अहकाम - रमज़ान उल मुबारक﴿

 

हे विश्वासियों! रोज़ा तुमहारे लिए निर्धारित है, क्योंकि यह उन लोगों के लिए भी था जो तुम से पहले थे ताकि तुम बुराई से दूर रह सको!. रोज़े (उपवास) के दिन की एक निश्चित संख्या है ...(पवित्र कुरान अध्याय 2, छंद 182-183)

मुख्य सूची / मेन मेनू

1) रमज़ान महीने के रोज़े क्या हैं? एक संक्षिप्त परिचय ! 2) इस्लामी किताबों (मरजा द्वारा) से लिए गए क़ानून
3) फ़िक़ह पर मौलाना सादिक हसन द्वारा दिए व्याख्यान पर नोट्स
यौम-उल-शक का रोज़ा (रमज़ान शुरू होने पर संदेह) | बीमार व्यक्ति | कफ्फारा इत्यादि
4) किताब "जुरिस्प्रुदेंस मेड इज़ी" (आसान न्याय-शास्त्र) में रोज़ा पर बातचीत
5) 'बुनियादी उपवास गाइड' - मौलाना सैयद मुहम्मद रिज़वी 6) उर्दू /हिन्दी में उपवास पर ऑडियो सवाल - जवाब ( मौलाना सादिक़ हसन )
7) इस्लाम में तरावीह की वैधता 8)  रमज़ान के अमाल (19, 21, 23) - शबे कद्र

8) रमज़ान दुआओं का महीना है ! यहाँ पर इस महीने की दुआओं के लिए क्लिक करें

रमज़ान महीने के रोज़े क्या हैं? एक संक्षिप्त परिचय ! 1

मुख्य मेनू

 

इस्लामिक क़ानून - रमज़ान और रोज़ादार 2

मुख्य मेनू

 

1. रोज़े की नियत

*1559 - इंसान के लिए रोज़े की नियत दिल से गुजारना य मसलन यह कहना के "मै कल रोज़ा रखूंगा, ज़रूरी नहीं बल्कि उसका इरादा करना काफी है की वो अल्लाह ताअला की रिज़ा के लिए अजाने सुबह से मगरिब तक कोई भी ऐसा काम नहीं करेगा जिससे रोज़ा बातिल होता हो और यह यकीन हासिल करने के लिए इस तमाम वक़्त में वो रोज़े  से रहा है ज़रूरी है की कुछ देर अजाने सुबह से पहले और कुछ देर मगरिब के बाद भी ऐसे काम से परहेज़ करे जिन से रोज़ा बातिल हो  जाता है !

 

1560  -  इंसान माहे रमजानुल मुबारक की हर रात उस से अगले दिन के रोज़े की नियत कर सकता है और बेहतर यह है की उस महीने की पहली रात को ही सारे महीने के रोज़े की नियत करे

 

*1561 - वो शख्स जिसका रोज़ा  रखने का इरादा हो उसके लिए माहे रमज़ान में रोज़े की नियत का आखरी वक़्त अजाने सुबह से पहले है ! यानी अजाने सुबह से पहले रोज़े की नियत ज़रूरी है, अगरचे नींद या ऐसी ही किसी वजह से अपने इरादे की तरफ मुतवज्जह न हो!

 

*1562 - जिस शख्स ने ऐसे कोई काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करे तो वह जिस वक़्त भी दिन में मुस्तहब रोज़े की नियत कर ले अगरचे मगरिब होने में वक़्त कम ही रह गया हो, उस का रोज़ा सही है!

 

*1563 - जो शख्स माहे रमजानुल मुबारक के रोजों और उसी तरह वाजिब रोजों में जिनके दिन मोईयन है रोज़े की नियत किये बगैर अजाने सुबह से पहले सो जाए अगर वोह जोहर से पहले बेदार हो जाए और रोज़े  की नियत करे तो उसका रोज़ा सही है, और अगर वो जोहर के बाद बेदार हो तो एह्तेयात की बिना पर ज़रूरी है की क़र्बते मुतलक की नियत न करे और उस दिन के रोज़े की कजा भी बजा लाये

 

* 1564 - अगर कोई शख्स माहे रमजानुल मुबारक के रोजों के अलावा कोई दूसरा रोज़ा रकना चाहे   तो ज़रूरी है की उस रोज़े तो मोईयन करे मसलन नियत करे की "मै कजा या कफ्फारे का रोज़ा रख़ रहा हूँ" लेकिन माहे रमजानुल मुबारक में यह नियत करना ज़रूरी नहीं की मै सारे रमजानुल मुबारक का रोज़ा रख़ रहा हूँ बल्कि अगर किसी को इल्म न हो या भूल जाए की माहे रमज़ान है और किसी दुसरे रोज़े की नियत करे तब भी वह रोज़ा माहे रमज़ान का रोज़ा शुमार होगा

 

* 1565  - अगर कोई शख्स यह जानता हो के रमज़ान का महीना है और जान बूझ कर माहे रमज़ान के रोज़े के इलावा  किसी दूसरी रोज़े की नियत करे तो वह रोज़ा जिसकी उसने नियत की है वह रोज़ा शुमार नहीं होगा और इसी तरह वह माहे रमज़ान का रोज़ा भी शुमार नहीं होगा अगर वह नियत क़स्दे कुर्बत के मनाफ़ी हो बल्कि अगर मनाफ़ी न हो तब भी एहतियात की बिना पर वह रोज़ा माहे रमज़ान का रोज़ा शुमार नहीं होगा

 

1566  - मिसाल के तौर पर अगर कोई शख्स माहे रमजानुल मुबारक के पहले रोज़े की नियत करे लेकिन बाद में मालूम हो की यह दूसरा या तीसरा रोज़ा था तो उसका रोज़ा सही है

 

1567  - अगर कोई शख्स अजाने सुबह से पहले रोज़े की नियत करने के बाद बेहोश हो जाए और फिर उसे दिन में किसी वक़्त होश आ जाए तो एहतियाते वाजिब यह है की उस दिन का रोज़ा तमाम करे और उसकी कजा भी बजा लाये

 

1568  - अगर कोई शख्स अजाने सुबह से पहले रोज़े की नियत करे और फिर बेहोश हो जाए और फिर उसे दिन में किसी वक़्त होश आ जाए तो एहतियाते वाजिब यह है की उस दिन का रोज़ा तमाम करे और उसकी कजा भी बजा लाये

 

1569 - अगर कोई शख्स अजाने सुबह से पहले रोज़े की नियत करे और सो जाए और मगरिब के बाद बेदार हो तो उसका रोज़ा सही है

 

*1570 - अगर किसी शख्स को इल्म ना हो या भूल जाए की माहे रमज़ान है और जोहर से पहले इस अम्र की जानिब मुतवज्जह हो और इस दौरान कोई ऐसा काम कर चुका हो जो रोज़े को बातिल करता है तो उसका रोज़ा बातिल होगा लेकिन यह ज़रूरी है की मगरिब तक कोई ऐसा काम न करे जो रोज़े को बातिल करता हो और माहे रमज़ान के बाद रोज़े की कजा भी करे और अगर जोहर के बाद मुतवज्जह हो की रमज़ान का महीना है तो एहतियात के बिना पर यही हुक्म है और अगर ज़ोंहर से पहले मुतवज्जह हो तो कोई ऐसा काम भी न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो उसका रोज़ा सही है

 

*1571 - अगर माहे रमज़ान में बच्चा अजाने सुबह से पहले   बालिग़ हो जाए तो ज़रूरी है की रोज़ा रखे और अगर अजाने सुनाह के बाद बालिग़ हो तो उस दिन का रोज़ा उस पर वाजिब नहीं है लेकिन अगर मुस्तहब रोज़ा रखने का इरादा कर लिया हो तो इस सूरत में एहतियात के बिना पर उस दिन के रोज़े को पूरा करना ज़रूरी है

 

*1572 - जो शख्स मैय्यत के रोज़े रखने के लिए अजीर बना हो या उसके जिम्मे कफ्फारे के रोज़े हो अगर वह मुस्तहब रोज़े रखे तो कोई हर्ज नहीं लेकिन अगर कजा  रोज़े किसी के जिम्मे हो तो वोह मुस्तहब रोज़ा नहीं रख़ सकता और अगर भूल कर मुस्तहब रोज़ा रख़ ले तो इस सूरत में अगर जोहर से पहले याद आ जाए तो उसका रोज़ा कलअदम हो जाता  है और वह अपनी नियत वाजिब रोज़े की जानिब मोड़ सकता है और अगर वह जोहर के बाद मुतवज्जह हो तो एहतियात  के बिना पर उसका रोज़ा बातिल है और अगर उसे मगरिब के बाद याद आये तो उसके रोज़े का सही होना इश्काल से खाली नहीं

 

*1573 - अगर माहे रमज़ान के रोज़े के इलावा कोई दूसरा मखसूस रोज़ा इंसान पर वाजिब हो मसलन उसने मन्नत मानी हो की एक मुक़र्रर दिन को रोज़ा रखेगा और जान बूझ कर अजाने सुबह तक नियत न करे तो उसका रोज़ा बातिल है और अगर उसे मालूम न हो की उस दिन का रोज़ा उस पर वाजिब है या भूल जाए और जोहर से पहले उसे याद आये तो अगर उसने कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो और रोज़े की नियत कर ले तो उसका रोज़ा सही है और अगर जोहर के बाद उसे याद आये तो माहे रमज़ान के रोज़े में जिस एहतियात का ज़िक्र किया गया है उसका ख्याल रखे

 

1574 - अगर कोई शख्स किसी गैर मु'अययन वाजिब रोज़े के लिए मसलन रोज़े कफ्फारा के लिए जोहर के नज़दीक तक आ-मदन ना करे तो कोई हरज नहीं बल्कि अगर नियत से पहले मुसम्मम इरादा रखता हो के रोज़ा नहीं रखेगा या मुज़-बज़ब हो के रोज़ा रखे या नहीं रखे तो अगर उसने कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो और जोहर से पहले रोज़े की नियत कर ले तो उस का रोज़ा सही है

 

*1575 - अगर कोई काफिर माहे रमज़ान में जोहर से पहले मुसलमान हो जाए और अजाने सुबह से उस वक़्त तक कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है की रोज़े की नियत करे और रोज़े को तमाम करे और अगर दिन का रोज़ा न रखे तो उसकी कजा बजा लाये

 

*1576 - अगर कोई बीमार शख्स माहे रमज़ान के किसी दिन में जोहर से पहले तंदुरुस्त हो जाए और उसमे उस वक़्त तक कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो नियत कर के उस दिन का रोज़ा रखना ज़रूरी है और अगर जोहर के बाद तंदरुस्त हो तो उस दिन का रोज़ा उस पर वाजिब नहीं है

 

*1577 - जिस दिन के बारे में इंसान को शक हो की शाबान की आखरी तारीख है या रमज़ान की पहली तारीख उस दिन का रोज़ा रखना उस पर वाजिब नहीं है और अगर रोज़ा रखना चाहे तो रमजानुल मुबारक के रोज़े की नियत नहीं कर सकता लेकिंग नियत कर के अगर रमज़ान है तो रमज़ान का रोज़ा है और अगर रमज़ान नहीं है तो कजा रोज़ा या उसी जैसा कोई और रोज़ है तो बईद नहीं की उसका रोज़ा सही हो लेकिन बेहतर यह है की कजा रोज़े वगैरा की नियत करे और अगर बाद में पता चले की माहे रमज़ान था तो रमज़ान का रोज़ा शुमार होगा लेकिन अगर नियत सिर्फ रोज़े की करे और बाद में मालूम हो के रमज़ान था तब भी काफी है

 

1578 - अगर किसी दिन के बारे में इंसान को शक हो की शाबान की आखिरी तारीख है य रमजानुल मुबारक की पहली तारीख तो वह कजा या मुस्तहब या ऐसे ही किसी और रोज़े की नियत करके रोज़ा रख़ ले, दिन में किसी वक़्त उसे पता चले की माहे रमज़ान है तो ज़रूरी है के माहे रमज़ान के रोज़े की नियत कर ले

 

*1579 -  अगर किसी मुअययन वाजिब रोज़े के बारे में मसलन रमजानुल मुबारक के रोज़े के बारे में इंसान मुज़-बज़ब हो की अपने रोज़े को बातिल करे या न करे या रोज़े को बातिल करने का क़स्द करे तो ख्वाह उसने जो क़स्द किया हो उसे तर्क कर दे और कोई ऐसा काम भी न करे जिस में रोज़ा बातिल होता हो उसका रोज़ा एहतियात के बिना पर बातिल हो जाता है

 

*1580 - अगर कोई शख्स जो मुस्तहब या ऐसा वाजिब रोज़ा मसलन कफ्फारे का रोज़ा रखे हुए हो जिसका वक़्त मुअययन न हो किसी ऐसे काम का क़स्द करे जो रोज़े को बातिल करता हो या मुज़-बज़ब जो की कोई ऐसा काम करे या न करे तो अगर वोह कोई ऐसा काम ना करे और वाजिब रोज़े में जोहर से पहले और मुस्तहब रोज़े में गुरूब (आफताब) से पहले दुबारा रोज़े की नियत कर ले तो उसका रोज़ा सही है!

2. वह चीज़ें जो रोज़े को बातिल कराती हैं

* 1581 चंद  चीज़ें  जो  रोज़े  को  बातिल  कर  देती  हैं  वो  यह  हैं  :

(1) खाना  और  पीना

(2) जिमाअ  करना

(3) इस्तेमना  –  यानी इंसान अपने साथ या किसी दुसरे के साथ जिमाअ के अलावा ऐसा फेल करे जिसके नतीजे में मणि खारिज हो

(4) खुदाए  तआला , पैगम्बरे  अकरम  (सअवव) और  अइम्मा -ए- ताहेरीन  (अस) से  कोई  झूटी  बात  मंसूब   करना

(5) गुबार  हलक  तक  पहुंचाना

(6) मशहूर कौल की बिना पर पूरा सर पानी में डुबाना

(7) अजाने सुबह तक जनाबत या हैज़ और निफासत की हालत में रहना

(8) किसी सैय्याल चीज़ से हुकना (एनिमा) करना

(9)  कै करना 

 

इन मुब्तलात के तफ्सीली अहकाम

 

(1) खाना और पीना

1582 - अगर रोजादार इस अम्र की जानिब मुतवज्जह होते ही की रोज़े से हैं कोई चीज़ जान बूझ कर खाए या पिए तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है! क़तए नज़र इस से की वो चीज़ ऐसी हो जिसे उमूसन खाया या पीया जाता हो मसलन रोटी और पानी या ऐसी हो जिसे उमूसन खाया य पीया ना जाता हो मसलन मिटटी और दरख़्त की शीरा ख्वाह कम हो या ज्यादा हत्ता की अगर रोजादार मिस्वाक मुंह से निकाले और दुबारा मुंह में ले जाए और उस की तरी निगल ले तब भी रोज़ा बातिल हो जाता है सिवाए इस सूरत के की मिस्वाक की तरी लुआबे दहन में घुल मिल कर इस तरह ख़तम हो जाए की उसे बैरूनी तरी ना कहा जा सके

 

1583 - जब रोजादार खाना ख़ा रहा हो, अगर उसे मालूम हो जाए की सुबह हो गयी है तो ज़रूरी है की जो लुक्मः मुंह में हो उसे उगल दे और अगर जान बूझ कर वो लुक्मः निगल ले तो उसका रोज़ा बातिल है! और उस हुक्म के मुताबिक, जिस का ज़िक्र बाद में होगा उस पर कफ्फारा भी वाजिब है!

