9 जिल'हिज्ज - अरफ़ा का दिन / शाम की दुआएँ﴿

यह शबे जुमा और जुमा को भी पढ़ी जानी चाहिए 

3 दुआ  ->  1) या शहीद कुल्ले नजवा   |    2) अल्लाहुम्मा मन ताबा तहया (शबे जुमा को भी)   |  3) - चार तस्बीहात  

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दुआ 1 - या शहीद कुल्ले नजवा   

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शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

अल्लाहूम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन  आले मोहम्मद.

ऐ अल्लाह! हर राज़ के गवाह ऐ हर शिकायत के पहुँचने के मुक़ाम, ऐ हर पोशीदा चीज़ के जाने वाले, और हर हाजत की  

आखिरी जगह, ऐ बन्दों पर अपनी नेमतों का आग़ाज़ करने वाले ऐ मेहरबान माफ़ करने वाले ऐ बेहतरीन दर'गुज़र करने वायले ऐ अता वाले 

ऐ वोह जिस से निहाँ नहीं है तरीक न बे'करां समुन्दर न बुर्जों वाला आसमान, और न यकबारगी उठने वाली मौजें निहाँ हैं ऐ वो 

तारीकियाँ जिस के लिए रौशन हैं सवाल करता हूँ ब'वास्ता तेरी इज़ज़त वाली ज़ात के नूर के जिसको तूने पहाड़ पर चमकाया तो वोह बिखर कर रह गया और हज़रात मूसा (अ:स) 

बेहोश हो कर गिर पड़े और ब'वास्ता तेरे नाम के जिस से तूने आसमानों को बग़ैर किसी सतूनों के बुलंद किया और ज़मीन को जमे हुए पानी कि सतह के 

ऊपर फैलाया और सवाली हूँ 'वास्ता तेरे महफूज़ पोशीदा लिखे हुए पाक'तर नाम के की जिस से तुझे पुकारा जाये तो जवाब देता है और जब इसके 

ज़रिये तुझ से माँगा जाए तो अता करता है और 'वास्ता तेरे पाक व पाकीज़ा नाम के सवाली हूँ जो हर नूर से बालातर नूर है, वोह नूर है इस नूर में से 

और जिस से हर नूर चमकता है जब वोह जमीन पर पहुंचा तो वोह फट गयी, जब वोह आसमानों पर पहुंचा तो वोह कुशादा हो गयी, जब अर्श पर पहुंचा तो 

वोह लरज़ने लगा और 'वास्ता तेरे इन नाम के जिस से तेरे फरिश्तों के दिल दहल जाते हैं और सवाली हूँ जिब्राइल, मिकाइल 

और इस्राफील के वास्ते से और हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स:अ:व:व) के इस हक़ के वास्ते से सवाली हूँ जो तमाम नबियों और फरिश्तों पर है और 

सवाली हूँ के जिसकी बरकत से ख़िज़र (अ:स) पानी कि लहरों पर चलते थे जैसा की वोह इस ज़मीन कि बुलंदियों पर

चलते थे और 'वास्ता तेरे नाम के जिस से तूने मूसा (अ:स) के लिए दरया को चीरा, फ़िरौन को इसकी क़ौम समेत गर्क़ किया और मूसा (अ:स) बिन इमरान 

को साथियों समेत निजात दी और 'वास्ता इस नाम के जिस से मूसा बिन इमरान ने तूर ऐमन कि एक सिम्त से पुकारा था, पास तूने इसको 

जवाब दिया और इसपर अपनी मुहब्ब्त नाज़िल फरमाई, और सवाली हूँ ब'वास्ता इस नाम के जिस की बरकत से इसा (अ:स) बिन मरयम (स:अ) ने मुर्दे ज़िंदा किये, बचपने में गहवारे 

में कलाम किया और तेरे हुक्म से इस नाम के साथ जिज़ाम व बुरुस (बीमारों और कोढ़ियों) वालों को शफ़ा दी और 'वास्ता तेरे इस नाम के जिस से तुझे हामिलाने  अर्श और जिब्राइल 

मीकाईल और इसराफ़ील और तेरे हबीब हज़रात मोहम्मद मुस्तफ़ा (स:अ:व:व) तुझे पुकारते हैं नीज़ जिस नाम से तेरे मुक़र्रिब फ़रिश्ते 

तेरे भेजे हुए अम्बिया और तेरे नेकोकार बन्दे तुझे पुकारते हैं जो आसमान वालों और ज़मीन वालों में हैं और 'वास्ता तेरे इस नाम के जिस से 

तुझे पुकारा मछली वाले ने जब वोह ग़ुस्से में जा रहा था तो इसने ख्याल किया की तू इसे न पकड़ेगा बस इसने वोह पानी की तारीकियों में पुकारा के तेरे 

सिवा कोई माबूद नहीं है, तू पाक है, बेशक मैं ज़ालिमों में से हूँ बस तूने इसकी दुआ क़बूल की और तूने इसे रंज व ग़म में से निकाला और तू मोमिनों को 

इसी तरह रिहाई देता है और सवाली हूँ तेरे बुजुर्गतर नाम के वास्ते से जिस के साथ तुझे दाऊद (अ:स) ने सजदे कि हालत में पुकारा, बस बख्श दी तूने इसकी भूल 

और 'वास्ता तेरे इस नाम के जिसके साथ तुझे आसिया, फ़िरौन कि ज़ौजा ने पुकारा जब कहने लगी के मेरे रब मेरे लिए अपने यहाँ जन्नत में एक घर बना और मुझे फ़िरौन 

और इसके अमल से निजात दे और मुझे ज़ालिमों के गिरोह से निजात दे बस तूने इसकी दुआ सुन ली और सवाली हूँ 'वास्ता तेरे इस नाम जिसके साथ तुझे 

अय्यूब ने पुकारा जब इन पर सख्ती आ पड़ी बस तूने इनको निजात दी और अपनी रहमत से इन्हें अहलियत दिए और इन जैसे और भी अता किये ताकी इबादत गुज़ारों के लिए 

यादगार बने और सवाली हूँ 'वास्ता तेरे इस नाम जिसके साथ तुझे याक़ूब (अ:स) ने पुकारा बस तूने इन्हें आँखें वापिस दी और इनका नूरे नज़र युसुफ़ (अ:स) भी और इसके बिखरे खानदान को 

यकजा कर दिया और ब'वास्ता तेरे इस नाम जिसके साथ तुझे सुलेमान (अ:स) ने पुकारा बस तूने इन्हें ऐसा मुल्क व हुकूमत बख्शा जो इनके बाद किसी के लिए नहीं 

बेशक तू बहुत अता करने वाला है और ब'वास्ता तेरे इस नाम जिस के साथ तूने बुराक़ को ब'खातीर मोहम्मद (स:अ:व:व) मती'अ किया जैसा के फरमाया खुदाए त'आला 

ने पाक है वोह ज़ात जिस ने अपने बन्दे को सैर कराई रातों रात काबा शरीफ से मस्जिद अक़सा तक की और क़ौल खुदा है पाक 

है वोह ज़ात जिस ने इसे हमार्रे लिए मती'अ किया वर्ना हैम मेई ऐसी ताक़त न थी और पाने परवरदिगार की तरफ पलटने वाले हैं और ब'वास्ता तेरे इस 

नाम के जिसे जिब्राइल हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) के पास ले कर आये और ब'वास्ता तेरे इस नाम के जिस के साथ तुझे आदम (अ:स) ने पुकारा और माफ़ की तूने 

इनकी भूल और इन्हें अपनी जन्नत में ठहराया और सवाल करता हूँ तुझ से अज़मत वाले क़ुरान के वास्ते से हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) नबियों के ख़ातिम के वास्ते से और इब्राहीम (अ:स) 

के वास्ते से और क़यामत के रोज़ तेरे फैसले के वास्ते से और मीज़ान व अदल के वास्ते से जब नसब की जाएगी और सहीफ़े खोले जायेंगे 

