रमज़ान की पहली रात और पहला दिन﴿

इस में चंद आमाल हैं :

1. आब जारी में ग़ुस्ल करना और 30 चुल्लू पानी सर में डालना की यह साल भर तक तमाम दर्दों और बीमारियों से महफ़ूज़ रखने का मोजिब है 

2. एक चुल्लू गुलाब का अर्क़ अपने चेहरे पर डाले ताकी ज़िल्लत व परेशानी से निजात हो, और थोड़ा सा गुलाब अर्क़ सर डाले की साल भर परेशानी से बचा रहे!

3. अव्वल माह की 2 रक'अत नमाज़ पढ़े सदक़ा दे 

4. 2 रक'अत नमाज़ पढ़े जिसकी पहली रक'अत में सूरह अल'हम्द के बाद सूरह इनना फ़तह'ना दूसरी रक'अत में सूरह अल'हम्द के बाद कोई सूरह पढ़े ताकि ख़ुदाए त'आला इस साल तमाम बुराइयों को इस से दूर रखे और आख़िरी साल तक इसकी हिफ़ाज़त करे!

5. तुलु-ए-फ़जर के बाद यह दुआ पढ़े :

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ माबूद, माहे रमज़ान आ गया है और तूने इसके रोज़े  फ़र्ज़ किये हैं, इसमें तूने क़ुरआन उतारा है जो लोगों के लिए  हिदायत 

और हिदायत की निशानियाँ और हक़ व बातिल में फ़र्क़ करता है, ऐ माबूद! इसके रोज़े रखने में मदद कर और इसे हम से क़बूल फ़रमा, इसको हम से पूरा ले और हमारे 

लिए पूरा फ़रमा तरफ़ आसानी व सहूलत के साथ, बेशक तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है

 

اَللّٰھُمَّ قَدْ حَضَرَ شَھْرُ رَمَضانَ وَقَدِ افْتَرَضْتَ عَلَیْنا صِیامَہُ، وَأَ نْزَلْتَ فِیہِ الْقُرْآنَ ھُدیً لِلنّاسِ

وَبَیِّناتٍ مِنَ الْھُدی وَالْفُرْقانِ ۔ اَللّٰھُمَّ أَعِنَّا عَلَی صِیامِہِ، وَتَقَبَّلْہُ مِنّا وَتَسَلَّمْہُ مِنّا، وَسَلِّمْہُ لَنا 

فِی یُسْرٍ مِنْکَ وَعافِیَةٍ، إِنَّکَ عَلَی کُلِّ شَیْءٍ قَدِیرٌ ۔

6 . सहीफ़ए कामेला की 44वीं दुआ अगर इस माह की पहली रात में न पढ़ सके तो आज के दिन में पढ़े!

7. ज़ाद अल'मियाद में अल्लामा मजलिसी (र:अ) ने फ़रमाया के शेख़ कुल्लीनी (अलैह रहमा) व शेख़ तूसी (अलैह रहमा) और दीगर बुज़ुर्गों ने मातबर सनद के साथ रिवायत की है की ईमाम मूसा काज़िम (अ:स) ने फ़रमाया, "माहे मुबारक रमज़ान में अव्वल साल यानि इस माह के पहले दिन जो शख़्स दिखावे या किसी ग़लत इरादे के बग़ैर महज़ रज़ाए ईलाही के लिए इस दुआ को पढ़े तो ख़ुदा साल भर तक फ़ितना व फ़साद और बदन को ज़रर पहुंचाने वाली हर आफ़त से महफ़ूज़ रखेगा, और वह दुआ यह है :

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ माबूद मैं सवाल करता हूँ तुझ से तेरे नाम के वास्ते से हर चीज़ जिस की मती है और तेरी रहमत के वास्ते से  छाई हुई है 

तेरी बड़ाई के वास्ते से जिस के आगे हर चीज़ झुकी हुई है तेरी इज़्ज़त के वास्ते से जो हर चीज़ पर हावी है तेरी क़ुव्वत के वास्ते से 