 

1584 - अगर रोजादार गलती से कोई चीज़ ख़ा ले या पी ले तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता

 

1585 - जो इंजेक्शन उज़्व को बेहिस कर देते हैं या किसी और मकसद के लिए इस्तेमाल होते हैं अगर रोज़ादार इन्हें इस्तेमाल करे तो कोई हर्ज नहीं लेकिन बेहतर यह है की उन इंजेक्शनो से परहेज़ किया जाए जो दवा और गिज़ा के बजाये इस्तेमाल होते हैं

 

1586 - अगर रोज़ादार की दांतों के रेखों में फँसी हुई कोई चीज़ अमदन निगल ले तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है

 

1587 - जो शख्स रोज़ा रखना चाहता हो उस के लिए अजाने सुबह  से पहले दांतों में खिलाल ज़रूरी नहीं है लेकिन अगर उसे इल्म हो जाये की जो गिज़ा दांतों के रेखों में रह गयी है वह दिन के वक़्त पेट में चली जायेगी तो खिलाल करना ज़रूरी है!

 

1588 - मुंह का पानी निगलने से रोज़ा बातिल नहीं होता ख्वाह तुर्शी वगैरा के तसव्वुर से ही मुंह में पानी भर आया हो

 

1589- सर और सीने का बलगम जब तक मुंह के अंदर वाले हिस्से तक ना पहुंचे उसे निगलने में कोई हर्ज नहीं लेकिन अगर मुंह में आ जाए तो एहतियाते वाजिब है की उसे थूक दे

 

* 1590 - अगर रोजादार को इतनी प्यास लगे की की उसे प्यास से मर जाने का खौफ हो जाए या उसे नुकसान का अंदेशा हो या इतनी सख्ती उठानी पड़े जो उस के लिए ना काबिले बर्दाश्त हो तो इतना पानी पी सकता है की उन उमूर का खौफ ख़तम हो जाए लेकिन उसका रोज़ा बातिल हो जाएगा और अगर माहे रमज़ान हो तो एहतियाते लाजिम की बिना पर ज़रूरी है की उस से ज्यादा पानी ना पिए और दिन के बाकी हिस्से में वह काम करने से परहेज़ करे जिससे रोज़ा बातिल हो जाता है

 

1591 - बच्चे या परिंदे को खिलाने के लिए गिज़ा का चबाना या गिज़ा का चखना और इसी तरह के काम जिस में गिज़ा उमुमन हलक तक नहीं पहुँचती ख्वाह वह इत्तेफकान हल्क़ तक पहुँच जाए तो रोज़े को बातिल नहीं करती, लेकिन अगर इंसान शुरू से जानता हो की यह गिज़ा हल्क़ तक पहुँच जायेगी तो उस का रोज़ा बातिल हो जाता है और ज़रूरी है की उस की कजा बजा लाये और कफ्फारा भी उस पर वाजिब है

 

1592- इंसान (मामूली) नकाहत की वजह से रोज़ा नहीं छोड़ सकता, लेकिन अगर नकाहत इस हद तक हो की उमूमन बर्दाश्त ना हो सके तो फिर रोज़ा छोड़ने में कोई हर्ज नहीं

 

(2) जिमाअ

 

1593 -  जिमाअ रोज़े को बातिल कर देता है ख्वाह उज़्वे तनासुल सुपारी तक ही दाखिल हो और मनी भी खारिज ना हो 

 

* 1594 - अगर आलाए तनासुल सुपारी से कम दाखिल हो और मनी भी खारिज ना हो तो रोज़ा बातिल नहीं होता लेकिन जिस शख्स की सुपारी कटी हुई हो अगर वह सुपारी की मिकदार से कमतर मिकदार दाखिल करे तो अगर यह कहा जाए की उसने हमबिस्तरी की है तो उसका रोज़ा बातिल  हो जाएगा

 

* 1595 - अगर कोई शाल्ख्स आमदन जिमाअ का इरादा करे और फिर शक करे की सुपारी के बराबर दाखिल हुआ था या नहीं तो एहतियाते लाजिम की बिना पर उस का रोज़ा बातिल है और ज़रूरी है की उस रोज़े की कजा बजा लाये लेकिन कफ्फारा वाजिब नहीं है

 

1596 - अगर कोई शख्स भूल जाए की रोज़े से है और जिमाअ करे या उसे जिमाअ पर इस तरह मजबूर किया जाए की उसका इख्तियार बाक़ी ना रहे तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होगा अलबत्ता अगर जिमाअ की हालत में उसे याद आ जाए की रोज़े से है या मजबूरी ख़तम हो जाए तो ज़रूरी है की फ़ौरन तर्क करे और अगर ऐसा ना करे तो उसका रोज़ा बातिल है

 

(3) इस्तेमना

 

1597 -  अगर रोजादार इस्तेमना करे (इस्तेमना के मानी मसाइल संख्या 1571 में बताये जा चुके हैं), तो उसका रोज़ा बातिल है

 

1598 - अगर बे-इख्तियारी की हालत में किसी की मनी खारिज हो जाए तो  उसका रोज़ा बातिल नहीं है

 

1599 - अगरचे रोज़ादार को मालूम है की अगर दिन में सोयेगा तो उसे एहतिलाम हो जाएगा यानी सोते में उसकी मनी खारिज हो जायेगी तो भी उसके लिए सोना जाएज़ है, ख्वाह ना सोने की वजह से उसे कोई तकलीफ न भी हो और उसे एहतिलाम हो जाए तो बी उसका रोज़ा बातिल नहीं होता है

 

1600 - अगर रोज़ादार मनी खारिज होते वक़्त नींद से बेदार हो जाए तो उसपर यह वाजिब नहीं की मनी को निकलने से रोके

 

1601 - जिस रोज़ेदार को एहतिलाम हो गया हो तो वह पेशाब कर सकता है ख्वाह उसे यह इल्म हो की पेशाब करने से बाक़ी मानदः मनी नाली से बाहर आ जायेगी

 

1602 - जब रोज़ेदार को एहतिलाम हो जाए अगर उसे मालूम हो की मनी नाली में रह गयी है  और वह गुसल से पहले पेशाब नहीं करेगा तो गुसल के बाद मनी उसके जिस्म से खारिज होगी तो एहतियाते मुस्तहब यह है की गुसल से पहले पेशाब करे

 

* 1603 - जो शख्स मनी निकालने  के इरादे से छेड़ छाड़ और दिल्लगी करे तो ख्वाह मनी न भी निकले तो एहतियाते लाजिम की बिना पर ज़रूरी है की रोज़े को तमाम करे और उसकी क़ज़ा भी बजा लाये! 

 

1604 - अगर रोजादार मनी निकालने के इरादे के बगैर मिसाल के तौर पर अपनी बीवी से छेड़ छाड़ और हंसी मजाक करे और उसे इत्मीनान हो की मनी खारिज नहीं होगी अगरचे इत्तेफाक़न मनी खारिज हो जाए , उसका रोज़ा सही है, अलबत्ता उसे इत्मीनान ना हो तो उस सूरत में जब मनी खारिज होगी तो उसका रोज़ा बातिल हो जाएगा

 

(4) ख़ुदा व  रसूल पर बोहतान बाँधना

* 1605 - अगर रोज़ादार  ज़बान से या लिख कर या इशारे से या किसी और तरीके से अल्लाह तआला या रसूले अकरम (सललल्लाहो इलैहे व आलेही व सल्लम) या आपके (बार हक़) जा नशीनो में से किसी से जान बूझ कर कोई झूठी बात मंसूब करे तो अगरचे वह फ़ौरन कह दे की मैंने झूठा कहा है या तौबा कर ले तब भी एहतियाते लाजिम की बिना पर हजरत फातिमा ज़हरा (सल्वातुल्लाहे अलैहा) और तमाम अम्बियाए मुरसलीन (अस) और उन के जा नशीनो से भी कोई झूठी बात मंसूब  करने का यही हुक्म है

 

1606 - अगर (रोज़ादार) कोई ऐसी रिवायत नकल करना चाहे जिस के कतई होने की दलील न हो और उस के बारे में उसे यह इल्म न हो की सच है की झूठ तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है की जिस शख्स से वह रिवायत हो या जिस किताब में लिखी देखी हो उसका हवाला दे!

 

1607 - अगर किसी रिवायत के बारे में इख्तालाफ रखता हो की वह वाकई कौले खुदा या कौले पैगम्बर (सललल्लाहो इलैहे व आलेही व सल्लम) है और उसे अल्लाह तआल़ा या पैगम्बरे अकरम (सललल्लाहो इलैहे व आलेही व सल्लम) से मंसूब करे और बाद में मालूम हो की निस्बत ठीक नहीं थी तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होगा!

 

*1608 - अगर रोज़ादार किसी चीज़ के बारे में यह जानते हुए की झूठ है उसे अल्लाह तआल़ा और रसूले अकरम (सललल्लाहो इलैहे व आलेही व सल्लम) से मंसूब करे और बाद में उसे पता चले की जो कुछ उसने कहा था वह दुरुस्त था तो एहतियाते लाजिम की बिना पर ज़रूरी है की रोज़े को तमाम करे और उसकी क़ज़ा भी बजा लाये

 

* 1609 -  अगर रोज़ादार किसी ऐसे झूठ को जो खुद रोज़ादार ने नहीं बल्कि किसी दुसरे ना गढ़ा हो जान बूझ कर अल्लाह तआला या रसूले अकरम (सललल्लाहो इलैहे व आलेही  सल्लम) या आपके (बर हक़) जानशीनो से मंसूब कर दे तो एहतियाते लाजिम की बिना पर उसका रोज़ा बातिल हो जाएगा लेकिन अगर जिसने झूठ गढ़ा हो उसका कौल नकल करे तो कोई हरज नहीं!

 

* 1610 - अगर रोज़ादार से सवाल किया जाए की किया रसूले मोहतषम (स:अ) ने ऐसा फरमाया है और वह अमदन जहाँ  जवाब "नहीं" देना चाहिए वहां "इसबात" में दे और जहाँ "इसबात" में देना चाहिए वहां अमदन "नहीं" दे तो एहतियाते लाजिम की बिना पर उसका रोज़ा बातिल हो जाता है!

 

* 1611-  अगर कोई शख्स अल्लाह तआला या रसूले अकरम (सललल्लाहो इलैहे व आलेही  सल्लम) का कौले दुरुस्त नक़ल करे और बाद में कहे की मैंने झूठ कहा है या रात को कोई झूठी बात उनसे मंसूब करे और दुसरे दिन जबकि रोज़ा रखा हुआ हो कहे की जो कुछ मैंने गुज़श्तः रात कहा ठा वह दुरुस्त है तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है लेकिन अगर वह रिवायत के (सही या गलत होने के) बारे में बताये (तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता है)!

 

 

(5) ग़ुबार को हलक़ तक पहुंचाना 

* 1612 - एहतियाते वाजिब की बिना पर कसीफ़ गुबार का हलक़ तक पहुंचाना रोज़े को बातिल कर देता है ख्वाह गुबार किसी ऐसी चीज़ का हो जिसका खाना हलाल हो मसलन आटा या किसी ऐसी चीज़ का हो जिसका खाना हराम हो मसलन मिट्टी

 

* 1613 - अक़वा यह है की गैरे कसीफ़ गुबार हलक़ तक पहुँचने से रोज़ा बातिल हो जाता है

 

* 1614  - अगर हवा की वजह से गुबार पैदा हो सुर इंसान मुतवज्जह होने और एहतियात कर सकने के बावजूद एहतियात ना करे और गुबार उसके हलक़ तक पहुँच जाए तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उसका रोज़ा बातिल हो जाता है

 

* 1615 - एहतियाते वाजिब यह है की रोजादार सिगरेट और तम्बाकू वगैरा का धुआं भी हलक़ तक ना पहुंचाए !

 

* 1616 - अगर इंसान एहतियात न करे और गुबार य धुआं वगैरा हलक़ में चला जाए तो अगर उसे यकीन य इत्मीनान था की यह चीज़ें हलक़ में ना पहुंचेगी तो उसका रोज़ा सही है लेकिन अगर उसे गुमान था की यह हलक़ तक नहीं पहुंचेगी तो बेहतर है की रोज़े की क़ज़ा बजा लाये!

 

1617 - अगर कोई शख्स यह भूल जाए की रोज़े से है एहतियात ना करे या बे इख्तियार  गुबार वगैरा उसके हलक़ तक पहुँच जाए तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता !

 

 

(6) सर को पानी में डुबोना

 

* 1618 - अगर रोज़ादार जान बूझ कर सारा सर पानी में डुबो दे तो ख्वाह उस का बाक़ी बदन पानी से बाहर रहे मशहूर  कौल की बिना पर उसका रोज़ा बातिल हो जाता है लेकिन बईद नहीं की ऐसा करना रोज़े को बातिल न करे ! अगरचे ऐसा करने में शदीद कराहत है और मुमकिन हो तो उससे एहतियात करना बेहतर है!

 

* 1619 - अगर रोज़ादार अपने निस्फ सर को एक दफा और बक़ी निस्फ सर को दूसरी दफा पानी में डुबोये तो उसका रोज़ा सही होने में कोई इश्काल नहीं है!

 

* 1620 - अगर सारा सर पानी में डूब जाए तो ख्वाह कुछ बाल पानी से बाहर भी रह जाएँ तो उसका हुक्म भी मसअला 1618  की तरह है! 

 

* 1621 - पानी के इलावा दूसरी सय्याल चीज़ों मसलन दूध में सर डुबोने से रोज़े को कोई ज़रर नहीं पहुँचता और मुजाफ पानी में सर डुबोने का भी यही हुक्म है!

 

* 1622 - अगर रोज़ादार बे इख्तियार पानी में गिर जाए और उसका पूरा सर पानी में डूब जाए य भूल जाए की रोज़े से है और सर पानी में डुबो ले तो उसक एरोज़े में कोई  इश्काल नहीं है!

 

* 1623 - अगर कोई रोज़ादार यह ख्याल करते हुए अपने आपको पानी में गिरा दे की उसका सर पानी में नहीं  डूबेगा लेकिन उसका पूरा सर पानी में डूब जाए तो उसके रोज़े में बिलकुल इश्काल नहीं है!

 

* 1624 - अगर कोई शख्स भूल जाए की रोज़े से है और सर पानी में डुबो दे तो अगर पानी में डूबे हुए उसे याद आये की रोज़े से है तो बेहतर यह है की रोज़ादार फ़ौरन अपना सर पानी से बाहर निकाले और अगर ना निकाले तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होगा !

 

* 1625 - अगर कोई शख्स रोज़ादार के सर को ज़बरदस्ती पानी में डुबो दे तो उसके रोज़े में कोई इश्काल नहीं है लेकिन जबकि अभी वह  पानी में है दूसरा शख्स अपना हाथ हटा ले तो बेहतर है की फ़ौरन अपना सर पानी से बाहर निकाल ले!

 

* 1626- अगर रोज़ादार ग़ुस्ल की नियत से सर पानी में डुबो दे तो उस का रोज़ा और ग़ुस्ल दोनों सही हैं!

 

* 1627 - अगर कोई रोज़ादार किसी को डूबने से बचाने की ख़ातिर सर को पानी में डुबो दे ख्वाह उस शख्स तो बचाना वाजिब ही क्यों ना हो एहतियाते मुस्तहब है की रोज़े की क़ज़ा बजा लाये!

