ईदे ग़दीर - 18 ज़िलहिज्ज﴿

18 ज़िल हिज्जा को ईद क्यों?

ग़दीर और इस्लामी उख़ुव्वत

ख़ुलासा ए ख़ुतब ए ग़दीर

मारेफ़ते ग़दीर

हदीसे ग़दीर

 

 

अठारवीं ज़िलहिज्ज की रात

 

यह ईदे ग़दीर की रात है जो बड़ी इज़्ज़त व अज़मत वाली रात है!

 

अठारवीं ज़िलहिज्ज  का दिन

 

यह ईदे ग़दीर का दिन है जो ख़ुदाए त'आला और आले मोहम्मद (अ:स) की अज़ीम तरीन ईदों में से है! हर पैग़म्बर ने इस दिन ईद मनाई और हर नबी इस दिन का शान और अज़मत का क़ाएल रहा है!  आसमान में इस इस ईद का नाम "रोज़े अहद मा'हूद" है और ज़मीन में इसका नाम मिसाक़ माख़ूज़ और इसकी जमा मशहूर है! एक रिवायत के मुताबिक़ ईमाम जाफ़र सादिक़ (अ:स) से पुछा गया की जुमा, ईद उल फ़ित्र और ईदे क़ुर्बान के अलावा भी मुसलमानों के लिए कोई ईद है? हज़रत (अ:स) ने फ़रमाया " हाँ, इनके अलावा भी एक ईद है और वो बड़ी इज़्ज़त व शराफ़त की हामिल है! जब अर्ज़ किया गया की वह कौन सी ईद है? तो आपने (अ:स) फ़रमाया : वह दिन की जिसमे हज़रत रसूले आज़म (स:अ:व: व) ने अमीरुल मोमिनीन (अ:स का तारुफ़ (परिचय) अपने ख़लीफ़ा के तौर पर कराया, आपने फ़रमाया की जिसका मैं मौला हूँ, अली (अ:स उसके मौला हैं, और यह अठारवीं ज़िलहिज्ज का दिन और रोज़े ईदे ग़दीर है! रावी ने अर्ज़ की के इस दिन हम क्या अमल करें? हज़रत (अ:स ने फ़रमाया की इस दिन रोज़ा रखो, ख़ुदा की इबादत करो, मोहम्मद व आले मोहम्मद का ज़िक्र करो, और इनपर सलवात भेजो! हुज़ूर (स:अ:व:व) ने अमीरुल मोमिनीन (अ:स) को इस दिन ईद मनाने की वसीयत फ़रमाई, जैसे हर पैग़म्बर अपने अपने वसी को इस तरह वसीयत करता रहा है: इबने अबी नसर बज़न्ती ने ईमाम अली रज़ा (अ:स से रिवायत की है के हज़रत ने फ़रमाया : ऐ इबने अबी नसर! तुम जहाँ कहीं भी हो रोज़े ग़दीर नजफ़ अशरफ़ पहुँचो हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ:स) की ज़्यारत करो क्योंकि हर मोमिन मर्द और हर मोमिना औरत और हर मुस्लिम मर्द और हर मुस्लिमा औरत के साठ साल के गुनाह माफ़ हो जाते हैं, इसके अलावा यह की पुरे माहे रमज़ान , सभी शबे क़दरों और ईदे फ़ितर में जितने इंसान जहन्नुम की आग से आज़ाद किये जाते हैं इस एक दिन में इनसे दो चार लोगों को जहन्नुम की आग से आज़ाद करारा दिया जाता है! आज के दिन होने हाजत मंद मोमिन भाई को एक दरहम सदक़े के तौर पर देना दुसरे दिनों में एक हज़ार दरहम देने के बराबर है!! बस ईदे ग़दीर के दिन अपने मोमिन भाई के साथ एहसान व नेकी करो, और अपने मोमिन भाई और मोमिना बहन को ख़ुश करो, ख़ुदा की क़सम अगर लोगों को इस दिन की फ़ज़ीलत का इल्म होता और वह इसका लिहाज़ रखते तो इस रोज़ मलाईका इनसे दस मर्तबा हाथ मिलाते! मुख़्तसर यह की इस दिन की इज़्ज़त और ताज़ीम करना लाज़िम है,

 

और इसमें चंद अमाल यह हैं:             

 

(1) इस दिन का रोज़ा रखना साठ साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा है, एक रिवायत में है की रोज़े ईदे ग़दीर का रोज़ा की मुद्दत दुन्या के रोज़ों, 100 हज और 100 उमरे के बराबर है!

