सलाते गुफैला    mp3    

हुक्म 783 : नमाज़े गुफैला एक मुस्तहब नमाज़ है जो मगरिब और इशा की नमाज़ के दरम्यान पढ़ी जाती है, और इसका बहुत सवाब है

इसकी पहली रक्'अत में सुरह अल-हम्द के बाद और दूसरी किसी सुरह की जगह इन आयात को पढ़ें 

21.87: ज़ाअल्न'नूने इद दोहाबा मुग़ा'ज़ेबन फ़'ज़ुन्ना अन-लन नक़'देरा अलैहे फ़'नादा'इ फ़ी अल'ज़ूलूमाते अन ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तो मिन'अल-ज़ालेमीन, 'अस्तन-जब्ना लहू व नजय्या'नहु मिन अल'गम्मे व कज़ालेका नुन'जिय्यी अल'मोमेनीन

सुरह अल-अंबिया (21 : 87-88)

وَذَا النُّونِ إِذْ ذَھَبَ مُغَاضِباً فَظَنَّ أَنْ لَنْ نَقْدِرَ عَلَیْہِ فَنادَی فِی الظُّلُماتِ أَنْ لاَ إِلہَإِلاَّ أَنْتَ سُبْحَانَکَ إِنِّی کُنْتُ مِنَ الظَّالِمِینَ، فَاسْتَجَبْنَا لَہُ وَنَجَّیْناہُ مِنَ الْغَمِّ وَکَذلِکَ نُنْجِی الْمُؤْمِنِینَ۔

हिंदी तर्जुमा :

और जब ज़ाल्नून गुस्से की हालत में चला गया तो इसका गुमान था की हम इसे नहीं पकड़ेंगे, फिर इसने तारीकियों में फरयाद की के तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तू पाक है, बे'शक मैं ही खताकारों में से हूँ तब हम ने इसकी गुज़ारिश कबूल की और इसे अपनी परेशानी से, और हम मोमिनों को इसी तरह निजात देते हैं - और ग़ैब की कुंजियाँ इसी के पास हैं, जिसे इसके सिवा कोई नहीं जानत

इसकी दूसरी रक्'अत में सुरह अल-हम्द के बाद दूसरी किसी सुरह की जगह इन आयात को पढ़ें

व इद'दहु मफ़ा'तेहुल ग़ैब ला यअ-लमोहा इल्ला होवा व यालामो मा फ़ी अल'बर्रे व अल'बहरे व मा तस'क़तो मिन वरा'क़तिन इल्ला या'लमोहा व ला हब'बतिन फ़ी ज़ूलुमाते अल'अर्ज़ व ला रत'बिन व ला या'बिस इल्ला फ़ी किताबिन मुबीन

सुरह अल-अन'आम (6 : 59)

وَعِنْدَہُ مَفَاتِحُ الْغَیْبِ لاَ یَعْلَمُھَا إِلاَّ ھُوَ وَیَعْلَمُ مَا فِی الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَمَا تَسْقُطُ مِنْ وَرَقَةٍ إِلاَّ یَعْلَمُھا وَلاَ حَبَّةٍ فِی ظُلُماتِ الْاَرْضِ وَلاَ  رَطْبٍ وَلاَ یَابِسٍ إِلاَّ فِی کِتَابٍ مُبِینٍ

हिंदी तर्जुमा :

इसी को मालूम है जो कुछ खुशकी व तरी में है, कोई पता नहीं करता मगर यह की वोह इसे जानता है और ज़मीन को तारीकियों में कोई दाना नहीं, कोई खुश्क़ व तर नहीं मगर वोह रौशन किताब में मज़कूर 

और कुनूत में यह दुआ पढ़ें

अल्लाहुम्मा इन्नी अस'अलोका बे'मफ़ा'तेहुल ग़ैब अल'लती ला या'लमोहा इल्ला अन्ता अन तुसल्ली अला मोहम्मदीन व आलेही व अन'तफ़-अल बी क़ज़ा-व-क़ज़ा (क़ज़ा-व-क़ज़ा की जगह अपनी दुआएं माँग

 اَللّٰھُمَّ انِّی أَسْأَلُکَ بِمَفَاتِحِ الْغَیْبِ الَّتِی لاَ یَعْلَمُہا إِلاّ أَنْتَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِہِ وَأَنْ تَفعَل بِی کَذا وَکَذا،

हिंदी तर्जुमा :

ख़ुदा वंदा ! मैं तुझ से कलीद'हाए ग़ैब के वास्ते से सवाल करता हूँ जिसे तेरे सिवा कोई नहीं जानता की मोहम्मद (स:अव:व) व आले मोहम्मद (अ:स) पर रहमत नाजिल फरमा और मेरे हक में यह काम कर दे (क़ज़ा-व-क़ज़) की जगह अपनी हाजत ब्यान करें), ऐ माबूद! तू मुझे नेमत अता करने वाला ह

उसके बाद से यह दुआ पढ़ें :

अल्लाहुम्मा अन्ता वालिय्यु नेमती व क़दीरू अला तलाबाती ता'लमू हाजती फ़-अस'अलोका बे'हक़्क़े मुहम्मदीन व आले मोहम्मदीन अलैहे व अलैहिम अल्सलामु लम्मा क़ज़य-तहा ली

اَللّٰھُمَّ أَنْتَ وَلِیُّ اَلسَّلاَمُ لَمَّا قَضَیْتَھا لِی

हिंदी तर्जुमा :

और मेरी हाजत पर क़ुदरत रखता है, मेरी हाजत को जानता है, बस मोहम्मद (स:आ:व:व) व आले मोहम्मद (अ:स) के वास्ते से सवाल करता हूँ की मेरी हाजत को पूरी फ़रमा

 

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