 

 

(7 ) अजाने सुबह तक जनाबत, हैज़, और निफासत की हालत में रहना

 

* 1628  - अगर जुनुब शख्स माहे रमज़ानुल मुबारक में जान बूझ कर अजाने सुबह तक  ग़ुस्ल ना करे तो उसका रोज़ा बातिल है और जिस शख्स का वजीफा तय्मुम हो और जान बूझ कर तय्मुम न करे तो उसका रोज़ा भी बातिल है और माहे रमज़ान की क़ज़ा का हुक्म भी यही है!

 

1629 - अगर जुनुब शख्स माहे रमज़ान के रोज़ों और उनकी क़ज़ा के इलावा उन वाजिब रोज़ों में जिनका वक़्त माहे रमज़ान के रोज़ों की तरह मुअययन है जान बूझ कर अजाने सुबह तक ग़ुस्ल ना करे तो अजहर यह है की उसका रोज़ा सही है!

 

* 1630  - अगर कोई शख्स माहे रमज़ानुल मुबारक की किसी रात में जुनुब हो जाए तो अगर वह अमदन ग़ुस्ल न करे हत्ता की वक़्त तंग हो जाए तो ज़रूरी है की तय्मुम करे और रोज़ा रखे और एहतियाते मुस्तहब यह है की उसकी क़ज़ा भी बजा लाये!

 

1631  - अगर जुनुब शख्स माहे रमज़ान में ग़ुस्ल करना भूल जाए और एक दिन के बाद उसे याद आये तो ज़रूरी है की उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे और अगर चंद दिनों के बाद याद आये तो उतने दिनों के रोज़ों की क़ज़ा करे और अगर चंद दिनों के बाद याद आये तो उतने दिनों के रोज़ा की क़ज़ा करे जितने दिनों के बारे में उसे यक़ीन हो की वह जुनुब या मसलन अगर उसे यह इल्म न हो की तीन दिन जुनुब रहा था या चार दिन तो ज़रूरी है की तीन दिनों के रोजो की क़ज़ा करे!

 

1632 - अगर कोई ऐसा शख्स अपने आप को जुनुब कर ले जिसके पास माहे रमज़ान की रात में ग़ुस्ल और तय्मुम में से किसी के लिए भी वक़्त न हो तो उसका रोज़ा बातिल है और उसपर क़ज़ा और कफ्फारा दोनों वाजिब है!

 

* 1633 - अगर रोज़ादार यह जान्ने के लिए जुस्तजू करे  की उस के पास वक़्त है या नहीं और गुमान करे की उसके पास ग़ुस्ल के लिए वक़्त है और अपने आप को जुनुब कर ले और बाद में उसे पता चले की वक़्त तंग था और तय्मुम करके रोज़ा रखे तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर ज़रूरी है की उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करे!

 

* 1634  - जो शख्स माहे रमज़ान की किसी रात को जुनुब हो   और जानता हो की अगर सोयेगा तो सुबह तक बेदार ना होगा, उसे बगैर ग़ुस्ल किये न सोना चाहिए और अगर वह ग़ुस्ल करने से पहले अपनी मर्जे से सो जाए और सुबह तक बेदार न हो तो उसका रोज़ा बातिल है और क़ज़ा और कफ्फारा दोनों उस पर वाजिब हैं!

 

* 1635 - जब जुनुब माहे रमज़ान की रात में सोकर जाग उठे तो एहतियाते  वाजिब यह है की अगर वह बेदार होने के बारे में मुतमइन हो तो ग़ुस्ल से पहले न सोये अगरचे इस बात का एह्तिमाल हो की अगर दुबारा सो गया तो सुबह की अज़ान से पहले बेदार हो जाएगा!

 

* 1636 - अगर कोई शख्स माहे रमज़ान की किसी रात में जुनुब हो और यक़ीन रखता हो की अगर सो गया तो सुबह की अज़ान से पहले बेदार हो जाएगा और उसका मुसम्मम इरादा हो की बेदार होने के बाद ग़ुस्ल करेगा और इस इरादे के साथ सो जाए और अज़ान तक सोता रहे तो उसका रोज़ा सही है! और अगर कोई शख्स सुबह की अज़ान से पहले बेदार होने के बारे में मुतमइन हो तो उसके लिए भी यही हुक्म है!

 

1637 - अगर कोई शख्स माहे रमज़ान की किसी रात में जुनुब हो और उसे इल्म हो या एह्तिमाल हो की अगर सो गया तो सुबह की अज़ान से पहले बेदार हो जाएगा और वह इस बात से ग़ाफिल  हो की बेदार होने के बाद उस पर ग़ुस्ल करना ज़रूरी है तो उस सूरत में जबकि वह सो जाए और सुबह की अज़ान तक सोया रहे एहतियात की बिना पर उस पर क़ज़ा वाजिब हो जाती है!

 

* 1638 - अगर कोई शख्स माहे रमज़ान में किसी रात में जुनुब हो और उसे यक़ीन हो या एह्तिमाल इस बात का हो की अगर वह सो गया तो सुबह की अज़ान से पहले बेदार हो जाएगा और वह बेदार होने के बाद ग़ुस्ल न करना चाहता हो तो उस सूरत में जबकि वह सो जाए और बेदार न हो उस का रोज़ा बातिल है, और क़ज़ा और कफ्फ़ारा उस के लिए लाजिम है! और इसी तरह अगर बेदार होने के बाद उसे तरद्दुद हो की ग़ुस्ल करे या न करे तो एहतियाते लाजिम की बिना पर यही हुक्म है!

 

* 1639 - अगर जुनुब शख्स माहे रमज़ान की किसी रात में सोकर जाग उठे और उसे यक़ीन हो या इस बात का एह्तिमाल हो की अगर दुबारा सो गया तो सुबह की अज़ान से पहले बेदार हो जाएगा और वोह मुसम्मम इरादा भी रखता हो की बेदार होने बाद के ग़ुस्ल करेगा और दुबारा सो जाए और अज़ान तक बेदार न हो तो ज़रूरी है की बतौरे सज़ा उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे! और अगर दूसरी नींद से बेदार हो जाए और तीसरी दफा सो जाए और सुबह की अज़ान तक बेदार न हो तो ज़रूरी है की उस दिन के रोज़े के क़ज़ा करे और एहतियाते मुस्तहब की बिना पर कफ्फ़ारा भी दे!

 

1640 - जब इंसान को नींद में एहतिलाम हो जाए तो पहली, दूसरी और तीसरी नींद से मुराद वह नींद है की इंसान (एहतिलाम से) जागने के बाद सोये लेकिन वह नींद जिसमे एहतिलाम हुआ पहली नींद में शुमार नहीं होती!

 

1641 - अगर किसी शख्स को दिन में एहतिलाम हो जाए तो फ़ौरन ग़ुस्ल करना वाजिब नहीं!

 

1642 - अगर कोई शख्स माहे रमज़ान में सुबह की अज़ान के बाद जागे और यह देखे की उसे एहतिलाम हो गया है तो अगरचे उसे मालूम हो की यह एहतिलाम अज़ान से पहले हुआ है, उस का रोज़ा सही है!

 

* 1643 - जो शख्स रमज़ानुल मुबारक का क़ज़ा रोज़ा रखना चाहता हो और वह सुबह की अज़ान तक जुनुब रहे तो अगर उसका इस हालत में रहना अमदन हो तो उस दिन का रोज़ा नहीं रख़ सकता और अगर अमदन नो हो तो रोज़ा रख़ सकता है अगरचे एहतियात यह है की रोज़ा न रखे 

 

* 1644 - जो शख्स रमज़ानुल मुबारक के क़ज़ा रोज़े रखना चाहता हो अगर वह सुबह की अज़ान के बाद बेदार हो और देखे की उसे एहतिलाम हो गया है और जानता हो की यह एहतिलाम उसे सुबह की अज़ान से पहले हुआ है तो अक़वा की बिना पर उस दिन माहे रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा की नियत से रोज़ा रख़ सकता है!

 

1645  - अगर माहे रमज़ान के क़ज़ा रोज़ों के इलावा ऐसे वाजिब रोज़ों में की जिन का वक़्त मुअय्यन नहीं है मसलन कफ्फारे के रोज़े में कोई शख्स अमदन अजाने सुबह तक जुनुब रहे तो अज़हर यह है की उसका रोज़ा सही है लेकिन बेहतर है की उस दिन के अलावा किसी दुसरे दिन का रोज़ा रखे!

 * 1646 - अगर रमज़ान के रोज़ों में औरत सुबह की अज़ान से पहले हैज़ या निफास से पाक हो जाए और अमदन ग़ुस्ल ना करे या वक़्त तंग होने की सूरत में - अगरचे उसके अख्त्यार में हो और रमज़ान का रोज़ा हो - तय्मुम न करे तो उसका रोज़ा बातिल है और एहतियात की बिना पर माहे रमज़ान के क़ज़ा रोज़े का भी यही हुक्म है (यानी उस का रोज़ा बातिल है) और इन दो के इलावा दीगर सूरतों में बातिल नहीं अगरचे अहवत यह है के ग़ुस्ल करे! माहे रमज़ान में जिस औरत की शरई ज़िम्मेदारी हैज़ या निफास के ग़ुस्ल के बदले तय्मुम हो और इसी तरह एहतियात की बिना पर रमज़ान की क़ज़ा में अगर जान बूझ कर अजाने सुबह से पहले तय्मुम न करे तो उस का रोज़ा बातिल है!

 

* 1647 - अगर कोई औरत माहे रमज़ान में सुबह की अज़ान से पहले हैज़ या निफास से पाक हो जाए और ग़ुस्ल के लिए वक़्त न हो तो ज़रूरी है की तय्मुम करे और सुबह की अज़ान तक बेदार रहना ज़रूरी नहीं है! जिस जुनुब शख्स का वज़ीफ़ा तय्मुम हो उसके लिए भी यही हुक्म है!

 

1648  - अगर कोई औरत माहे रमज़ान में सुनाह की अज़ान के नज़दीक हैज़ या निफास से पाक हो जाए और ग़ुस्ल या तय्मुम किसी के किये भी वक़्त बाकी न हो तो उस का रोज़ा सही है!

 

1649 - अगर कोई औरत सुबह की अज़ान के बाद हैज़ य निफास के खून से पाक हो जाए या दिन में उसे हैज़ या निफास का खून आ जाए तो अगरचे यह  खून मगरिब के क़रीब ही क्यों  आये, उसका रोज़ा बातिल है!  

 

1650 - अगर औरत हैज़ या निफास का ग़ुस्ल करना भूल जाए और उसे एक या कई दिन के बाद याद आये तो जो रोज़े उसने रखे हैं वोह सही हैं!

 

* 1651 - अगर औरत माहे रमज़ानुल मुबारक में सुबह की अज़ान से पहले हैज़ या निफास से पाक हो जाए और ग़ुस्ल करने में कोताही करे और सुबह की अज़ान तक ग़ुस्ल  करे और वक़्त तंग होने की सूरत में तय्मुम भी ना करे तो उसका रोज़ा बातिल है, लेकिन अगर कोताही न करे मसलन मुन्तजिर हो की ज़नाना हम्माम मुयस्सर आ जाए ख्वाह उस मुद्द्त में वह तीन दफः सोये और सुबह की अज़ान तक ग़ुस्ल न करे और तय्मुम करने में भी कोताही न करे तो उसका रोज़ा सही है!

 

* 1652 - जो औरत इस्तिहाज़ाये कसीरः की हालत में हो अगर वह अपने गूसलों को उस तफसील के साथ न बजा लाये जिसका ज़िक्र मसअला 402 में किया गया है तो उसका रोज़ा सही है! ऐसे ही इस्तिहाज़ाये मुत्तवाससित में अगरचे औरत ग़ुस्ल भी न करे, उसका रोज़ा सही है!

 

1653 - जिस शख्स ने मैय्यत को मस किया है यानी अपने बदन का कोई हिस्सा मैय्यत के बदन से छुआ हो वह गुसले मैय्यत के बगैर रोज़ा रख़ सकता है और अगर रोज़े की हालत में भी मैय्यत को मस करे तो उस का रोज़ा बातिल नहीं होता है!

 

(8) हुक्ना लेना 

1654  - सैय्याल चीज़ से हुकना (एनिमा) अगरचे ब अमरे मजबूरी और इलाज की गरज से लिया जाए, रोज़े को बातिल कर देता है!

 

(9 ) कै करना 

1655 - अगर रोज़ादार जान बूझ कर  कै करे तो अगरचे वह बिमारी की वजह से ऐसा करने पर मजबूर हो तो उसका रोज़ा बातिल  हो जाता है लेकिन अगर सहवन या बे इख्तियार हो कर कै करे तो कोई हर्ज नहीं है!

 

* 1656 - अगर कोई शख्स रात को ऐसी चीज़ ख़ा ले जिसके बारे में मालूम हो की उस के खाने की वजह से दिन में बे इख्तियार कै आयेगी तो एहतियाते मुस्तहब यह है की उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे!

 

* 1657 -  अगर रोज़ादार कै कर सकता हो और ऐसा करना उस के लिए मुज़ीर और तकलीफ का बाइस न हो तो बेहतर यह है  की कै को रोके!

 

* 1658 - अगर रोज़ादार के हलक़ में मकखी  चली जाए य चुनांचे वह इस हद तक अंदर चली गयी हो की उसके नीचे ले जाने को निगलना न कहा जाए तो ज़रूरी नहीं की उसे बाहर निकाला जाए और उसका रोज़ा सही है लेकिन अगर मकखी काफी हद तक अंदर न गयी हो तो ज़रूरी है की बाहर निकाले अगरचे उसको कै करके ही निकालना पड़े मगर यह है की कै करने में रोजादार को ज़रूर और तकलीफ न हो और अगर वह कै न करे और उसे निगल ले तो उसका रोज़ा बातिल हो जाएगा!

 

1659 - अगर रोज़ादार सहवन कोई चीज़ निगल ले और उसके पेट में पहुँचने से पहले उसे याद आ जाए की रोज़े से है तो उस चीज़ का निकालना लाजिमी नहीं और उसका रोज़ा सही है!

 

1660 - अगर किसी   रोज़ादार को यक़ीन हो की डकार लेने की वजह से कोई चीज़ उसके हलक़ से बाहर आ जायेगी तो एहतियात की बिना पर उसे जान बूझ कर डकार नहीं लेनी चाहिए, लेकिन उसे यक़ीन न हो तो कोई हर्ज नहीं!

 

1661 - अगर रोज़ादार डकार ले और कोई चीज़ उसके मुंह या हलक़ में आ जाए तो ज़रूरी है की उसे उगल दे और अगर वह चीज़ बे इख्तियार पेट में चली जाए तो उसका रोज़ा सही है!

3. उन चीज़ों के अहकाम जो रोज़े को बातिल करती हैं |

उन चीज़ों के अहकाम जो रोज़े को बातिल करते हैं!

* 1662 - अगर इंसान जान बूझ कर और इख्तियार के साथ कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है और अगर कोई ऐसा काम जान बूझ कर न करे तो फिर इश्काल नहीं लेकिन अगर जुनुब सो जाए और उस तफसील के मुताबिक जो मसअला 1639  में ब्यान की गयी है सुबह की अज़ान तक ग़ुस्ल ना करे तो उसका रोज़ा बातिल है! चुनांचे अगर इंसान न जानता हो के जो बातें बताईं गयीं हैं उनमे से बाज़ रोज़े को बातिल करती हैं यानी जाहिल क़ासिर हो और इनकार भी न करता हो ( ब अल्फाज़े दीगर मुक़स्सिर "न" हो) या यह के शरई हुज्जत पर एतेमाद रखता हो और खाने  पीने और जिमाअ के इलावा उन अफआल में से किसी फेल को अंजाम दे तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होगा!

