रमज़ान उल मुबारक की आख़िरी 10 रातों की दुआ 
इकीसवीं रमज़ान की रात की दुआ 

इसकी फ़ज़ीलत उनीसवीं रात से ज़्यादा है, लिहाज़ा उनीसवीं रात के जो अमाल मुश्तरका हैं वो इस रात में भी बजा लाये 

(1) ग़ुस्ल  (2) शब बेदारी  (3)  ज़्यारत ईमाम हुसैन (अ:स)
(4) क़ुरआन को  रखना  (5)  100 रक'अत नमाज़  (6) दुआए जौशन कबीर वग़ैरा 
(7) सूरह हम्द के बाद 7 मर्तबा सूरह तौहीद वाली नमाज़ 

 

रिवायत में ताकीद की गई है की इस रात और तीसवीं की रात में ग़ुस्ल और शब बेदारी करे और इबादत  मशग़ूल रहे की शबे क़द्र  इन्ही दो  है, चंद दूसरी रिवायत में मनकुल है की ईमाम जाफ़र सादिक़ (अ:स) से अर्ज़ किया की मोईन तौर पर फ़रमाएँ की शबे क़द्र कौन सी रात है? आप ने किसी रात का तअययुन नहीं किया, फ़रमाया की मगर इसमें क्या हर्ज है की तुन इन दो रातों में आमाले ख़ैर बजा रहो! हमारे बुज़ुर्ग आलिम शेख सुद्दूक (अ:र) ने फ़रमाया की उल्माए इमामिया के एक इज्तेमा में मेरे एक उस्ताद ने यह बात इमला कराई की जो शख्स इन दो (इक्कीसवीं और तेईसवीं रमज़ान) रातों को मसाईल दिनी ब्यान करते हुए जाग कर गुज़ारे तो वो सब लोगों से अफ़ज़ल है! बहरहाल आज की रात से रमज़ान उल मुबारक के आखिरी अशरे की दुआएँ शुरू कर दे, इन दुआओँ में से एक वह दुआ है जिसे शेख कुल्लीनी ने "अल' काफ़ी" में ईमाम जाफ़र सादिक़ (अ:स) से नक़ल किया है की फ़रमाया, "रमज़ान के आख़िरी अशरे में हर रात को यह  दुआ पढ़े:      

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

أَعُوذُ بِجَلالِ وَجْھِکَ الْکَرِیمِ أَنْ یَنْقَضِی عَنِّی شَھْرُ رَمَضانَ أَوْ یَطْلُعَ الْفَجْرُ مِنْ لَیْلَتِی ہذِھِ

وَلَکَ قِبَلِی ذَنْبٌ أَوْ تَبِعَةٌ تُعَذِّبُنِی عَلَیْہ

शेख कफ़'अमी ने हाशिया बलद अल-अमीन में नक़ल किया है की ईमाम जाफ़र सादिक़ (अ:स) रमज़ान उल मुबारक के आखिरी अशरे की हर रात फ़रायज़ व नाफिला के बाद यह दुआ पढ़ा करते थे

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

اَللّٰھُمَّ أَدِّ عَنَّا حَقَّ مَا مَضیٰ مِنْ شَھْرِ رَمَضانَ وَاغْفِرْ لَنا تَقْصِیرَنا فِیہِ وَتَسَلَّمْہُ مِنَّا مَقْبُولاً، وَلاَ

تُؤاخِذْنا بِإِسْرافِنا عَلَی أَنْفُسِنا، وَاجْعَلْنا مِنَ الْمَرْحُومِینَ وَلاَ تَجْعَلْنا مِنَ الْمَحْرُومِینَ

शेख कफ़'अमी ने यह भी फ़रमाया की जो शख़्स इस दुआ को पढ़े तो हक़ त'आला रमज़ान के गुज़िश्ता दिनों में सरज़द होने वाली इसकी खतायें माफ़ फ़रमाएगा और आइन्दा दिनों में गुनाहों से बचाए रखेगा! सैय्यद इब्ने ताऊस ने किताब इक़बाल में इब्ने अभी उमैर के ज़रिए मराज़ीम से नक़ल किया है की ईमाम जाफ़र सादिक़ (अ:स) रमज़ान के आख़िरी अशरे की हर रात यह  दुआ पढ़ा करते थे 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

اَللّٰھُمَّ إِنَّکَ قُلْتَ فِی کِتابِکَ الْمُنْزَلِ شَھْرُ رَمَضانَ الَّذِی أُنْزِلَ فِیہِ الْقُرْآنُ ھُدیً لِلنَّاسِ

وَبَیِّناتٍ مِنَ الْھُدیٰ وَالْفُرْقانِ فَعَظَّمْتَ حُرْمَةَ شَھْرِ رَمَضانَ بِما أَ نْزَلْتَ فِیہِ مِنَ الْقُرْآنِ وَ

خَصَصْتَہُ بِلَیْلَةِ الْقَدْرِ وَجَعَلْتَہا خَیْراً مِنْ أَ لْفِ شَھْرٍ ۔ اَللّٰھُمَّ وَہذِھِ أَیَّامُ شَھْرِ رَمَضانَ قَدِ انْقَضَتْ،

