ज़्यारत हज़रत माम अली नक़ी अलैहिस्सलाम﴿

अपनी किताब मिस्बाहुल ज़ायर में सैय्यद इब्ने ताऊस ने इस ज़्यारत का ज़िक्र ऐसे किया है :

 

जब आप ईमाम (अ:स) की ज़्यारत के लिए सामरा पहुंचे तो सबसे पहले ज़्यारत की नियत से ग़ुस्ल करें, फिर अपने सबसे साफ़ कपड़े पहने और उसके बाद इज़्ज़त व एहतराम के साथ रौज़ा ए मुबारक की तरफ़ जाएँ! जब आप रौज़ा के दरवाज़े पर पहुँचे तो दाखिल होने की इजाज़त के लिए यह पढ़ें :

इज़्ने दुखूल 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ या नबी अल्लाह ?

 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  या अमीरुल मोमिनीन ?

 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  या फातिमा ज़हरा, 

 

जो आलमीन की औरतों की सरदार हैं ?

 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  मेरे मौला हसन इब्ने अली?
 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  मेरे मौला हुसैन इब्ने अली?
 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  मेरे मौला अली इबनिल हुसैन ?
 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  मेरे मौला मोहम्मद इबने अली?

 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  मेरे मौला जाफ़र इब्ने मोहम्मद?
 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  मेरे मौला मूसा इब्ने जाफ़र?

 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  मेरे मौला अबुल हसन अली इब्ने मोहम्मद?

 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  मेरे मौला  अबू मुहम्मद अल हसन इब्ने अली?
 

क्या मैं दाखिल हो सकता हूँ  ऐ अल्लाह के फ़रिश्तों 
 

जिसे इस मुक़द्दस और पाक हरम के इंतेज़ाम के लिए लगाया गया है!

अद्खुलो या नबी अल्लाह 

 

अद्खुलो या अमीरुल मोमिनीन 

 

अद्खुलो या फ़ातिमा तुज़ ज़हरा 

 

सैय्यदता निसाइल आलामीन 

 

अद्खुलो या मौलाया अल-हसन इबने अलीयुन  

 

अद्खुलो या मौलाया अल-हुसैन इब्ने अलियुन  

 

अद्खुलो या मौलाया अली इबनिल हुसैन 
 

अद्खुलो या मौलाया मोहम्मद इबने अलियिन

 

अद्खुलो या मौलाया जाफ़र इबने मोहम्मद 

 

अद्खुलो या मौलाया मूसा इबने जाफ़रीन 

 

अद्खुलो या मौलाया अलियुन इबने मूसा 

 

अद्खुलो या मौलाया मोहम्मद इबने अलीयुन 

 

अद्खुलो या मौलाया या अबुल हसन अलीयुन इबने मोहम्मद 

 

अद्खुलो या मौलाया या अबा मोहम्मद अल-हसन इबने अलीयिन 

 

अद्खुलो या मलाईकतो-ल्लाह

 

अल-मुवक्किलीना बी-हाज़ल हरमिश शरीफ़           

 

 

اادْخُلُ يَا نَبِيَّ ٱللَّهِ

اادْخُلُ يَا امِيرَ ٱلْمُؤْمِنِينَ

اادْخُلُ يَا فَاطِمَةُ ٱلزَّهْرَاءُ

سَيِّدَةَ نِسَاءِ ٱلْعَالَمِينَ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ ٱلْحَسَنُ بْنَ عَلِيٍّ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ ٱلْحُسَيْنُ بْنَ عَلِيٍّ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ عَلِيُّ بْنَ ٱلْحُسَيْنِ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ مُحَمَّدُ بْنَ عَلِيٍّ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ جَعْفَرُ بْنَ مُحَمَّدٍ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ مُوسَىٰ بْنَ جَعْفَرٍ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ عَلِيُّ بْنَ مُوسَىٰ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ مُحَمَّدُ بْنَ عَلِيٍّ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ يَا ابَا ٱلْحَسَنِ عَلِيُّ بْنَ مُحَمَّدٍ

اادْخُلُ يَا مَوْلاَيَ يَا ابَا مُحَمَّدٍ ٱلْحَسَنُ بْنَ عَلِيٍّ

اادْخُلُ يَا مَلاَئِكَةَ ٱللَّهِ

ٱلْمُوَكَّلِينَ بِهٰذَا ٱلْحَرَمِ ٱلشَّرِيفِ

इसके बाद आप रौज़ा ए मुक़ददस में पहले दाहिना पैर रख कर दाख़िल हों! जब आप ईमाम अबुल हसन अल हादी (अ:स) की ज़रीह पर पहुंचे जहाँ आपका चेहरा ज़रीह की तरफ हो और पीठ क़िब्ले की तरफ, तब 100 मर्तबा पढ़ें :

