जुमा का दिन﴿

दुआए नुदबा - नमाज़े फ़ज्र के बाद

दुआए ईमाम ज़ैनुल आबेदीन(अ:स)-फ़ज्र से पहले 

या शहीद कुल्ले नज्वा

दुआए जुमा - सहीफ़ा अलविया से 

रोज़े जुमा की दूसरी दुआएं

सहीफ़े सज्जादिया की दुआ- 46 , 48 

अबुल हसन ज़रदाब इस्फ़हानी की सलवात

बीबी सैय्यदा (स:अ) की जुमा की दुआ

  नाफ़िला जुमा के लिए दुआ

दुआए सीमात - सूरज ढलने के पहले  

दुआए सरदाब

ज्यारत ईमाम अल'मेहदी (अ:त:फ़)

सुराः जुम       Mp3 Audio link

ईमाम के ज़यारत की ऑडियो

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

तमाम तारीफ़ उस अल्लाह तआला के लिये है जो पैदा करने और ज़िन्दगी बख़्शने से पहले मौजूद था और तमाम चीज़ों के फ़ना होने के बाद बाक़ी रहेगा। वह ऐसा इल्म वाला है के जो उसे याद रखे उसे भूलता नहीं, जो उसका शुक्र अदा करे उसके हाँ कमी नहीं होने देता, जो उसे पुकारे उसे महरूम नहीं करता, जो उससे उम्मीद रखे उसकी उम्मीद नहीं तोड़ता।

बारे इलाहा! मैं तुझे गवाह करता हूं और तू गवाह होने के लेहाज़ से बहुत काफ़ी है, और तेरे तमाम फ़रिश्तों और तेरे आसमानों में बसने वालों और तेरे अर्श के उठाने वालों और तेरे फ़र्सतादा नबियों (अ0) और रसूलों (अ0) और तेरी पैदा की हुई क़िस्म-क़िस्म की मख़लूक़ात को अपनी गवाही पर गवाह करता हूं के तू ही माबूद है और तेरे अलावा कोई माबूद नहीं। तू वहदहू लाशरीक है, तेरा कोई हमसर नहीं है तेरे क़ौल में न वादाखि़लाफ़ी होती है और न कोई तबदीली। और यह के मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम तेरे ख़ास बन्दे और रसूल (स0) हैं जिन चीज़ों की ज़िम्मेदारी तूने उन पर आएद की वह बन्दों तक पहुंचा दीं। उन्होंने ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर की राह में जेहाद करके हक़क़े जेहाद अदा किया और सही-सही सवाब की ख़ुशख़बरी दी और वाक़ेई अज़ाब से डराया। बारे इलाहा! जब तक तू मुझे ज़िन्दा रखे अपने दीन पर साबित क़दम रख और जब के तूने मुझे हिदायत कर दी तो मेरे दिल को बेराह न होने दे और मुझे अपने पास से रहमत अता कर। बेशक तू ही नेमतों का बख़्शने वाला है। मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और हमें उनके इत्तेबाअ और उनकी जमाअत में से क़रार दे और उनके गिर्दा में महशूर फ़रमा और नमाज़े जुमा के फ़रीज़े और उस दिन की दूसरों इबादतों के बजा लाने और फ़राएज़ पर अमल करने वालों पर क़यामत के दिन जो अताएं तूने तक़सीम की हैं उन्हें हासिल करने की तौफ़ीक़ मरहमत फ़रमा। बेशक तू साहेबे इक़्तेदार और हिकमत वाला है।

 

अलहम्दो लील'लाहे अल'अव्वलो क़बला अल'निशा'ए व अल'इहया'ए व अल'आख़िरे बादा फ़िनाए अल'अशियाए अल'अलीमे अल'लज़ी ला यन्शा 

मन ज़क'रोहू व ला यन'क़सो मन शक'राहू व ला या'खीबो मन द-आहु व ला यक़-त-ओ रजा-अ मन रजाहो अल्लाहुम्मा इन्नी 

उश'हदोका व कफ़ा बिका शहीदन, व अशहदो जमी-अ मलाई'कतेका व सुक्काना समावातेका व हामालते     

अर्शेका व मन बा'अस्ता मिन अम्बियाएका व रोसूलेका व अंशा'अत मिन अस्नाफ़े ख़ल'क़ेका अन्नी अशहदो 