وَلَیالِیہِ قَدْ تَصَرَّمَتْ، وَقَدْ صِرْتُ یَا إِلھِی مِنْہُ إِلی مَاأَنْتَ أَعْلَمُ بِہِ مِنِّی وَأَحْصیٰ لِعَدَدِھِ مِنَ

الْخَلْقِ أَجْمَعِینَ، فَأَسْأَلُکَ بِما سَأَلَکَ بِہِ مَلائِکَتُکَ الْمُقَرَّبُونَ، وَأَ نْبِیاؤُکَ الْمُرْسَلُونَ،

وَعِبادُکَ الصَّالِحُونَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَأَنْ تَفُکَّ رَقَبَتِی مِنَ النَّارِ،وَتُدْخِلَنِی 

الْجَنَّةَ برَحْمَتِکَ وَأَنْ تَتَفَضَّلَ عَلَیَّ بِعَفْوِکَ وَکَرَمِکَ وَتَتَقَبَّلَ تَقَرُّبِی، وَتَسْتَجِیبَ دُعائِی

وَتَمُنَّ عَلَیَّ بِالْاَمْنِ یَوْمَ الْخَوْفِ مِنْ کُلِّ ھَوْلٍ أَعْدَدْتَہُ لِیَوْمِ الْقِیامَةِ ۔ إِلھِی وَأَعُوذُ بِوَجْھِکَ

الْکَرِیمِ وَبِجَلالِکَ الْعَظِیمِ أَنْ تَنْقَضِیَ أَیَّامُ شَھْرِ رَمَضانَ وَلَیالِیہِ وَلَکَ قِبَلِی تَبِعَةٌ أَوْ ذَ نْبٌ

تُؤاخِذُنِی بِہِ، أَوْ خَطِیئَةٌ تُرِیدُ أَنْ تَقْتَصَّہا مِنِّی لَمْ تَغْفِرْھا لِي، سَیِّدِی سَیِّدِی سَیِّدِی، أَسْأَلُکَ

یَا لاَ إِلہَ إِلاَّ أَنْتَ إِذْ لاَ إِلہَ إِلاَّ أَنْتَ إِنْ کُنْتَ رَضِیتَ عَنِّی فِی ہذَا الشَّھْرِ فَازْدَدْ عَنِّی رِضیً، وَ

إِنْ لَمْ تَکُنْ رَضِیتَ عَنِّی فَمِنَ الْاَنَ فَارْضَ عَنِّی یَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِینَ، یَا اللهُ یَا أَحَدُ یَا صَمَدُ یَا

مَنْ لَمْ یَلِدْ وَلَمْ یُولَدْ وَلَمْ یَکُنْ لَہُ کُفُواً أَحَدٌ اور یہ بہت زیادہ کہے :یَا مُلَیِّنَ الْحَدِیدِ لِداوُدَ عَلَیْہِ اَلسَّلاَمُ

یَا کاشِفَ الضُّرِّ وَالْکُرَبِ الْعِظامِ عَنْ أَ یُّوبَ ں أَیْ مُفَرِّجَ ھَمِّ یَعْقُوبَ  أَیْ مُنَفِّسَ غَمِّ

یُوسُفَ  صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ کَما أَنْتَ أَھْلُہُ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَیْھِمْ أَجْمَعِینَ وَافْعَلْ

بِی مَا أَنْتَ أَھْلُہُ، وَلاَ تَفْعَلْ بِی مَا أَنَا أَھْلُہُ ۔

जो दुआएँ काफ़ी सनद के साथ मक़नाओ मिस्बाह में मुर्सीलह तौर पर नक़ल हुई हैं उनमें से एक यह है की इसको इक्कीसवीं रमज़ान की रात पढ़े 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا مُو لِجَ اللَّیْلِ فِی النَّہارِ، وَمُو لِجَ النَّہارِ فِی اللَّیْلِ، وَ مُخْرِجَ الْحَیِّ مِنَ الْمَیِّتِ، وَمُخْرِجَ

الْمَیِّتِ مِنَ الْحَیِّ، یَا رازِقَ مَنْ یَشاءُ بِغَیْرِ حِسابٍ، یَااللهُ یَا رَحْمٰنُ، یَااللهُ یَا رَحِیمُ یَا اللهُ یَااللهُ

یَا اللهُ لَکَ الْاَسْماءُ الْحُسْنیٰ، وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا وَالْکِبْرِیاءُ وَالْاَلاءُ، أَسْأَ لُکَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی

مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ، وَأَنْ تَجْعَلَ اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی السُّعَداءِ، وَرُوحِی مَعَ الشُّھَداءِ،

وَإِحْسانِی فِی عِلِّیِّینَ، وَ إِسائَتِی مَغْفُورَةً وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً تُباشِرُ بِہِ قَلْبِی، وَإِیماناً یُذْھِبُ الشَّکَّ