 

* 1663 - अगर रोज़ेदार सहवन कोई ऐसा कम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और इस गुमान से की उस का रोज़ा बातिल हो गया है दुबारा अमदन कोई ऐसा ही काम करे तो उस का रोज़ा बातिल हो जाता है!

 

* 1664 - अगर कोई चीज़ ज़बरदस्ती रोज़ादार के हलक़ में उँडेल दी जाए तो उसका रोज़ा बातिल नहीं होता लेकिन अगर उसे मजबूर किया जाए मसलन उसे कहा जाए की अगर तुम गिज़ा नहीं खाओगे तो हम तुम्हे माली या जानी नुकसान पहुंचाएंगे और वह नुकसान से बचने के लिए अपने आप कुछ ख़ा ले तो उसका रोज़ा बातिल हो जाएगा!

 

* 1665 - रोज़ादार को ऐसी जगह नहीं जाना चाहिए जिसके बारे में वह जानता हो की लोग कोई चीज़ उसके हलक़ में डाल देंगे या उसे रोज़ा तोड़ने पर मजबूर  करेंगे और अगर ऐसी जगह जाए या ब अमरे-मजबूरी वह खुद कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो तो उसका रोज़ा बातिल हो जाता है और अगर कोई चीज़ उसके हलक़ में उँडेल दी जाए तो एहतियाते लाजिम की बिना पर यही हुक्म है!

4. वो चीज़ें जो रोज़दारों के लिए मकरूह हैं

* 1666 - रोजादारों के लिए कुछ चीज़ें मकरूह हैं और उनमें से बाज़ यह हैं :

(1)  आँख में दवा डालना और सुरमा लगाना जबकि उस का मज़ा या बू हलक़ में पहुंचे

(2) हर ऐसा काम जो कमजोरी का बाइस हो मसलन फसद खुलवाना और हम्माम जाना

(3)  (नाक से) नास खींचना बशर्ते की यह इल्म न हो की हलक़ तक पहुंचेगी और अगर यह इल्म हो की हलक़ तक पहुंचेगी तो उस का इस्तेमाल जाइज़ नहीं है!

(4) खुशबूदार घास (और जडी बूटियाँ) सूंघना!
(5) औरत का पानी में बैठना

(6) शैय्याफ़ इस्तेमाल करना यानी किसी खुश्क चीज़ से एनीमा लेना!

(7) जो लिबास पहन रखा हो उसे तर करना

(8) दांत निकलवाना और वह काम करना जिसकी वजह से मुंह से खून निकले!

(9) तर लकड़ी से मिस्वाक करना!

(10) बिना वजह पानी या कोई और सय्याल चीज़ मुंह में डालना

और यह भी मकरूह है मनी निकालने के क़स्द के बगैर इंसान अपनी बीवी का बोसा ले या कोई शहवत अंगेज़ काम करे और अगर ऐसा करना मनी निकालने के क़स्द से हो और मनी न निकले तो एहतियाते लाजिम की बिना पर रोज़ा बातिल हो जाता है!

5. ऐसे मौक़े जिनमे रोज़ा की क़ज़ा और कफ्फ़ारा वाजिब हो जाते हैं

* 1667 - अगर   कोई शख्स माहे रमज़ान के रोज़े को  खाने, पीने या हमबिस्तरी या इस्तिमना या जनाबत पर बाकी रहने की वजह से बातिल करे जबकि जब्र और नाचारी की बिना पर नहीं बल्कि अमदन और इख्तियारन  ऐसा किया हो तो उस पर क़ज़ा के इलावा कफ्फारा भी वाजिब होगा और जो कोई मुज़क्किरा उमूर के इलावा किसी और तरीके से रोज़ा बातिल करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है की वह क़ज़ा के इलावा कफ्फारा भी दे!

* 1668 - जिन उमूर का ज़िक्र किया गया है अगर उन में से किसी फेल को अंजाम दे जबकि उसे पुख्ता यक़ीन हो की उस अमल से उस का रोज़ा बातिल नहीं होगा तो उस पर कफ्फारा वाजिब नहीं है!

6. रोज़े का कफ्फ़ारा

* 1669 - माहे रमज़ान का रोज़ा तोड़ने के कफ्फारे के तौर पर ज़रूरी है की इंसान एक गुलाम आज़ाद करे या उन अहकाम के मुताबिक जो आइन्दा मसअले में ब्यान किये जायेंगे दो महीने रोज़े रखे या साथ फकीरों को पेट भर कर खाना खिलाये या हर फ़क़ीर को एक मुद तकरीबन 3/4 किलो तआम यानी गंदुम या जौ या रोटी वगैरा दे और अगर यह अफआल अंजाम देना उसके लिए मुमकिन  न हो तो ब-क़द्रे इमकान सदक़ा देना ज़रूरी है और अगर यह मुमकिन न हो तो तौबा व इस्तिग्फार करे और एहतियाते वाजिब यह है की जिस वक़्त (कफ्फ़ारा देने के काब्बिल हो जाए कफ्फ़ारा दे!

   1670  - जो शख्स माहे रमज़ान के रोज़े के कफ्फारे के तौर पर दो माह रोज़े रखना चाहे तो ज़रूरी है की एक पूरा महीना और उस से अगले महीने के एक दिन तक मुसलसल रोज़े रखे और अगर बाक़ी मांदा रोज़े मुसलसल न भी रखे तो कोई इश्काल नहीं!

* 1671 - जो शख्स माहे रमज़ान के रोज़े के कफ्फारे के तौर पर दो माह रोज़े रखना चाहे ज़रूरी है की वह रोज़े ऐसे वक़्त न रखे जिसके बारे में वह जानता हो की एक महीने और एक दिन के दरमियान ईद कुर्बान की तरह कोई ऐसा दिन आ जाएगा जिसका रोज़ा रखना हराम है!

   1672 - जिस शख्स को मुसलसल रोज़े रखना ज़रूरी है अगर वह उनके बीच में बगैर उज़्र के एक दिन रोज़ा न रखे तो ज़रूरी है की दुबारा अज़ सरे नौ  रोज़े रखे!

* 1673  - अगर उन दिनों के दरमियान जिन में मुसलसल रोज़े रखने ज़रूरी हैं रोज़ादार को कोई गैर इक्ख्तियारी उज़्र पेश आ जाए मसलन हैज़ या निफास य ऐसा सफ़र जिसे इख्तियार  करने पर  वह मजबूर हो तो उज़्र के दूर होने के बाद बाक़ी मांदा रोज़े रखे!

* 1674 - अगर कोई शख्स हराम चीज़ से अपना रोज़ा बातिल कर दे ख्वाह वह चीज़ बज़ाते खुद हराम हो जैसे शराब और जीना या किसी वजह से हराम हो जाए जैसे की हलाल गिज़ा जिस का खाना इंसान के लिए बिल उमूम मुज़ीर हो या वह अपनी बीवी से हालते  हैज़ में  मुजामिअत करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है की मज्मुँ कफ्फारा दे! यानी उसे चाहिए की एक गुलाम आज़ाद करे और दो महीने रोज़े रखे और साथ फ़क़ीरों को पेट भर कर खाना खिलाये या उनमे से हर फ़क़ीर को एक मुद गंदुम या जौ की रोटी वगैरा दे और अगर यह तीनों चीज़ें उसके लिए मुमकिन न हो तो उनमे से जो कफ्फारा मुमकिन हो, दे!

* 1675 - अगर रोज़ादार जान बूझ कर अल्लाह तआल़ा य नबिय अकरम स्वलल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम से कोई झूटी बात मंसूब करे तो एहतियाते मुस्तहब यह है की मजमुअन कफ्फारा वाजिब है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह  है की हर दफआ के लिए एक-एक कफ्फारा दे!

(1676) अगर रोज़े दार माहे रमज़ान के एक दिन में कई दफ़ा जिमाअ(सम्भोग) या इस्तिमना(किसी भी प्रकार से अपना वीर्य निकालना) करे तो उस पर एक कफ़्फ़ारा वाजिब है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि हर दफ़ा के लिए एक एक कफ़फ़ारा दे।

(1677) अगर रोज़े दार माहे रमज़ान के एक दिन में जिमाअ या इस्तिमना के अलावा कई बार कोई दूसरा ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल कर देता है तो इन सब के लिए बिला इशकाल एक कफ़्फ़ारा काफ़ी है।

(1678) अगर रोज़े दार जिमाअ के अलावा कोई दूसरा ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और फ़िर अपनी ज़ौजा(बीवी) से मुजामेअत(सम्भोग) करे तो दोनों को लिए एक कफ़्फ़ारा काफ़ी है।

(1679) अगर रोज़े दार कोई ऐसा काम करे जो हलाल तो हो लेकिन रोज़े को बातिल करता हो मसलन पानी पी ले और उस के बाद कोई दूसरा ऐसा काम करे जो हराम हो और रोज़े को बातिल भी करता हो मसलन हराम ग़िज़ा खाले तो एक कफ़्फ़ारा काफ़ी है।

(1680) अगर रोज़े दार डकार ले और कोई चीज़ उस के मुँह में आ जाये तो अगर वह उसे जान बूझ कर निगल ले तो उस का रोज़ा बातिल है। और ज़रूरी है कि उस की क़ज़ा भी करे और कफ़्फ़ारा भी दे। और अगर उस चीज़ का खाना हराम हो मसलन डकार लेते वक़्त खून या कोई ऐसी चीज़ जिसे ग़िज़ा न कहा जा सके उस के मुंह में आ जाये और वह उसे जान बूझ कर निगल ले तो ज़रूरी है कि उस रोज़े की क़ज़ा बजा लाये और एहतियाते मुस्तहब कि बिना पर मजमूअन कफ़्फ़ारा भी दे।

(1681) अगर कोई रोज़े दार मन्नत माने कि एक खास दिन रोज़ा रखेगा तो अगर वह उस दिन जाब बूझ कर अपने रोज़े को बातिल कर ले तो ज़रूरी है कि कफ़्फ़ारा दे और उस का कफ़्फ़ारा वही है जो कि मन्नत तोड़ने का कफ़्फ़ारा है।

(1682) अगर रोज़े दार ग़ैरे क़ाबिले एतेमाद शख्स के यह कहने पर कि मग़रिब का वक़्त हो गया है रोज़ा अफ़तार कर ले और बाद में पता चले कि मग़रिब का वक़्त नही हुआ या शक करे कि मग़रिब का वक़्त हुआ है या नही तो उस पर क़ज़ा और कफ़्फ़ारा दोनों वाजिब हो जाते हैं।

(1683) जो शख्स जान बूझ कर अपना रोज़ा बातिल कर ले और अगर वह ज़ोहर के बाद सफ़र करे या कफ़्फ़रे से बचने के लिए ज़ोहर से पहले सफ़र करे तो उस पर कफ़्फ़ारा साक़ित नही होता बल्कि अगर ज़ोहर से पहले इत्तेफ़ाक़न उसे सफ़र करना पड़े तब भी कफ़्फ़ारा उस पर वाजिब है।

(1684) अगर कोई शख्स जान बूझ कर अपना रोज़ा तोड़ दे और उस के बाद कोई उज़्र पैदा हो जाये मसलन हैज़ या निफ़ास या बीमारी मे मुबतिला हो जाये तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि कफ़्फ़ारा दे।

(1685) अगर किसी शख्स को यक़ीन हो कि आज माहे रमज़ानुल मुबारक की पहली तारीख है और वह जान बूझ कर रोज़ा तोड़ दे लेकिन बाद में उसे पता चले कि शाबान की आख़री तारीख है तो उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब नही है।

(1686) अगर किसा शख्स को शक हो कि आज रमज़ान की आख़री तारीख़ है या शव्वाल की पहली तारीख़ और वह जान बूझ कर रोज़ा तोड़ दे और बाद में पता चले कि पहली शव्वाल है तो उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब नही है।

(1687) अगर रोज़े दार माहे रमज़ान में अपनी रोज़े दार बीवी से जिमाअ(समभेग) करे तो अगर उस ने बीवी को मज़बूर किया हो तो अपने रोज़े का कफ़्फ़ारा दे और एहतियात की बीना पर ज़रूरी है कि बीवी के रोज़े का भी कफ़्फ़ारा दे और अगर बीवी जिमाअ पर राज़ी हो तो हर एक पर एक एक कफ़्फ़ारा वाजिब हो जाता है।

(1689) अगर रोज़े दार माहे रमज़ान में अपनी बीवी को जिमाअ पर मजबूर करे और जिमाअ के दौरान औरत भी जिमाअ पर राज़ी हो जाये तो एहतियाते वाजिब की बिना पर ज़रूरी है कि मर्द दो कफ़्फ़ारे दे और औरत एक कफ़्फ़ारा दे।

(1690) अगर रोज़े दार माहे रमज़ानुल मुबारक में अपनी रोज़े दार बीवी से जो सो रही हो जिमाअ करे तो उस पर एक कफ़्फ़ारा वाजिब होता है और औरत का रोज़ा सही है और उस पर कफ़्फ़ारा भी नही वाजिब नही है।

(1691) अगर शौहर(पति) अपनी बीवी को या बीवी अपने शौहर को जिमाअ के अलावा कोई ऐसा काम करने पर मजबूर करे जिस से रोज़ा बातिल हो जाता है तो उन दोनों में से किसी पर भी कफ़्फारा वाजिब नही है।

(1692) जो आदमी सफ़र या बीमारी की वजह से रोज़ा न रखे वह अपनी रोज़े दार बीवी को जिमाअ पर मजबूर नही कर सकता लेकिन अगर मजबूर करे तब भी मर्द पर कफ़्फ़ारा वाजिब नही।

(1693) ज़रूरी है कि इंसान कफ़्फ़ारा देने में कोताही न करे लेकिन फ़ौरन देना भी ज़रूरी नही है।

(1694) अगर किसी शख्स पर कफ़्फ़ारा वाजिब हो और वह कई साल तक न दो तो कफ़्फ़ारे में कोई इज़ाफ़ा नही होता।

(1695) जिस शख्स को कफ़्फ़ारा के तौर पर एक दिन साठ फ़क़ीरों को खाना खिलाना ज़रूरी हो अगर साठ फ़क़ीर मौजूद हों तो वह एक फ़क़ीर को एक मुद से ज़्यादा खाना नही दे सकता या एक फ़क़ीर को एक से ज़्यादा बार पेट भर कर खिलाये और उसे अपने कफ़्फ़ारे में ज़्यादा अफ़राद को खाना खिलाना शुमार करे अलबत्ता वह फ़क़ीर के अहलो अयाल में से हर एक को एक मुद दे सकता है चाहे वह छोटे छोटे ही क्यों न हों।

(1696) जो शख्स माहे रमज़ानुल मुबारक की क़ज़ा करे अगर वह ज़ोहर के बाद जान बूझ कर कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो तो ज़रूरी है कि दस फ़क़ीरों को अलग अलग एक मुद खाना दे और अगर न दे सकता हो तो तीन रोज़े रखे।

7. वह सूरतें जिन में फ़क़त रोज़े की क़ज़ा वाजिब है

(1697) जो हालतें ब्यान हो चुकी हैं उन के अलावा इन चंद हालतों में इंसान पर सिर्फ़ रोज़े की क़ज़ा वाजिब है कफ़्फ़ारा वाजिब नही है।