अन्नका अन्ता अल्लाहो ला इलाहा इल्ला अन्ता वह-दका ला शरीका लका व ला अदीला व ला ख़ल'फ़ा ले'क़ौलेका

व ला तब्दीला व अन्ना मोहम्मदन सल'अल्लाहो अलैहे व आलेही अब्दोका व रसुलोका आदा मा हम्मल-तहु इला अल'इबादे 

व हदा फ़ी'अल्लाहे अज़-ज़ा व जल्ला हक़क़ा अल'जिहादे व अन्नहू बश'शरा बेमा हुवा हक़क़ा मिन अल्तव्वाबे व अनज़रा बिमा हुवा सिद्को 

मिन अल'इक़ाबे अल्लाहुम्मा सब्बत-नी आला दीनेका मा अही'यतानी व ला तज़'अ क़ल्बी बादा इज़ हादै-तनी व हब-ली 

मीन ला-दुनका रहमते इन्नका अंतल वहाबो सल्ली आला मोहम्मदीन व आले मोहम्मदीन व आज-अलनी मीन 

अत्बा-एही शी-आतेहु अह'शुरनि फ़ी ज़म'रतेही व-व फ़क़-नी ला इदा-ए फ़र' अल'जुमुआते मा 'जब्ता अलैय्या फ़ीहा 

मिनल्त'ता-आते क़सम-ता ला-ईह'लेहा मीना अल-अताए फ़ी यौमे अल'जज़ाए इन्नका अन्ता अल'अज़ीज़ो अल'हकीमो   

اَلْحَمْدُ لِلّٰہِ الاَوَّلِ قَبْلَ الْاِنْشاءِ وَالْاِحْیاءِ، وَالاْخِرِ بَعْدَ فَنَاءِ الْاَشْیاءِ، الْعَلِیمِ الَّذِی لاَ یَنْسیٰ 

مَنْ ذَکَرَہُ، وَلاَ یَنْقُصُ مَنْ شَکَرَہُ، وَلاَ یَخِیبُ مَنْ دَعَاہُ، وَلاَ یَقْطَعُ رَجَاءَ مَنْ رَجَاہُ ۔ اَللّٰھُمَّ إِنِّی

أُشْھِدُکَ وَکَفی بِکَ شَھِیداً، وَأُشْھِدُ جَمِیعَ مَلائِکَتِکَ وَسُکَّانَ سَمٰواتِکَ وَحَمَلَةِ

عَرْشِکَ، وَمَنْ بَعَثْتَ مِنْ أَنْبِیَائِکَ وَرُسُلِکَ، وَأَ نْشَأْتَ مِنْ أَصْنَافِ خَلْقِکَ، أَنِّی أَشْھَدُ

أَ نَّکَ أَ نْتَ اللهُ لاَ إِلہَ إِلاَّ أَ نْتَ، وَحْدَکَ لاَ شَرِیکَ لَکَ وَلاَعَدِیلَ، وَلاَ خُلْفَ لِقَوْلِکَ

وَلاَ تَبْدِیلَ، وَأَنَّ مُحَمَّداً صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ عَبْدُکَ وَرَسُولُکَ، أَدَّی مَا حَمَّلْتَہُ إِلَی الْعِبَادِ،

وَجَاھَدَ فِی اللهِ عَزَّ وَجَلَّ حَقَّ الْجِھَادِ وَأَنَّہُ بَشَّرَ بِمَا ھُوَ حَقٌّ مِنَ الثَّوَابِ، وَأَ نْذَرَ بِمَا ھُوَ صِدْقٌ

مِنَ الْعِقَابِ ۔ اَللّٰھُمَّ ثَبِّتْنِی عَلیٰ دِینِکَ مَا أَحْیَیْتَنِی، وَلاَ تُزِغْ قَلْبِی بَعْدَ إِذْ ھَدَیْتَنِی، وَھَبْ لِی 

مِنْ لَدُنْک رَحْمَةً إِنَّکَ َأَنْتَ الْوَھَّابُ۔ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَعَلَی آلِ مُحَمَّدٍ، وَاجْعَلْنِی مِنْ 

أَتْباعِہِ وَشِیعَتِہِوَاحْشُرْ نِی فِی زُمْرَتِہِ وَوَفِّقْنِی لاََِدَاءِ فَرْضِ الْجُمُعَاتِ، وَمَا أَوْجَبْتَ عَلَیَّ فِیھا 

