हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) पर रोज़ाना की सलवात﴿

शाबान में हर रोज़ ज़वाल के वक़्त और 15 शाबान की रात को ईमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ:स) की यह सलवात पढ़ें :

 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ माबूद! मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा जो नुबुव्वत के शजर ए रिसालत का मुक़ाम, फ़रिश्तों के आने जाने की जगह, इल्म के ख़ज़ाने और वही के घरों में रहने वाले हैं! ऐ माबूद! मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा जो बेपनाह भंवरों में चलती हुई किश्ती हैं की बच जाएगा जो इसमें सवार होगा और डूब जाएगा जो इसे छोड़ देगा! इनसे आगे निकल जाने वाला दीन से बाहर और इनसे पीछे रह जाने वाला नाबूद हो जाएगा, और इनके साथ रहने वाला हक़ तक पहुँच जाएगा!  ऐ माबूद! मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा जो पायेदार जाए-पनाह और परेशान व बेचारे की फ़रयाद को पहुँचने वाले, भागने और डरने वाले की जाए-अमान और साथ रहने वालों के निगहदार हैं!  ऐ माबूद! मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा, बहुत नहुत रहमत की जो इन के लिए ख़ुशनूदी की वजह और मोहम्मद व आले मोहम्मद के वाजिब हक़ की अदाएगी और इसके पूरा होने का सबब बने! तेरी क़ुव्वत व ताक़त से ऐ जहानों के परवरदिगार, ऐ माबूद! मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा जो पाकीज़ातर, ख़ुश किरदार और नेकोकार हैं, जिन के हुक़ुक़ तूने वाजिब किये और तूने इनकी अताअत और मोहब्बत को फ़र्ज़ क़रार दिया है, ऐ माबूद! मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मरे दिल को अपनी अताअत से आबाद फ़रमा अपनी नाफ़रमानी से मुझे रुस्वा व ज़लील न कर और जिसके रिज़्क़ में तूने तंगी की है मुझे इस से हमदर्दी करने की तौफ़ीक़ दे क्योंकि तूने अपने फ़ज़ल से मेरे रिज़्क़ में फ़राख़ी की, मुझ पर अपने फ़ज़ल को फैलाया और मुझे अपने साये तले ज़िन्दा रखा है और यह तेरे नबी का महीना है जो तेरे रसूलों के सरदार हैं, यह माहे शाबान जिसे तूने अपनी रहमत और रज़ामन्दी के साथ घेरा हुआ है यह वही महीना है जिस में हज़रत रसूल (स:अ:व:व) दिनों में रोज़े रखते थे और रातों में सलवातो क़याम किया करते थे, तेरी फ़रमाबरदारी और इस महीने के दरजात के बाइस वो ज़िंदगी भर ऐसा ही करते रहे, ऐ माबूद! बस इस महीने में हमें इनके सुन्नत की पैरवी और इनकी शिफ़ाअत हासित करने में मदद फ़रमा, ऐ माबूद! आँहज़रत को मेरा शफ़ी बना जिनकी शिफ़ाअत मक़बूल है और मेरे लिए अपनी तरफ़ खुला रास्ता क़रार दे, मुझे इनका सच्चा पैरोकार बना दे, यहाँ तक की मैं क़यामत के रोज़ तेरे सामने पेश हूँ, जबकि तू मुझ से राज़ी हो, और मेरे गुनाहों से चश्मपोशी करे, ऐसे में मेरे लिए तूने अपनी रहमत और ख़ुशनूदी लाज़िम कर रखी हो और मुझे दारुल क़रार और नेक सालेह लोगों के साथ रहने की मोहलत दे    

 
 

اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ شَجَرَةِ النُّبُوَّةِ، وَمَوضِعِ الرِّسالَةِ، وَمُخْتَلَفِ الْمَلائِکَةِ وَمَعْدِنِ الْعِلْمِ، وَأَھْلِ بَیْتِ الْوَحْیِ ۔ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ الْفُلْکِ الْجارِیَةِ فِی  اللُّجَجِ الْغامِرَةِ، یَأْمَنُ مَنْ رَکِبَہا، وَیَغْرَقُ مَنْ تَرَکَھَا، الْمُتَقَدِّمُ لَھُمْ مارِقٌ، وَالْمُتَأَخِّرُ عَنْھُمْ زاھِقٌ، وَاللاَّزِمُ لَھُمْ لاحِقٌ ۔ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ الْکَھْفِ الْحَصِینِ، وَغِیاثِ الْمُضْطَرِّ الْمُسْتَکِینِ، وَمَلْجَاَ الْہارِبِینَ وَعِصْمَةِ الْمُعْتَصِمِینَ ۔ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ صَلاةً کَثِیرَةً تَکُونُ لَھُمْ رِضاً وَ لِحَقِّ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ أَداءً وَقَضاءً بِحَوْلٍ مِنْکَ وَقُوَّةٍ یَا رَبَّ الْعالَمِینَ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ الطَّیِّبِینَ الْاَ بْرارِ الْاَخْیارِ الَّذِینَ أَوْجَبْتَ حُقُوقَھُمْ وَفَرَضْتَ طاعَتَھُمْ وَوِلایَتَھُمْ ۔ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَاعْمُرْ قَلْبِی بِطاعَتِکَ وَلاَ تُخْزِنِی بِمَعْصِیَتِکَ وَارْزُقْنِی مُواساةَ مَنْ قَتَّرْتَ عَلَیْہِ مِنْ رِزْقِکَ بِما وَسَّعْتَ عَلَیَّ مِنْ فَضْلِکَ، وَنَشَرْتَ عَلَیَّ مِنْ عَدْلِکَ، وَأَحْیَیْتَنِی تَحْتَ ظِلِّکَ وَھذا شَھْرُ نَبِیِّکَ سَیِّدِ رُسُلِکَ شَعْبانُ الَّذِی حَفَفْتَہُ مِنْکَ بِالرَّحْمَةِ وَالرِّضْوانِ الَّذِی کانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ وَسَلَّمَ یَدْأَبُ فِی صِیامِہِ وَقِیامِہِ فِی لَیالِیہِ وَأَیَّامِہِ بُخُوعاً لَکَ فِی إِکْرامِہِ وَ إِعْظامِہِ إِلی مَحَلِّ حِمامِہِ اَللّٰھُمَّ فَأَعِنَّا عَلَی الاسْتِنانِ بِسُنَّتِہِ فِیہِ، وَنَیْلِ الشَّفاعَةِ لَدَیْہِ اَللّٰھُمَّ وَاجْعَلْہُ لِی شَفِیعاً مُشَفَّعاً،وَطَرِیقاً إِلَیْکَ مَھْیَعاً وَاجْعَلْنِی لَہُ مُتَّبِعاً حَتّی أَلْقاکَ یَوْمَ الْقِیامَةِ عَنِّی راضِیاً، وَعَنْ ذُ نُوبِی غاضِیاً، قَدْ أَوْجَبْتَ لِی مِنْکَ الرَّحْمَةَ وَالرِّضْوانَ، وَأَ نْزَلْتَنِی دارَ الْقَرارِ وَمَحَلَّ الْاَخْیارِ ۔

 

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