(1) एक शख्स माहे रमज़ान की रात में जुनुब हो जाये और जैसा कि मसअला न0 1639 में तफ़सील से बताया गया है कि सुबह की अज़ान तक नींद से बेदार न हो।

(2) रोज़े को बातिल करने वाला काम तो न किया हो लेकिन रोज़े कि नियत न करे या रिया करे(यानी लोगों पर ज़ाहिर करे कि रोज़े से हूँ) या रोज़ा न रखने का इरादा करे। इसी तरह अगर ऐसे काम का इरादा करे जो रोजे को बातिल करता हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उस दिन के रोज़े की क़ज़ा रखना ज़रूरी है।

(3) माहे रमज़ानुल मुबारक में ग़ुस्ले जनाबत(समभेग के बाद किया जाने वाला स्नान) करना भूल जाये और जनाबत की हालत में एक या कई दिन रोज़े रखता रहे।

(4) माहे रमज़ानुल मुबारक में यह तहक़ीक किये बिना कि सुबह हुई है या नही कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और बाद में पता चला कि सुबह हो चुकी था तो इस सूरत में एहतियात की बिना पर ज़रूरी है कि क़ुरबते मुतलक़ा की नियत से उस दिन उन चीज़ों से परहेज़ करे जो रोज़े को बातिल करती हैं और उस दिन के रोज़े की क़ज़ा भी करे।

(5) कोई कहे कि सुबह नही हुई है और इंसान उस के कहने की बिना पर कोई काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और बाद में पता चले कि सुबहा हो गयी थी।

(6) कोई कहे कि सुबहा हो गयी है और इंसान उस के कहने पर यक़ीन न करे या समझे कि मज़ाक़ कर रहा है और खुद तहक़ीक़ न करे और कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो और बाद में मालूम हो कि सुबह हो चुकी थी।

(7) नाबीना(अँधा) या उस जैसा कोई शख़्स किसी के कहने पर जिस का क़ौल उस के लिए शरअन हुज्जत हो रोज़ा अफ़तार कर ले और बाद में पता चले कि अभी मग़रिब का वक़्त नही हुआ था।

(8) इंसान को यक़ीन या इतमीनान हो कि मग़रिब का वक़्त हो गया है और वह रोज़ा अफ़तार कर ले और बाद में पता चले कि मगरिब का वक़्त नही हुआ था। लेकिन अगर मतलए़ अबर आलूद हो(आसमान पर धुँध छाई हो) और इंसान गुमान के तहत रोज़ा अफ़तार कर ले कि मग़रिब का वक़्त हो गया है और बाद में पता चले कि मग़रिब नही हुई थी तो एहतियात की बिना पर इस सूरत में क़ज़ा वाजिब है।

(9) इंसान प्यास कि वजह से कुल्ली करे यानी पानी मुँह में घुमाये और बेइख्तियार पानी पेट में चाल जाये। अगर नमाज़े वाजिब के वुज़ू के अलावा किसी वुज़ू में कुल्ली की जाये तो एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उस के लिए भी यही हुक्म है। लेकिन अगर इंसान भूल जाये कि रोज़े से है और पानी गले से उतर जाये या प्यास के अलावा किसी दूसरी सूरत में कि जहाँ कुल्ली करना मुस्तहब है (जैसे वोज़ू करते वक़्त) कुल्ली करे और पानी बेइख्तियार पेट में चला जाये तो उस की क़ज़ा नही है।

(10) कोई शख्स मज़बूरी, इज़तेरार या तक़य्ये की हालत में रोज़ा अफ़तार करे तो उस पर रोज़े की क़ज़ा रखना लाज़िम है लेकिन कफ़्फारा वाजिब नही है।

(1698) अगर रोज़े दार पानी के अलावा कोई चीज़ मुँह में डाले और वह बेइख्तियार पेट में चली जाये या नाक में पानी डाले और वह बेइख्तियार (हलक़ के) नीचे उतर जाये तो उर पर क़ज़ा वाजिब नही है।

(1699) रोज़े दार के लिए ज़्यादा कुल्ली करना मकरूह है और अगर कुल्ली के बाद लुआ़बे दहन(थूक) निगलना चाहे तो बेहतर है कि पहले तीन दफ़ा लुआब को थूक दे।

(1700) अगर किसी शख्स को मालूम हो या उसे एहतेमाल हो कि कुल्ली करने से बेइख्तियार पानी उस के हलक़ में चला जायेगा तो ज़रूरी है कि कुल्ली न करे। और अगर जानता हो कि भूल जाने की वजह से पानी उस के हलक़ में चला जायेगा तब भी एहतियाते लाज़िम की बिना पर यही हुक्म है।

(1701) अगर किसी शख्स को माहे रमज़ानुल मुबारक में तहक़ीक करने के बाद मालूम न हो कि सुबह हो गयी है और वह कोई ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता है और बाद में मालूम हो कि सुबह हो गयी है तो उस के लिए रोज़ा की क़ज़ा करना ज़रूरी नहीं।

(1702) अगर किसी शख्स को शक हो कि मग़रिब हो गयी है या नहीं तो वह रोज़ा अफ़तार नहीं कर सकता लेकिन अगर उसे शक हो कि सुबह हुई है या नही तो वह तहक़ीक़ करने से पहले ऐसा काम कर सता है जो रोज़े को बातिल करता हो।

8. क़ज़ा रोज़े के अहकाम

(1703) अगर कोई दीवाना अच्छा हो जाये तो उस के लिए आलमे दीवानगी के रोज़ों की क़ज़ा वाजिब नही।

(1704) अगर कोई काफ़िर मुसलमान हो जाये तो जमाने कुफ़्र के रोज़ों की क़ज़ा वाजिब नही है लेकिन अगर एक मुसलमान काफ़िर हो जाये और फ़िर मुसलमान हो जाये तो ज़रूरी है कि कुफ़्र के दिनों के रोज़ों की क़ज़ा बजा लाये।

(1705) जो रोज़े इंसान की बेहोशी की वजह से छूट जायें ज़रूरी है कि उन की क़ज़ा बजा लाये। चाहे जिस चीज़ से वह बेहवास हुआ हो वह इलाज की ग़रज़ से ही क्योँ न खाई हो।

(1706) अगर कोई शख्स किसी उज़्र की वजह से चंद दिन रोज़े न रखे और बाद में शक करे कि उस का उज़्र किस वक़्त ख़त्म हुआ था तो उस के लिए वाजिब है कि जितनी मुद्दत रोज़े न रखने का ज़्यादा एहतेमाल हो उस के मुताबिक़ क़ज़ा बजा लाये। मसलन अगर कोई शख्स रमज़ानुल मुबारक से पहले सफ़र करे और उसे मालूम न हो कि माहे मुबारक की पाँचवीं तारीख को सफ़र से वापस आया था या छटी को या मसलन उस ने माहे रमज़ान के आखिर में सफ़र शुरू किया हो और माहे मुबारक ख़त्म होने के बाद वापस आया हो और उसे पता न हो कि पच्चीसवीं रमज़ान को सफ़र किया था या छब्बीसवीं को तो दोनों सूरतों में वह कमतर दीनों यानी पाँच रोज़ों की क़ज़ा कर सकता है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि ज़्यादा दिनों या छः रोज़ों की क़ज़ा करे।

(1707) अगर किसी शख्स पर कई साल के माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों की क़ज़ा वाज़िब हो तो जिस साल के रोज़ों की क़ज़ा पहले करना चाहे कर सकता है लेकिन अगर आखिरे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों की क़ज़ा का वक़्त तंग हो मसलन आखिरी रमज़ानुल मुबारक के पाँच रोज़ों की कज़ा उस के ज़िम्मे हो और आइंदा रमज़ानुल मुबारक के शुरू होने में भी पाँच ही दिन बाक़ी हों तो बेहतर यह है कि पहले आखरी रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों की क़ज़ा बजा लाये।

(1708) अगर किसी शख्स पर कई साल के माहे रमज़ान के रोज़ों की क़ज़ा वाजिब हो और वह रोज़ों की नियत करते वक़्त, वक़्त मुऐय्यन न करे की कौन से रमज़ानुल मुबारक के रोज़े का क़ज़ा कर रहा है तो उस का शुमार आखरी माहे रमज़ान कि क़ज़ा में नहीं होगा।

(1709) जिस शख्स ने रमाज़नुल मुबारक का कज़ा रोज़ा रखा हो और वह उस रोज़े को ज़ोहर से पहले तोड़ सकता है, लेकिन अगर क़ज़ा का वक़्त तंग हो तो फिर बेहतर यह है कि रोज़ा न तोड़े।

(1710) अगर किसी मय्यित का क़ज़ा रोज़ा रखा हो तो बेहतर यह है कि ज़ोहर के बाद रोज़ा न तोड़े।

(1711) अगर कोई बीमारी या हैज़ या निफ़ास की वजह से रमज़ानुल मुबारक के रोज़े न रखे और उस मद्दत के गुज़रने से पहले कि जिस में वह उन रोज़ों की जो उसने नही रखे थे क़ज़ा कर सकता हो मर जाये, तो उन रोज़ों की क़ज़ा नही है।

(1712) अगर कोई शख्स बीमारी की वजह से रमज़ानुल मुबारक के रोज़े न रखे और उस की बीमारी आइंदा रमज़ान तक तूल खीँच जाये तो जो रोज़े उसने न रखे हों उन की क़ज़ा उस पर वाजिब नहीं है और ज़रूरी है कि हर दिन के लिए एक मुद तआम या गेहूँ या जौ या रोटी वग़ैरा फ़क़ीर को दे। लेकिन अगर किसी और उज़्र मसलन सफ़र की वजह से रोज़े न रखे और उस का उज़्र अइंदा रमाज़नुल मुबारक तक बाक़ी रहे तो ज़रूरी है कि जो रोज़े न रखे हों उन की कज़ा करे और एहतियाते वाजिब यह है कि हर दिन के लिए एक मुद तआम भी फ़क़ीर को दे।

(1713) अगर कोई शख्स बीमारी की वज़ह से रमाज़नुल मुबारक के रोज़े न रखे और रमाज़नुल मुबारक के बाद उस की बीमारी दूर हो जाये लेकिन कोई दूसरा उज़्र पेश आ जाये जिस की वजह से वह आइंदा रमाज़नुल मुबारक तक क़ज़ा रोज़े न रख सके तो ज़रूरी है कि जो रोज़े न रखें हों उन की क़ज़ा बजा लाये और यह भी कि अगर रमाज़नुल मुबारक में बीमारी के अलावा कोई और उज़्र रखता हो और रमाज़नुल मुबारक के बाद वह उज़्र दूर हो जाये और आइंदा साल के रमाज़नुल मुबारक तक बीमारी की वजह से रोज़े न रखे हों तो ज़रूरी है कि उन की क़ज़ा बजा लाये और एहतियाते वाजिब की बिना पर हर दिन के लिए एक मुद तआम भी फ़क़ीर को दे।

(1714) अगर कोई शख्स किसी उज़्र की वजह से रमाज़नुल मुबारक में रोज़े न रखे और रमाज़नुल मुबारक के बाद उस का उज़्र दूर हो जाये और आइंदा रमाज़नुल मुबारक तक अमदन रोज़ों की कज़ा न बजा लाये तो ज़रूरी है कि रोज़ों की क़ज़ा करे और हर दिन के लिए एक मुद तआम भी फ़क़ीर को दे।

(1715) अगर कोई शख्स कज़ा रोज़े रखने में कोताही करे हत्ता कि वक़्त तंग हो जाये और वक़्त की तंगी में उसे कोई उज़्र पेश आ जाये तो ज़रूरी है कि रोज़ों की कज़ा करे और एहतियात की बिना पर हर एक दिन के लिए एक मुद तआम फ़क़ीर को दे। और अगर उज़्र ख़त्म होने के बाद मुसम्मम इरादा रखता हो कि रोज़ों की क़ज़ा बजा लायेगा, लेकिन क़ज़ा बजा लाने से पहले तंग वक़्त में उसे कोई उज़्र पेश आ जाये तो इस सूरत में भी यही हुक्म है।

(1716) अगर इंसान का मरज़ चंद साल तक खींच जाये तो ज़रूरी है कि तंदुरूस्त होने के बाद आख़री रमज़ानुल मुबारक के छुटे हुए रोज़ो की क़ज़ा बजा लाये और उस से पिछले साल के रमज़ान के महीनो के हर दिन के लिए एक मुद तआम फ़क़ीर को दे।

(1617) जिस शख्स के लिए हर रोज़ के बदले एक मुद तआम फ़क़ीर को देना ज़रूरी हो वह चंद दिनों का कफ़्फ़ारा एक ही फ़क़ीर को दे सकता है।

(1718) अगर कोई शख्स माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों की क़ज़ा करने में कई साल की ताख़ीर कर दे तो ज़रूरी है कि क़ज़ा करे और पहले साल में ताख़ीर करने की बिना पर हर रोज़ के लिए एक मुद तआम फ़क़ीर को दे लेकिन बाक़ी कई साल की ताख़ीर के लिए उस पर कुछ भी वाजिब नही है।

(1719) अगर कोई शख्स रमज़ानुल मुबारक के रोज़े जान बुझ कर न रखे तो ज़रूरी है कि उन की क़ज़ा बजा लाये और हर दिन के लिए दो महीने रोज़े रखे या साठ फ़क़ीरों का खाना दे या एक ग़ुलाम आज़ाद करे और अगर आइंदा रमज़ानुल मुबारक तक उन की कज़ा न करे तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर हर दिन के लिए एक मुद तआम कफ़्फ़ारा भी दे।

(1720) अगर कोई शख्स जान बूझ कर रमज़ानुल मुबारक का रोज़ा न रखे और दिन में कई दफ़ा जिमाअ या इस्तिमना करे तो अक़वा की बिना पर दो कफ़्फ़ारे नही होगें (एक कफ़्फ़ारा ही काफ़ी है।) ऐसे ही अगर कई दफ़ा कोई और ऐसा काम करे जो रोज़े को बातिल करता हो मसलन कई दफ़ा खाना खाये तब भी एक कफ़्फ़ारा काफ़ी है।

(1721) बाप के मरने के बाद बड़े बेटे के लिए एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़रूरी है कि बाप के रोज़ों की क़ज़ा उसी तरह बजा लाये जैसे कि नमाज़ की लिलसिले में मसअला न0 1399 में तफ़सील से बताया गाया है।

(1722) अगर किसी के बाप ने माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों के अलावा कोई दूसरा वाजिब रोज़ा मसलन मन्नती रोज़े न रखे हों तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि बड़ा बेटा उन रोज़ों की कज़ा बजा लाये। लेकिन अगर बाप किसी के रोज़ों के लिए अजीर हो और उस ने वह रोज़े न रखे हो तो उन रोज़ों की क़ज़ा बड़े बेटे पर वाजिब नही है।

9. मुसाफिर के रोज़ों के अहकाम

(1723) जिस मुसाफ़िर के लिए सफ़र में चार रकअती नमाज़ के बजाये दो रकअती पढ़ना ज़रूरी है उसे रोज़ा नही रखना चाहिये लेकिन वह मुसाफ़िर जो पूरी नमाज़ पढ़ता हो, मसलन जिस का पेशा ही सफ़र हो या जिस का सफ़र किसी नाजायज़ काम के लिए हो ज़रूरी है कि सफ़र में रोज़ा रखे।