عَنِّی، وَتُرْضِیَنِی بِما قَسَمْتَ لِی، وَآتِنا فِی الدُّنْیا حَسَنَةً، وَفِی الاَْخِرَةِ حَسَنَةً، وَقِنا عَذابَ

النَّارِالْحَرِیقِ وَارْزُقْنِی فِیہا ذِکْرَکَ وَشُکْرَکَ وَالرَّغْبَةَ إِلَیْکَ وَالْاِنابَةَ وَالتَّوْفِیقَ لِما وَفَّقْتَ

لَہُ مُحَمَّداً وَآلَ مُحَمَّدٍ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمُ اَلسَّلاَمُ ۔

बाईसवीं शब की दुआ 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا سالِخَ النَّہارِ مِنَ اللَّیْلِ فَإِذا نَحْنُ مُظْلِمُونَ وَمُجْرِیَ الشَّمْسِ لِمُسْتَقَرِّ

ہا بِتَقْدِیرِکَ یَا عَزِیزُ یَا عَلِیمُ وَمُقَدِّرَ الْقَمَرِ مَنازِلَ حَتّی عادَ کَالْعُرْجُونِ الْقَدِیمِ، یَا نُورَ کُلِّ

نُورٍ،وَمُنْتَہیٰ کُلِّ رَغْبَةٍ، وَوَلِیَّ کُلِّ نِعْمَةٍ، یَا اللهُ یَا رَحْمٰنُ، یَااللهُ یَا قُدُّوسُ، یَا أَحَدُ یَا واحِدُ یَا

فَرْدُ یَااللهُ یَا اللهُ یَا اللهُ لَکَ الْاَسْماءُ الْحُسْنی وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا وَالْکِبْرِیاءُ وَالْاَلاءُ، أَسْأَ لُکَ

أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَأَھْلِ بَیْتِہِ وَأَنْ تَجْعَلَ اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی السُّعَداءِ وَرُوحِی مَعَ

الشُّھَداءِ وَ إِحْسانِی فِی عِلِّیِّینَ وَإِسائَتِی مَغْفُورَةً وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً تُباشِرُ بِہِ قَلْبِی وَإِیماناً

یُذْھِبُ الشَّکَّ عَنِّی، وَتُرْضِیَنِی بِما قَسَمْتَ لِی، وَآتِنا فِی الدُّنْیا حَسَنَةً، وَفِی الْاَخِرَةِ حَسَنَةً،

وَقِنا عَذابَ النَّارِ الْحَرِیقِ، وَارْزُقْنِی فِیہا ذِکْرَکَ وَشُکْرَکَ، وَالرَّغْبَةَ إِلَیْکَ، وَالْاِنابَةَ وَ

التَّوْفِیقَ لِما وَفَّقْتَ لَہُ مُحَمَّداً وَآلَ مُحَمَّدٍ عَلَیْھِمُ اَلسَّلاَمُ 

तेइसवीं रात की दुआ व अमाल 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا رَبَّ لَیْلَةِ الْقَدْرِ وَجاعِلَہا خَیْراً مِنْ    أَلْفِ شَھْرٍ وَرَبَّ اللَّیْلِ

وَالنَّہارِ وَالْجِبالِ وَالْبِحارِ وَالظُّلَمِ وَالْاَ نْوارِ وَالْاَرْضِ وَالسَّماءِ یَا بارِیٴُ یَا مُصَوِّرُ یَا حَنَّانُ یَا

مَنَّانُ، یَااللهُ یَا رَحْمٰنُ یَااللهُ یَا قَیُّومُ یَااللهُ یَا بَدِیعُ، یَااللهُ یَااللهُ یَااللّہُ،لَکَ الْاَسْماءُ الْحُسْنیٰ،

وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا،وَالْکِبْرِیاءُ وَالْاَلاءُ، أَسْأَ لُکَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَأَنْ تَجْعَلَ

اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی السُّعَداءِ، وَرُوحِی مَعَ الشُّھَداءِ، وَ إِحْسانِی فِی عِلِّیِّینَ، وَ إِسائَتِی 

مَغْفُورَةً وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً تُباشِرُبِہِ قَلْبِی وَإِیماناً یُذْھِبُ الشَّکَّ عَنِّی وَتُرْضِیَنِی بِما قَسَمْتَ

لِی،وَآتِنا فِی الدُّنْیا حَسَنَةً،وَفِی الْاَخِرَةِ حَسَنَةً،وَقِنا عَذابَ النَّارِالْحَرِیقِ،وَارْزُقْنِی فِیہا ذِکْرَکَ وَ

شُکْرَکَ وَالرَّغْبَةَ إِلَیْکَ وَالْاِنابَةَ وَالتَّوْبَةَ وَالتَّوْفِیقَ لِما وَفَّقْتَ لَہُ مُحَمَّداً وَآلَ مُحَمَّدٍ عَلَیْھِمُ اَلسَّلاَمُ

