ईमाम हुसैन  (अ:स) के सोग व मातम की विदाई

यकीनन मोमिनों के दिल शहादत इमाम हुसैन (अ:स) की मोहब्बत व एहतराम के साथ धड़कते हैं जिनकी हरारत कभी कम नहीं होती" - हज़रत रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) - मुस्तदरक अल वसाइल वोलउम 10, पेज 318

अल्लाह ज़्यादा करे हमारे अजर व सवाब को ईस पर जो कुछ हम ईमाम हुसैन (अ:स) की सोगवारी में करते हैं और हमें तुम्हें ईमाम हुसैन (अ:स) के खून का बदला लेने वालों में करार दे, अपने वली ईमाम अल-मेहदी (अ:त:फ) के हम रिकाब (साथ) हो कर, जो आले मोहम्मद (अ:स) में से हैं

आ'अ ज़मल-लाहो उजू'रना बे'मुसाबिना बिल-हुसैने व जा'अल्ना वा ई'या-कुम मिनत-तालेबीना बे'सारिही मा-आ वली-एही अल-इमाम'अल महदिय्यो मिन आले मोहम्मद अलैहिमुस सलामो 

أَعْظَمَ اللهُ أُجُورَنا بِمُصأبِنا بِالْحُسَیْنِں وَجَعَلَنا وَإِیَّاکُمْ مِنَ الطَّالِبِینَ بِثارِہِ مَعَ وَلِیِّہِ الْاِمامِ الْمَھْدِیِّ مِنْ آلِ مُحَمَّدٍ عَلَیْھِمُ اَلسَّلَامُ

हम ईमाम मोहम्मद अल-मेहदी (अ:स) और तमाम अहलेबैत (अ:स) को शहादत ईमाम हसन अल-अस्करी (अ:स) के मौक़े पर ख़ुलूस दिल से ताज़ियत पेश करते हैं! ईमाम (अ:स) को मोअ'तमिद अब्बासी ने 28 साल की उम्र में ज़हर से इनके कैदखाने में शहीद किया गया! रौज़ा-ए-ईमाम (अ:स) की समर्रा में हाल में दहशत गरदों के ज़रिये की गई तबाही इस बात का सबूत है की अहलेबैत (अ:स) पर अभी भी ज़ुल्म और जब्र हो रहा है! लेकिन रौज़ा-ए-मुक़द्दस की नई तामीर इस बात की गवाही देती है की सच की ही जीत होगी! हम अल्लाह से दुआ करते हैं की दुन्या में अमन और इन्साफ को बहाल करने के लिए हमारे ईमाम मोहम्मद अल-मेहदी (अ:त:फ) के ज़हूर में ताजील (जल्दी) फरमाए - आमीन

चूँकि अय्याम अज़ादारी (के दिन) ख़तम हो रहे हैं, हम अपने ग़म से भरे दिल के साथ शहीदाने कर्बला (अ:स) को भी विदा करते हैं! हमें अब एक साल तक इंतज़ार करना पड़ेगा जब हम मजलिस, मातम, अलम, आशूरा, अर'बईन, ग़म और अपने अज़ादारी को वापस पा सकेंगे! वोह खुश नसीब जो अगले साल तक ज़िंदा रहेंगे अय्याम ग़म मना सकेंगे और जो नहीं रह सकेंगे इनका अपने प्यारे ईमाम (अ:स) पर आखिरी सलाम हो! यकीनन ईमाम हुसैन (अ:स) की याद मनाने की कोई हद नहीं है और यह हर साल बढती ही जाती है! हम अपने काले लिबासों को उतारने के साथ साथ कर्बला के शहीदों पर सलाम भेजते हैं और यह एलान करते हैं की हम सभी आप के साथ हैं और सिर्फ आप ही के साथ हैं, ना की आपके दुश्मनों के साथ!

या अबा-अब्दिल्लाह (अ:स) ! हम यह भी वादा करते हैं की हम आपकी ज़्यारत की पूरी पूरी कोशिश करेंगे और यह भी की हम आपके ग़म में कम से कम हर शबे जुमा को आंसू बहायेंगे! हम आपको हर वक़्त याद करते हैं, आपके दुश्मनों पर लानत करते हैं और हमारे ईमाम (अ:स) जैसा की आपने ख्वाहिश ज़ाहिर की थी जब भी पानी पीते हैं आप (अ:स) लोगों की प्यास को ज़रूर याद करते हैं! ऐ शहीदाने कर्बला (अ:स) हम आप लोगों के ज़रीया सिखाये गए असूलों को अपनी रोज़ाना की जिंदगी में शामिल करेंगे! इन असूलों में सबसे पहला हमारे ईमाम अल्वक़्त (अ:स) की पहचान और इनसे वफादारी है!