अल्लाहो अकबर 

इसके बाद ईमाम (अ:स) की यह ज़्यारत पढ़ें :

सलाम हो आप पर अबुल हसन

 

ऐ हज़रत अली इब्ने मोहम्मद,

 

ऐ पाकीज़ा हिदायत याफ़्ता,

 

ऐ नूरी वसी और ख़ुदा की रहमत,

 

और इसकी बरकतें हों,

 

सलाम हो आप पर ऐ खुदा के बरगुज़ीदा,

 

सलाम हो आप पर ऐ ख़ुदा के राज़, 

 

सलाम हो आप पर ऐ ख़ुदा की मज़बूत रस्सी, 

 

सलाम हो आप पर ऐ ख़ुदा  की आल, 

 

सलाम हो आप पर ऐ ख़ुदा की बेहतरीन मख़लूक़, 

 

सलाम हो आप पर ऐ खुदा के इन्तेख़ाब किये हुए, 

 

सलाम हो आप पर ऐ खुदा के अमीन, 

 

सलाम हो आप पर ऐ खुदा के हक़, 

 

सलाम हो आप पर ऐ खुदा के प्यारे, 

 

सलाम हो आप पर ऐ नूरों के नूर, 

 

सलाम हो आप पर ऐ नेकोकारों की ज़ीनत, 

 

सलाम हो आप पर ऐ अच्छों की औलाद, 

 

सलाम हो आप पर ऐ पाकीज़ा लोगों की असल, 

 

सलाम हो आप पर ऐ रहमान की हुज्जत, 

 

सलाम हो आप पर ऐ ईमान के सतून,

 

सलाम हो आप पर ऐ मोमिनों के मौला, 

 

सलाम हो आप पर ऐ सालेहीन के आक़ा, 

 

सलाम हो आप पर ऐ तक़वा के साथी, 

 

सलाम हो आप पर ऐ दीन के सतून, 

 

सलाम हो आप पर ऐ फ़र्ज़न्द ख़ातिमूल अम्बिया के, 

 

सलाम हो आप पर ऐ बेटे सरदार ए औसिया के, 

 

सलाम हो आप पर ऐ फ़र्ज़न्द फ़ातिमा ज़हरा के,

 

जो तमाम आलमों की औरतों की सरदार हैं,

 

सलाम हो आप पर ऐ वफ़ा करने वाले अमीन, 

 

सलाम हो आप पर ऐ ख़ुदा की पसंदीदा निशानी, 

 

सलाम हो आप पर ऐ ज़ाहिद व मुत्तक़ी, 

 

सलाम हो आप पर ऐ सारे आलम पर खुदा की हुज्जत, 

 

सलाम हो आप पर ऐ क़ुरआन की तरह वाले, 

 

सलाम हो आप पर ऐ हलाल को हराम से अलग करने वाले, 

 

सलाम हो आप पर ऐ पाक नसीहत करने वाले,

 

सलाम हो आप पर ऐ ख़ुदा के दिखाए रास्ते, 

 

सलाम हो आप पर ऐ हिदायत के रौशन सितारे,

 

मैं गवाही देता हूँ ऐ मेरे आक़ा ऐ हज़रत अबुल हसन (अ:स)

 

की आप बेशक ख़ुदा की मख़लूक़ात पर इसकी हुज्जत हैं,

 

और तमाम आलम में इसके ख़लीफ़ा हैं

 

और इसकी ममलेकत में इसके अमीन हैं,

 

और इसके गवाह हैं इसके बन्दों पर,

 

और मैं गवाह देता हूँ की बेशक आप

 

कलमा ए तक़वा हैं,

 

हिदायत के दरवाज़ा हैं,

 

मज़बूत घेरा हैं, और

 

हुज्जत ए ख़ुदा हैं

 

अहले ज़मीन पर

 

और ज़मीन के नीचे रहने वालों पर, 

 

और मैं गवाह देता हूँ की आप

 

गुनाहों से पाक और सारी बुराइओं से बरी हैं,

 

ख़ुदा की बुज़ुर्गी के साथ अता किये गए हैं,

 

खुदा की दलील के साथ और दिए गए हैं

 

ख़ुदा के कलाम और वो रुक्न हैं

 