और क़लम के वास्ते से जब वो चलेगा और लौह के वास्ते से जब वोह पुर हो जायेगी और इस नाम के वास्ते से जिस को तूने अर्श

के परों पर लिखा इससे पहले के तूने मख्लूक़ सूरज, और चाँद को दो हज़ार साल में बनाया और गवाही देता हूँ  के अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं जो यकता है 

इसका कोई सानी नहीं  और यह के हज़रत मोहम्मद इसके बन्दे और रसूल हैं और सवाल करता हूँ तुझ से ब'वास्ता तेरे इस नाम के जो तेरे खज़ानों में महफूज़ है जिसको

ख़ास किया है तूने इल्मे ग़ैब के साथ अपने हुज़ूर में जिस पर तेरे मख्लूक़ में से कोई भी आगाह नहीं है न कोई मुक़र्रिब फ़रिश्ता न कोई भेजा हुआ नबी और न ही कोई

बरगुज़ीदा बन्दा और सवाल करता हूँ तुझे से 'वास्ता तेरे इस नाम के जिसके साथ तूने दरयाओं को चीरा पहाड़ों को क़ायम फरमाया और इसे से दिन रात में 

तफ़रीक़ की है और और ब'वास्ता दुबारा नाज़िल होने वाली सात आयतों और अज़मत वाले क़ुरान के ब'वास्ता इज़ज़त वाले कातिबों के ब'वास्ता ताहा व यासीन 

और क:ह:य:सीन और हाम:मीम:ऐन:सीन:क़ाफ़ और ब'वास्ता मूसा (अ:स) की तौरैत, ईसा (अ:स) की इन्जील दाऊद (अ:स की ज़बूर और ब'वास्ता मोहम्मद (स:अ:व:व) के क़ुरान 

के खुदा रहमत करे इनपर और इनकी आल पर और तमाम रसूलों पर और अपने दोनों इस्माये आज़म पर ऐ अल्लाह मैं सवाल करता हूँ तुझ से 

'वास्ता तेरे इस नाम के जो तूने रूहें क़ब्ज़ करने के लिए मौत के फ़रिश्ता को तालीम फ़रमाया और सवाल करता हूँ तुझे से ब'वास्ता तेरे इस नाम 

के शजर-ए-ज़ैतून के पत्ते पर लिखा गया बस दोज़ख इस पत्ते के आगे झुक गया फिर कहा तूने के ऐ आग ठंडी हो जा और सलामती वाली और सवाल करता हूँ 

तुझ से 'वास्ता तेरे इस नाम के जिसे तूने इज़ज़त और बुज़ुर्गी के पर्दों पर लिखा है ऐ वो के जिसे सवाल से तंगी नहीं होती और अता से कमी नहीं 

आती ऐ वो जिस से मदद मांगी और जिस से पनाह ली जाती है सवाल करता हूँ तुझ से 'वास्ता तेरे अर्श के इज़ज़त वाले मकामात तेरी किताब में मौजूद 

इन्तेहाई रहमत के और 'वास्ता तेरे इस्म आज़म तेरी बुलंद शान और तेरे कामिल और बुलन्दतर कलमात के ऐ अल्लाह ऐ हवाओं और इनके असरात के रब ऐ 

आसमान और इसके साये के रब ऐ ज़मीन और इसके बोझ के रब ऐ शैतानों और इनके गुमराह'करदा के रब, ऐ दरयाओं और इनकी रवानी के रब

और 'वास्ता हर इस हक़ के जो तुझ पर है और 'वास्ता मुक़र्रिब फरिश्तों रूहानियों करूबियों और रात और दिन में तेरी तस्बीह करने वालों के जो थकते नहीं हैं 

और 'वास्ता तेरे ख़लील इब्राहीम (अ:स) के और 'वास्ता तेरे हर दोस्त के जो सफ़ा और मरवा के दरम्यान तुझे पुकारता है और तू उसकी दुआ क़बूल करता है 

 क़बूल करने वाले मैं सवाल करता हूँ तुझ से 'वास्ता इन नामों के और ब'वास्ता इन दुआओं के यह के हमारे गुनाह बख्श दे 

जो हम कर चुके और करेंगे और जो हम ने छुप कर किये हैं और जो ज़ाहिर किये हैं और जो हम ने ब्यान किये हैं और जो हमने छिपाए और जिनको तू हम 

से ज़यादा जानता है बेशक तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखने वाला है ब'ज़रिया अपनी रहमत के ऐ सबसे ज़यादा रहम करने वाले ऐ हर बे'वतन 

के निगहबान ऐ हर तन्हा के मोनिस व ग़मख़ार ऐ हर कमज़ोर कि क़ुव्वत ऐ हर सितम दीदा कि मदद करने वाले ऐ हर महरूम के राज़िक़ ऐ हर ख़ौफ़ज़दा 

के हमदम ऐ हर मुसाफिर के हमराही ऐ हर हाज़िर के सहारे ऐ हर गुनाह और ख़ता के बख्शने वाले ऐ फरयादियों के फरयादरस

 हर पुकारने वाले की (पुकार) सुनने वाले ऐ दुखयारी लोगों के दुखों को दूर करने वाले ऐ ग़म'ज़दों के ग़म मिटाने वाले ऐ आसमानों और 

ज़मीनों के पैदा करने वाले ऐ तलबगारों के मक़सद कि इन्तेहा ऐ परेशान लोगों की दुआ क़बूल करनेवाले ऐ सब से ज़यादा रहम करने वाले 

ऐ सब जहानों के रब ऐ यौमे जज़ा को बदला देने वाले ऐ अता करने वालों से ज़यादा अता करने वाले ऐ मेहरबानों से ज़यादा मेहरबान, ऐ सुन्ने 

वालों से ज़यादा सुन्ने वाले ऐ देखने वालों से ज़यादा देखने वाले, ऐ ताक़तवरों से ज़यादा ताक़त वाले मेरे वोह गुनाह माफ़ कर दे जो नेमतों 

से महरूम करते हैं मेरे वोह गुनाह बख्श दे जो शर्मिंदगी का बाइस बनते हैं मेरे वोह गुनाह माफ़ कर दे जो बीमारियाँ पैदा करते हैं  मेरे वोह गुनाह बख्श 

दे जो पर्दों को फ़ाश करते हैं मेरे वोह गुनाह माफ़ कर दे जो दुआ को रोक देते हैं  मेरे वोह गुनाह बख्श दे 

जो बारिशों में रुकावट डालते हैं  मेरे वोह गुनाह माफ़ कर दे जो जल्द मौत लाते हैं मेरे वोह गुनाह बख्श दे जो बद'बख्ती  

का मोजिब बनते हैं मेरे वोह गुनाह माफ़ कर दे जो मेरी दुन्या को तारीक करते हैं, मेरे वोह गुनाह बख्श दे जो बे'पर्दगी का 

सबब बनते हैं, और मेरे वोह गुनाह माफ़ कर दे जिनको तेरे सिवा कोई माफ़ नहीं कर सकता, ऐ अल्लाह, तेरी मख्लूक़ में से मुझ पर किसी का जो बोझ है वोह मुझ से 

हटा दे मेरे कामों में कशाइश आसानी और सहूलत पैदा कर दे मेरे सीने में अपना यक़ीन और मेरे दिल में अपनी उम्मीद को जगह दे यहाँ तक के तेरे 

गैर से उम्मीद न रखूँ ऐ अल्लाह, मेरे मुक़ाम में मेरी हिफाज़त कर और मुझे पनाह दे और मेरे साथ रह दिन में रात में मेरी निगहबानी कर मेरे 

आगे से पीछे से दायें से बाएं से और मेरे ऊपर से और नीचे से और मेरा रास्ता आसान कर दे मेरे लिए बेहतर आसाइश पैदा कर दे 