مِنَالطَّاعَاتِ، وَقَسَمْتَ لاِھْلِھَا مِنَ الْعَطَاءِ فِی یَوْمِ الْجَزَاءِ، إِنَّکَ أَ نْتَ الْعَزِیزُ الْحَکِیمُ۔

 

दूसरी दुआएँ - मफ़ातीह उल'जिनान से 

रोज़े जुमा के अमाल बहुत ज़यादा हैं और हम यहाँ उनमें से कुछ का ही ज़िक्र कर रहे हैँ!
1 . जुमा के दिन नमाज़े सुबह कि पहली रक्'अत में सुराः जुमा और दूसरी रक्'अत में सुराः तौहीद पढ़ें 
2. नमाज़े सुबह के बाद बात करने से पहले यह दुआ पढ़ें ताकि इस जुमा से अगले जुमा तक गुनाहों का कफ्फारा हो जाए ! 

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ माबूद मैंने अपने इस जुमा के रोज़ जो बात कही या इस में किसी बात पर क़सम खाई है या किसी बात पर नज़र या मन्नत मानी है तो यह सब कुछ तेरी मर्ज़ी के ताबे है, पास इनमें से जिसके पूरा होने में तेरी मस्लेहत है इसे पूरा फरमा, और जिसे तू ना चाहे इसे पूरा न कर, ऐ माबूद जिस पर तू रहमत करे मैं इस पर रहमत का तालिब हूँ और जिस पर तू लानत करे मेरी भी उसपर लानत है!

अल्लाहुम्मा मा क़ल्तो फ़ी फ़ी जुमो-अती हाज़ेही मिन क़ौलिन औ हलफ़तो फ़ीहा मिन हलफ़िन औ नज़रतो फ़ीहा मिन नज़रिन फ़'मशी-अतोका बैना यदै ज़ालेका कुल्लाही फ़मा शी'अता मिन्हो अन यकूना काना व मा लम तशा-अ मिन्हो लम यकुन अल्लाहुम्मा अग़फ़िर ली तजा'वज़ अन्ना अल्लाहुम्मा मन साल'लैता अलैहि फसालाती अलैही व मन ला'अन्ता फ़ ला'नती अलैही 

اَللّٰھُمَّ مَا قُلْتُ فِی جُمُعَتِی ھَذِہِ مِنْ قَوْلٍ أَوْ حَلَفْتُ فِیھا مِنْ حَلْفٍ أَوْنَذَرْتُ فِیھا مِنْ نَذْرٍفَمَشِیْئَتُکَ بَیْنَ یَدَیْ ذلِکَ کُلِّہِ فَمَا شِئْتَ مِنْہُ أَنْ یَکُونَ کَانَ، وَمَا لَمْ تَشَأْ مِنْہُ لَمْ یَکُنْ اَللّٰھُمَّ اغْفِرْ لِی وَتَجاوَزْ عَنِّی اَللّٰھُمَّ مَنْ صَلَّیْتَ عَلَیْہِ فَصَلاَتِی عَلَیْہِ وَمَنْ لَعَنْتَ فَلَعْنَتِی عَلَیْہِ

 हर माह कम से कम एक मरतबा यह अमल करना ज़रूरी है! रिवायत में आया है की जो शख्स नमाज़े सुबह के बाद सूरज के उगने तक ताक़ीबात (दुआओं) में मशग़ूल रहे तो जन्नत उल फ़िरदौस में इसके सत्तर दर्जे बुलंद किये जायेंगे! शेख तूसी (अ:र) से रिवायत है की नमाज़े जुमा कि ताक़ीबात में यह दुआ पढ़ना बहुत बेहतर है!   

