आयतल कुर्सी (क़ुरान 2:255- 7)

Transliteration(अरबी में पढ़ें)

بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيم               

बिस्मिल्ला हिर रहमानिर रहीम 

2.255: ख़ुदा ही वो ज़ाते पाक है कि उसके सिवा कोई माबूद नहीं (वह) ज़िन्दा है (और) सारे जहान का संभालने वाला है उसको न ऊँघ आती है न नींद जो कुछ आसमानो में है और जो कुछ ज़मीन में है (गरज़ सब कुछ) उसी का है कौन ऐसा है जो बग़ैर उसकी इजाज़त के उसके पास किसी की सिफ़ारिश करे जो कुछ उनके सामने मौजूद है (वह) और जो कुछ उनके पीछे (हो चुका) है (खुदा सबको) जानता है और लोग उसके इल्म में से किसी चीज़ पर भी अहाता नहीं कर सकते मगर वह जिसे जितना चाहे (सिखा दे) उसकी कुर्सी सब आसमानॊं और ज़मीनों को घेरे हुये है और उन दोनों (आसमान व ज़मीन) की निगेहदाश्त उसपर कुछ भी मुश्किल नहीं और वह आलीशान बुजुर्ग़ मरतबा है .


2.256: दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और खुदा ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और ख़ुदा सब कुछ सुनता और जानता है .
 

2.257: ख़ुदा उन लोगों का सरपरस्त है जो ईमान ला चुके कि उन्हें (गुमराही की) तारीक़ियों से निकाल कर (हिदायत की) रौशनी में लाता है और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया उनके सरपरस्त शैतान हैं कि उनको (ईमान की) रौशनी से निकाल कर (कुफ़्र की) तारीकियों में डाल देते हैं यही लोग तो जहन्नुमी हैं (और) यही उसमें हमेशा रहेंगे.

अरबी में पढ़ें

बिस्मिल्ला हिर रहमानिर रहीम     

अल्लाहो ला इलाहा इल्ला होवा, अल -हय्युल क़य्यूमो, ला'ता ख़ु-ज़ोहू सेनातुन  वाला  नौमुन,

लहू मा फ़ीस समावाते व मा फिल अर्ज़े, मन ज़ल लज़ी यश-फ-ओ' इ'न्दहू इल्ला बे-इज़्नेही, या'लमो मा बैना अय्दीहीम व मा ख़ल'फ़हुम, व ला  योहीतूना  बे शै'यिम  मिन  इ'ल्मेही  इल्ला बेमा  शा-अ, वसे-अ' कुर्सिय्यो'हुस समावाते वल अर्ज़, व ला या-ऊदोहू हिफ़'ज़ोहोमा, व होवल अ'लिय्युल अ'ज़ीमो.

ला इक्राहा फ़िद दीन, क़द तबय्या-नर रुश्दो मेनल गै'यए , फ़'मय्न यक्फुर बीत-ताग़'हूते  व यू-मीम बिल्लाहे फ़क़दिस तमसका बिल-उ'र्वातिल वुसक़ा, लन्फेसामा  लहा, वल्लाहो समी-उ'न अ'लीमुन. अल्लाहो वालिय्युल लज़ीना आ'मनू, युखरेजोहुम  मेनज़ ज़ोलोमाते एलन नूरे, वल'लज़ीना कफरू अव्लेया-ओ-होमुत ताग़'हूतो  युखरे'जूनाहुम  मेनन नूरे इ'लाज़ ज़ोलोमाते, ऊला-एका अस्हाबुन  नारे, हुम फ़ीहा  ख़ालेदून  !