और मुझे तंगी में ज़लील व ख्वार न कर मुझे राह समझा दे ऐ बेहतरीन रहबर और मामलात में मुझे मेरे नफ्स के हवाले न कर मुझे हर तरह 

की ख़ुशी अता फ़र्मा, और और बेहतरी और कामयाबी के साथ और दुन्या व आख़ेरत की भलाई के साथ मुझे अपने कुनबे में वापस ले चल 

बे'शक तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है और मुझ पर अपना फ़ज़ल व करम कर मेरे लिए अपने पाकीज़ा रिज़क में फ़रावानी फ़रमा 

मुझे अपनी फ़र्माबरदारी में लगा दे मुझे अपनी सज़ा और आग से पनाह दे और जब तू मुझे वफ़ात दे तो अपनी रहमत से मुझे जन्नत में 

पहुंचा दे ऐ अल्लाह मैं तेरी पनाह चाहता हूँ इस से के मुझे से तेरी नेमत छिन जाए और तेरी निगहबानी हासिल न रहे और तेरी पनाह 

चाहता हूँ तेरी तरफ से सख्ती और अज़ाब के आने से और तेरी पनाह चाहता हूँ सख्त आज़माइश से बद'बख्ती के आने से बुरी तक़दीर से दुश्मनों 

के ताने से और इस तकलीफ से जो आसमान से नाज़िल हो और हर इस बुराई से जिसका ज़िकर नाज़िल हुई किताब में है, ऐ अल्लाह, मुझे बुरे लोगों 

में क़रार न दे और न ही अहले जहन्नुम में से क़रार दे और न ही मुझे नेक लोगों के सोहबत से महरूम रख मुझे पाकीज़ा ज़िंदगी नसीब कर, मुझ को बेहतरीन हालत में 

मौत दे नेकोकारों में शामिल कर देना मुझे अम्बिया का साथ अता फरमाना, इस मुक़ामे सिद्क़ व सफ़ा में जो तेरे ज़बरदस्त हुकूमत में है ऐ माबूद हम्द तेरे ही 

लिए है तेरी तरफ से नेहतरीन आज़माइश में मदद करने पर और हम्द तेरे लिए है के तूने इस्लाम कि पैरवी और सुन्नत पर अमल करने की तौफ़ीक़ दी है 

ऐ परवरदिगार जैसे तूने इनकी अपने दीं की तरफ रहनुमाई की अपनी किताब इन्हें सिखाई बस हमारी भी रहनुमाई कर और हमें सिखा और हम्द तेरे लिए 

है, बेहतरीन आज़माइश पर और इस ख़ास एहसान पर जो यूने मुझ पर किया है जैसा के तूने मुझे पैदा किया है तो अच्छी  सूरत दी है मुझे इल्म सिखाया तो बेहतरीन तालीम 

दी है और मेरी रहनुमाई की तो क्या खूब रहनुमाई की है, बस हम्द तेरे लिए है के तूने मुझे अव्वल से आख़िर तक मुसलसल नेमतें दी, बस ऐ मेरे सरदार 

कितने ही दुःख थे जो तूने दूर कर दिए मेरे आक़ा कितने ही ग़म थे जो तूने मिटा दिए ऐ मेरे मालिक कितने ही अंदेशे थे जो तूने महू (हटा) के दिए ऐ मेरे 

आक़ा कितनी ही परेशानियाँ थी जो तूने ख़तम कर दी और कितने ही ऐब थे जो तूने ढाँप लिए बस हम्द तेरे लिए है 

हर एक हाल में हर जगह हर ज़माने में हर एक मंज़िल और हर एक मुक़ाम पर और इस मौजूदा हालत में और हर हालत में, ऐ माबूद आज 

के दिन मुझे हिस्सा व नसीब के लिहाज़ से अपने सब बन्दों से बरतर क़रार दे इस भलाई में जो तूने तक़सीम की या जो तकलीफ़ तूने दूर 

की या जो बुराई तूने हटाई या जो सख्ती तूने टाली या जो ख़ैर तूने अता की या जो रहमत तूने आम की या जो आफ़ियत तूने इनायत की है के बे'शक 

तू हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है, आसमानों और ज़मीन के ख़ज़ाने तेरे क़ब्ज़े में हैं और तू वोह यकता बुज़ुर्गी वाला, अता करने वाला है जो किसी साएल कि हटाता नहीं किसी 

उम्मीदवार को मायूस नहीं करता और जिस कि आता कम नहीं होती और जो कुछ इसके पास है ख़तम नहीं होता बल्कि वोह बढ़ता है, मिक़दार में पाकीज़गी में अता में और सख़ावत 

में और मुझे अपने ख़ज़ानों से इनायत कर जो ख़तम नहीं होते और पानी वासी रहमत में से मुझे अता का के बेशक तेरी अता कभी बंद नहीं होती और तू हर चीज़ पर 

क़ुदरत रखता है अपनी रहमत के साथ ऐ सब से ज़यादा रहम करने वाले  

 

 

اَللّٰھُمَّ یَا شاھِدَ کُلِّ نَجْوی، وَمَوْضِعَ کُلِّ شَکْوی، وَعالِمَ کُلِّ خَفِیَّةٍ، وَمُنْتَھی کُلِّ حاجَةٍ،

 یَامُبْتَدِئاً بِالنِّعَمِ عَلَی الْعِبادِ، یَا کَرِیمَ الْعَفْوِ، یَا حَسَنَ التَّجاوُزِ، یَا جَوادُ،یَا مَنْ لاَ یُوارِی مِنْہُ لَیْلٌ

داجٍ وَلاَ بَحْرٌ عَجَّاجٌ وَلاَ سَماءٌ ذاتُ أَبْراجٍ، وَلاَ ظُلَمٌ ذاتُ ارْتِتاجٍ، یَا مَنِ الظُّلْمَةُ عِنْدَہُ ضِیاءٌ،

أَسْأَلُکَ بِنُورِ وَجْھِکَ الْکَرِیمِ الَّذِی تَجَلَّیْتَ بِہِ لِلْجَبَلِ فَجَعَلْتَہُ دَ کّاً وَخَرَّ مُوسی صَعِقاً،

وَبِاسْمِکَ الَّذِی رَفَعْتَ بِہِ السَّماواتِ بِلا عَمَدٍ، وَسَطَحْتَ بِہِ الْاَرْضَ عَلَی وَجْہِ مَاءٍ جَمَدٍ،

وَبِاسْمِکَ الْمَخْزُونِ الْمَکْنُونِ الْمَکْتُوبِ الطَّاھِرِ الَّذِی إِذا دُعِیتَ بِہِ أَجَبْتَ، وَ إِذا سُئِلْتَ

بِہِ أَعْطَیْتَ، وَبِاسْمِکَ السُّبُّوحِ الْقُدُّوسِ الْبُرْھانِ الَّذِی ھُوَ نُورٌ عَلَی کُلِّ نُورٍ، وَنُورٌ مِنْ نُورٍ

یُضِیءُ مِنْہُ کُلُّ نُورٍ، إِذا بَلَغَ الْاَرْضَ انْشَقَّتْ، وَ إِذا بَلَغَ السَّماواتِ فُتِحَتْ، وَ إِذا بَلَغَ الْعَرْشَ

اھْتَزَّ وَبِاسْمِکَ الَّذِی تَرْتَعِدُ مِنْہُ فَرائِصُ مَلائِکَتِکَ وَاَسأَلُکَ بِحَقِّ جَبْرَائِیلَ وَمِیکائِیلَ وَ

إِسْرافِیلَ وَبِحَقِّ مُحَمَّدٍ الْمُصْطَفی صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ وَعَلَی جَمِیعِ الْاَ نْبِیاءِ وَجَمِیعِ الْمَلائِکَةِ،