जिसकी तरफ़ पनाह लेते हैं

 

और जिस से शहर आबाद रहते है

 

और मैं गवाही देता हूँ ऐ मेरे मौला की

 

मैं आपका और आपके आबाओ कराम का,

 

और आपके फ़रज़न्दों पर यक़ीन रखता हूँ

 

और आपका ताबे हूँ अपनी ज़ात में

 

और दीन के अहकाम में

 

और अपने अमल में

 

और अपनी बाज़्गुज़श्त और क़याम में

 

और मैं दोस्त हूँ उसका जो आपका दोस्त है

 

और दुश्मन हूँ  उसका जो आपका दुश्मन है,

 

ईमान रखता हूँ

 

आपकी बातिनी मन्ज़ेलत

 

और ज़ाहिरी मर्तबा

 

और आपके अव्वल पर

 

और आपके आख़िर पर,,

 

मेरे माँ बाप आप पर क़ुर्बान हों

 

और आप पर सलाम

 

और ख़ुदा की रहमत

 

और इसकी बरकतें हों 


 

 

 

 

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا ابَا ٱلْحَسَنِ

عَلِيُّ بْنَ مُحَمَّدٍ

ٱلزَّكِيُّ ٱلرَّاشِدُ

ٱلنُّورُ ٱلثَّاقِبُ

وَرَحْمَةُ ٱللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا صَفِيَّ ٱللَّهِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا سِرَّ ٱللَّهِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حَبْلَ ٱللَّهِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا آلَ ٱللَّهِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا خِيَرةَ ٱللَّهِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا صَفْوَةَ ٱللَّهِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا امِينَ ٱللَّهِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حَقَّ ٱللَّهِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حَبِيبَ ٱللَّهِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا نُورَ ٱلانْوَارِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا زَيْنَ ٱلابْرَارِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا سَلِيلَ ٱلاخْيَارِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا عُنْصُرَ ٱلاطْهَارِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حُجَّةَ ٱلرَّحْمٰنِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا رُكْنَ ٱلإِيـمَانِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا مَوْلَىٰ ٱلْمُؤْمِنِينَ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا وَلِيَّ ٱلصَّالِحِينَ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا عَلَمَ ٱلْهُدَىٰ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا حَلِيفَ ٱلتُّقَىٰ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا عَمُودَ ٱلدِّينِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا بْنَ خَاتَمِ ٱلنَّبِيِّينَ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا بْنَ سَيِّدِ ٱلْوَصِيِّينَ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ يَا بْنَ فَاطِمَةَ ٱلزَّهْرَاءِ

سَيِّدَةِ نِسَاءِ ٱلْعَالَمِينَ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلامِينُ ٱلْوَفِيُّ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلْعَلَمُ ٱلرَّضِيُّ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلزَّاهِدُ ٱلتَّقِيُّ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلْحُجَّةُ عَلَىٰ ٱلْخَلْقِ اجْمَعِينَ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلتَّالِي لِلْقُرْآنِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلْمُبَيِّنُ لِلْحَلاَلِ مِنَ ٱلْحَرَامِ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلْوَلِيُّ ٱلنَّاصِحُ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلطَّرِيقُ ٱلْوَاضِحُ