(1724) माहे रमज़ानुल मुबारक में सफ़र में कोई हरज नही है लेकिन रोज़ों से बचने के लिए सफ़र करना मकरूह है। और इसी तरह रमज़ानुल मुबारक की चौबीसवीं तारीख से पहले सफ़र करना (मकरूह है) बजुज़ इस सफ़र के जो हज उमरा या किसी ज़रूरी काम के लिए हो।

(1725) अगर माहे रमज़ान के रोज़ों के अलावा किसी ख़ास दिन का रोज़ा इंसान पर वाजिब हो मसलन वह रोज़ा इजारे या इजारे की मानिंद किसी वजह से वाजिब हो या एतेकाफ़ के दिनों में से तीसरा दिन हो तो वह उस दिन सफ़र नही कर तकता और अगर सफ़र में हो और उस के लिए ठहरना मुमकिन हो तो ज़रूरी है कि दस दिन एक जगह क़याम करने की नियत करे और उस दिन रोज़ा रखे लेकिन अगर उस दिन का रोज़ा मन्नत की वजह से वाजिब हुआ हो तो ज़ाहिर है कि उस दिन सफ़र करना जायज़ है और क़याम की नियत करना वाजिब नहीं। अगरचे बेहतर यह है कि जब तक सफ़र करने के लिए मज़बूर न हो सफ़र न करे और अगर सफ़र करे और सफ़र में हो तो क़याम करने की नियत करे।

(1726) अगर कोई शख्स मुस्तहब रोज़े की मन्नत माने लेकिन उस के लिए दिन मुऐय्यन न करे तो वह शख्स सफ़र में ऐसा मन्नती रोज़ा नहीं रख सकता। लेकिन अगर मन्नत माने कि सफ़र के दौरान एक मखसूस दिन रोज़ा रखेगा तो ज़रूरी है कि वह रोज़ा सफ़र में रखे और यह भी कि अगर मन्नत माने कि सफ़र में हो या न हो एक मखसूस दिन का रोज़ा रखेगा तो ज़रूरी है कि अगरचे सफ़र में हो तब भी उस दिन का रोज़ा रखे।

(1727) मुसाफ़िर तलबे हाजत के लिए तीन दिन मदीन-ए-तय्येबा में मुस्तहब रोज़ा रख सकता है और एहवत यह है कि वह तीन दिन बुद्ध, जुमेरात और जुमा हों।

(1728) कोई शख़्स जिसे यह इल्म न हो कि मुसाफ़िर का रोज़ा रखना बातिल है, अगर सफ़र में रोज़ा रख ले और दिन ही दिन में उसे मसअले का हुक्म मालूम हो जाये तो उस का रोज़ा बातिल है। लेकिन अगर मग़रिब तक हुक्म मालूम न हो तो उस का रोज़ा सही है।

(1729) अगर कोई शख्स यह भूल जाये कि वह मुसाफ़िर है या यह कि मुसाफ़िर का रोज़ा बातिल होता है तो उस का रोज़ा सही है।

(1730) अगर रोज़े दार ज़ोहर के बाद सफ़र करे तो ज़रूरी है कि एहतियात की बिना पर अपने रोज़े को तमाम करे और अगर ज़ोहर से पहले सफ़र करे और रात से ही सफ़र का इरादा रखता हो तो उस दिन का रोज़ा नही रख सकता बल्कि अगर रात से सफ़र का इरादा न हो तब भी एहतियात की बिना पर उस दिन रोज़ा नही सख सकता लेकिन हर सूरत में हद्द तरख्ख़ुस तक पहुँचने से पहले ऐसा कोई काम नही करना चाहिए जो रोज़े को बातिल करता हो वरना उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब होगा।

(1731) अगर मुसाफ़िर माहे रमज़ानुल मुबारक में चाहे वह फ़ज्र से पहले सफ़र में हो या रोज़े से हो और सफ़र करे और ज़ोहर से पहले अपने वतन पहुँच जाये या ऐसी जगह पहुँच जाये जहाँ उस दिन क़याम करना चाहता हो और उस ने कोई ऐसा काम न किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो ज़रूरी है कि उस दिन का रोज़ा रखे और अगर कोई ऐसा काम किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो तो उस पर उस दिन का रोज़ा वाजिब नही है।

(1732) अगर मुसाफ़िर ज़ोहर के बाद अपने वतन पहुँचे या ऐसी जगह पहुँचे जहाँ दस दिन क़याम करना चाहता हो तो उस दिन का रोज़ा नहीं रख सकता।

(1733) मुसाफ़िर और वह शख्स जो किसी उज़्र की वजह से रोज़ा नही रख सकता हो उस के लिए माहे रमज़ानुल मुबारक में दिन के वक़्त जिमाअ करना और पेट भर खाना और पीना मकरूह है।

10. वह लोग जिन पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं

(1734) जो शख्स बुढ़ापे की वजह से रोज़ा न रख सकता हो या रोज़ा रखना उस के लिए शदीद तकलीफ़ का बाइस हो तो उस पर रोज़ा वाजिब नहीं है। लेकिन रोज़ा न रखने की सूरत में ज़रूरी है कि हर रोज़े के बदले एक मुद तआम यानी गेहूँ या जौ या रोटी या इन से मिलती जुलती कोई चीज़ फ़क़ीर को दे।

(1735) जो शख्स बुढ़ापे की वजह से माहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़े न रखे अगर वह रमज़ानुल मुबारक के बाद रोज़े रखने के क़ाबिल हो जाये तो एहतियाते मुस्तहब यह है कि जो रोज़े न रखे हों उन की क़ज़ा बजा लाये।

(1736) अगर किसी शख्स को कोई बीमारी हो जिस की वजह से उसे बहुत ज़्यादा प्यास लगती हो और वह प्यास बर्दाश्त न कर सकता हो या प्यास की वजह से उसे तकलीफ़ होती हो तो उस पर रोज़ा वाजिब नहीं है। लेकिन रोज़ा न रखने की सूरत में ज़रूरी है कि हर रोज़े के बदले एक मुद तआम फ़क़ीर को दे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि जितनी मिक़दार की बहुत ज़्यादा ज़रूरत हो उस से ज़्यादा पानी न पिये। और बाद में जब रोज़ा रखने के क़बिल हो जाये तो जो रोज़े न रखे हों एहतियाते मुस्तहब की बिना पर उस की कज़ा बजा लाये।

(1737) जिस औरत के वज़े हम्ल(संतानुत्पत्ति) का वक़्त क़रीब हो, अगर उस का रोज़ा रखना खुद उस के लिए या उस के होने वाले बच्चे के मुज़िर्र(हानी कारक) हो तो उस पर रोज़ा रखना वाजिब नही है। लेकिन ज़रूरी है कि वह हर दिन के बदले एक मुद तआम फ़क़ीर को दे और ज़रूरी है कि दोनों सूरतों में जो रोज़े न रखे हों उन की क़ज़ा बजा लाये।

(1738) जो औरत बच्चे को दूद्ध पिलाती हो और उसका दूद्ध कम हो चाहे बच्चे की माँ हो या दाया और चाहे बच्चे को मुफ़्त दूद्ध पिला रही हो अगर उस का रोज़ा रखना खुद उस के या दूद्ध पीने वाले बच्चे के लिए मुज़िर्र(हानी कारक) हो तो उस औरत पर रोज़ा रखना वाजिब नहीं है। लेकिन ज़रूरी है कि हर दिन के बदले एक मुद तआम फ़क़ीर को दे और दोनों सूरतों में जो रोज़े न रखे हों उन की क़ज़ा करना ज़रूरी है। लेकिन एहतियाते वाजिब की बिना पर यह हुक्म सिर्फ़ इस सूरत में है जब कि बच्चे को दूद्ध पिलाने का इंहेसार उसी पर हो लेकिन अगर बच्चे को दूद्ध पिलाने का कोई और तरीक़ा हो मसलन कुछ औरतें मिल कर बच्चे को दूद्ध पिलायें तो ऐसी सूरत में उस हुक्म के साबित होने में इशकाल है।

11. महीने की पहली तारीख साबित होने का तरीक़ा

(1739) महीने की पहली तारीख़ निम्न लिखित चार चीज़ों से साबित होती हैः

(1) इंसान खुद चाँद देखे।

(2) एक ऐसा गिरोह जिस के कहने पर यक़ीन या इतमिनान हो जाये यह कहे कि हमने चाँद देखा है और इस तरह हर वह चीज़ जिस की बदौलत यक़ीन या इतमीनान हो जाये।

(3) दो आदिल मर्द यह कहें कि हम ने रात को चाँद देखा है लेकिन अगर वह चाँद की हालत अलग अलग बयान करें तो पहली तारीख़ साबित नही होगी। और अगर उन की गवाही में इख़तेलाफ़ हो तब भी यही हुक्म है। अगर उस के हुक्म में इख़तेलाफ़ हो मसलन शहर के बहुत से लोग चाँद देखने की कोशिश करें और उन लोगों में से दो अदिल चाँद देखने का दावा करें और दूसरों को चाँद नज़र न आये हालाँकि उन लोगों में दो और अदिल आदमी ऐसे हों जो चाँद की जगह पहचानते हों, निगाह की तेज़ी और दीगर खुसूसियात में उन पहले दो अदिल अदमियों की मानिंद हों (और चाँद देखने का दावा न करें) तो एसी सूरत में दो आदिल अदमियों की गवाही से महीने की पहली तारीख़ साबित नही होगी।

(4) शाबान की पहली तारीख़ से तीस दिन गुज़र जायें जिन के गुज़रने पर माहे रमज़ानुल मुबारक की पहली तारीख़ साबित हो जाती है और रमज़ानुल मुबारक की पहली तारीख़ से तीस दिन गुज़र जायें जिन के गुज़रने पर शव्वाल की पहली तारीख़ साबित हो जाती है।

(1740) हाकिमे शरअ़ के हुक्म से महीने की पहली तारीख़ साबित नही होती और एहतियात की रिआयत करना अवला है।

(1741) मुनज्जिमों की पेशीन गोई से महीने की पहली तारीख़ साबित नहीं होती लेकिन अगर इंसान को उन के कहने से यक़ीन या इतमिनान हो जाये तो ज़रूरी है कि उस पर अमल करे।

(1742) चाँद का असमान पर बलंद होना या उस का देर से ग़ुरूब होना इस बात की दलील नहीं कि इस से पहली रात चाँद रात थी और इसी तरह अगर चाँद के गिर्द हल्क़ा हो तो यह इस बात की दलील नही है कि पहली का चाँद गुज़िश्ता रात निकला है।

(1743) अगर किसी शख्स पर माहे रमज़ानुल मुबारक की पहली तारीख़ साबित न हो और वह रोज़ा न रखे लेकिन बाद में साबित हो जाये कि ग़ुज़िश्ता रात ही चाँद रात थी तो ज़रूरी है कि उस दिन के रोज़े की क़ज़ा करे।

(1744) अगर किसी शहर में महीने की पहली तारीख़ साबित हो जाये तो दूसरे शहरों में भी कि जिन का उफ़ुक़ उस शहर से मुत्ताहिद हो महीने की पहली तारीख़ होती है। यहाँ पर उफ़ुक़ के मुत्ताहिद होने से मुराद यह है कि अगर पहले शहर में चाँद दिखाई दे तो दूसरे शहर में भी अगर बादल की तरह कोई रुकावट न हो तो चाँद दिखीई देता है।

(1745) महीने की पहली तारीख़ टेली गिराम (और टेलेक्स या फ़ेक्स) से साबित नही होती सिवाए इस सूरत के कि इंसान को इल्म हो कि यह पैग़ाम दो आदिल मर्दों की शहादत की रू से या किसी ऐसे तरीक़े से आया है जो शरअन मोतबर है।

(1746) जिस दिन के मोताअल्लिक़ इंसान को इल्म न हो कि रमज़ानुल मुबारक का अख़री दिन है या शव्वाल का पहला दिन, इस दिन ज़रूरी है कि रोज़ा रखे लेकिन अगर दिन ही दिन में उसे पता चल जाये कि आज यकुम शव्वाल (रोज़े ईद) है तो ज़रूरी है कि रोज़ा अफ़तार कर ले।

(1747) अगर कोई शख्स क़ैद में हो और माहे रमज़ान के बारे में यक़ीन न कर सके तो ज़रूरी है कि गुमान करे लेकिन अगर क़वी गुमान पर अमल कर सकता हो तो ज़ईफ़ गुमान पर अमल नही कर सकता और अगर गुमान पर अमल मुमकिन न हो तो ज़रूरी है कि जिस महीने के बारे में एहतेमाल हो कि रमज़ान है उस महीने में रोज़ा रखे लेकिन ज़रूरी है कि वह उस महीन को याद रखे। चुनाचे बाद में उसे एहतेमाल हो कि वह माहे रमज़ान या उस के बाद का ज़माना था तो उस के ज़िम्मे कुछ नहीं है। लेकिन अगर मालूम हो कि माहे रमज़ान से पहले का ज़माना था तो ज़रूरी है कि रमज़ान के रोज़ों की कज़ा करे।

12. हराम और मकरूह रोज़े

(1748) ईदे फ़ित्र और ईदे क़ुरबान के दिन रोज़ा रखना हराम है और यह भी कि जिस दिन के बारे में इंसान को यह इल्म न हो कि शाबान की आख़री तारीख़ है या रमज़ानुल मुबारक की पहली तो अगर उस दिन पहली रमज़ानुल मुबारक की नियत से रोज़ा रखे तो हराम है।

(1749) अगर औरत के मुस्तहब (नफ़ली) रोज़ा रखने से शौहर की हक़ तलफ़ी होती हो तो औरत का रोज़ा रखना हराम है और एहतियाते वाजिब यह है कि चाहे शौहर की हक़ तलफ़ी न भी होती हो उस की इजाज़त के बग़ैर मुस्तहब (नफ़ली) रोज़ा न रखे।

(1750) अगर औलाद का मुस्तहब रोज़ा (माँ बाप की औलाद से शफ़क़त का वजह से) माँ बाप का लिए अज़िय्यत का सबब हो तो औलाद के लिए मुस्तहब रोज़ा रखना हराम है।

(1751) अगर बेटा बाप की इजाज़त के बग़ैर मुस्तहब रोज़ा रख ले और दिन के दौरान बाप उसे (रोज़ा रखने से) माना करे तो अगर बेटे का बाप की बात न मान ना फ़ितरी शफ़क़त की वजह से अज़ियत का सबब हो तो बेटे को चाहिये कि रोज़ा तोड़ दे।

(1752) अगर कोई शख्स जानता हो कि रोज़ा रखना उस के लिए ऐसा मुज़िर(हानी कारक) नहीं है कि जिस की परवाह की जाये तो अगरचे तबीब कहे कि मुज़िर है उस के लिए ज़रूरी है कि रोज़ा रखे और अगर कोई शख्स यक़ीन या गुमान रखता हो कि रोज़ा उस के लिए मुज़िर है तो अगरचे तबीब कहे कि मुज़िर नहीं है तो ज़रूरी है कि वह रोज़ा न रखे और अगर रोज़ा रखे जब कि रोज़ा रखना वाक़ई मुज़िर हो या क़स्दे क़ुर्बत से न हो तो उस का रोज़ा सही है।

(1753) अगर किसी शख्स को एहतेमाल हो कि रोजा रखना उस के लिए ऐसा मुज़िर्र है कि जिस की परवा की जाये और उस एहतेमाल की बीना पर (उस के दिल में) ख़ौफ़ पैदा हो जाये तो अगर उस का एहतेमाल लोगों की नज़र में सही हो तो उसे रोज़ा नही रखना चाहिये। और अगर वह रोज़ा रख ले तो गुज़िश्ता मसअले की तरह इस सूरत में भी उस का रोज़ा सही नही है।

(1754) जिस शख्स को एतेमाद हो कि रोज़ा रखना उस के लिए मुज़िर नही है अगर वह रोज़ा रख ले और मग़रिब के बाद पता चले कि रोज़ा रखना उस के लिए ऐसा मुज़िर था जिस की परवाह की जाती तो एहतियाते वाजिब की बिना पर उस रोज़े की क़ज़ा करना ज़रूरी है।

(1755) ऊपर बयान किये गये रोज़ों के अलावा और भी हराम रोज़े है जो मुफ़स्सल किताबों में मज़कूर है।

(1756) आशूर के दिन रोज़ा रखना मकरूह है और उस दिन का रोज़ा भी मकरूह है जिस के बारे में शक हो कि अरफ़े का दिन है या ईदे क़ुरबान का दिन।

13. मुस्तहब रोज़े

हराम और मकरूह रोज़ों के अलावा जिन का ज़िक्र किया जा चुका है साल के तमाम दिनों के रोज़े मुस्तहब है और बाज़ दिनों के रोज़े रखने की बहुत ताकीद की गई है जिन में से चंद यह हैः

(1) हर महीने की पहली और आख़री जुमेरात और पहला बुध जो महीने की दसवीं तारीख़ के बाद आये। और अगर कोई शख्स यह रोज़े न रखे तो मुस्तहब है कि उन की कज़ा करे और रोज़ा बिल्कुल न रख सकता हो तो मुस्तहब है कि हर दिन के बदले एक मुद तआम या 12/6 नुख़ुद सिक्केदार चाँदी फ़क़ीर को दे।

(2) हर महीने की तेरहवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं तारीख़।

(3) रजब और शाबान के पूरे महीने के रोज़े। या उन दो महीनों में जितने रोज़े रख सकें चाहे वह एक दिन ही क्यों न हो।

(4) ईदे नौ रोज़ के दिन।

(5) शव्वाल की चौथी से नवीं तारीख तक।

(6) ज़ीक़ादा की पच्चीसवीं और इक्कीसवीं तारीख़।

(7) ज़ीक़ादा की पहली तारीख से नवीं तारीख़ (यौमे अरफ़ा) तक लेकिन अगर इंसान रोज़े की वजह से बेदार होने वाली कमज़ोरी की बिना पर यौमे अरफ़ा की दुआयें न पढ़ सके तो उस दिन का रोज़ा मकरूह है।

(8) ईदे सईदे ग़दीर के दिन (18 ज़िलहिज्जा)

(9) रोज़े मुबाहिला (24 ज़िलहिज्जा)

(10) मुहर्रामुल हराम की पहली, तीसरी और सातवीं तारीख़।

(11) रसूसले अकरम (स0) की विलादत का दिन (17 रबी-उल-अव्वल)

(12) जमादीयुल अव्वल की पंद्रहवी तारीख़।

और ईदे बेसत यानी रसूले अकरम (स0) के ऐलाने रिसालत के दिन (27 रजब) को भी रोज़ा रखना मुस्तहब है। और जो शख्स मुस्तहब रोज़ा रखे उस के लिए वाजिब नहीं है कि उसे इख़्तिताम तक ही पहुँचाये बल्कि अगर उस का काई मोमिन भाई उसे खाने की दावत दे तो मुस्तहब है कि उस की दावत क़बूल कर ले और दिन में ही रोज़ा खोल ले चाहे ज़ोहर के बाद ही क्यों न हो।

14. वह सूरतें जिनमे मुब्त्लाते रोज़ा से परहेज़ मुस्तहब है

(1758) नीचे लिखे पाँच अशख़ास के लिए मुस्तहब है कि अगरचे रोज़े से न हों माहे रमज़ानुल मुबारक में उन कामों से परहेज़ करें जो रोज़े को बातिल करते है।

(1) वह मुसाफ़िर जिस ने सफ़र में कोई ऐसा काम किया हो जो रोज़े को बातिल करता हो और वह ज़ोहर से पहले अपने वतन या ऐसी जगह पहुँच जाये जहाँ वह दस दिन रहना चाहता है ।

(2) वह मुसाफ़िर जो ज़ोहर के बाद अपने वतन या ऐसी जगह पहुँच जाये जहाँ वह दस दिन रहना चाहता हो। और इसी तरह अगर ज़ोहर से पहले उन जगहों पर पहुँच जाये जब कि वह सफ़र में रोज़ा तोड़ चुका हो तब भी यही हुक्म है।

(3) वह मरीज़ जो ज़ोहर के बाद तंदुरूस्त हो जाये। और यही हुक्म है अगर ज़ोहर से पहले तंदुरूस्त हो जाये अगरचे उस ने कोई ऐसा काम (भी) किया हो रोज़े को बातिल कर देता हो। और इसी तरह अगर ऐसा काम न किया हो तो उस का हुक्म मस्अला न0 1576 में गुज़र जुका है।

(4) वह औरत जो दिन में हैज़ या निफ़ास के ख़ून से पाक हो जाये।

(1759) रोज़े दार के लिए मुस्तहब है कि रोज़ा अफ़तार करने से पहले मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर कोई दूसरा शख्स उस का इंतिज़ार कर रहा हो या उसे इतनी भूक लगी हो कि हुज़ूरे क़ल्ब के साथ नमाज़ न पढ़ सकता हो तो बेहतर है कि पहले रोज़ा अफ़तार करे। लेकिन ज़हाँ तक मुमकिन हो नमाज़ फ़ज़ीलत के वक़्त में ही अदा करे।

फ़िक़ह पर मौलाना सादिक हसन द्वारा दिए व्याख्यान पर नोट्स (www.panjtan.org से प्राप्त किया गया)

मुख्य मेनू

1 रोज़ा का सामान्य क़ानून

 

सामान्य ज्ञान :

 

निम्नलिखित प्रकार के रोज़े इस्लाम में वैध करार दिए गए हैं!

१. रमज़ान के रोज़े

२. काजा रोज़े

३. मुस्तहब रोज़े

४. कफ्फारा के रोज़े

५. नज़र और मन्नत के रोज़े

 

1. उपवास रमजान के पूरे महीने में वाजिब  है! उपवास निय्यत  (इरादे के साथ) शुरू होता है कि "मैं उन सभी चीजों को जो फज्र  के निर्धारित समय से मग़रिब  (शाम)  की निर्धारित समय के तोड़ने के वक़्त तक उन सभी चीज़ों से परहेज करेंगे कुर्बतन  इलाल्लाह . रमजान में उपवास के लिए प्रत्येक दिन की  निय्यत  फज्र , या रात से पहले किया जा सकता है, एक दिन पहले, या पूरे महीने के लिए किया जा सकता है जो रमजान की शुरुआत में किया जाता है!


2. 30 शाबान (यौमुश  शक) पर उपवास रमजान का पहला रोज़ा के इरादे से हराम हराम है जब आप रमजान के शुरू होने के बारे में निश्चित नहीं हैं!. यह बेहतर और मुस्तहब है की आप ३० शाबान का रोज़ा या तो क़ज़ा रोज़े की निय्यत से रखें या मुस्तहब रोज़े की नियात से रखें और अगर आप ने क़ज़ा या मुस्तहब के निय्यत से रोज़ा रखा है और आप को पता चल जाए की यह रमज़ान की पहली है तो आप अपनी निय्यत को बदल कर पहली रमज़ान की निय्यत से रोज़ा रखें  तो यह स्वतः पहली  रमजान के उपवास के रूप में गिना जाएगा.

 

क़ज़ा और कफ्फारा किसी भी वैध कारण के बिना रमज़ान का रोज़ा नहीं रखना एक महान पाप है! रमज़ान के प्रत्येक ऐसे दिन जिस दिन का रोज़ा छूटा है या नहीं रखा है, उसके लिए क़ज़ा रोज़ा है और कफ्फ़ारा के रूप में एक भारी जुर्माना है! प्रत्येक छूटे हुए रोज़े के बदले इंसान को या तो ६० रोज़े रखने का हुक्म है या ६० गरीबों को खाना खिलाने का! यही क़ज़ा और कफ्फारा या दोनों का हुक्म है जब कोई जान बूझ कर रोज़ा छोड़े!

1.खाने के लिए या जो  रमजान के महीने में दिन के दौरान खाना और  पीना हराम है उनके लिए भी जो कोई वैध कारण के बिना उपवास नहीं कर रहे हैं!. लेकिन जो लोग किसी वैध कारण से रोज़ा नहीं रख़ रहे हैं जैसे की यात्री, वृद्ध व्यक्ति, गर्भावस्था में महिला , स्तनपान कराने वली महिला , या हैज़ वाली महिला या बीमार व्यक्ति , उनके लिए भी यह एहतियाते मुस्तहब है की दिन के दौरान खाने या पीने से बचें.

2. यदि एक बच्चा रमजान के दौरान फज्र  समय से पहले बालिग़  (बालिग लड़कियों के लिए 9 वर्ष उदाहरण बन जाता है) हो जाता/जाती  है  , तो उस पर रोज़ा उस दिन से वाजिब  हो जाएगा लेकिन अगर वह रमजान के दौरान जोहर  समय के बाद बालिग़ हो जाता/जाती  है तो  फिर अगले दिन से उपवास वाजिब होगा!.

3. अगर मौलिक मुक्ति या संभोग,  रमजान में रात के दौरान होता है (जिसमे गुसले  जनाबत वाजिब हो), तो यह फज्र से पहले गुसले  जनाबत वाजिब हो जाता है , अगर गुसले जनाबत किसी कारणवश नहीं संभव है या हानिकारक है तो तय्मुम करना आवश्यक है अन्यथा उसपर क़ज़ा और कफ्फारा लागू होगा! .  अगर रमजान में दिन के समय के दौरान या फज्र के बाद अनजाने में मनी खारिज हो तो रोज़ा प्रभावित नहीं है!

4. अगर एक औरत हैज़  ( रमजान के दौरान माहवारी में है) तो वह माहवारी की अवधि के दौरान रोज़ा नहीं रखेगी!. लेकिन वह रमजान के बाद रोज़ा की क़ज़ा रखगी! अगर एक औरत को रमजान के दौरान फज्र  समय से पहले मासिक धर्म से मुक्त हो जाती है, यह उसका फज्र  पहले घुसले  हैज़ करना और उपवास रखना वाजिब है! अगर वह दिन के दौरान या फज्र के बाद माहवारी से मुक्त हो जाती है, तो वह रोज़ा अगले दिन से शुरू होगा! अगर एक औरत ने रोज़ा रखा हुआ है और किसी भी समय (रोज़े की अवस्था में) उसे मासिक धर्म की अवधि शुरू होता है, तो उस दिन का रोज़ा अवैध है और  वह रमजान के बाद क़ज़ा  रखेगी!

5. उपवास के दौरान स्थानीय संज्ञाहरण (सुन्न करने का इंजेक्शन) की अनुमति दी है, लेकिन यह बेहतर होगा कि इंजेक्शन जो दवा या भोजन के रूप में दिया जाता है उससे परहेज करें!.

6. उपवास के दौरान, यदि आप कुछ बयान अल्लाह या पैगंबर, या मासूमीन  के यह मानते हुए दें की यह सही था, लेकिन बाद में यह गलत पाया गया तो, आपका उपवास अमान्य हो जाता है और क़ज़ा  और कफ्फारा  लागू होगा! .

7. अगर एक पति रमजान के उपवास के दौरान अपनी पतनी  को  सेक्स के लिए मजबूर करता है और सेक्स करता है, तो क़ज़ा  दोनों पर वाजिब  हो जाएगा, लेकिन पति को दुगुना कफ्फ़ारा भुगतान करना होगा, खुद के लिए और उसकी पत्नी के लिए!

2. हराम रोजा (10 किस्म के रोज़े हराम हैं, और इस्लाम में मना किये गए हैं!
इस्लाम में १० प्रकार के रोज़ों को हराम करार दिया गया है!
१. ईद-उल-फितर का दिन
२. ईद-अल-अजहा का दिन
३. तश्रीक का दिन का रोज़ा (११-१३ ज़िल-हज्ज जो व्यक्ति मीना में है)
४. यौमुल-शक (३० शाबान का रोज़ा)
५. सफ़र (यात्रा) में रहने वाला व्यक्ति
६. बीमार व्यक्ति के रमज़ान का रोज़ा
७. खामोशी का रोज़ा
८. विसाल का रोज़ा (जान बूझ कर दो लगातार दिन का रोज़ा जिसमे रात भी शामिल हो)
९. हराम कामों के हो जाने पर शुक्र का रोज़ा
१०. वैसे मुस्तहब रोज़े जो बगैर अनुमती के रखे गए और जिनमे अनुमती आव्यश्यक हो!
3. यौम-उल-शक का रोज़ा (रमज़ान शुरू होने पर संदेह)
 शाबान के तीसवां दिन (३०) यौमुल शक का दिन कहलाता है! अगर आप को २९ की शाम या रात तक या फिर ३० का दिन ख़तम होने के पहले तक यह पता नहीं चले की रमज़ान की पहली है या शाबान की ३० और रमज़ान के रोज़े की नियात है तो वह रोज़ा हराम हो जाता है!
३० शाबान का रोज़ा रखना मुस्तहब है, लेकिन ३० शाबान के रोज़े की नियत के प्रकार इस तरह के हैं!
१.  माफिज़-ज़िम्मा की निय्यत (अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्ति के लिए)
२, अगर पिछले रमज़ान का कोई रोज़ा क़ज़ा है तो क़ज़ा की नियत करे
३. शाबान के मुस्तहब रोज़े की नियत
 
अगर आप दोहरी नियत करें मतलब ३० शाबान का मुस्तहब और पहली रमज़ान का वाजिब तो यह नियत आक़ा खुई के क़ानून से गलत होगी लेकिन अयातुल्लाह खुमैनी और अयातुल्लाह सिस्तानी के क़ानून से सही होगी!
अगर आप ३० शाबान का मुस्तहब रोज़ा रखें, और दिन के किसी समय में भी आप को रमज़ान के पहली की खबर मिल जाए तो फ़ौरन अपनी नियत बदल कर रमज़ान के रोज़े की करें!
अगर आप ने किसी भी नियत से ३० शाबान का रोज़ा रखा है और बाद में आप को पता चले के यह पहली रमज़ान थी तो अप्प का रोज़ा पहली रमज़ान का रोज़ा माना जाएगा!
 
अगर आप ३० शाबान का रोज़ा नहीं रख़ रहे है, तो आप के लिए यह आवश्यक है की,
१. अगर ३० शाबान के सूरज डूबने के बाद आप को पता चले की २९ का चाँद था तो आप के लिए पहली रमज़ान का रोज़ा क़ज़ा हो जाता है जो आपको बाद में रखना होगा
२. अगर आप को ज़वाल के वक़्त पता चले के चाँद देखा गया था तो आप के लिए दिन का खाना पीना या जो काम मना किया गया है वह मगरिब के रोज़ा तोड़ने वक़्त तक हराम है, और आप को एक रोज़ा की क़ज़ा भी रखना होगा!
३. अगर आप को ज़वाल के पहले चाँद देखे जाने की सूचना मिले तो :
          (१) अगर आपने कोई ऐसा काम नहीं किया है जो रोज़ा तोड़ सकता है (मसलन खाना पीना, या सेक्स) तो आप फ़ौरन रमज़ान पहले रोज़े की नियत करें
          (२)  अगर आपने कोई ऐसा काम किया है जो रोज़ा तोड़ सकता है (मसलन खाना पीना, या सेक्स) तो आप रमज़ान का रोज़ा रखने जैसा वयवहार करें और बाद में रोज़ा का क़ज़ा रखें!
 