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للَّـهُ لَا إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ ۚ لَا تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٌ ۚ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِندَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ ۚ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ ۖوَلَا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ ۖ وَلَا يَئُودُهُ حِفْظُهُمَا ۚ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ﴿٢٥٥﴾ لَا إِكْرَاهَ فِي الدِّينِ ۖ قَد تَّبَيَّنَ الرُّشْدُ مِنَ الْغَيِّ ۚ فَمَن يَكْفُرْ بِالطَّاغُوتِ وَيُؤْمِن بِاللَّـهِ فَقَدِ اسْتَمْسَكَ بِالْعُرْوَةِ الْوُثْقَىٰ لَا انفِصَامَ لَهَا ۗ وَاللَّـهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ﴿٢٥٦

 

आयतल कुर्सी पढ़ने से अल्लाह की तवज्जोह अपने बन्दों की तरफ हो जाती है!

 

6ठे इमाम जाफर सादिक (आ:स) ने फरमाया:   :

لَمَّا أَمَرَ اللَّهُ عَزَّ وَ جَلَّ هَذِهِ الْآيَاتِ أَنْ يَهْبِطْنَ إِلَى الْأَرْضِ تَعَلَّقْنَ بِالْعَرْشِ وَ قُلْنَ أَيْ رَبِّ إِلَى أَيْنَ تُهْبِطُنَا إِلَى أَهْلِ الْخَطَايَا وَ الذُّنُوبِ فَأَوْحَى اللَّهُ عَزَّ وَ جَلَّ إِلَيْهِنَّ أَنِ اهْبِطْنَ فَوَ عِزَّتِي وَ جَلَالِي لَا يَتْلُوكُنَّ أَحَدٌ مِنْ آلِ مُحَمَّدٍ وَ شِيعَتِهِمْ فِي دُبُرِ مَا افْتَرَضْتُ عَلَيْهِ مِنَ الْمَكْتُوبَةِ فِي كُلِّ يَوْمٍ إِلَّا نَظَرْتُ إِلَيْهِ بِعَيْنِيَ الْمَكْنُونَةِ فِي كُلِّ يَوْمٍ سَبْعِينَ نَظْرَةً أَقْضِي لَهُ فِي كُلِّ نَظْرَةٍ سَبْعِينَ حَاجَةً وَ قَبِلْتُهُ عَلَى مَا فِيهِ مِنَ الْمَعَاصِي وَ هِيَ أُمُّ الْكِتَابِ وَ شَهِدَ اللَّهُ أَنَّهُ لا إِلهَ إِلَّا هُوَ وَ الْمَلائِكَةُ وَ أُولُوا الْعِلْمِ وَ آيَةُ الْكُرْسِيِّ وَ آيَةُ الْمُلْكِ

“When Allah, the Noble and Grand, commanded the verse (mentioned at the end of this tradition) to descend down to the Earth, they (the verses) attached themselves to the Throne (of Allah) and said, ‘O Lord! Where are you sending us to? Are you sending us to a place of [the People of] transgressions and sins?’ Allah, the Noble and Grand, revealed to them (the verses), ‘Go down as I swear by My Greatness and My Majesty that not a single person from amongst the progeny of Muhammad and their followers (Shia) shall recite you after that which I have made obligatory upon them (the five canonical prayers) every day except that I will glance at them with a special glance with My eyes seventy times every day and with every glance, I will fulfill seventy of their desires and I will accept (their supplications) even though they have sins (on their record) and these verses will make up the basis of The Book (Ummul Kitab – meaning Suratul Hamd) and the verse, ‘

अल्लाह ने गवाही दी कि उसके सिवा कोई पूज्य नहीं; और फ़रिश्तों ने और उन लोगों ने भी जो न्याय और संतुलन स्थापित करनेवाली एक सत्ता को जानते है। उस प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी के सिवा कोई पूज्य नहीं

’ [Q. 3:18] और आयतल कुर्सीकहो, "ऐ अल्लाह, राज्य के स्वामी! तू जिसे चाहे राज्य दे और जिससे चाहे राज्य छीन ले, और जिसे चाहे इज़्ज़त (प्रभुत्व) प्रदान करे और जिसको चाहे अपमानित कर दे। तेरे ही हाथ में भलाई है। निस्संदेह तुझे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है  [Q. 3:26].”[1]


[1] उसूल-अल काफ़ी, वौल. 4, पेज. 426

            

     

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