اَلسَّلاَمُ عَلَيْكَ ايُّهَا ٱلنَّجْمُ ٱللاَّئِحُ

اشْهَدُ يَا مَوْلاَيَ يَا ابَا ٱلْحَسَنِ

انَّكَ حُجَّةُ ٱللَّهِ عَلَىٰ خَلْقِهِ

وَخَلِيفَتُهُ فِي بَرِيَّتِهِ

وَامِينُهُ فِي بِلاَدِهِ

وَشَاهِدُهُ عَلَىٰ عِبَادِهِ

وَاشْهَدُ انَّكَ كَلِمَةُ ٱلتَّقْوَىٰ

وَبَابُ ٱلْهُدَىٰ

وَٱلْعُرْوَةُ ٱلْوُثْقَىٰ

وَٱلْحُجَّةُ عَلَىٰ مَنْ فَوْقَ ٱلارْضِ

وَمَنْ تَحْتَ ٱلثَّرَىٰ

وَاشْهَدُ انَّكَ ٱلْمُطَهَّرُ مِنَ ٱلذُّنُوبِ

ٱلْمُبَرَّا مِنَ ٱلْعُيُوبِ

وَٱلْمُخْتَصُّ بِكَرَامَةِ ٱللَّهِ

وَٱلْمَحْبُوُّ بِحُجَّةِ ٱللَّهِ

وَٱلْمَوْهُوبُ لَهُ كَلِمَةُ ٱللَّهِ

وَٱلرُّكْنُ ٱلَّذِي يَلْجَا إِِلَيْهِ ٱلْعِبَادُ

وَتُحْيَىٰ بِهِ ٱلْبِلاَدُ

وَاشْهَدُ يَا مَوْلاَيَ

انِّي بِكَ وَبِآبَائِكَ وَابْنَائِكَ مُوقِنٌ مُقِرٌّ

وَلَكُمْ تَابِعٌ فِي ذَاتِ نَفْسِي

وَشَرَايِعِ دِينِي

وَخَاتِمَةِ عَمَلِي

وَمُنْقَلَبِي وَمَثْوَايَ

وَانِّي وَلِيٌّ لِمَنْ وَالاَكُمْ

وَعَدُوٌّ لِمَنْ عَادَاكُمْ

مُؤْمِنٌ بِسِرِّكُمْ وَعَلاَنِيَتِكُمْ

وَاوَّلِكُمْ وَآخِرِكُمْ

بِابِي انْتَ وَامِّي

وَٱلسَّلاَمُ عَلَيْكَ وَرَحْمَةُ ٱللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ

फिर ज़रीह ए अक़दस को चूम कर अपने दोनों गालों को ज़रीह से मले और फिर कहे 

ख़ुदा वंदा दरूद भेज मोहम्मद व आले मोहम्मद पर

 

और दरूद भेज अपनी मुकम्मल हुज्जत पर

 

और अपने पाकीज़ा वाली पर

 

और अपने पसंदीदा अमीन पर

 

और अपने बरगुज़ीदा हादी पर

 

और अपने सिराते मुस्तक़ीम पर

 

और अपने बड़े रास्ता पर

 

और अपनी दरम्यानी राह पर,

 

मोमिनों के दिलों के नूर पर,

 

मुत्तक़ियों के वली पर

 

और मुख्लिसों के सरदार पर,

 

ख़ुदा वंदा दरूद भेज हमारे सरदार मोहम्मद मुस्तफ़ा (स:अ:व:व) पर और इनके अहलेबैत व अतहार पर

 

और दरूद भेज हज़रत अली बिन मोहम्मद (स:अ) पर

 

की यह हादी और मासूम हैं

 

और नअ-आज़िश से महफ़ूज़ हैं,

 

ऐब से पाक हैं,

 

आरज़ू में तुझी से वाबस्ता हैं

 

फ़ितनों में आज़माये हुए

 

और मेहनतों में जांचे हुए हैं,

 

अच्छी आज़माइशों के साथ इम्तेहान किये गए हैं

 

और तकलीफों में सब्र करते हैं ,

 

तेरे बन्दों के हादी हैं

 

और तेरी ममलेकत की बरकतें हैं

 

और तेरी रहमत का महल हैं,

 

तेरी हिकमत के हामिल हैं

 

और तेरी जन्नत की जानिब रहबर हैं,

 

तेरी मख़लूक़ात भर में आलम हैं

 

और तेरे बन्दों के हादी हैं

 

जिनको तूने पसंद किया है

 

और चुन लिया है,

 

और अख़्त्यार फ़रमाया इनको मक़ाम पर अपने रसूल के,

 

इनकी उम्मत में इनके ऊपर हिफ्ज़े शरीयत लाज़िम कर दी,

 

चुनांचेह आपने वसीयत का बोझ उठा लिया

 

और इसके बर्दाश्त करने पर क़ादिर रहे,

 

ना किसी मुश्किल में ठोकर खाई

 

और ना किसी सख़्त परेशानी में बग़ैर फ़ायदा बोले,

 

बल्कि छुपे हुए को ज़ाहिर कर दिया, 

 

मुनाफ़िक़ों से टकराये

 

और फ़र्ज़  दिया,

 

ख़ुदा वंदा बस जिस तरह तूने अपने नबी की आँखें इस ईमाम के ज़रिया ठंडी की हैं

 

इसी तरह इनके दर्जे को बुलंद कर,

 

अपने नज़दीक इनके अजर को कसीर क़रार दे

 

और इनपर रहमत नाज़िल कर

 

और हमारी जानिब से इनकी ख़िदमत में तहय्या सलाम पहुंचा

 

और हमें अपने पास से इनकी मोहब्बत में फ़ज़्ल व एहसान

 

और मग़फ़ेरत व रिज़वान अता फ़रमा,

 

बेशक तो बड़ा फ़ज़्ल वाला है!          