 

(2) इस दिन ग़ुस्ल करना ज़रूरी और बाइसे ख़ैर व बरकत है!

 

(3) इस रोज़ जहाँ कहीं भी हो ख़ुद को रौज़ा ए अमीरुल मोमिनीन (अ:स) पर पहुँचाये और आपकी ज़्यारत करे! आज के दिन के लिए हज़रत की तीन मख़सूस ज़्यारते हैं और इनमें सबसे ज़्यादा मशहूर ज़्यारत अमीन अल्लाह है, जो दूर और नज़दीक से पढ़ी जा सकती है! यह ज़्यारत जामिया मुतलक़ा है!

 

(4) हज़रत रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) से मन्क़ूल तावीज़ पढ़े!

 

(5) 2 रकअत नमाज़ बजा लाये और सजदा ए शुक्र में 100 मर्तबा "शुक्रन शुक्रन" कहे, फिर सर सज्दे से उठाये और यह  दुआ पढ़े :

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

اَللّٰھُمَّ إِنِّی أَسْأَلُکَ بِأَنَّ لَکَ الْحَمْدَ وَحْدَکَ لاَ شَرِیکَ لَکَ وَأَ نَّکَ واحِدٌ أَحَدٌ صَمَدٌ لَمْ تَلِدْ وَلَمْ تُولَدْ وَلَمْ یَکُنْ لَکَ کُفُواً أَحَدٌ، وَأَنَّ مُحَمَّداً عَبْدُکَ وَرَسُولُکَ صَلَواتُکَ عَلَیْہِ وَ آلِہِ، یَا مَنْ ھُوَ کُلَّ یَوْمٍ فِی شَأْنٍ کَما کانَ مِنْ شَأْنِکَ أَنْ تَفَضَّلْتَ عَلَیَّ بِأَنْ جَعَلْتَنِی مِنْ أَھْلِ إِجابَتِکَ وَأَھْلِ دِینِکَ وَأَھْلِ دَعْوَتِکَ، وَوَفَّقْتَنِی لِذلِکَ فِی مُبْتَدَء خَلْقِی تَفَضُّلاً مِنْکَ وَکَرَماً وَجُوداً ثُمَّ أَرْدَفْتَ الْفَضْلَ فَضْلاً وَالْجُودَ جُوداً وَالْکَرَمَ کَرَمَاً رَأْفَةً مِنْکَ وَرَحْمَةً إِلی  أَنْ جَدَّدْتَ ذلِکَ الْعَھْدَ لِی تَجْدِیداً بَعْدَ تَجْدِیدِکَ خَلْقِی وَکُنْتُ نَسْیاً مَنْسِیّاً ناسِیاً ساھِیاً غافِلاً، فَأَ تْمَمْتَ نِعْمَتَکَ بِأَنْ ذَکَّرْتَنِی ذلِکَ وَمَنَنْتَ بِہِ عَلَیَّ وَھَدَیْتَنِی لَہُ، فَلْیَکُنْ مِنْ شَأْنِکَ یَا إِلھِی وَسَیِّدِی وَمَوْلایَ أَنْ تُتِمَّ لِی ذلِکَ وَلاَ تَسْلُبْنِیہِ حَتَّی تَتَوَفَّانِی عَلَی ذلِکَ وَأَ نْتَ عَنِّی راضٍ، فَإِنَّکَ أَحَقُّ الْمُنْعِمِینَ أَنْ تُتِمَّ نِعْمَتَکَ عَلَیَّ ۔ اَللّٰھُمَّ سَمِعْنا وَأَطَعْنا وَأَجَبْنا داعِیَکَ بِمَنِّکَ، فَلَکَ الْحَمْدُ غُفْرانَکَ رَبَّنا وَ إِلَیْکَ الْمَصِیرُ، آمَنّا بِاللهِ وَحْدَہُ لاَ شَرِیکَ لَہُ، وَ بِرَسُو لِہِ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ، وَصَدَّقْنا وَأَجَبْنا داعِیَ اللهِ وَاتَّبَعْنا الرَّسُولَ فِی مُوالاةِ مَوْلانا وَمَوْلَی الْمُؤْمِنِینَ أَمِیرِ الْمُؤْمِنِینَ عَلِیِّ بْنِ أَبِی طالِبٍ عَبْدِ اللهِ، وَأَخِی رَسُو لِہِ، وَالصِّدِّیقِ الْاَکْبَرِ،وَالْحُجَّةِ عَلَی بَرِیَّتِہِ، الْمُؤَیِّدِ بِہِ نَبِیَّہُ وَدِینَہُ الْحَقَّ الْمُبِینَ، عَلَماً لِدِینِ اللهِ، وَخازِناً لِعِلْمِہِ،وَعَیْبَةَ غَیْبِ اللهِ وَمَوْضِعَ سِرِّ اللهِ، وَأَمِینَ اللهِ عَلَی خَلْقِہِ، وَشاھِدَہُ فِی بَرِیَّتِہِ ۔ اَللّٰھُمَّ رَبَّنا إِنَّنا سَمِعْنا مُنادِیاً یُنادِی لِلْاِیْمانِ أَنْ آمِنُوا بِرَبِّکُمْ فَآمَنَّا رَبَّنا فَاغْفِرْ لَنا ذُنُوبَنا وَکَفِّرْ عَنَّا سَیِّئاتِنا وَ تَوَفَّنا مَعَ الْاَ بْرارِ، رَبَّنا وَآتِنا مَا وَعَدْتَنا عَلَی رُسُلِکَ وَلاَ تُخْزِنا یَوْمَ الْقِیامَةِ إِنَّکَ لاَ تُخْلِفُ الْمِیعادَ، فَإِنَّا یَا رَبَّنا بِمَنِّکَ وَلُطْفِکَ أَجَبْنا داعِیَکَ، وَاتَّبَعْنَا الرَّسُولَ وَصَدَّقْناہُ، وَصَدَّقْنا مَوْلَی الْمُؤْمِنِینَ، وَکَفَرْنا بِالْجِبْتِ وَالطَّاغُوتِ، فَوَ لِّنا مَا تَوَلَّیْنا، وَاحْشُرْنا مَعَ أَئِمَّتِنا فَإِنَّا بِھِمْ مُؤْمِنُونَ مُوقِنُونَ، وَلَھُمْ مُسَلِّمُونَ، آمَنَّا بِسِرِّھِمْ وَعَلانِیَتِھِمْ وَشاھِدِھِمْ وَغائِبِھِمْ، وَحَیِّھِمْ وَمَیِّتِھِمْ،وَرَضِینا بِھِمْ أَئِمَّةً وَقادَةً وَسادَةً،وَحَسْبُنا بِھِمْ بَیْنَنا وَبَیْنَ الله دُونَ خَلْقِہِ لاَ نَبْتَغِی بِھِمْ بَدَلاً وَلاَ نَتَّخِذُ مِنْ دُونِھِمْ وَلِیجَةً، وَبَرِئْنا إِلَی اللهِ مِنْ کُلِّ مَنْ نَصَبَ لَھُمْ حَرْباً مِنَ الْجِنِّ وَالْاِنْسِ مِنَ الْاَوَّلِینَ وَالْاَخِرِینَ، وَکَفَرْنا بِالْجِبْتِ وَالطَّاغُوتِ وَالْاََوْثانِ الْاَرْبَعَةِ وَأَشْیاعِھِمْ وَأَ تْباعِھِمْ وَکُلِّ مَنْ والاھُمْ مِنَ الْجِنِّ وَالاِنْسِ مِنْ أَوَّلِ الدَّھْرِ إِلی آخِرِہِ ۔ اَللّٰھُمَّ إِ نَّا نُشْھِدُکَ أَنَّا نَدِینُ بِما دانَ بِہِ مُحَمَّدٌ وَآلُ مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمْ، وَقَوْلُنا مَا قالُوا، وَدِینُنا مَادانُوا بِہِ، مَا قالُوا بِہِ قُلْنا، وَمَا دانُوا بِہِ دِنَّا، وَمَا أَ نْکَرُوا أَ نْکَرْنا، وَمَنْ والَوْا والَیْنا، وَمَنْ عادَوْا عادَیْنا، وَمَنْ لَعَنُوالَعَنَّا، وَمَنْ تَبَرَّأُوا مِنْہُ تَبَرَّأْنا مِنْہُ، وَمَنْ تَرَحَّمُوا عَلَیْہِ تَرَحَّمْنا عَلَیْہِ، آمَنَّا وَسَلَّمْنا وَرَضِینا وَاتَّبَعْنا مَوالِیَنا صَلَواتُ اللهِ عَلَیْھِمْ ۔ اَللّٰھُمَّ فَتَمِّمْ لَنا ذلِکَ وَلاَ تَسْلُبْناہُ وَاجْعَلْہُ مُسْتَقِرّاً ثابِتاً عِنْدَنا، وَلاَ تَجْعَلْہُ مُسْتَعاراً، وَأَحْیِنا مَا أَحْیَیْتَنا عَلَیْہِ، وَأَمِتْنا إِذا أَمَتَّنا عَلَیْہِ، آلُ مُحَمَّدٍ أَئِمَّتُنا فَبِھِمْ نَأْ تَمُّ وَ إِیَّاھُمْ نُوالِی، وَعَدُوَّھُمْ عَدُوَّ اللهِ نُعادِی، فَاجْعَلْنا مَعَھُمْ فِی الدُّنْیا وَالْاَخِرَةِ وَمِنَ الْمُقَرَّبِینَ،فَإِنَّا بِذلِکَ راضُونَ یَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِینَ ۔