मोहम्मद बिन ईसा ने अपनी सनद के साथ सालेहीन से रिवायत की है की, इन्होंने फ़रमाया : तेईसवीं रमज़ान की रात : इस दुआ को क़याम क्यू क़ऊद पर रुकू व सुजूद में नीज़ हर हाल में बार बार पढ़े और फिर अपनी ज़िंदगी में जब भी याद आये तो पढता रहे, पास हक़्क़े त'आला की बुज़ुर्गी ब्यान करने और हज़रत नबी ए अकरम (स:अ:व:व) पर दरूद व सलाम भेजने के कहे:

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

اَلَّلھُمَّ کُنْ لِّوَلِیِّکَ فلان بن فلان اورفلان بن فلان کی بجائے کہے:

الْحُجَّةِ بنِ الْحَسَنِ صَلَواتُکَ

عَلَیْہِ وَعَلَی آبائِہِ فِی ہذِھِ السَّاعَةِ وَفی کُلِّ ساعَةٍ وَلِیّاً وَحافِظاً وَقائِداً وَناصِراً وَدَلِیلاً وَعَیْناً

حَتَّی تُسْکِنَہُ أَرْضَکَ طَوْعاً وَتُمَتِّعَہُ فِیھا طَوِیلاً

फिर यह कहे  

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا مُدَبِّرَ الْاَمُورِ،یَا باعِثَ مَنْ فِی القُبُورِ،

یَا مُجْرِیَ البُحُورِ، یَا مُلَیِّنَ الحَدِیدِ لِداوُدَ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلَ مُحَمَّدٍ وَافْعَلَ بِی کَذا وَکَذا

इन लफ़्ज़ों (क़ज़ा व क़ज़ा) की बजाये अपनी  हाजत तलब करे : अल'लैलतो, अल'लैलतो (इसी रात, इसी रात) अपने हाथ बुलंद करे और कहे 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
     یَا مُدَبِّرَ الْاَمُورِ
इस दुआ को रुकू, सुजूद, क़याम, और क़'ऊद में बार बार पढ़े , इसके अलावा माहे रमज़ान की आखिरी  पढ़े: 

हदीयतो ज़ायर में मनकुल है की यह रात शबे क़द्र की पहली दो रातों से अफ़ज़ल है और बहुत सी रिवायतों से मालूम होता है की शबे क़द्र यही है और यह बात हक़ीक़त के क़रीबतर है, इस रात हिकमत इलाही के मुताबिक़ काएनात के तमाम उमूर मुक़द्दर होते हैं, पस इसमें पहली दो रातों के मुश्तरका अमाल बजा लाये और इनके अलावा इस रात के चाँद मख़्सूस अमाल भी हैं:

1. सूरह अंकबूत, सूरह रूम पढ़े की ईमाम जाफ़र सादिक़ (अ:स) ने क़सम खाते हुए फ़रमाया की इस रात इन दो सूरह को पढ़ने वाला अहले जन्नत में से है 

2. सूरह दुखान पढ़े 

3. 1000 मर्तबा सूरह क़द्र पढ़े 

4. इस रात ख़ुसूसन और आम दुसरे वक़्तों में यह दुआ पढ़े, "अल्लाहुम्मा कुन ले वलिएका....." को रमज़ान उल मुबारक के आखिरी अशरे की दुआओं के सिलसिले में तेइसवीं शब की दुआ के बाद इसका ज़िक्र हुआ है 

5. यह दुआ पढ़े :

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

اَللّٰھُمَّ امْدُدْ لِی فِی عُمْرِی وَأَوْسِعْ لِی فِی رِزْقِی وَأَصِحَّ لِی جِسْمِی 

وَبَلِّغْنِی أَمَلِی وَإِنْ کُنْتُ مِنَ الْاَشْقِیاءِ فَامْحُنِی مِنَ الْاَشْقِیاءِ  وَاکْتُبْنِی مِنَ السُّعَداءِ فَإِنَّکَ

قُلْتَ فِی کِتابِکَ الْمُنْزَلِ عَلَی نَبِیِّکَ الْمُرْسَلِ صَلَواتُکَ عَلَیْہِ وَآلِہِ یَمْحُواْ اللهُ مَایَشاءُ

وَیُثْبِتُ وَعِنْدَھُ أُمُّ الْکِتابِ ۔

6. फिर यह  दुआ पढ़े :

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

اَللّٰھُمَّ اجْعَلْ فِیما تَقْضِی وَفِیما تُقَدِّرُ مِنَ الْاَمْرِ الْمَحْتُومِ وَفِیما تَفْرُقُ مِنَ الاَمْرِ

الْحَکِیمِ فِی لَیْلَةِ الْقَدْرِ مِنَ الْقَضاءِ الَّذِی لاَ یُرَدُّ وَلاَ یُبَدَّلُ أَنْ تَکْتُبَنِی مِنْ حُجَّاجِ بَیْتِکَ

الْحَرامِ فِی عامِی ہذا الْمَبْرُورِ حَجُّھُمُ الْمَشْکُورِ سَعْیُھُمُ الْمَغْفُورِ ذُنُوبُھُمُ، الْمُکَفَّرِ عَنْھُمْ