हमारे लिए अय्याम अज़ा को विदा करना बड़ा मुश्किल काम है जिस के जज़्बात को मरहूम सच्चे भाई ने बड़ी खूसूरती से अपने नौहे में ब्यान किया है! हमारे एहसासात और जज़्बात और इनसे जुड़े तकरीबात (खुशियाँ) और सोग मोहब्बत अहलेबैत (अ:स) में है और जैसा की उल्माओं ने सिफारिश की है हम अपने ग़म को 9 रबी-अल'अव्वल को ख़तम करके ईद ज़हरा (स:अ) मनाते हैं!

अलविदा, अलविदा अलविदा ऐ हुसैन !!!

विडियो सच्चे भाई मरहूम 

(1) (2)

ये सदाये फुगाँ और यह मजलिसें 

मातम  नौहा और गम की यह ज़िनतें 

चाहता है यह दिल यूँ ही क़ाएम रहे 

आह फटता है दिल किस तरह यह कहें 

अलविदाअलविदाअलविदा  हुसैन 

मेरे मेहमान है आखरी यह सलाम 

तुझ पर कुर्बान है आखरी यह सलाम 

शाह ज़ीशान है है आखरी यह सलाम

दिल है वीरान है आखरी यह सलाम

अलविदाअलविदाअलविदा  हुसैन 

बख्श दे हो गयी हो जो खता 

हक खिदमत  हम से अदा हो सका 

ग़म यही है  जी भर के मातम किया 

तेरी खातिर  क्यों अपना सर दे दिया 

अलविदाअलविदाअलविदा  हुसैन 

गर जिए साल भर फिर करेंगे यह गम 

रोयेंगे फिर तेरे गम में मिलकर बहम 

और अगर मर गए तो यह होगा अलम 

हाय अफ़सोस जी भर के रोये  हम 

अलविदाअलविदाअलविदा  हुसैन 

अलविदा  शहे मशरेक़ैन अलविदा

बिन्ते अहमदन के नूरे ऐन अलविदा

है मुजाहिद के लब पर यह बैन अलविदा

अलविदाअलविदाअलविदा  हुसैन

 

नज़्म - मीर बबर अली अनीस 

(1)

(2) (3)

 मोमिनो हुसैन का मातम अखीर है 

बज़्म अज़ाए किबलाए मातम अखीर है 

शियों शहे इनाम का मातम अखीर है

हैं मज्लिसें तमाम मुहर्रम अखीर है

उरयाँ है सर फ़ातेहे बद्र--हुनैन का  

दे लो बतूल पाक को पुरसा हुसैन का 

हाँ आशिक़ाने शाह उमम पीटो अपना सर 

अशरा है आज और यह कयामत की है सेहर 

आलम के बादशाह का दुन्या से है सफ़र 

उठते हैं ताजिये के चले शाहे बहर--बर

रुखसत है है शह की अहले अज़ा बे हवास हैं 

देखो तो कैसे ताज़िए ख़ाने उदास हैं 

वा हसरता इमाम गरीबाँ का कूच है 

अफ़सोस है के दीन के सुल्ताँ का कूच है 

रौनक़ के दिन चले शहे ज़ीशान का कूच है 

रुखसत करो हुसैन से मेहमां का कूच है 

सदमा अजब तरह का दिल पर है जान पर 

कैसी उदासी फैली हुई है जहांन पर

 नूरे चश्मे  मुख्तार मोख्तार अलविदा 

 सैय्यादः बतूल के दिलदार अलविदा    

 उम्मत रसूल के गमख्वार अलविदा 

 हम से बेकसों के मददगार अलविदा 

आहो बुका से हम कभी गाफिल  होएँगे 

जब तक जियेंगे आपकी ग़ुरबत पर रोयेंगे 

 बे दयार--बे सर--सामान अलविदा

 बिन्ते मुस्तफ़ा के दिल--जान अलविदा

अहमद के बाग़ के गुले रेहान अलविदा 

दस दिन के मोमिनों के महमान अलविदा 

शियों निसार तेरे तन--पाश पाश के 

 बे कफ़न हुसैन फ़िदा तेरी लाश के 

 जिस्म--जान--हैदर कर्रार अलविदा

 शियाने दींन के सरदार अलविदा

सैय्यद ग़रीब बेकस--नाचार अलविदा 

बे-ख्वाहिश--बे बिरादर- बेयार अलविदा 

है है इमामबाड़ों को सुनसान कर चले 

आक़ा तमाम हिन्द को वीरान कर चले

 