 

 

अब फिर सजदे में जाए और 100 मर्तबा कहे "अल्हम्दुलिल्लाह
 

फिर 100 मर्तबा कहे : "शूकरन अल्लाह"


 

रिवायत  इस अमाल को  बजा लाएगा वो सवाब में इस शख़्स के बराबर है जो ईदे ग़दीर के दिन हज़रत रसूल अकरम (स:अ:व:व) की ख़िदमत में हाज़िर हो और जनाब अमीर (अ:स) के दस्ते मुबारक पर बैय्यत विलायत की हो! बेहतर है की इस नमाज़ को ज़वाल के क़रीब बजा लाये क्योंकि यही वो वक़्त है की जब रसूल (स:अ:व:व) ने अमीरुल मोमिनीन (अ:स) को ग़दीर में इमामत व ख़िलाफ़त के लिए मंसूब फ़रमाया! 


 

इस नमाज़ की पहली रकअत में सूरह अल-हम्द के बाद सूरह क़दर और दूसरी रकअत में सूरह अल-हम्द के बाद सूरह तौहीद की तिलावत करे!  

 

 

(6) ग़ुस्ल करे - ज़वाल से आधा घंटा पहले 2 रकअत नमाज़ बजा लाये जिसकी हर रकअत में सूरह अल-हम्द के बाद 10 मर्तबा सूरह तौहीद, 10 मर्तबा आयतल कुरसी और 10 मर्तबा सूरह क़दर पढ़े तो इसको एक लाख उमरे का सवाब मिलेगा! इसके अलावा इसकी दुन्या और आख़ेरत की हाजत आसानी से पूरी होगी! आपको पता होना चाहिए की सैय्यद ने किताब इक़बाल में इस नमाज़ में सूरह क़दर को आयतल कुरसी से पहले पढ़ने का ज़िक्र किया है! अल्लामा मजलिसी ने भी अपनी किताब ज़ाद-अल-मियाद में किताब इक़बाल की पैरवी में यही तहरीर फ़रमाया है और लिखने वाले ने भी अपनी दूसरी किताबों में यही तरतीब लिखी है! लेकिन बाद में जब इस पर रिसर्च किया गया तो मालूम हुआ की आयतल कुर्सी को सूरह क़द्र से पहले पढ़ने का ज़िक्र बहुत ज़्यादा रिवायतों में आया है, ज़ाहिरन किताब इक़बाल में या तो कातिब से कोई ग़लती हुई है या सहवे क़लम हुआ है, या यह भी मुमकिन है की यह एक अलग नमाज़ का तज़किरा हो और अल्लाह बेहतर जानने वाला है! इस नमाज़ के बाद रब्बना इन्नाणा समेना मुनादियां (رَبَّّنَا اِنَّنَا سَمِعْنَا مُنَادِیا ً) पढ़ें, यह एक तवील दुआ है!        