سَیِّئاتُھُمْ،وَاجْعَلْ فِیما تِقْضِی وَتُقَدِّرُ أَنْ تُطِیلَ عُمْرِی، وَتُوَسِّعَ لِی فِی رِزْقِی ۔

7. यह दुआ पढ़े जो किताबें इक़बाल में है 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا باطِناً فِی ظُھُورِہِ ویَا ظاھِراً فِی بُطُونِہِ وَیَا باطِناً لَیْسَ یَخْفَیٰ،

وَیَا ظاھِراً لَیْسَ یُریٰ، یَا مَوْصُوفاً لاَ یَبْلُغُ بِکَیْنُونَتِہِ مَوْصُوفٌ وَلاَ حَدٌّ مَحْدُودٌ، وَیَا غائِباً غَیْرَ مَفْقُودٍ،

وَیَا شاھِداً غَیْرَ مَشْھُودٍ، یُطْلَبُ فَیُصابُ، وَلَمْ یَخْلُ مِنْہُ السَّماواتُ وَالْاَرْضُ وَمَا بَیْنَھُما طَرْفَةَ عَیْنٍ،

لاَ یُدْرَکُ بِکَیْفٍ،وَلاَ یُؤَیَّنُ بِأَیْنٍ وَلاَبِحَیْثٍ،أَنْتَ نُورُالنُّورِ وَرَبُّ الاَرْبابِ،أَحَطْتَ بِجَمِیعِ الْاَمورِ،

سُبحانَ مَنْ لَیْسَ کَمِثِلہِ شَیْءٌ وَھُوَ السَّمیعُ البَصیرُ سبحانَ مَنْ ھُوَ ہکَذَا وَلاَ ھَکَذا غَیْرُہ

इसके बाद जो दुआ चाहे मांगे! 

अव्वल शब में किये हुए गुस्ल के अलावा आख़िर शब फिर गुस्ल करे और वाज़े रहे की इस रात ग़ुस्ल, शब बेदारी, ज़्यारत ईमाम हुसैन (अ:स) और 100 रक्'अत नमाज़ की बहुत ज़्यादा ताकीद और फ़ज़ीलत है! तहज़ीब उल ईस्लाम में शेख  बसीर के ज़रिये ईमाम जाफ़र सादिक़ (अ:स) से रिवायत की है की, आप ने फ़रमाया, "जिस रात के बारे में यकीन हो की वो शबे क़द्र है टी इसमें 100 रक्अत नमाज़ इस तरह की हर रक्अत में सूरह अल'हम्द के बाद 10 मर्तबा सूरह पढ़ो! अर्ज़ किया, "क़ुर्बान हो जाऊँ, अगर यह खड़े होकर न पढ़ सकूँ तो बैठ कर पढ़ लूँ?" फ़रमाया, "अगर खड़े होकर पढ़ने की ताक़त न हो तो बैठ कर पढ़ सकते हो, मैंने अर्ज़ किया, "अगर बैठ कर न पढ़ सकूँ तो फिर क्या करूँ?' आप (अ:स) ने फ़रमाया, "बैठ कर नहीं पढ़ सकते तो पुश्त (पीठ) के बल लेटकर पढ़ लो"! दुआएम अल'इस्लाम में रिवायत नक़ल हुई है की रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) रमज़ान उल मुबारक के आखिरी अशरे में अपना बिस्तर लपेट देते और इबादत इलाही में मसरूफ़ जाते! तेइसवीं की रात आप अपने अहलो अयाल को बेदार करते और फिर जिसपर नींद का ग़लबा होता इसके मुँह पर पानी के छींटे देते! हज़रत फ़ातिमा (सलाम अल्लाह अलैहा) भी इस रात अपने घर के किसी फ़र्द को सोने न देती, नींद इलाज यूँ करती की दिन को खाना कम देती और फरमाती की दिन को सो जाओ ताकि रात को बेदार रह सको, आप फरमाती हैं की बद क़िस्मत है वोह शख़्स जो आज की रात ख़ैर व नेकी से महरूम रह जाए! एक रिवायत में आया है की ईमाम जाफ़र सादिक़ (अ:स) सख्त बीमार थे के तेइसवीं रमज़ान की रात आ गयी, आप ने अपने कुनबे वालों और ग़ुलामों को हुक्म दिया की मुझ मस्जिद ले चलो, और फिर आप ने मस्जिद में शब बेदारी फ़रमाई! अल्लामा मजलिसी (अ:र) का इरशाद है की जहाँ तक मुमकिन हो इस रात तिलावत क़ुरआन पाक करे, और सहीफ़ए कमला की दुआएँ ख़ास कर दुआ "मकारिमुल अख़लाक़" और "दुआए तौबा" पढ़े ! नीज़ यह की शबे क़द्र दिनों की अज़मत व हुरमत का भी ख़्याल रखे और इनमें इबादत ईलाही और तिलावते क़ुरआनी करता रहे! मातेबर हदीसों में है की शबे क़द्र का दिन भी रात की तरह अज़मत व फ़ज़ीलत का हामिल है! 