وَبِالاسْمِ الَّذِی مَشی بِہِ الْخِضْرُ عَلَی قُلَلِ الْماءِ کَما مَشی بِہِ عَلَی جَدَدِ الْاَرْضِ، وَبِاسْمِکَ

الَّذِی فَلَقْتَ بِہِ الْبَحْرَ لِمُوسی وَأَغْرَقْتَ فِرْعَوْنَ وَقَوْمَہُ وَأَنْجَیْتَ بِہِ مُوسَی بْنَ عِمْرانَ وَمَنْ

مَعَہُ وَبِاسْمِکَ الَّذِی دَعاکَ بِہِ مُوسَی بْنُ عِمْرانَ مِنْ جانِبِ الطُّورِ الْاَیْمَنِ فَاسْتَجَبْتَ لَہُ

وَأَلْقَیْتَ عَلَیْہِ مَحَبَّةً مِنْکَ وَبِاسْمِکَ الَّذِی بِہِ أَحْیَا عِیسَی بْنُ مَرْیَمَ الْمَوْتی وَتَکَلَّمَ فِی الْمَھْدِ

صَبِیّاً، وَأَبْرَأَ الْاَکْمَہَ والْاَ بْرَصَ بِإِذْنِکَ وَبِاسْمِکَ الَّذِی دَعاکَ بِہِ حَمَلَةُ عَرْشِکَ وَجَبْرَائِیلُ

وَمِیکائِیلُ وَإِسْرافِیلُ وَحَبِیبُکَ مُحَمَّدٌ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ وَمَلائِکَتُکَ الْمُقَرَّبُونَ،وَأَنْبِیاؤُکَ

الْمُرْسَلُونَ، وَعِبادُکَ الصَّالِحُونَ مِنْ أَھْلِ السَّماواتِ وَالْاَرَضِینَ،وَبِاسْمِکَ الَّذِی دَعاکَ

بِہِ ذُو النُّونِ إِذْ ذَھَبَ مُغاضِباً فَظَنَّ أَنْ لَنْ تَقْدِرَ عَلَیْہِ فَنادی فِی الظُّلُماتِ أَنْ لاَ إِلہَ إِلاَّ أَ نْتَ

سُبْحانَکَ إِنِّی کُنْتُ مِنَ الظَّالِمِینَ، فَاسْتَجَبْتَ لَہُ وَنَجَّیْتَہُ مِنَ الْغَمِّ وَکَذَلِکَ تُنْجِی الْمُؤْمِنِینَ،

وَبِاسْمِکَ الْعَظِیمِ الَّذِی دَعاکَ بِہِ داوُدُ وَخَرَّ لَکَ ساجِداً فَغَفَرْتَ لَہُ ذَ نْبَہُ، وَبِاسْمِکَ

الَّذِی دَعَتْکَ بِہِ آسِیَةُ امْرَأَةُ فِرْعَوْنَ إِذْ قالَتْ رَبِّ ابْنِ لِی عِنْدَکَ بَیْتاً فِی الْجَنَّةِ وَنَجِّنِی مِنْ

فِرْعَوْنَ وَعَمَلِہِ وَنَجِّنِی مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِینَ، فَاسْتَجَبْتَ لَھا دُعائَھَا، وَبِاسْمِکَ الَّذِی دَعاکَ

بِہِ أَیُّوبُ إِذْ حَلَّ بِہِ الْبَلاءُ فَعافَیْتَہُ وَآتَیْتَہُ أَھْلَہُ وَمِثْلَھُمْ مَعَھُمْ رَحْمَةً مِنْ عِنْدِکَ وَذِکْری لِلْعابِدِینَ،

وَبِاسْمِکَ الَّذِی دَعاکَ بِہِ یَعْقُوبُ فَرَدَدْتَ عَلَیْہِ بَصَرَہُ وَقُرَّةَ عَیْنِہِ یُوسُفَ وَجَمَعْتَ شَمْلَہُ،

وَبِاسْمِکَ الَّذِی دَعاکَ بِہِ سُلَیْمانُ فَوَھَبْتَ لَہُ مُلْکاً لاَ یَنْبَغِی لاََِحَدٍ مِنْ بَعْدِھِ إِنَّکَ أَ نْتَ

الْوَہَّابُ،وَبِاسْمِکَ الَّذِی سَخَّرْتَ بِہِ الْبُراقَ لِمُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ وَسَلَّمَ إِذْ قالَ تَعالی 

سُبْحانَ الَّذِی أَسْری بِعَبْدِہِ لَیْلاً مِنَ الْمَسْجِدِ الْحَرامِ إِلَی الْمَسْجِدِ الْاَقْصی وَقَوْلُہُ سُبْحانَ

الَّذِی سَخَّرَ لَنا ھَذا وَما کُنَّا لَہُ مُقْرِنِینَ وَإِنَّا إِلی رَبِّنا لَمُنْقَلِبُونَ وَبِاسْمِکَ الَّذِی تَنَزَّلَ بِہِ جَبْرَائِیلُ

عَلَی مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ، وَبِاسْمِکَ الَّذِی دَعاکَ بِہِ آدَمُ فَغَفَرْتَ لَہُ ذَ نْبَہُ وَأَسْکَنْتَہُ

جَنَّتَکَ،وَأَسْأَ لُکَ بِحَقِّ الْقُرْآنِ الْعَظِیمِ وَبِحَقِّ مُحَمَّدٍ خاتَمِ النَّبِیِّینَ، وَبِحَقِّ إِبْراھِیمَ ، وَبِحَقِّ

فَصْلِکَ یَوْمَ الْقَضاءِ، وَبِحَقِّ الْمَوازِینِ إِذا نُصِبَتْ، وَالصُّحُفِ إِذا نُشِرَتْ، وَبِحَقِّ الْقَلَمِ وَ

مَا جَری، وَاللَّوْحِ وَمَا أَحْصی، وَبِحَقِّ الاسْمِ الَّذِی کَتَبْتَہُ عَلَی سُرادِقِ الْعَرْشِ قَبْلَ خَلْقِکَ

الْخَلْقَ وَالدُّنْیا وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ بِأَ لْفَیْ عامٍ، وَأَشْھَدُ أَنْ لاَ إِلہَ إِلاَّ اللهُ وَحْدَہُ لاَ شَرِیکَ لَہُ،

وَأَنَّ مُحَمَّداً عَبْدُہُ وَرَسُولُہُ، وَأَسْأَلُکَ بِاسْمِکَ الْمَخْزُونِ فِی خَزائِنِکَ الَّذِی اسْتَأْثَرْتَ بِہِ

فِی عِلْمِ الْغَیْبِ عِنْدَکَ لَمْ یَظْھَرْ عَلَیْہِ أَحَدٌ مِنْ خَلْقِکَ لاَ مَلَکٌ مُقَرَّبٌ وَلاَ نَبِیٌّ مُرْسَلٌ وَلاَ

عَبْدٌ مُصْطَفی وَأَسْأَلُکَ بِاسْمِکَ الَّذِی شَقَقْتَ بِہِ الْبِحارَ وَقامَتْ بِہِ الْجِبالُ وَاخْتَلَفَ بِہِ اللَّیْلُ

وَالنَّھارُ وَبِحَقِّ السَّبْعِ الْمَثانِی وَالْقُرْآنِ الْعَظِیمِ، وَبِحَقِّ الْکِرامِ الْکاتِبِینَ، وَبِحَقِّ طہ وَیسَ

وَکَھیعَصَ، وَحمَعَسَقَ، وَبِحَقِّ تَوْراةِ مُوسی، وَ إِنْجِیلِ عِیسی، وَزَبُورِ داوُدَ، وَفُرْقانِ مُحَمَّدٍ

صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ وَعَلَی جَمِیعِ الرُّسُلِ وَباھِیّاً شَراھِیّاً اَللّٰھُمَّ إِنِّی أَسْأَلُکَ بِحَقِّ تِلْکَ الْمُناجاةِ