 

(7) आज के दिन दुआए नुदबा पढ़े!

 

(8) इस दिन को यह दुआ पढ़ें जिसे सैय्यद इबने ताऊस ने शेख़ मुफ़ीद से नक़ल किया है:

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
   

اَللّٰھُمَّ إِنِّی أَسْأَ لُکَ بِحَقِّ مُحَمَّدٍ نَبِیِّکَ وَعَلِیٍّ وَ لِیِّکَ وَالشَّأْنِ وَالْقَدْرِ الَّذِی خَصَصْتَھُما بِہِ دُونَ خَلْقِکَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَعَلِیٍّ وَأَنْ تَبْدَأَ بِھِما فِی کُلِّ خَیْرٍ عاجِلٍ۔ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ الْاََئِمَّةِ الْقادَةِ، وَالدُّعاةِ السَّادَةِ وَالنُّجُومِ الزَّاھِرَةِ، وَالْأَعْلامِ الْباھِرَةِ، وَساسَةِ الْعِبادِ، وَأَرْکانِ الْبِلادِ، وَالنَّاقَةِ الْمُرْسَلَةِ وَالسَّفِینَةِ النَّاجِیَةِ الْجارِیَةِ فِی اللُّجَجِ الْغامِرَةِ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ خُزَّانِ عِلْمِکَ، وَأَرْکانِ تَوْحِیدِکَ، وَدَعائِمِ دِینِکَ، وَمَعادِنِ کَرامَتِکَ،وَصَفْوَتِکَ مِنْ بَرِیَّتِکَ وَخِیَرَتِکَ مِنْ خَلْقِکَ الْاَتْقِیاءِ الْاَنْقِیاءِ النُّجَباءِ الْاَ بْرارِ وَالْبابالْمُبْتَلیٰ بِہِ النَّاسُ مَنْ أَتاہُ نَجا وَمَنْ أَباہُ ھَویٰ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ  أَھْلِ الذِّکْرِ الَّذِینَ أَمَرْتَ بِمَسْأَلَتِھِمْ وَذَوِی الْقُرْبَی الَّذِینَ أَمَرْتَ بِمَوَدَّتِھِمْ وَفَرَضْتَ حَقَّھُمْ وَ جَعَلْتَ الْجَنَّةَ مَعادَ مَنِ اقْتَصَّ آثارَھُمْ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ کَما أَمَرُوا بِطاعَتِکَ وَنَھَوْا عَنْ مَعْصِیَتِکَ وَدَلُّوا عِبادَکَ عَلَی وَحْدانِیَّتِکَ۔ اَللّٰھُمَّ إِنِّی أَسْأَلُکَ بِحَقِّ مُحَمَّدٍ نَبِیِّکَ وَنَجِیبِکَ وَصَفْوَتِکَ وَأَمِینِکَ، وَرَسُو لِکَ إِلی خَلْقِکَ وَبِحَقِّ أَمِیرِ الْمُؤْمِنِینَ وَیَعْسُوبِ الدِّینِ وَقائِدِ الْغُرِّ الْمُحَجَّلِینَ الْوَصِیِّ الْوَفِیِّ وَالصِّدِّیقِ الْاََ کْبَرِ وَالْفارُوقِ بَیْنَ الْحَقِّ وَالْباطِلِ وَالشَّاھِدِ لَکَ وَالدَّالِّ عَلَیْکَ وَالصَّادِعِ بِأَمْرِکَ، وَالْمُجاھِدِ فِی سَبِیلِکَ، لَمْ تَأْخُذْہُ فِیکَ لَوْمَةُ لائِمٍ، أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ، وَأَنْ تَجْعَلَنِی فِی ھذَا الْیَوْمِ الَّذِی عَقَدْتَ فِیہِ لِوَ لِیِّکَ الْعَھْدَ فِی أَعْناقِ خَلْقِکَ وَأَکْمَلْتَ لَھُمُ الدِّینَ مِنَ الْعارِفِینَ بِحُرْمَتِہِ وَالْمُقِرِّینَ بِفَضْلِہِ مِن عُتَقائِکَ وَطُلَقائِکَ مِنَ النَّارِ، وَلاَ تُشْمِتْ بِی حاسِدِی النِّعَمِ ۔ اَللّٰھُمَّ فَکَما جَعَلْتَہُ عِیدَکَ الْاَکْبَرَ وَسَمَّیْتَہُ فِی السَّماءِ یَوْمَ الْعَھْدِ الْمَعْھُودِ، وَفِی الْاََرْضِ یَوْمَ الْمِیثاق الْمَأْخُوذِ وَ الْجَمْعِ الْمَسْؤُولِ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَأَقْرِرْ بِہِ عُیُونَنا وَاجْمَعْ بِہِ شَمْلَنا وَلاَ تُضِلَّنا بَعْدَ إِذْ ھَدَیْتَنا وَاجْعَلْنَا لِاَ نْعُمِکَ مِنَ الشَّاکِرِینَ یَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِینَ۔ الْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی عَرَّفَنا فَضْلَ ھذَا الْیَوْمِ وَبَصَّرَنا حُرْمَتَہُ وَکَرَّمَنا بِہِ وَشَرَّفَنا بِمَعْرِفَتِہِ، وَھَدانا بِنُورِہِ ۔ یَا رَسُولَ اللهِ،یَا أَمِیرَ الْمُؤْمِنِینَ، عَلَیْکُما وَعَلَی عِتْرَتِکُما وَعَلَی مُحِبِّیکُما مِنِّی أَفْضَلُ السَّلامِ مَا بَقِیَ اللَّیْلُ وَالنَّھارُ وَبِکُما أَتَوَجَّہُ إِلَی اللهِ رَبِّی وَرَبِّکُما فِی نَجاحِ طَلِبتِی وَقَضاءِ حَوائِجِی وَتَیْسِیرِ أُمُورِی اَللّٰھُمَّ إِنِّی أَسْأَلُکَ بِحَقِّ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَأَنْ تَلْعَنَ مَنْ جَحَدَ حَقَّ ھذَا الْیَوْمِ وَأَنْکَرَ حُرْمَتَہُ فَصَدَّ عَنْ سَبِیلِکَ لاِِِطْفاءِ نُورِکَ فَأَبَی اللهُ إِلاَّ أَنْ یُتِمَّ نُورَہُ اَللّٰھُمَّ فَرِّجْ عَنْ أَھْلِ بَیْتِ مُحَمَّدٍ نَبِیِّکَ وَ اکْشِفْ عَنْھُمْ وَبِھِمْ عَنِ الْمُؤْمِنِینَ الْکُرُباتِ اَللَّھُمَّ امْلَأَ الْاَرْضَ بِھِمْ عَدْلاً کَما مُلِیَتْ ظُلْماً وَجَوْراً وَأَنْجِزْ لَھُمْ مَا وَعَدْتَھُمْ إِنَّکَ لاَ تُخْلِفُ الْمِیعادَ