लो शाहे दीं के ताजियादारों करो बुका 

मातम के दिन तमाम हुए वा-मुसीबता 

यारो विदा होता है मज़्लूमे कर्बला 

मेहमान दोपहर का है वोह शाहे दो-सरा 

अब मौत ले चली शाहे आली मुक़ाम को 

रुखसत करो हुसैन अलैहिस सलाम को 

पीटो मुहिब्बो हिन्द से आका का कूच है 

रोओ के आज सैय्यदे वाला का कूच है  

अफ़्सोस है के बेकस--तन्हा का कूच है 

हाँ शियों ख़ाक उड़ाओ के मौला का कूच है 

जी भर के रोने पाए  मातम हुआ अखिर 

आशूर का भी रोज़ मुहर्रम हुआ अखीर 

किस तरह आये ताजियादारों के दिल को चैन 

हर सिम्त रूहे फ़ातिमा करती है रो के बैन 

कुर्बान तेरी लाश के ज़हरा के नूरे ऐन 

मोहताज गोर, गर्म ज़मीन पर पड़ा रहा 

चालीस रोज़ दश्त में बे-सर पड़ा रहा 

दो दिन की धुप रात की वोह ओस है सितम

वोह कंकडों का फर्श वोह मैदाने दर्द--गम 

और गर्म गर्म झोकों का चलना वोह दम--दम 

इस दुख पर सारबान ने किया हाथ भी कलम 

सदमे गुज़र गए यह तने चाक चाक पर 

है है यह आसमान  गिरा फट के ख़ाक पर 

लो यारो अब हुसैन की रुखसत का रोज़ है

हैदर के नूरे ऐन की रुखसत का रोज़ है 

ज़हरा के दिल के चैन की रुखसत का रोज़ है 

सुलतान मशरेकैन की रुखसत का रोज़ है 

फिर कर्बला की सिम्त शहे कर्बला चला 

हादी चला ईमाम चला पेशवा चला 

सिब्ते नबी की मजलिस--मातम तमाम है 

इब्ने अली की मजलिस--मातम तमाम है 

हक के वली की मजलिस--मातम तमाम है

रुए सखी की की मजलिस--मातम तमाम है

आइन्दा साल तक जो कोई ज़िन्दा होयेगा 

           फिर वोह शरीक होके मुहर्रम में रोयेगा

 

बस ये ज़रीह होगी  होंगे ये अलम 

ये मजलिसें यह सोहबतें घर घर से होगी कम 

मिम्बर को खाली देख के होयेगा दिल में ख़म 

ये दिन वोह हैं की क़त्ल हुए हैं शहे उमम 

अब ताजिया उठता है हर एक ख़ाक उड़ाएगा 

अब तो इमामबाड़ों में जाया  जाएगा 

रोओ मोहिब्बो आज की रिक़्क़त का रोज़ है 

सिब्ते नबी की आज शहादत का रोज़ है 

सर पर उड़ाओ ख़ाक कयामत का रोज़ है 

मजलूम-ओ-तशना लब पर मुसीबत का रोज़ है 

मातम तुम्हारे आका का यारो तमाम है 

मेहमान कोई दम कोई सा'अत ईमाम है 

अशरे का दिन है आज मोहिब्बाने बा'वफ़ा 

खंजर से ज़िबह हो गए सुल्ताने कर्बला 

लाजिम के आज तुम को करो गिरया-ओ-बुका 

जलती ज़मीन पर तने सरे उरयाँ पड़ा रहा 

ग़ुस्ल-ओ-कफ़न दिया  तने पाश पाश को 

गाड़ा किसी ने आके  सैय्यद की लाश को 

 मोमिनों हुसैन की रहलत का वक़्त है

 यारो तुम से शाह की रुखसत का वक़्त है 

लुटने का फ़ातमा की रियाज़त का वक़्त है 

आका की यह तुम्हारे शहादत का वक़्त है 

तुर्बत में जाके ज़ेर-ओ-ज़मीन गर  सोयेंगे 

फिर अगले साल अशरे में हज़रत को रोयेंगे 

रो लो अज़ीज़ो फिर कहाँ तुम और यह दिन कहाँ 

अगले बरस जो ज़िन्दा थे हैं ख़ाक में निहाँ 

क्या एतेमाद ज़ीस्त का दुन्या के दरम्यान 

पैके अजल से दहर में मिलती है कब अमाँ 

काहे को इस सवाब को हाथों से खोओ तुम

आइन्दा साल हो के  हो खूब रोओ तुम

यारब जहां में नज़्म-ए-रियाज़त हरा रहे 

गुलशन यह जलों से फूला फला रहे

अहले अज़ा पे साया-ए-मुश्किल कुशा रहे 

दामन गुले उम्मीद से हर दम भरा रहे

इस नज़्म का अनीस तुझे फिर सिला मिले 

सदके से पंजतन के जो हो मद'दुआ मिले

 

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