हिलाल (चाँद देखाई देने) पर सवाल जान्ने के लिए यहाँ क्लिक करें
4. यात्रिओं का रोंज़ा

इस्लामी शरीयत के मुताबिक, एक यात्री की सामान्य परिभाषा वह व्यक्ति है जो अपने घर से दूसरे शहर या  जगह 10 दिनों से कम रहने के इरादे यात्रा की/ गया हो! 

 

रमजान के महीने के दौरान एक यात्री का  उपवास हराम है! 

 

यदि आप रमज़ान में ज़वाल के बाद (समय अनुसार इस्लामी मध्य) अपनी यात्रा शुरू करे  तो यह उस दिन के लिए उपवास पूरा वाजिब  है.

 

यदि आप रमजान में ज़वाल  समय से पहले अपनी यात्रा शुरू की है तो यह वाजिब  है कि दिन में रोज़ा शुरू करे , और फिर स्वचालित रूप से आपका उपवास आपके घर/शहर से एक निश्चित दूरी की यात्रा के बाद टूट जाएगा!

 

यदि आप यात्रा कर रहे थे और ज़वाल (समय इस्लामी मध्य दिन) के बाद अपने घर/शहर वापिस आ जाते है जहाँ पर दस दिन या उस से ज्यादा रहने का क़स्द है और आपने ऐसा कोई काम नहीं किया है जो रोज़ा तोड़ सके तो आप पर वाजिब है की आप उस दिन का रोज़ा रखें लेकिन अगर आपने ऐसा कोई काम किया है तो आप उस दिन का रोज़ा नहीं रख़ सकते और दुसरे दिन से रोज़ा वाजिब होगा और पहले दिन की रोज़ा का क़ज़ा रखना होगा! 

 

यदि आप यात्रा कर रहे थे और ज़वाल (समय इस्लामी मध्य दिन) से पहले अपने घर/शहर वापिस आ जाते है जहाँ पर दस दिन या उस से ज्यादा रहने का क़स्द है तो आप उस दिन का  उपवास रख़ सकते हैं और यह मुस्तहब  है उस दिन उपवास का सम्मान करें सभी यात्रा के दौरान प्रत्येक व्रत के लिए रोज़ा का क़ज़ा रखें!.


यदि आप रमजान के महीने के दौरान एक यात्री रहे हैं, और कम से कम 10 दिनों के लिए कहीं रहने, तो आप उन दिनों के दौरान किसी भी अन्य मुस्तहब  रोज़ा या पिछले रमजान का क़ज़ा रोज़ा नहीं रख सकते!

5. रोंज़ा की नियत

रमजान के महीने के दौरान उपवास के लिए निय्यत फज्र (सुबह होने) से पहले किया जाना चाहिए, जैसा की ऊपर चर्चा किया गया है,  रमजान के पूरे महीने के लिए उपवास के लिए निय्यत  रमजान की शुरुआत में एक बार किया जा सकता! विशेष मामलों जैसे यौमुल शक  के लिए ऊपर चर्चित विषय को देखें!


रमजान के क़ज़ा व्रत के  निय्यत  के लिए ज़वाल (इस्लामी मध्य दिन) से पहले या फज्र समय से पहले किया जा सकता बशर्ते की कोई ऐसा काम न किया हो जिससे रोज़ा टूट सकता है!

 

किसी भी मुस्तहब रोज़े की निय्यत उस दिन सुबह से पहले या कभी भी मग़रिब  पहले किया जा सकता है बशर्ते की कोई ऐसा काम न किया हो जिससे रोज़ा टूट सकता है!

6. किन लोगों को रोज़े की छूट है?

वोह लोग जिनपर रमज़ान का रोज़ा वाजिब नहीं है वोह यह हैं :

१. नाबालिग लोग (इन पर क़ज़ा भी वाजिब नहीं है)

२. पागल लोग (इन पर क़ज़ा भी वाजिब नहीं है)

३. मुसाफिर / यात्रीगन (इन पर क़ज़ा वाजिब है जैसा उपर लिखा गया है)

४. बीमार लोग, जिनके कंडीशन ऊपर लिखे गए है!

५. हैज़ (माहवारी) वाली औरतें, लेकिन रमज़ान के बाद क़ज़ा वाजिब है! लेकिन अगर वोह अगले साल रमज़ान के पहले क़ज़ा नहीं रखती हैं तो उनके लिए क़ज़ा भी है और उनको फिदया  भी देना होगा! प्रत्येक दिन के छूटे हुए रोज़ा का फिदया 750 ग्राम अनाज का है जो किसी ग़रीब को देना होगा!

६. ऊमर रसीदा लोग, जिनमे रोज़ा रखने की सलाहियत और ताक़त  नहीं है! इनपर क़ज़ा भी वाजिब नहीं है इसके बावजूद के अगर रमज़ान के बाद उनमे थोड़ी ताक़त और सलाहियत आ जाए!

७. गर्भवती महिलाएं, अगर बच्चे के लिए रोज़ा नुकसानदेह है, न के उसके लिए! लेकिन इस रोज़े का क़ज़ा वाजिब है रमज़ान के बाद और उसे फिदया भी देना होगा ७५० ग्राम अनाज के बराबर प्रत्येक दिन के छूटे रोज़े के हिसाब से, किसी ग़रीब व्यक्ति को!

८. स्तनपान कराती हुई महीला, अगर रोज़ा सिर्फ बच्चे के लिए नुकसानदेह है न की उसके लिए! लेकिन इस रोज़े की क़ज़ा वाजिब है रमज़ान के बाद, और उसको फिदया भी देना होगा ७५० ग्राम अनाज के बराबर प्रत्येक दिन के छूटे रोज़े के हिसाब से, किसी ग़रीब व्यक्ति को!

7. बीमार व्यक्ति का रोज़ा

बीमार व्यक्ति के लिए रोज़ा वाजिब नहीं है, और कुछ हालत में यह हराम भी है!, लेकिन इन शर्तों के साथ :

१. अगर व्यक्ति को सौ प्रतिशत विश्वास है और ९५% इत्मीनान है की रोज़ा उसके लिए नुकसानदेह है (अगर डाक्टर कहें भी की नुकसानदेह नहीं है तब भी)

२. अगर व्यक्ति को विश्वास नहीं है की रोज़ा उसके लिए नुकसानदेह है, लेकिन डाक्टर कहता है की नुकसानदेह है.

अगर व्यक्ति लगातार बीमार रहता है और रमज़ान के दौरान रोज़ा नहीं रख़ सकता है, लेकिन अगर रमज़ान के बाद सेहत्याब हो जाता है कुछ दिनों के लिए, (उदाहरण स्वरुप जाड़े में कुछ दिनों के लिए) तब उसे उन दिनों में रोज़ा रखना चाहिए! ऐसे लोगों पर क़ज़ा वाजिब नहीं है जो इतना बीमार है की रमज़ान के बाद भी अगले ११ महीनों तक (अगला रमज़ान शुरू होने तक) बीमार रहे !

8. वोह बातें जो रोज़े को बातिल (खराब / तोड़) कर देती हैं
अगर आप रोज़ा रख़ रहे हैं तो निम्नलिखित बातें रोज़ा तोड़ सकती हैं या इसे असामान्य कर सकती हैं!
१. कुछ भी खाना और पीना
२. कै / मितली 
३. धुल के गुबार का हलक़ के नीचे तक जाने देना
४. अल्लाह, रसूल और मासूमीन के बारे में या उनके हवाले से गलत बयानी करना
५. सम्भोग
६. हस्तमैथुन या इस्तेमना
७. फज्र तक या अज़ान से पहले वाजिब ग़ुस्ल न करना
८. किसी सय्याल का लेना या एनेमा करना
९. सर को पानी के अंदर डुबोना (अयातुल्लाह सिस्तानी कहते हैं की इससे रोज़ा नहीं टूटता है)

 

अगर गुसले  जनाबत  वाजिब  हो जाता है तो यह ज़रूरी है की  यह सुबह होने से पहले, चाहे रमज़ान का रोज़ा हो या रमज़ान का क़ज़ा रोज़ा हो, गुसले  जनाबत  वाजिब है! मुस्तहब रोज़े के लिए, यह सुबह होने से पहले ग़ुस्ल करना आवश्यक नहीं है! अगर किसी औरत पर गुसले हैज़ वाजिब है तो यह ज़रूरी है की  यह सुबह होने से पहले, चाहे रमज़ान का रोज़ा हो या रमज़ान का क़ज़ा रोज़ा हो, गुसले  हैज़  वाजिब है, लेकिन अगर मुस्तहब रोज़ा है तो सुबह होने से पहले ग़ुस्ल करना एहतियाते वाजिब की बिना पर आवश्यक नहीं है (अयातुल्लाह खुई के अनुसार)

 

अगर किसी व्यक्ति को गुसले जनाबत सही तरीके से नहीं मालूम अगर उसने गुसले जनाबत को सही तरीके से किये बगैर रोज़ा रखा हो तो (या गुसले जनाबत करना भूल गया हो तो) उसे चाहिए के उस दिन का रोज़ा क़ज़ा करे और सही तरीके से गुसले जनाबत को जान कर उसी प्रकार से ग़ुस्ल करने के बाद क़ज़ा रोज़ा रखे! लेकिन उस औरत पर जिसने गुसले हैज़ सही तरीके से नहीं किया हो या भूल गयी हो उस पर क़ज़ा रोज़ा वाजिब नहीं है!

 

झूठ बोलना (या कोई मनगढ़त  हदीस बताना या अल्लाह, रसूल और मासूमीन के हवाले से गलत बात कहना कभी भी हराम है और यह रोज़े को बातिल कर देती है लेकिन अगर यह रोज़ा के दौरान जान बूझ कर नहीं की गयी तो रोज़ा सही है!

 

गुबार या धुएं को हलक़ के अंदर लेना रोज़ा को बातिल कर देता है लेकिंग अगर नहाने के लिए शावर में गरम पानी का भाप रोज़े को असर नहीं करता है!

 

अपना दांत धोने के लिए मंजन के प्रयोग या मुंह साफ़ करने ले लिए कुल्ला करना ठीक है उस वक़्त तक जब तक मंजन या पानी हलक़ में न जाए! अगर कुल्ला करने के बाद मुंह में गीलापन बाक़ी रहे तो रोज़ा नहीं टूटता!

 

खाने का स्वाद चखने के लिए (ज़बान पर) स्वाद के लिए लिया गया चखना रोज़े को असर नहीं करता लेकिन रोज़े के समय इसको हलक़ से नीचे नहीं जाना चाहिए!

 

आँख, कान और नाक में दवा (तरल दवाई) डाला जा सकता है बशर्ते के वोह हलक़ में ना जाए

9. कफ्फारा (दंड) : उपवास और इसके नियमों का पालन नहीं करने के कारण

अगर एक व्रत नहीं  रखा है या या अगर रमज़ान का रोज़ा एक वैध कारण के बिना टूट गया है, तो उस व्यक्ति को प्रत्येक छूटे ही रोज़े के दिन का क़ज़ा रखना होगा और कफ्फ़ारा भी देना होगा! हर एक दिन के छूटे हुए रोज़े का कफ्फारा या तो (१) ६० गरीबों को खिलाना है या (२) प्रत्येक दिन (छूटे हुए रोज़े) के लिए ६० रोज़ा रखना है!

 

अगर रमज़ान के एक रोज़ा किसी हराम काम ( अल्लाह, मासूमीन के लिए झूठ, शराबनोशी, या हस्तमैथुन) के कारण टूटा है तो क़ज़ा के इलावा दोनों क्किस्म के कफ्फारे (६० गरीबों को खाना खिलाना और ६० दिन का रोज़ा)  एहतियाते वाजिब की बिना पर देने होंगे!  हालंकि अयातुल्लाह सिस्तानी के क़ानून के हिसाब से दोनों किस्म के कफ्फारे किसी भी हालत में वाजिब नहीं हैं!

10. रमज़ान का रोज़ा नहीं रखने के लिए कफ्फारा का नियम

अगर रमजान का कोई भी रोज़ा किसी वैध कारण के बिना छूट जाता है या जानबूझकर छोड़ा जाता है तो आपको उन रोज़ों का क़ज़ा रखना होगा और ज़रूरी है की हर छूटे हुए रोज़े का कफ्फ़ारा भी दें! कफ्फारा  (दंड) की निम्नलिखित शर्तें हैं:

 

(क) प्रत्येक छूटे हुए दिन के लिए 60 दिन का उपवास रखें

(ख) 60 गरीब मोमीनो को खाना खिलायें एक दिन के छूटे हुए रोज़े के लिए!

 

अगर जान बूझ कर हराम काम किया हो (जैसा ऊपर दर्शाया गया है, तो क़ज़ा भी रखें और दोनों किस्म के कफ्फारा भी दें

 

१. अगर ६० मोमीनों को खाना खिलाने का कफारा चुना है तो साठों मोमिन को पेट भर कर खिलाना है या प्रत्येक मोमिन को ७५० ग्राम अनाज देना है! यह साठ लोग किसी भी आयु के हो सकते हैं, यहाँ तक के एक नवजात शिशु भी, लेकिन संख्या ६० होनी ज़रूरी है! यह अनुमती नहीं है की ३०-३० लोग कर के दो बार में खिलाये जाएँ. इसकी भी अनुमति नहीं है की ६० लोगों को खाने का पैसा दे दिया जाए! 

२. अगर आप रमज़ान का क़ज़ा रोज़ा रख़ रहे हैं और जान बूझ कर किसी वैध कारण के बिना जोहर के वक़्त के बाद रोज़ा तोड़ रहे हैं तो  कफ्फारा दिन के रोज़े के बराबर होगा, या दस मोमीनों को खाना खिलाना होगा  या 10 मोमीनों को 750 ग्राम अनाज देना होगा!

३. अगर रमज़ान का कफ्फारा बाक़ी है और अगर आपने वह कफ्फारा अगले रमज़ान तक नहीं दिया है तो उसको बाद में देना ज़रूरी है!

 . अगर कोई व्यक्ति बीमार है और इतना ग़रीब है की कफ्फ़ारा भी नहीं दे सकता तो जितना  उसके बस में है उतना सदक़ा दे दे!

५. अगर किसी औरत को रमज़ान का क़ज़ा रखना है (अपने माहवारी के कारण), तो उसको चाहिए के अगले रमज़ान के पहले अपना क़ज़ा रोज़ा पूरा कर ले, लेकिन अगर वोह किसी बिना पर नहीं किया हो तो रमज़ान के बाद यह आवश्यक है की पूरा करे, और उसका फिदया (दंड) भी दे जो 750 ग्राम अनाज के बराबर होगा प्रत्येक छूटे हुए रोज़े के लिए!  फिदया का दंड अगले साल भी यही होगा और नहीं बदलेगा

६. अगर व्यक्क्ति जिस देश में रहता हो वहां ग़रीब नहीं मिलते हों तो उसे चाहिए की वोह दुसरे देश में गरीबों को खिलाने का या उसी के मुताबिक अनाज भेजने का प्रबंध करे! 

 
 
 

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