الَّتِی کانَتْ بَیْنَکَ وَبَیْنَ مُوسَی بْنِ عِمْرانَ فَوْقَ جَبَلِ طُورِ سَیْناءَ وَأَسْأَلُکَ بِاسْمِکَ الَّذِی 

عَلَّمْتَہُ مَلَکَ الْمَوْتِ لِقَبْضِ الْاَرْواحِ، وَأَسْأَ لُکَ بِاسْمِکَ الَّذِی کُتِبَ عَلَی وَرَقِ الزَّیْتُونِ 

فَخَضَعتِ النِّیرانُ لِتِلْکَ الْوَرَقَةِ فَقُلْتَ یا نارُ کُونِی بَرْداً وَسَلاماً وَأَسْأَلُکَ بِاسْمِکَ الَّذِی 

کَتَبْتَہُ عَلَی سُرادِقِ الْمَجْدِ وَالْکَرامَةِ، یَا مَنْ لاَ یُخْفِیہِ سائِلٌ وَلاَ یَنْقُصُہُ نائِلٌ، یَا مَنْ بِہِ یُسْتَغاثُ

وَ إِلَیْہِ یُلْجَأُ، أَسْأَلُکَ بِمَعاقِدِ الْعِزِّ مِنْ عَرْشِکَ وَمُنْتَھَی الرَّحْمَةِ مِنْ کِتابِکَ، وَبِاسْمِکَ

الْاَعْظَمِ، وَجَدِّکَ الْاَعْلی وَکَلِماتِکَ التَّامَّاتِ الْعُلی اَللّٰھُمَّ رَبَّ الرِّیاحِ وَمَا ذَرَتْ وَالسَّماءِ وَمَا

أَظَلَّتْ وَالْاَرْضِ وَمَا أَقَلَّتْ وَالشَّیاطِینِ وَمَا أَضَلَّتْ، وَالْبِحارِ وَمَا جَرَتْ، وَبِحَقِّ کُلِّ حَقٍّ

ھُوَ عَلَیْکَ حَقٌّ وَبِحَقِّ الْمَلائِکَةِ الْمُقَرَّبِینَ وَالرَّوْحانِیِّینَ وَالْکَرُوبِیِّینَ وَالْمُسَبِّحِینَ لَکَ

بِاللَّیْلِ وَالنَّھارِ لاَ یَفْتُرُونَ، وَبِحَقِّ إِبْراھِیمَ خَلِیلِکَ، وَبِحَقِّ کُلِّ وَ لِیٍّ یُنادِیکَ بَیْنَ الصَّفا وَ

 الْمَرْوَةِ وَتَسْتَجِیبُ لَہُ دُعائَہُ، یَا مُجِیبُ أَسْأَلُکَ بِحَقِّ ھذِہِ الْاَسْماءِ وَبِھذِہِ الدَّعَواتِ أَنْ

تَغْفِرَ لَنٰا مَا قَدَّمْنا وَمَا أَخَّرْنٰا وَمَا أَسْرَرْنٰا وَمَا أَعْلَنَّا وَمَا أَبْدَیْنٰا وَمَا أَخْفَیْنٰا وَمَا أَ نْتَ أَعْلَمُ بِہِ مِنَّا

إِنَّکَ عَلَی کُلِّ شَیْءٍ قَدِیرٌ بِرَحْمَتِکَ یَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِینَ ۔ یَا حافِظَ کُلِّ غَرِیبٍ، یَا مُؤْ نِسَ

کُلِّ وَحِیدٍ، یَا قُوَّةَ کُلِّ ضَعِیفٍ یَا ناصِرَ کُلِّ مَظْلُومٍ، یَا رازِقَ کُلِّ مَحْرُومٍ، یَا مُؤْ نِسَ کُلِّ

مُسْتَوْحِشِ یَا صاحِبَ کُلِّ مُسافِرٍ، یَا عِمادَ کُلِّ حاضِرٍ، یَا غافِرَ کُلِّ ذَ نْبٍ وَخَطِیئَةٍ، یَا غِیاثَ

الْمُسْتَغِیثِینَ، یَا صَرِیخَ الْمُسْتَصْرِخِینَ، یَا کاشِفَ کَرْبِ الْمَکْرُوبِینَ، یَا فارِجَ ھَمِّ الْمَھْمُومِینَ،

یَا بَدِیعَ السَّمَاوَاتِ وَالْاَرَضِینَ، یَا مُنْتَہی غایَةِ الطَّالِبِینَ، یَا مُجِیبَ دَعْوَةِ الْمُضْطَرِّینَ، یَا أَرْحَمَ

الرَّاحِمِینَ، یَا رَبَّ الْعالَمِینَ، یَا دَیَّانَ یَوْمِ الدِّینِ، یَا أَجْوَدَ الْاَجْوَدِینَ، یَا أَکْرَمَ الْاَکْرَمِینَ، یَا

أَسْمَعَ السَّامِعِینَ، یَا أَبْصَرَ النَّاظِرِینَ، یَا أَ قْدَرَ الْقادِرِینَ، اغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُغَیِّرُ النِّعَمَ،

وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُورِثُ النَّدَمَ، وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُورِثُ السَّقَمَ، وَاغْفِرْ لِیَ

الذُّنُوبَ الَّتِی تَھْتِکُ الْعِصَمَ وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تَرُدُّ الدُّعاءَ وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی

تَحْبِسُ قَطْرَ السَّماءِ، وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُعَجِّلُ الْفَناءَ، وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تَجْلِبُ

الشَّقاءَ، وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تُظْلِمُ الْھَواءَ، وَاغْفِرْ لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی تَکْشِفُ الْغِطاءَ ، وَاغْفِرْ

لِیَ الذُّنُوبَ الَّتِی لاَ یَغْفِرُھا غَیْرُکَ یَا اللهُ، وَاحْمِلْ عَنِّی کُلَّ تَبِعَةٍ لاََِحَدٍ مِنْ خَلْقِکَ، وَاجْعَلْ لِی

مِنْ أَمْرِی فَرَجاً وَمَخْرَجاً وَیُسْراً وَأَنْزِلْ یَقِینَکَ فِی صَدْرِی، وَرَجائَکَ فِی قَلْبِی حَتَّی لاَ أَرْجُوَ

غَیْرَکَ اَللّٰھُمَّ احْفَظْنِی وَعافِنِی فِی مَقامِی وَاصْحَبْنِی فِی لَیْلِی وَنَہارِی، وَمِنْ بَیْنِ یَدَیَّ وَمِنْ

خَلْفِی وَعَنْ یَمِینِی وَعَنْ شِمالِی وَمِنْ فَوْقِی وَمِنْ تَحْتِی، وَیَسِّرْ لِیَ السَّبِیلَ، وَأَحْسِنْ لِیَ التَّیْسِیرَ،

وَلاَ تَخْذُلْنِی فِی الْعَسِیرِ وَاھْدِنِی یَا خَیْرَ دلِیلٍ، وَلاَ تَکِلْنِی إِلی نَفْسِی فِی الْاُمُورِ وَلَقِّنِی کُلَّ

سُرُورٍ وَاقْلِبْنِی إِلی أَھْلِی بِالْفَلاحِ وَالنَّجاحِ مَحْبُوراً فِی الْعاجِلِ وَالْآجِلِ إِنَّکَ عَلَی کُلِّ شَیْءٍ

قَدِیرٌ، وَارْزُقْنِی مِنْ فَضْلِکَ، وَأَوْسِعْ عَلَیَّ مِنْ طَیِّباتِ رِزْقِکَ، وَاسْتَعْمِلْنِی فِی طاعَتِکَ،

وَأَجِرْنِی مِنْ عَذابِکَ وَنارِکَ، وَاقْلِبْنِی إِذا تَوَفَّیْتَنِی إِلی جَنَّتِکَ بِرَحْمَتِکَ ۔ اَللّٰھُمَّ إِنِّی 

