, जिस तरह नमाज़ के वक़्त बताये गए हैं, इसी तरह रोज़ा ज़कात, हज, ख़ुम्स वगैरा का ज़माना भी पक्का किया गया है, लेकिन "अमर बिल मारूफ" और "नही अनिल मुनकर" "तव्ल्ला" और "तबर्रा" यह दीं के ऐसे फरू'--दींन हैं जिन के लिए कोई वक़्त और ज़माना मुक़र्रर नहीं किया गया है, बिल-खुसूस तवल्ला और तबर्रा से तो एक लम्हा के लिए भी गाफिल नहीं रह सकते, यानी हम यह नहीं कह सकते की एक मिनट के लिए मोहब्बत--अहलेबैत (:) को दिल से निकाल दिया गया है या एक लम्हा के लिए दुश्मनाने अहलेबैत (:) के किरदार को अपना लिया गया है, जब ऐसा है तो फिर तबर्रा को 9 रबी उल-अव्वल से क्यों मखसूस कर दिया गया?  इसी रोज़ इसकी क्यों ताकीद होती है? बाक़ी दिनों में यह इसी तरह क्यों नहीं याद आता? वो भी सिर्फ ज़बानी?

ज़बान से तबर्रा काफी नहीं है बल्कि अमली मैदान में आकर तबर्रा करें, यानी अहलेबैत (:) के दुश्मनों की इताअत हुक्मरानी दिल से कबूल करें और इनके पस्त और गिरे हुए किरदार को अपनाएँ!  यह कैसे हो सकता है की कोई शिया जो ख़ुम्स निकालता हो और अपने बेटों को मीरास से महरूम रखता हो वो गासेबीन पर लानत करे और लानत में खुद भी शामिल हो जाए! वोह शिया जो अपने अमल--बद से अहलेबैत (:) को नाराज़ करता हो और वोह अहलेबैत (:) को सताने वालों पर लानत करे और इस लानत के दायरे में खुद भी जाए!

याद रखिये ! लानत नाम पर नहीं किरदार पर होती है, इसीलिए इस का दाएरा बहुत बड़ा होता है

 कुछ ज़रिये से पता चलता है की इस दिन ज्यारत आले यासीन और दुआ-ए-सनमिए कुरैश पढने का बहुत सवाब है!

 

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