 

 

اَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ

وَصَلِّ عَلَىٰ حُجَّتِكَ ٱلْوَفِيِّ

وَوَلِيِّكَ ٱلزَّكِيِّ

وَامِينِكَ ٱلْمُرْتَضَىٰ

وَصَفِيِّكَ ٱلْهَادِي

وَصِرَاطِكَ ٱلْمُسْتَقِيمِ

وَٱلْجَادَّةِ ٱلْعُظْمَىٰ

وَٱلطَّرِيقَةِ ٱلْوُسْطَىٰ

نُورِ قُلُوبِ ٱلْمُؤْمِنِينَ

وَوَلِيِّ ٱلْمُتَّقِينَ

وَصَاحِبِ ٱلْمُخْلِصِينَ

اَللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَاهْلِ بَيْتِهِ

وَصَلِّ عَلَىٰ عَلِيِّ بْنِ مُحَمَّدٍ

ٱلرَّاشِدِ ٱلْمَعْصُومِ مِنَ ٱلزَّلَلِ

وَٱلطَّاهِرِ مِنَ ٱلْخَلَلِ

وَٱلْمُنْقَطِعِ إِِلَيْكَ بِٱلامَلِ

ٱلْمَبْلُوِّ بِٱلْفِتَنِ

وَٱلْمُخْتَبَرِ بِٱلْمِحَنِ

وَٱلْمُمْتَحَنِ بِحُسْنِ ٱلْبَلْوَىٰ

وَصَبْرِ ٱلشَّكْوَىٰ

مُرْشِدِ عِبَادِكَ

وَبَرَكَةِ بِلاَدِكَ

وَمَحَلِّ رَحْمَتِكَ

ومُسْتَوْدَعِ حِكْمَتِكَ

وَٱلْقَائِدِ إِلَىٰ جَنَّتِكَ

ٱلْعَالِمِ فِي بَرِيَّتِكَ

وَٱلْهَادِي فِي خَلِيقَتِكَ

ٱلَّذِي ٱرْتَضَيْتَهُ وَٱنْتَجَبْتَهُ

وَٱخْتَرْتَهُ لِمَقَامِ رَسُولِكَ فِي امَّتِهِ

وَالْزَمْتَهُ حِفْظَ شَرِيعَتِهِ

فَٱسْتَقَلَّ بِاعْبَاءِ ٱلْوَصِيَّةِ

نَاهِضاً بِهَا

ومُضْطَلِعاً بِحَمْلِهَا

لَمْ يَعْثُرْ فِي مُشْكِلٍ

وَلاَ هَفَا فِي مُعْضِلٍ

بَلْ كَشَفَ ٱلْغُمَّةَ

وَسَدَّ ٱلْفُرْجَةَ

وَادَّىٰ ٱلْمُفْتَرَضَ

اَللَّهُمَّ فَكَمَا اقْرَرْتَ نَاظِرَ نَبِيِّكَ بِهِ

فَرَقِّهِ دَرَجَتَهُ

وَاجْزِلْ لَدَيْكَ مَثُوبَتَهُ

وَصَلِّ عَلَيْهِ

وَبَلِّغْهُ مِنَّا تَحِيَّةً وَسَلاَماً

وَآتِنَا مِنْ لَدُنْكَ فِي مُوَالاَتِهِ فَضْلاًَ وَإِِحْسَاناً

وَمَغْفِرَةً وَرِضْوَاناً

إِِنَّكَ ذُو ٱلْفَضْلِ ٱلْعَظِيمِ

मुहर्रम 

सफ़र 

रबी'उल अव्वल  रजब 

शाबान 

रमज़ान  ज़िल्काद  ज़िल्हज्ज 
क़ुरान करीम  क़ुरानी दुआएँ  दुआएँ  ज्यारतें 
अहलेबैत (अ:स) कौन हैं? सहीफ़ा-ए-मासूमीन (अ:स) नमाज़ मासूमीन (अ:स) और दूसरी अहम् नमाज़ें  हज़रत ईमाम मेहदी (अ:त:फ़)
ईस्लामी क़ानून और फ़िक्ह  लाईब्रेरी  उल्मा-ए-दीन  इस्लामी महीने और ख़ास तारीख़ें

कृपया अपना सुझाव  भेजें

ये साईट कॉपी राईट नहीं है !