चौबीसवें रात की दुआ

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا فالِقَ الْاِصْباحِ وَجاعِلَ اللَّیْلِ سَکَناً وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ حُسْباناً، یَاعَزِیزُ

یَا عَلِیمُ یَا ذَا الْمَنِّ وَالطَّوْلِ وَالْقُوَّةِ وَالْحَوْلِ وَالْفَضْلِ وَالْاِنْعامِ وَالْجَلالِ وَالْاِکْرامِ، یَا اللهُ

یَا رَحْمنُ یَا اللهُ یَا فَرْدُ یَا وِتْرُ یَا اللهُ یَا ظاھِرُ یَا باطِنُ، یَا حَیُّ لاَإِلہَ إِلاَّ أَ نْتَ لَکَ الْاَسْماءُ الْحُسْنی،

وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا، وَالْکِبْرِیاءُ وَالْاَلاءُ، أَسْأَ لُکَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ، وَأَنْ تَجْعَلَ

اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی السُّعَداءِ وَرُوحِی مَعَ الشُّھَداءِ، وَ إِحْسانِی فِی عِلِّیِّینَ، وَ إِسائَتِی 

مَغْفُورَةً، وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً تُباشِرُ بِہِ قَلْبِی، وَإِیماناً یَذْھَبُ بِالشَّکِّ عَنِّی، وَرِضیً بِماقَسَمْتَ

لِی، وَآتِنافِی الدُّنْیا حَسَنَةً، وَفِی الاَْخِرَةِ حَسَنَةً، وَقِنا عَذابَ النَّارِ الْحَرِیقِ، وَارْزُقْنِی فِیہا

ذِکْرَکَ وَشُکْرَکَ وَالرَّغْبَةَ إِلَیْکَ وَالْاِنابَةَ وَالتَّوْبَةَ وَالتَّوْفِیقَ لِما وَفَّقْتَ لَہُ مُحَمَّداً وَآلَ

مُحَمَّدٍ صَلَواتُکَ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمْ ۔

पच्चीसवें रात की दुआ

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا جاعِلَ اللَّیْلِ لِباساً وَالنَّہارِ مَعاشاً، وَالْاَرْضِ مِہاداً، وَالْجِبالِ أَوْتاداً یَا اللهُ

یَاقاھِرُ، یَااللهُ یَاجَبّارُ، یَااللهُ یَاسَمِیعُ، یَااللهُ یَاقَرِیبُ،یَااللهُ یَامُجِیبُ، یَا اللهُ یَا اللهُ یَا اللّہُ، لَکَ

الْاَسْماءُ الْحُسْنی ، وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا، وَالْکِبْرِیاءُ وَالْاَلاءُ، أَسْأَ لُکَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ

مُحَمَّدٍ،وَأَنْ تَجْعَلَ اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی السُّعَداءِ وَرُوحِی مَعَ الشُّھَداءِ وَ إِحْسانِی فِی  

عِلِّیِّینَ وَ إِسائَتِی مَغْفُورَةً وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً تُباشِرُ بِہِ قَلْبِی، وَإِیماناً یُذْھِبُ الشَّکَّ عَنِّی، وَرِضیً

بِما قَسَمْتَ لِی وَآتِنا فِی الدُّنْیا حَسَنَةً وَفِی الاَْخِرَةِ حَسَنَةً، وَقِنا عَذابَ النَّارِ الْحَرِیقِ

وَارْزُقْنِی فِیہا ذِکْرَکَ وَشُکْرَکَ وَالرَّغْبَةَ إِلَیْکَ وَالْاِنابَةَ وَالتَّوْبَةَ وَالتَّوْفِیقَ

لِما وَفَّقْتَ لَہُ مُحَمَّداً وَآلَ مُحَمَّدٍ عَلَیْھِمُ اَلسَّلاَمُ ۔

छब्बीसवें रात की दुआ 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا جاعِلَ اللَّیْلِ وَالنَّہارِ آیَتَیْنِ، یَا مَنْ مَحا آیَةَ اللَّیْلِ وَجَعَلَ آیَةَ 

النَّہارِ مُبْصِرَةً لِتَبْتَغُوا فَضْلاً مِنْہُ وَرِضْواناً یَا مُفَصِّلَ کُلِّ شَیْءٍ تَفْصِیلاً یَا مَاجِدُ یَا وَہَّابُ یَا للهُ

یَاجَوادُ، یَااللهُ یَااللهُ یَااللهُ،لَکَ الْاَسْماءُ الْحُسْنی،وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا،وَالْکِبْرِیاءُ وَالْاَلاءُ،أَسْأَلُکَ

أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ، وَأَنْ تَجْعَلَ اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی السُّعَداءِ، وَرُوحِی 

مَعَ الشُّھَداءِ، وَ إِحْسانِی فِی عِلِّیِّینَ وَ إِسائَتِی مَغْفُورَةً، وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً تُباشِرُ بِہِ قَلْبِی،وَ

إِیماناً یُذْھِبُ الشَّکَّ عَنِّی وَتُرْضِیَنِی بِما قَسَمْتَ لِی، وَآتِنا فِی الدُّنْیا حَسَنَةً، وَفِی الْاَخِرَةِ 