(9) जब बरादर मोमिन से मुलाक़ात करे तो इसे ईदे ग़दीर की मुबारकबादी देने के लिए यह कहे:

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
सारी तारीफें इस अल्लाह के लिए हैं जिस ने हमें अमीरुल मोमिनीन (अ:स) की  और इनके बाद अईम्मा (अ:स) की विलायत व इमामत को मानने वालों में से क़रार दिया है!  

الْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی جَعَلَنا مِنَ الْمُتَمَسِّکینَ بِوِلایَةِ أَمِیرِ الْمُؤْمِنِینَ وَالْاَ ئِمَّة عَلَیْھِمُ اَلسَّلَامُ

फिर यह भी पढ़ें :

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

इस अल्लाह के लिए हम्द है जिस ने आज के दिन के ज़रिये हमें इज़्ज़त दी और हमें इस अहद को वफ़ा करने वाला बनाया जो हमारे सुपुर्द किया और वह पैमाना जो हम से विलायत 

 

अमीरुल मोमिनीन (अ:स) अपने वालियाने अम्र और अदल पर क़ायम रहने वालों के बारे में लिया और हमें रोज़े क़यामत का इंकार करने वालों और इसे झुटलाने वालों में नहीं रखा! 

 

 

الْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی أَکْرَمَنا بِھذَا الْیَوْمِ وَجَعَلَنا مِنَ الْمُوفِینَ بِعَھْدِہِ إِلَیْنا وَمِیثاقِہِ الَّذِی واثَقَنا بِہِ

مِنْ وِلایَةِ وُلاةِ أَمْرِہِ وَالْقُوَّامِ بِقِسْطِہِ، وَلَمْ یَجْعَلْنا مِنَ الْجاحِدِینَ وَالْمُکَذِّبِینَ بِیَوْمِ الدِّینِ۔

(10) 100 मर्तबा कहें :

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
इस अल्लाह के लिए हम्द है जिस ने अपने दीं के कमाल और नेमत के तमाम होने को अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली इबने अभी तालिब (अ:स) की  विलायत के साथ शर्त क़रार दिया!  

الْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی جَعَلَ کَمالَ دِینِہِ وَتَمامَ نِعْمَتِہِ بِوِلایَةِ أَمِیرِ الْمُؤْمِنِینَ عَلِیِّ بْنِ أَبِی طالِبٍ عَلَیْہِ اَلسَّلَامُ

 

 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
मैं भाई बना तुम्हारा रहे ख़ुदा में! मैं मुख्लिस हुआ तुम्हारा रहे ख़ुदा में, मैंने हाथ मिलाया तुमसे रहे ख़ुदा में, और अहद करता हूँ ख़ुदा से इसके फ़रिश्तों से इसकी किताबों और इसके रसूलों इसके नबियों से और अ'ईम्मा मासूमीन (अ:स) से इस बात का की अगर मैं बहिश्त (जन्नत) वालों की शिफ़ाअत हासिल करने वालों में हो जाऊँ और मुझे जन्नत में दाख़िले का हुक्म हो तो मैं जन्नत में दाखिल नहीं होऊँगा तुझे साथ लिए बग़ैर!  

واخَیْتُکَ فِی اللهِ،وَصافَیْتُکَ فِی اللهِ، وَصافَحْتُکَ فِی اللهِ، وَعاھَدْتُ اللهَ وَمَلائِکَتَہُ وَکُتُبَہُ وَرُسُلَہُ وَأَنْبِیائَہُ وَالْاَئِمَّةَ الْمَعْصُومِینَ عَلَیْھِمُ اَلسَّلَامُ عَلَی أَنَّی إِنْ کُنْتُ مِنْ أَھْلِ الْجَنَّةِ وَالشَّفاعَةِ وَأُذِنَ لِی بِأَنْ أَدْخُلَ الْجَنَّةَ لاَ أَدْخُلُھا إِلاَّ وَأَنْتَ مَعِی

दूसरा मोमिन भाई इसके जवाब में कहे:

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
मैंने क़ुबूल किया!  

قَبِلْتُ

और फिर यह कहे:

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

साक़ित कर दिए मैंने तुझ से भाईचारे के सारे हुक़ुक़ सिवाए शिफ़ाअत करने, दुआए ख़ैर करने, और मुलाक़ात करने के लिए

 

 

أَسْقَطْتُ عَنْکَ جَمِیعَ حُقُوقِ الْاُخُوَّةِ مَا خَلاَ الشَّفاعَةَ وَالدُّعاءَ وَالزِّیارَةَ ۔

 

मोहद्दिस फ़ैज़ ने भी अपनी किताब ख़िलासतुल अज़कार में तक़रीबन यही लिखा है की दूसरा मोमिन भाई ख़ुद या इसका वकील ऐसे लफ़्ज़ों में भाईचारगी क़बूल करे जो वाज़े तौर पर (स्पष्ट रूप से) क़बूलियत के मानी को पेश करता हो, और सिवाए दुआ और मुलाक़ात के बाक़ी भाईचारगी के दुसरे हुक़ूक़ को साक़ित कर दें!  

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