أَعُوذُ بِکَ مِنْ زَوالِ نِعْمَتِکَ، وَمِنْ تَحْوِیلِ عافِیَتِکَ وَمِنْ حُلُولِ نَقِمَتِکَ وَمِنْ نُزُولِ

عَذابِکَ وَأَعُوذُ بِکَ مِنْ جَھْدِ الْبَلاءِ وَدَرَکِ الشَّقاءِ وَمِنْ سُوءِ الْقَضاءِ، وَشَماتَةِ الْاَعْداءِ،

وَمِنْ شَرِّ مَا یَنْزِلُ مِنَ السَّماءِ، وَمِنْ شَرِّ مَا فِی الْکِتابِ الْمُنْزَلِ ۔ اَللّٰھُمَّ لاَ تَجْعَلْنِی مِنَ الْاَشْرارِ،

وَلاَ مِنْ أَصْحابِ النَّارِ، وَلاَ تَحْرِمْنِی صُحْبَةَ الْاَخْیارِ، وَأَحْیِنِی حَیَاةً طَیِّبَةً، وَتَوَفَّنِی وَفاةً طَیِّبَةً

تُلْحِقُنِی بِالْاَ بْرارِ، وَارْزُقْنِی مُرافَقَةَ الْاَنْبِیاءِ فِی مَقْعَدِ صِدْقٍ عِنْدَ مَلِیکٍ مُقْتَدِرٍ ۔ اَللّٰھُمَّ لَکَ 

الْحَمْدُ عَلَی حُسْنِ بَلائِکَ وَصُنْعِکَ، وَلَکَ الْحَمْدُ عَلَی الْاِسْلامِ وَاتِّباعِ السُّنَّةِ، یَارَبِّ

کَما ھَدَیْتَھُمْ لِدِینِکَ وَعَلَّمْتَھُمْ کِتابَکَ فَاھْدِنا وَعَلِّمْنا، وَلَکَ الْحَمْدُ عَلَی حُسْنِ بَلائِکَ

وَصُنْعِکَ عِنْدِی خاصَّةً کَما خَلَقْتَنِی فَأَحْسَنْتَ خَلْقِی وَعَلَّمْتَنِی فَأَحْسَنْتَ تَعْلِیمِی وَھَدَیْتَنِی 

فَأَحْسَنْتَ ھِدایَتِی، فَلَکَ الْحَمْدُ عَلَی إِنْعامِکَ عَلَیَّ قَدِیماً وَحَدِیثاً، فَکَمْ مِنْ کَرْبٍ یَا سَیِّدِی

قَدْ فَرَّجْتَہُ وَکَمْ مِنْ غَمٍّ یَا سَیِّدِی قَدْ نَفَّسْتَہُ وَکَمْ مِنْ ھَمٍّ یَا سَیِّدِی قَدْ کَشَفْتَہُ وَکَمْ مِنْ بَلاءٍ یَا

سَیِّدِی قَدْ صَرَفْتَہُ وَکَمْ مِنْ عَیْبٍ یَا سَیِّدِی قَدْ سَتَرْتَہُ فَلَکَ الْحَمْدُ عَلَی کُلِّ حالٍ فِی کُلِّ

مَثْویً وَزَمَانٍ وَمُنْقَلَبٍ وَمَقامٍ وَعَلَی ھذِہِ الْحالِ وَکُلِّ حالٍ ۔ اَللّٰھُمَّ اجْعَلْنِی مِنْ أَفْضَلِ عِبادِکَ

نَصِیباً فِی ھذَا الْیَوْمِ مِنْ خَیْرٍ تَقْسِمُہُ أَوْ ضُرٍّ تَکْشِفُہُ، أَوْ سُوءٍ تَصْرِفُہُ أَوْ بَلاءٍ تَدْفَعُہُ أَوْ خَیْرٍ

تَسُوقُہُ، أَوْ رَحْمَةٍ تَنْشُرُھا، أَوْ عافِیَةٍ تُلْبِسُھا فَإِنَّکَ عَلَی کُلِّ شَیْءٍ قَدِیرٌ وَبِیَدِکَ خَزائِنُ

السَّماواتِ وَالْاَرْضِ وَأَنْتَ الْواحِدُ الْکَرِیمُ الْمُعْطِی الَّذِی لاَ یُرَدُّ سائِلُہُ، وَلاَ یُخَیَّبُ آمِلُہُ،

وَلاَ یَنْقُصُ نائِلُہُ، وَلاَ یَنْفَدُ مَا عِنْدَہُ بَلْ یَزْدادُ کَثْرَةً وَطِیباً وَعَطاءً وَجُوداً، وَارْزُقْنِی مِنْ خَزٰائِنِکَ

الَّتِی لاَ تَفْنی، وَمِنْ رَحْمَتِکَ الْواسِعَةِ إِنَّ عَطائَکَ لَمْ یَکُنْ مَحْظُوراً وَأَنْتَ عَلَی کُلِّ شَیْءٍ

قَدِیرٌ بِرَحْمَتِکَ یَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِینَ ۔

दुआ -2, अल्लाहुम्मा मन ता'बा (जुमेरात को भी पढ़ी जानी चाहिए) اَللَّهُمَّ مَنْ تَعَبَّا

 

शेख तुसी, सैय्यद इब्ने तावूस, अल'कफ़'अमी और सैय्यद इब्न बाक़ी से रिवायत है के यह दुआ जुमा के दिन, जुमेरात की रात को, और अरफ़ा के दिन और रात दोनों में (ज़िलहिज्ज की नवीं तारीख) पढ़ने कि बहुत फ़ज़ीलत है! शेख अल तुसी कि किताब "अल-मिस्बाह" में यह दुआ इस तरह लिखी गयी है :                                                                                                                               Mp3   |   PPT     | Pdf

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

अल्लाहूम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन  आले मोहम्मद.

खुदाया जो भी अता व बख्शीश के लिए मख्लूक़ की तरफ जाने को आमादा और मुस्ता'अद हो इस की उम्मीद इसी की दाद वहश पर लगी 

होती है तो ऐ मेरे परवरदिगार मेरी आमादगी व व तैय्यारी तेरी अफ़ू व दर'गुज़र तेरी बख्शीश और तेरे इनाम के हासिल करने की उम्मीद पर है 

बस मेरी दुआ को मायूस न कर, ऐ वो ज़ात जिस से कोई साएल मायूस नहीं होता किसी का हासिल करना इसकी अता को कम नहीं कर सकता है बस मैं ने जो सालेह अमल 

किये हैं इसके भरोसे पर तेरी जनाब में नहीं आया और न ही मख्लूक़ के दीं की उम्मीद रखता हूँ और मैं तो अपनी बुराइयों और ज़ुल्म का इक़रार करते हुए तेरी बारगाह में 

हाज़िर हुआ हूँ, और ऐतराफ़ करता हूँ के मैं कोई हुज्जत और उज़र नहीं रखता हूँ मैं तेरे हुज़ूर अफ़ू-ए-अज़ीम कि उम्मीद लेकर आया हूँ जिस से तू ख़ताकारों 

को माफ़ फरमाता है के इनके बड़े गुनाहों का तसलसुल तुझे इन पर रहमत करने से बाज़ नहीं रख सकता तो ऐ वो ज़ात जिसकी रहमत आम और अफ़ू व बख्शीश अज़ीम 

है ऐ ख़ुदाए अज़ीम, ऐ ख़ुदाए अज़ीम, ऐ ख़ुदाए अज़ीम तेरा ग़ज़ब तेरे ही हिल्म से पलट सकता है और तेरी नाराज़गी तेरे ही हुज़ूर नाला व फ़रयाद से ही दूर 

हो सकती है तो ऐ मेरे ख़ुदा मुझे अपने क़ुदरत से कशाइश अता कर जिस से तू उजड़े हुए शहरों को आबाद करता है मुझे ग़मगीनी में 