حَسَنَةً، وَقِنا عَذابَ النّارِ الْحَرِیقِ، وَارْزُقْنِی فِیہا ذِکْرَکَ وَشُکْرَکَ وَالرَّغْبَةَ إِلَیْکَ وَالْاِنابَةَ 

وَالتَّوْبَةَ وَالتَّوْفِیقَ لِما وَفَّقْتَ لَہُ مُحَمَّداً وَآلَ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمْ ۔

सत्ताइसवें रात की दुआ 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا مادَّ الظِّلِّ وَلَوْ شِئْتَ لَجَعَلْتَہُ ساکِناً وَجَعَلْتَ الشَّمْسَ عَلَیْہِ

دَلِیلاً ثُمَّ قَبَضْتَہُ إِلَیْکَ قَبْضاً یَسِیراً، یَا ذَا الْجُودِ وَالطَّوْلِ وَالْکِبْرِیاءِ وَالاَْلاءِ لاَ إِلہَ إِلاَّ أَ نْتَ عالِمُ

الْغَیْبِ وَالشَّہادَةِ الرَّحْمٰنُ الرَّحِیمُ، لاَ إِلہَ إِلاَّأَنْتَ یَا قُدُّوسُ یَا سَلامُ یَا مُؤْمِنُ یَا مُھَیْمِنُ یَا

عَزِیزُ یَا جَبَّارُیَا مُتَکَبِّرُ یَا اللهُ یَا خالِقُ یَا بارِیٴُ یَا مُصَوِّرُ، یَا اللهُ یَا اللهُ یَا اللهُ، لَکَ الْاَسْماءُ

الْحُسْنیٰ وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا، وَالْکِبْرِیاءُ وَالْاَلاءُ، أَسْأَ لُکَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ،

وَأَنْ تَجْعَلَ اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی السُّعَداءِ، وَرُوحِی مَعَ الشُّھَداءِ، وَ إِحْسانِی فِی عِلِّیِّینَ،

وَإِسائَتِی مَغْفُورَةً، وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً تُباشِرُ بِہِ قَلْبِی،وَإِیماناً یُذْھِبُ الشَّکَّ عَنِّی، وَتُرْضِیَنِی بِما 

قَسَمْتَ لِی،وَآتِنا فِی الدُّنْیا حَسَنَةً،وَفِی الْآخِرَةِ حَسَنَةً، وَقِنا عَذابَ النَّارِ الْحَرِیقِ، وَارْزُقْنِی

فِیہا ذِکْرَکَ وَشُکْرَکَ وَالرَّغْبَةَ إِلَیْکَ وَالْاِنابَةَ وَالتَّوْبَةَ وَالتَّوْفِیقَ لِما وَفَّقْتَ لَہُ مُحَمَّداً

وَآلَ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمْ ۔

अट्ठाइसवें रात की दुआ 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا خازِنَ اللَّیْلِ فِی الْھَواءِ، وَخازِنَ النُّورِ فِی السَّماءِ، وَمَانِعَ السَّماءِ أَنْ

تَقَعَ عَلَی الْاَرْضِ إِلاَّ بِإِذْنِہِ وَحابِسَھُما أَنْ تَزُولا،یَاعَلِیمُ یَاعَظِیمُ یَاغَفُورُ یَادائِمُ یَا اللهُ یَاوارِثُ

یَاباعِثَ مَنْ فِی الْقُبُورِ،یَااللهُ یَااللهُ یَااللهُ، لَکَ الْاَسْماءُ الْحُسْنی، وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا،وَالْکِبْرِیاءُ

وَالْاَلاءُ أَسْأَلُکَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ، وَأَنْ تَجْعَلَ اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی

السُّعَداءِ، وَرُوحِی مَعَ الشُّھَداءِ، وَ إِحْسانِی فِی عِلِّیِّینَ، وَ إِسائَتِی مَغْفُورَةً، وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً

تُباشِرُ بِہِ قَلْبِی، وَ إِیماناً یُذْھِبُ الشَّکَّ عَنِّی، وَتُرْضِیَنِی بِما قَسَمْتَ لِی، وَآتِنا فِی الدُّنْیا

حَسَنَةً،وَفِی الْاَخِرَةِ حَسَنَةً،وَقِنا عَذابَ النَّارِالْحَرِیقِ وَارْزُقْنِی فِیہا ذِکْرَکَ وَشُکْرَکَ،وَالرَّغْبَةَ 

إِلَیْکَ وَالْاِنابَةَ وَالتَّوْبَةَ وَالتَّوْفِیقَ لِما وَفَّقْتَ لَہُ مُحَمَّداً وَآلَ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمْ

उन्तीस्वें रात की दुआ 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

یَا مُکَوِّرَ اللَّیْلِ عَلَی النَّہارِ، وَمُکَوِّرَ النَّہارِ عَلَی اللَّیْلِ، یَا عَلِیمُ یَاحَکِیمُ،