जिसके आगे हर चीज़ सर नगूं है तेरी इक़्तेदार के वास्ते से की जो  हर चीज़ पर ग़ालिब है और सवाली हूँ तेरे इल्म के वास्ते से जो हर चीज़ को घेरे 

हुए है ऐ नूर ऐ पाकीज़ा तर ऐ अव्वल जो हर चीज़ के पहले था ऐ वो जो हर चीज़ का बाद बाक़ी रहेगा ऐ अल्लाह 

ऐ रहमान मोहम्मद और आले मोहम्मद पर रहमत फ़रमा और मेरे वह गुनाह माफ़ फ़रमा जो नेमतों को पलटा देते हैं और मेरे वो 

गुनाह माफ़ फ़रमा जो अज़ाब का बाएस हैं मेरे वो गुनाह माफ़ फ़रमा  उम्मीद व रहमत को तोड़ते हैं मेरे वो गुनाह माफ़ फ़रमा जो मुझ पर दुश्मनों 

को चढ़ा लाते हैं, मेरे वो गुनाह माफ़ फ़रमा जो दुआ क़ुबूल नहीं होने देते मेरे वो गुनाह माफ़ फ़रमा जिन की वजह से मुसीबत आ जाती है मेरे वो 

गुनाह माफ़ फ़रमा जो आसमान से बारिश को रोकते हैं, मेरे वो गुनाह माफ़ फ़रमा जो जिन से पर्दा दरी होती  है,मेरे वो गुनाह माफ़ फ़रमा जो जल्द ज़िंदगी 

ख़तम कर देते हैं, मेरे वो गुनाह माफ़ फ़रमा जो शर्मिंदगी की वजह हैं, मेरे वो गुनाह माफ़ फ़रमा जो पर्दा चाक कर देते हैं, और मुझे  पाएदार ज़िरह 

पहना दे जिसे कोई उतार ना सके, मुझे इन आने वाले साल के शब व रोज़ में जिन चीज़ों का डर है इनके शर से हिफ़ाज़त में रख, 

ऐ माबूद! ऐ सात आसमानों और सात ज़मीनों और जो कुछ इनमें है और जो कुछ  दरम्यान में है इसके परवरदिगार और 

ऐ अर्शे अज़ीम के परवरदिगार और दो बार नाज़िल शुदा सात आयतों और क़ुरआन अज़ीम के परवरदिगार और इसराफील (अ:स) मिकाइल (अ:स) व 

जिब्राइल (अ:स) के परवरदिगार और हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) के परवरदिगार की जो रसूलों के सरदार और नबियों में आख़िरी हैं 

तेरे वास्ते से तुझ से सवाली हूँ और इसके वास्ते से जिससे तूने ख़ुद को मौसूम किया, ऐ बुजुर्गतर तू वह है जो बड़ा एहसान करने वाला, हर ख़तरे 

को दूर करने वाल, बड़ी बड़ी अताओं वाला, काम और ज़्यादा नेकियों को दोगुना करने वाला है, और तू जो चाहे वही करने वाला है, ऐ क़दीर ऐ अल्लाह ऐ रहमान, 

हज़रत मोहम्मद रहमत फ़रमा और इनके अहलेबैत (अ:स) पर रहमत फ़रमा और इस आने वाले साल में अपनी तरफ़ से मेरी पर्दापोशी फ़रमा मेरे चेहरे को अपने 

नूर से शादमान कर, अपनी मोहब्बत में मुझे महबूब बना, अपनी रज़ा व ख़ुशनूदी, अपनी बेहतरीन बख़्शिश और अपनी बड़ी बड़ी अताओं से हिस्सा दे और मुझे अपनी तरफ़ 

से भलाई अता फ़रमा जो तू अपनी मख़लूक़ में से किसी को अता फ़रमाए और नवाज़िशों के साथ तंदरुस्ती भी दे ऐ तमाम शिकायतों 

के सुनने वाले, ऐ हर राज़ के गवाह, ऐ हर पोशीदा चीज़ के जानने वाले और जिस को चाहे दूर कर देने वाले, ऐ बा'इज़्ज़त माफ़ करने वाले 