हलाक न कर यहाँ तक के तू मेरी दुआ को क़बूल कर ले और दुआ की क़बूलियत से मुझे आगाह फ़रमा दे मुझे आखिर दम तक सेहर व आफ़ियत से 

रख और मेरे दुश्मन को मेरी बुरी हालत पर खुश न होने दे और इसे मुझ पर तसल्लुत और इख़तियार न दे

ऐ परवरदिगार अगर तू मुझे गिरा दे तो कौन म्मुझे उठाने वाला है और अगर तू मुझे बुल्लंद करे तो कौन मुझे पस्त कर सकता है 

अगर तू मुझे हलाक करे तो कौन तेरे बन्दे से मुताल्लिक़ तुझे कुछ कह सकता है इस के मुताल्लिक़ सवाल कर सकता है बेशक मैं जानता हूँ 

के तेरे फैसले में ज़ुल्म नहीं और तीर अज़ाब में जल्दी नहीं और बेशक जल्दी वो करता है जिसे वक़्त निकल जाने का डर हो और ज़ुल्म वो करता है जो कमज़ोर हो और 

ऐ मेरे माबूद तू इन बातों से बहुत बुलंद और बहुत बड़ा है ऐ माबूद! मैं तेरी पनाह लेता हूँ तू मुझे पनाह दे तेरे नज़दीक आता हूँ मुझे नज़दीक 

कर ले तुझ से रोज़ी मांगता हूँ मुझे रोज़ी दे, तुझ पर भरोसा करता हूँ मेरी किफ़ालत फ़रमा, अपने दुश्मन के ख़िलाफ तुझ से मदद चाहता हूँ और अ'आनत का तालिब 

हूँ मेरी मदद फ़रमा और मेरे माबूद तुझ से बख्शीश का तालिब हूँ मुझे बख्श दे, आमीन, आमीन    

 

اَللَّهُمَّ مَنْ تَعَبَّا وَتَهَيَّا

وَاعَدَّ وَٱسْتَعَدَّ

لِوِفَادَةٍ إِلَىٰ مَخْلُوقٍ

رَجَاءَ رِفْدِهِ

وَطَلَبَ نَائِلِهِ وَجَائِزَتِهِ

فَإلَيْكَ يَا رَبِّ تَعْبِيَتِي وَٱسْتِعْدَادِي

رَجَاءَ عَفْوِكَ

وَطَلَبَ نَائِلِكَ وَجَائِزَتِكَ

فَلاَ تُخَيِّبْ دُعَائي

يَا مَنْ لاَ يَخِيبُ عَلَيْهِ سَائِلٌ

وَلاَ يَنْقُصُهُ نَائِلٌ

فَإنّي لَمْ آتِكَ ثِقَةً بِعَمَلٍ صَالِحٍ عَمِلْتُهُ

وَلاَ لِوِفَادَةِ مَخْلُوقٍ رَجَوْتُهُ

اتَيْتُكَ مُقِرّاً عَلَىٰ نَفْسِي بِٱلإسَاءَةِ وَٱلظُّلْمِ

مُعْتَرِفاً بِانْ لاَ حُجَّةَ لِي وَلاَ عُذْرَ

اتَيْتُكَ ارْجُو عَظِيمَ عَفْوِكَ

ٱلَّذِي عَفَوْتَ بِهِ عَنِ ٱلْخَاطِئينَ

فَلَمْ يَمْنَعْكَ طُولُ عُكُوفِهِمْ عَلِي عَظِيمِ ٱلْجُرْمِ

انْ عُدْتَ عَلَيْهِمْ بِٱلرَّحْمَةِ

فَيَا مَنْ رَحْمَتُهُ وَاسِعَةٌ

وَعَفْوُهُ عَظيمٌ

يَا عَظيـمُ يَا عَظيـمُ يَا عَظيـمُ

لاَ يَرُدُّ غَضَبَكَ إِلاَّ حِلْمُكَ

وَلاَ يُنْجِي مِنْ سَخَطِكَ إِلاَّ ٱلتَّضَرُّعُ إِلَيْكَ

فَهَبْ لِي يَا إِلٰهِي فَرَجاً

بِٱلْقُدْرَةِ ٱلَّتِي تُحْيِي بِهَا مَيْتَ ٱلْبِلاَدِ

وَلاَ تُهْلِكْنِي غَمّاً حَتَّىٰ تَسْتَجِيبَ لِي

وَتُعَرِّفَنِي ٱلإِجَابَةَ فِي دُعَائِي

وَاذِقْنِي طَعْمَ ٱلْعَافِيَةِ إلَىٰ مُنَتَهَىٰ اجَلِي

وَلاَ تُشْمِتْ بِي عَدُوِّي

وَلاَ تُسَلِّطْهُ عَلَيَّ

وَلاَ تُمَكِّنْهُ مِنْ عُنُقِي

اَللَّهُمَّ إِنْ وَضَعْتَنِي فَمَنْ ذَا ٱلَّذِي يَرْفَعُنِي

وَإِنْ رَفَعْتَنِي فَمَنْ ذَا ٱلَّذِي يَضَعُنِي

وَإِنْ اهْلَكْتَنِي فَمَنْ ذَا ٱلَّذِي يَعْرِضُ لَكَ فِي عَبْدِكَ

اوْ يَسْالُكَ عَنْ امْرِهِ

وَقَدْ عَلِمْتُ انَّهُ لَيْسَ فِي حُكْمِكَ ظُلْمٌ

وَلاَ فِي نَقَمَتِكَ عَجَلَةٌ

وَإِنَّمَا يَعْجَلُ مَنْ يَخَافُ ٱلْفَوْتَ

وَإِنَّمَا يَحْتَاجُ إِلَىٰ ٱلظُّلْمِ ٱلضَّعِيفُ

وَقَدْ تَعَالَيْتَ يَا إِلٰهِي عَنْ ذٰلِكَ  عُلُوّاً كَبِيراً

اَللَّهُمَّ إِنِّي اعُوذُ بِكَ فَاعِذْنِي

وَاسْتَجيرُ بِكَ فَاجِرْنِي

وَاسْتَرْزِقُكَ فَٱرْزُقْنِي

وَاتَوَكَّلُ عَلَيْكَ فَٱكْفِنِي

وَاستَنْصِرُكَ عَلَىٰ عَدُوِّي فَٱنْصُرْنِي

وَاسْتَعينُ بِكَ فَاعِنِّي

وَاسْتَغْفِرُكَ يَا إِلٰهِي فَٱغْفِرْ لِي

آمِينَ آمِينَ آمِينَ

Dua No. 3    Recite the following '4' Tasbihaat as many times as possible:    Pdf   Mp3

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

अल्लाहूम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन  आले मोहम्मद.