یَارَبَّ الْاَرْبابِ، وَسَیِّدَ السَّاداتِ، لاَ إِلہَ إِلاَّ أَ نْتَ، یَا أَ قْرَبَ إِلَیَّ مِنْ حَبْلِ الْوَرِیدِ یَا اللهُ یَا اللهُ

یَا اللهُ لَکَ الْاَسْماءُ الْحُسْنیٰ وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا وَالْکِبْرِیاءُ وَالْاَلاءُ أَسْأَلُکَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ

وَآلِ مُحَمَّدٍ وَأَنْ تَجْعَلَ اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی السُّعَداءِ، وَرُوحِی مَعَ الشُّھَداءِ، وَ إِحْسانِی فِی

عِلِّیِّینَ، وَ إِسائَتِی مَغْفُورَةً وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً تُباشِرُ بِہِ قَلْبِی، وَإِیماناً یُذْھِبُ الشَّکَّ عَنِّی وَ

تُرْضِیَنِی بِما قَسَمْتَ لِی، وَآتِنا فِی الدُّنْیا حَسَنَةً، وَفِی الْاَخِرَةِ حَسَنَةً، وَقِنا عَذابَ النَّارِ

الْحَرِیقِ وَارْزُقْنِی فِیہا ذِکْرَکَ وَشُکْرَکَ، وَالرَّغْبَةَ إِلَیْکَ وَالْاِنابَةَ وَالتَّوْبَةَ وَالتَّوْفِیقَ

لِما وَفَّقْتَ لَہُ مُحَمَّداً وَآلَ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمْ

तीसवें रात की दुआ

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

الْحَمْدُ لِلّٰہِ لاَ شَرِیکَ لَہُ، الْحَمْدُ لِلّٰہِ کَما یَنْبَغِی لِکَرَمِ وَجْھِہِ وَعِزِّ جَلالِہِ

وَکَما ھُوَ أَھْلُہُ، یَا قُدُّوسُ یَا نُورُ، یَا نُورَ الْقُدْسِ، یَا سُبُّوحُ، یَا مُنْتَھَی التَّسْبِیحِ، یَا رَحْمٰنُ، یَا

فاعِلَ الرَّحْمَةِ، یَا اللهُ، یَا عَلِیمُ، یَا کَبِیرُ، یَا اللهُ، یَا لَطِیفُ،یَا جَلِیلُ، یَا اللهُ، یَا سَمِیعُ، یَا بَصِیرُ،

یَا اللهُ یَا اللهُ یَا اللهُ، لَکَ الْاَسْماءُ الْحُسْنیٰ،وَالْاَمْثالُ الْعُلْیا، وَالْکِبْرِیاءُ وَالْاَلاءُ، أَسْأَ لُکَ أَنْ

تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَأَھْلِ بَیْتِہِ،وَأَنْ تَجْعَلَ اسْمِی فِی ہذِھِ اللَّیْلَةِ فِی السُّعَداءِ، وَرُوحِی مَعَ

الشُّھَداءِ،وَإِحْسانِی فِی عِلِّیِّینَ، وَإِسائَتِی مَغْفُورَةً، وَأَنْ تَھَبَ لِی یَقِیناً تُباشِرُ بِہِ قَلْبِی، وَإِیماناً

یُذْھِبُ الشَّکَّ عَنِّی، وَتُرْضِیَنِی بِمَا قَسَمْتَ لِی، وَآتِنا فِی الدُّنْیا حَسَنَةً وَفِی الْآخِرَةِ حَسَنَةً،

وَقِنا عَذابَ النَّارِ الْحَرِیقِ، وَارْزُقْنِی فِیہا ذِکْرَکَ وَشُکْرَکَ، وَالرَّغْبَةَ إِلَیْکَ وَالْاِنابَةَ وَ

التَّوْبَةَ وَالتَّوْفِیقَ لِما وَفَّقْتَ لَہُ مُحَمَّداً وَآلَ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمْ ۔

ताकीबात मुश्तरका

दुआ-नमाज़ फ़ज्र के बाद

दुआ-नमाज़ ज़ोहर के बाद

दुआ-नमाज़ असर के बाद

दुआ-नमाज़ मग़रिब के बाद

दुआ-नमाज़ ईशा के बाद

रोज़ाना की दुआ व ज़यारत 

जुमा

सनीचर 

ईतवार सोमवार मंगल बुध जुमेरात

मुहर्रम 

सफ़र 

रबी'उल अव्वल  रजब 

शाबान 

रमज़ान  ज़िल्काद  ज़िल्हज्ज 
क़ुरान करीम  क़ुरानी दुआएँ  दुआएँ  ज्यारतें 
अहलेबैत (अ:स) कौन हैं? सहीफ़ा-ए-मासूमीन (अ:स) नमाज़ मासूमीन (अ:स) और दूसरी अहम् नमाज़ें  हज़रत ईमाम मेहदी (अ:त:फ़)
ईस्लामी क़ानून और फ़िक्ह  लाईब्रेरी  उल्मा-ए-दीन  इस्लामी महीने और ख़ास तारीख़ें

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