ऐ बेहतरीन दर गुज़र करने वाले, मुझे इब्राहिम (अ:स) दीन और इनकी सीरत पर मौत दे और मुझे हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) के 

दीन पर मौत दे और अच्छे तरीक़े से मौत दे, पस मौत दे मुझे जबकि मैं तेरे दोस्तों का दोस्त और तेरे दुश्मनों का दुश्मन हूँ,    

ऐ माबूद! इस साल मुझे हर इस क़ौल व अमल से दूर रख जो मुझ को तुझ से दूर कर देने वाला है वाला है और मुझे इस साल 

हर ऐसे क़ौल व अमल की तरफ़ ले जा जो मुझ को तेरी  क़ुरबत में पहुंचाने वाला है ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले 

मुझे हर क़ौल या अमल या फ़ेल से दूर रख जिसके नुक़सान और अंजाम से डरता हूँ और खाएफ़ हूँ की तू इसको पसंद ना करे तो मेरी तरफ़ 

से अपनी पाकीज़ा तवज्जह हटा लेगा, पस इससे तेरे यहाँ मेरे हिस्से में कमी हो जायेगी, ऐ मोहब्बत वाले, ऐ रहम वाले, ऐ माबूद! इस साल मुझे अपनी 

हिफ़ाज़त व निगहदारी में क़रार दे, अपने पनाह में अपने आस्ताँ पर रख, मुझे अपनी हिफ़ाज़त का लिबास पहना,  तरफ़ से बुज़ुर्गी दे, तेरी क़ुर्बत वाला बा'इज़्ज़त 

है और तेरी तारीफ़ बुलंद है और तेरे सिवा कोई माबूद नहीं है, ऐ माबूद! दोस्तों में जो नेक लोग गुज़रे हैं मुझे इनमें शुमार कर और इनके साथ मिला दे 

और इनमें से जिस ने तेरी तरफ़ से सच्ची बात कही मुझे इसका मानने वाला बना, ऐ माबूद! मैं तर पनाह लेता हूँ 

इस से के घेरे में मुझ को मेरी ख़ता, मेरा जुल्म अपने नफ़्स पर मेरी ज़्यादती, और अपने ख़्वाहिश की पैरवी और अपनी चाहत

में महवियत को यह चीज़ें मेरी और तेरी रहमत व ख़ुशनूदी के दरम्यान हाएल हो जाएँ, पस मैं तेरे यहाँ 

फरामोश हो जाऊँ और तेरी नाराज़गी में फँस जाऊँ, ऐ माबूद! मुझे हर इस नेक अमल की तौफ़ीक़ दे जिससे तू खुश हो और मुझे ब'लिहाज़ 

मुक़ाम अपने करीब कर ले, ऐ माबूद! जैसे तूने मदद फ़रमाई अपने नबी मोहम्मद (स:अ:व:व) की ख़ौफ़ दुश्मनान में 

और इनकी परेशानी दूर की और इनका रंज व ग़म मिटा दिया और तूने अपना वादा सच्चा कर दिखाया और इनसे किया हुआ पैमान पूरा फ़रमाया तो ऐ माबूद! इसी तरह 

इस साल के ख़ौफ़ में मेरी मदद फ़रमा, इसकी मुसीबतों बीमारियों, आज़माइशों, तकलीफ़ों, और ग़मों और इसमें म'आश की तंगी वग़ैरा पर मुझे अपनी 

रहमत से बेहतरीन आसाइश दे मुझे तमाम नेमतें मिलती रहें यहाँ तक की मेरी मौत का वक़्त आ जाए, मैं सवाल करता हूँ तुझ से इसकी तरह जिस ने गुनाह 

और ज़ुल्म किया और वो मोहताज ही गुनाह का एतराफ़ करता है और सवाली हूँ तुझ से की मेरे पिछले गुनाह माफ़ कर दे, जिनको तेरे निगहबानों ने लिखा है और तेरे मु'अज़ीज़ 