   

سُبْحَانَ ٱللَّهِ قَبْلَ كُلِّ احَدٍ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ بَعْدَ كُلِّ احَدٍ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ مَعَ كُلِّ احَدٍ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ يَبْقَىٰ رَبُّنَا ويَفْنَىٰ كُلُّ احَدٍ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ تَسْبِيحاً يَفْضُلُ تَسْبِيحَ ٱلْمُسَبِّحِينَ

فَضْلاًَ كَثِيراً قَبْلَ كُلِّ احَدٍ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ تَسْبِيحاً يَفْضُلُ تَسْبِيحَ ٱلْمُسَبِّحِينَ

فَضْلاًَ كَثيراً بَعْدَ كُلِّ احَدٍ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ تَسْبِيحاً يَفْضُلُ تَسْبِيحَ ٱلْمُسَبِّحِينَ

فَضْلاًَ كَثيراً مَعَ كُلِّ احَدٍ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ تَسْبِيحاً يَفْضُلُ تَسْبِيحَ ٱلْمُسَبِّحِينَ

فَضْلاً كَثِيراً لِرَبِّنَا ٱلْبَاقِي وَيَفْنَىٰ كُلُّ احَدٍ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ تَسْبِيحاً لاَ يُحْصَىٰ وَلاَ يُدْرَىٰ

وَلاَ يُنْسَىٰ وَلاَ يَبْلَىٰ

وَلاَ يَفْنَىٰ وَلَيْسَ لَهُ مُنْتَهَىٰ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ تَسْبِيحاً يَدُومُ بِدَوَامِهِ

وَيَبْقَىٰ بِبَقَائِهِ فِي سِنِيِّ ٱلْعَالَمِينَ

وَشُهوُرِ ٱلدُّهوُرِ وَايَّامِ ٱلدُّنْيَا

وَسَاعَاتِ ٱللَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ

وَسُبْحَانَ ٱللَّهِ ابَدَ ٱلابَدِ وَمَعَ ٱلابَدِ

مِمَّا لاَ يُحْصِيهِ ٱلْعَدَدُ

وَلاَ يُفْنِيهِ ٱلامَدُ

وَلاَ يَقْطَعُهُ ٱلابَدُ

وَتَبَارَكَ ٱللَّهُ احْسَنُ ٱلْخَالِقِينَ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ قَبْلَ كُلِّ احَدٍ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ بَعْدَ كُلِّ احَدٍ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ مَعَ كُلِّ احَدٍ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ يَبْقَىٰ رَبُّنَا ويَفْنَىٰ كُلُّ احَدٍ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ حَمْداً يَفْضُلُ حَمْدَ ٱلْحَامِدِينَ

فَضْلاًَ كَثِيراً قَبْلَ كُلِّ احَدٍ

وَالْحَمْدُ لِلَّهِ حَمْداً يَفْضُلُ حَمْدَ ٱلْحَامِدِينَ

فَضْلاً كَثيراً بَعْدَ كُلِّ احَدٍ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ حَمْداً يَفْضُلُ حَمْدَ الْحَامِدِينَ

فَضْلاً كَثيراً مَعَ كُلِّ احَدٍ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ حَمْداً يَفْضُلُ حَمْدَ ٱلْحَامِدِينَ

فَضْلاً كَثيراً لِرَبِّنَا ٱلْبَاقِي وَيَفْنَىٰ كُلُّ احَدٍ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ حَمْداً لاَ يُحْصَىٰ وَلاَ يُدْرَىٰ

وَلاَ يُنْسَىٰ وَلاَ يَبْلَىٰ

وَلاَ يَفْنَىٰ وَلَيْسَ لَهُ مُنْتَهَىٰ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ حَمْداً يَدُومُ بِدَوَامِهِ

وَيَبْقَىٰ بِبَقَائِهِ فِي سِنِيِّ ٱلْعَالَمِينَ

وَشُهوُرِ ٱلدُّهوُرِ وَايَّامِ ٱلدُّنْيَا

وَسَاعَاتِ ٱللَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ

وَٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ابَدَ ٱلابَدِ وَمَعَ ٱلابَدِ

مِمَّا لاَ يُحْصِيهِ ٱلْعَدَدُ

وَلاَ يُفْنِيهِ ٱلامَدُ

وَلاَ يَقْطَعُهُ ٱلابَدُ

وَتَبَارَكَ ٱللَّهُ احْسَنُ ٱلْخَالِقِينَ

لاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ قَبْلَ كُلِّ احَدٍ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ بَعْدَ كُلِّ احَدٍ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ مَعَ كُلِّ احَدٍ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ يَبْقَىٰ رَبُّنَا ويَفْنَىٰ كُلُّ احَدٍ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ تَهْلِيلاً يَفْضُلُ تَهْلِيلَ ٱلْمُهَلِّلِينَ

فَضْلاً كَثِيراً قَبْلَ كُلِّ احَدٍ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ تَهْلِيلاً يَفْضُلُ تَهْلِيلَ ٱلْمُهَلِّلِينَ

فَضْلاً كَثيراً بَعْدَ كُلِّ احَدٍ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ تَهْلِيلاً يَفْضُلُ تَهْلِيلَ ٱلْمُهَلِّلِينَ

فَضْلاً كَثيراً مَعَ كُلِّ احَدٍ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ تَهْلِيلاً يَفْضُلُ تَهْلِيلَ ٱلْمُهَلِّلِينَ

فَضْلاًَ كَثيراً لِرَبِّنَا ٱلْبَاقِي وَيَفْنَىٰ كُلُّ احَدٍ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ تَهْلِيلاً لاَ يُحْصَىٰ وَلاَ يُدْرَىٰ

وَلاَ يُنْسَىٰ وَلاَ يَبْلَىٰ

وَلاَ يَفْنَىٰ وَلَيْسَ لَهُ مُنْتَهَىٰ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ اللَّهُ تَهْلِيلاً يَدُومُ بِدَوَامِهِ

وَيَبْقَىٰ بِبَقَائِهِ فِي سِنِيِّ ٱلْعَالَمِينَ

وَشُهوُرِ ٱلدُّهوُرِ وَايَّامِ ٱلدُّنْيَا

وَسَاعَاتِ ٱللَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ

وَلاَ إِلٰهَ إِلاَّ ٱللَّهُ ابَدَ ٱلابَدِ وَمَعَ ٱلابَدِ

مِمَّا لاَ يُحْصِيهِ ٱلْعَدَدُ

وَلاَ يُفْنِيهِ ٱلامَدُ

وَلاَ يَقْطَعُهُ ٱلابَدُ

وَتَبَارَكَ ٱللَّهُ احْسَنُ ٱلْخَالِقِينَ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ قَبْلَ كُلِّ احَدٍ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ بَعْدَ كُلِّ احَدٍ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ مَعَ كُلِّ احَدٍ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ يَبْقَىٰ رَبُّنَا ويَفْنَىٰ كُلُّ احَدٍ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ تَكْبِيراً يَفْضُلُ تَكْبِيرَ ٱلْمُكَبِّرِينَ

فَضْلاً كَثِيراً قَبْلَ كُلِّ احَدٍ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ تَكْبِيراً يَفْضُلُ تَكْبِيرَ ٱلْمُكَبِّرِينَ

فَضْلاً كَثيراً بَعْدَ كُلِّ احَدٍ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ تَكْبِيراً يَفْضُلُ تَكْبِيرَ ٱلْمُكَبِّرِينَ

فَضْلاً كَثيراً مَعَ كُلِّ احَدٍ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ تَكْبِيراً يَفْضُلُ تَكْبِيرَ ٱلْمُكَبِّرِينَ

فَضْلاً كَثيراً لِرَبِّنَا ٱلْبَاقِي وَيَفْنَىٰ كُلُّ احَدٍ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ تَكْبِيراً لاَ يُحْصَىٰ وَلاَ يُدْرَىٰ

وَلاَ يُنْسَىٰ وَلاَ يَبْلَىٰ

وَلاَ يَفْنَىٰ وَلَيْسَ لَهُ مُنْتَهَىٰ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ تَكْبِيراً يَدُومُ بِدَوَامِهِ

وَيَبْقَىٰ بِبَقَائِهِ فِي سِنِيِّ ٱلْعَالَمِينَ

وَشُهوُرِ ٱلدُّهوُرِ وَايَّامِ ٱلدُّنْيَا

وَسَاعَاتِ ٱللَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ

وَٱللَّهُ اكْبَرُ ابَدَ ٱلابَدِ وَمَعَ ٱلابَدِ

مِمَّا لاَ يُحْصِيهِ ٱلْعَدَدُ

وَلاَ يُفْنِيهِ ٱلامَدُ

وَلاَ يَقْطَعُهُ ٱلابَدُ

وَتَبَارَكَ ٱللَّهُ احْسَنُ ٱلْخَالِقِينَ

 

अल्ला हुम्मा सल्ले अला मुहम्मद व आले मुहम्मद

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