फ़रिश्तों ने शुमार किया जो मुझ पर मुक़र्रर हैं और मेरे अल्लाह! बाक़ी मांडह ज़िंदगी में मुझे गुनाहों से बचा इस वक़्त तक की मेरी उमर तमाम हो जाए, ऐ अल्लाह! ऐ रहमान, 

ऐ रहीम, हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) और इनके अहलेबैत (अ:स) पर रहमत फ़रमा और मुझे वो सब कुछ अता कर जो मैंने माँगा और जिसकी तुझ से ख़्वाहिश की है 

पस तूने दुआ करने का हुक्म दिया और मेरी दुआ कबूल करने की ज़िम्मेदारी ली है ऐ सबसे ज़्यादा रहम वाले  
 

اَللّٰھُمَّ إِنِّی أَسْأَلُکَ بِاسْمِکَ الَّذِی دانَ لَہُ کُلُّ شَیْءٍ وَبِرَحْمَتِکَ الَّتِی وَسِعَتْ کُلَّ شَیْءٍ

وَبِعَظَمَتِکَ الَّتِی تَواضَعَ لَہا کُلُّ شَیْءٍ وَبِعِزَّتِکَ الَّتِی قَھَرَتْ کُلَّ شَیْءٍ وَبِقُوَّتِکَ الَّتِی

خَضَعَ لَہا کُلُّ شَیْءٍ، وَبِجَبَرُوتِکَ الَّتِی غَلَبَتْ کُلَّ شَیْءٍ، وَبِعِلْمِکَ الَّذِی أَحاطَ بِکُلِّ شَیْءٍ،

 یَا نُورُ یَا قُدُّوسُ، یَا أَوَّلُ قَبْلَ کُلِّ شَیْءٍ، وَیَا باقِیاً بَعْدَ کُلِّ شَیْءٍ، یَا اللهُ یَا رَحْمنُ صَلِّ عَلَی 

مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُغَیِّرُ النِّعَمَ وَاغْفِرْلِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُنْزِلُ النِّقَمَ وَ

اغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تَقْطَعُ الرَّجاءَ، وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُدِیلُ الْاَعْداءَ وَاغْفِرْلِیَ الذُّنُوبَ

الَّتِی تَرُدُّ الدُّعاءَ وَاغْفِرْلِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی یُسْتَحَقُّ بِہا نُزُولُ الْبَلاءِ، وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی

تَحْبِسُ غَیْثَ السَّماءِ، وَاغْفِرْلِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تَکْشِفُ الْغِطاءَ، وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُعَجِّلُ

الْفَناءَ، وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُورِثُ النَّدَمَ، وَاغْفِرْلِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تَھْتِکُ الْعِصَمَ وَأَلْبِسْنِی 

دِرْعَکَ الْحَصِینَةَ الَّتِی لاَ تُرامُ وَعافِنِی مِنْ شَرِّ مَا أُحاذِرُ بِاللَّیْلِ وَالنَّہارِ فِی مُسْتَقْبَلِ سَنَتِی ھذِھِ

اَللّٰھُمَّ رَبَّ السَّمَاواتِ السَّبْعِ، وَرَبَّ الْاَرَضِینَ السَّبْعِ وَمَا فِیھِنَّ وَمَا بَیْنَھُنَّ وَرَبَّ الْعَرْشِ

الْعَظِیمِ، وَرَبَّ السَّبْعِ الْمَثانِی وَالْقُرْآنِ الْعَظِیمِ، وَرَبَّ إِسْرافِیلَ وَمِیکائِیلَ وَجَبْرائِیلَ، وَرَبَّ

مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ سَیِّدِ الْمُرْسَلِینَ وَخاتَمِ النَّبِیِّینَ، أَسْأَلُکَ بِکَ وَبِما سَمَّیْتَ بِہِ 

نَفْسَکَ یَا عَظِیمُ أَ نْتَ الَّذِی تَمُنُّ بِالْعَظِیمِ، وَتَدْفَعُ کُلَّ مَحْذُورٍ، وَتُعْطِی کُلَّ جَزِیلٍ، وَتُضاعِفُ

الْحَسَناتِ بِالْقَلِیلِ وَبِالْکَثِیرِ وَتَفْعَلُ مَا تَشاءُ یَا قَدِیرُ یَا اللهُ یَا رَحْمنُ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَأَھْلِ

بَیْتِہِ وَأَلْبِسْنِی فِی مُسْتَقْبَلِ سَنَتِی ہذِھِ سِتْرَکَ وَنَضِّرْ وَجْھِی بِنُورِکَ، وَأَحِبَّنِی بِمَحَبَّتِکَ،

وَبَلِّغْنِی رِضْوانَکَ، وَشَرِیفَ کَرامَتِکَ، وَجَسِیمَ عَطِیَّتِکَ، وَأَعْطِنِی مِنْ خَیْرِ مَا عِنْدَکَ

وَمِنْ خَیْرِ مَا أَنْتَ مُعْطِیہِ أَحَداً مِنْ خَلْقِکَ، وَأَ لْبِسْنِی مَعَ ذلِکَ عافِیَتَکَ، یَا مَوْضِعَ کُلِّ 

شَکْویٰ، وَیَا شاھِدَ کُلِّ نَجْویٰ، وَیَا عالِمَ کُلِّ خَفِیَّةٍ، وَیَا دافِعَ مَا تَشاءُ مِنْ بَلِیَّةٍ، یَا کَرِیمَ الْعَفْوِ،

یَا حَسَنَ التَّجاوُزِ تَوَفَّنِی عَلَی مِلَّةِ إِبْراھِیمَ وَفِطْرَتِہِ، وَعَلَی دِینِ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ

وَسُنَّتِہِ، وَعَلَی خَیْرِ الْوَفاةِ فَتَوَفَّنِی مُوالِیاً لاََِوْ لِیائِکَ، وَمُعادِیاً لِاَعْدائِکَ اَللّٰھُمَّ وَجَنِّبْنِی فِی 

ہذِھِ السَّنَةِ کُلَّ عَمَلٍ أَوْ قَوْلٍ أَوْ فِعْلٍ یُباعِدُنِی مِنْکَ، وَاجْلِبْنِی إِلی کُلِّ عَمَلٍ أَوْ قَوْلٍ أَوْ فِعْلٍ

یُقَرِّبُنِی مِنْکَ فِی ہذِھِ السَّنَةَ، یَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِینَ، وَامْنَعْنِی مِنْ کُلِّ عَمَلٍ أَوْ قَوْلٍ أَوْ فِعْلٍ یَکُونُ

مِنِّی أَخافُ ضَرَرَ عاقِبَتِہِ، وَأَخافُ مَقْتَکَ إِیَّایَ عَلَیْہِ حِذارَ أَنْ تَصْرِفَ وَجْھَکَ الْکَرِیمَ عَنِّی 

فَأَسْتَوْجِبَ بِہِ نَقْصاً مِنْ حَظٍّ لِی عِنْدَکَ یَا رَؤُوفُ یَا رَحِیمُ اَللّٰھُمَّ اجْعَلْنِی فِی مُسْتَقْبِلِ سَنَتِی 

ھذِھِ فِی حِفْظِکَ وَفِی جِوارِکَ وَفِی کَنَفِکَ وَجَلِّلْنِی سِتْرَ عافِیَتِکَ وَھَبْ لِی کَرامَتَکَ

عَزَّ جارُکَ وَجَلَّ ثَناؤُکَ، وَلاَ إِلہَ غَیْرُکَ ۔ اَللّٰھُمَّ اجْعَلْنِی تابِعاً لِصالِحِی مَنْ مَضیٰ مِنْ

أَوْلِیائِکَ، وَأَلْحِقْنِی بِھِمْ، وَاجْعَلْنِی مُسَلِّماً لِمَنْ قالَ بِالصِّدْقِ عَلَیْکَ مِنْھُمْ، وَأَعُوذُ بِکَ اَللّٰھُمَّ

أَنْ تُحِیطَ بِی خَطِیئَتِی وَظُلْمِی وَ إِسْرافِی عَلَی نَفْسِی وَ اتِّباعِی لِھَوایَ وَاشْتِغالِی بِشَھَواتِی

فَیَحُولُ ذلِکَ بَیْنِی وَبَیْنَ رَحْمَتِکَ وَرِضْوانِکَ فَأَکُونُ مَنْسِیّاً عِنْدَکَ، مُتَعَرِّضاً لِسَخَطِکَ

وَنِقْمَتِکَ۔اَللّٰھُمَّ وَفِّقْنِی لِکُلِّ عَمَلٍ صَالِحٍ تَرْضیٰ بِہِ عَنِّی، وَقَرِّبْنِی إِلَیْکَ زُلْفیٰ اَللّٰھُمَّ کَما

کَفَیْتَ نَبِیَّکَ مُحَمَّداً صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ ھَوْلَ عَدُوِّہِ وَفَرَّجْتَ ھَمَّہُ وَکَشَفْتَ غَمَّہُ وَصَدَقْتَہُ

وَعْدَکَ وَأَ نْجَزْتَ لَہُ عَھْدَکَ اَللّٰھُمَّ فَبِذلِکَ فَاکْفِنِی ھَوْلَ ہذِھِ السَّنَةِ وَآفاتِہا وَأَسْقامَہا

وَفِتْنَتَہا وَشُرُورَہا وَأَحْزانَہا وَضِیقَ الْمَعاشِ فِیہا وَبَلِّغْنِی بِرَحْمَتِکَ کَمالَ الْعافِیَةِ بِتَمامِ

دَوامِ النِّعْمَةِ عِنْدِی إِلی مُنْتَہی أَجَلِی، أَسْأَلُکَ سُؤالَ مَنْ أَساءَ وَظَلَمَ وَاسْتَکانَ وَاعْتَرَفَ،وَ

وَأَسْأَ لُکَ أَنْ تَغْفِرَ لِی مَا مَضیٰ مِنَ الذُّنُوبِ الَّتِی حَصَرَتْہا حَفَظَتُکَ وَأَحْصَتْہا کِرامُ مَلائِکَتِکَ

عَلَیَّ وَأَنْ تَعْصِمَنِی اَللّٰھُمَّ مِنَ الذُّنُوبِ فِیما بَقِیَ مِنْ عُمْرِی إِلی مُنْتَہی أَجَلِی یَا اللهُ یَا رَحْمنُ

یَا رَحِیمُ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَأَھْلِ بَیْتِ مُحَمَّدٍ وَآتِنِی کُلَّ مَا سَأَلْتُکَ وَرَغِبْتُ إِلَیْکَ فِیہِ

فَإِنَّکَ أَمَرْتَنِی بِالدُّعاءِ، وَتَکَفَّلْتَ لِی بِالْاِجابَةِ، یَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِینَ ۔

 

नमाज़ के बाद की ताकीबात (दुआ) 

ताकीबात मुश्तरका

दुआ-नमाज़ फ़ज्र के बाद

दुआ-नमाज़ ज़ोहर के बाद

दुआ-नमाज़ असर के बाद

दुआ-नमाज़ मग़रिब के बाद

दुआ-नमाज़ ईशा के बाद

रोज़ाना की दुआ व ज़यारत 

जुमा

सनीचर 

ईतवार सोमवार मंगल बुध जुमेरात

मुहर्रम 

सफ़र 

रबी'उल अव्वल  रजब 

शाबान 

रमज़ान  ज़िल्काद  ज़िल्हज्ज 
क़ुरान करीम  क़ुरानी दुआएँ  दुआएँ  ज्यारतें 
अहलेबैत (अ:स) कौन हैं? सहीफ़ा-ए-मासूमीन (अ:स) नमाज़ मासूमीन (अ:स) और दूसरी अहम् नमाज़ें  हज़रत ईमाम मेहदी (अ:त:फ़)
ईस्लामी क़ानून और फ़िक्ह  लाईब्रेरी  उल्मा-ए-दीन  इस्लामी महीने और ख़ास तारीख़ें

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