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ माबूद अपनी हाजत ले कर तेरे पास आया हूँ, और आज के दिन तेरी जनाब में औपने फ़क़र व फ़ाक़ा और बेचारगी के साथ हाज़िर हूँ, तू अपने अमल के बजाये तेरी बख्शीश व रहमत कि ज़्यादा उम्मीद रखता हूँ और तेरी बख्शीश व रहमत मेरे गुहाओं से कहीं ज़्यादा बड़ी है, बस मेरी हाजात को पूरी फ़रमा क्योंकि तू ऐसा करने कि क़ुदरत रखता है, और यह तेरे लिए बहुत ही आसान और मेरे एह्त्याज के मुनासिब है, क्योंकि मैं तेरी तौफ़ीक़ के बग़ैर कोई काम नहीं कर सकता और तेरे सिवा मुझे बुराई से बचाने वाला कोई नहीं है और मैं अपनी दुन्या व आख़ेरत और ग़ुर्बत व तन्हाई के बारे में तेरे अलावा किसी से उम्मीद नहीं रखता और न इस दिन जिस दिन लोग मुझे क़ब्र में अकेला छोड़ जायेंगे और मैं अपने गुनाहों में तेरे सिवा किसी को कारसाज़ नहीं समझता! 

अल्लाहुम्मा इन्नी त-अम'मद-तो इलैका बेहा-जति व अनज़ल-तो इलैका अल'यौमा फ़क़री व फ़ा'क़ेति व मस'कनाती फ़'अना ले'मग़'फ़ेरतेका अरजा मिन्नी ले'अमली व ला मग़'फ़ेरातोका व रहमतोका औ'साओ मिन ज़ोनोबी फ़'तवल्ला क़ज़ा'अ कुल्ला हाजा'तीन ली बे'क़ुद'रतेका अलैहा व ता-यसीर ज़लका अलैका व ले फ़क़री इलैका फ़'इन्नी लम' ओसिब ख़ैरन क़त्ता इल्ला मिन्का व लम यसरफ़ अन्ना सु'अन क़त्ता अहदो सिवाका व लस्तो अर'जू ले आख़िराती व दुन्याया व ला ले'यौमे फ़क़री यौमा युफ़'रेदूनी अल'नासो फ़ी हुफ़'रती व उफ़ज़ी इलैका ब'ज़ुन'बी सिवाका       

 

اَللّٰھُمَّ إِنِّی تَعَمَّدْتُ إِلَیْکَ بِحَاجَتِی، وَأَ نْزَلْتُ إِلَیْکَ الْیَوْمَ فَقْرِی وَفَاقَتِی وَمَسْکَنَتِیِ فَأَنَا لِمَغْفِرَتِکَ أَرْجٰی مِنِّی لِعَمَلِی، وَلَمَغْفِرَتُکَ وَرَحْمَتُکَ أَوْسَعُ مِنْ ذُ نُوبِی فَتَوَلّ  قَضاءَ کُلِّ حَاجَةٍ لِی بِقُدْرَتِکَ عَلَیْھَا وَتَیْسِیْرِ ذلکَ عَلَیْکَ، وَ لِفَقْرِی إِلَیْکَ فَإنِّی لَم  أُصِبْ خَیْراً قَطُّ إِلاَّ مِنْکَ وَلَمْ یَصْرِفْ عَنِّی سُوءً قَطُّ أَحَدٌ سِوَاکَ، وَلَسْتُ أَرْجُو لآِخِرَتِی وَدُنْیایَ وَلا لِیَوْمِ فَقْرِی یَوْمَ یُفْرِدُنِیَ النَّاسُ فِی حُفْرَتِی وَأُفْضِی إِلَیْکَ بِذَنْبِی سِوَاکَ

3. रिवायत है की जो शख्स रोज़े जुमा या ग़ैर जुमा फ़जर या ज़ोहर की नमाज़ के बाद यह सलवात पढ़े तो वोह मरने से पहले हज़रत क़ायम (अ:त:फ़)  करेगा! जो यह सलवात 100 मरतबा पढ़े तो खुदाए त'आला उसकी साठ (60) हाजतों को पूरी करेगा! 30 हाजत दुन्या में और 30 हाजत आख़ेरत में!  

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ
माबूद मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा और उनके आखिरी ज़हूर में ताजील फ़रमा  अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मदीन व अज्जिल फराजो'हुम  

اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَعَجِّلْ فَرَجَھُمْ۔

4. नमाज़े फज्र के बाद सुराः रहमान पढ़े और "'बैय्या अला'रब्बिकुमा तुक्ज़'बान" (فَبِاَیِّ اٰلآءِ رَبِّکُمَا تُکَذِّبَانِ) के बाद हर दफ़ा कहें:  

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

मैं तेरी नेमतों में से किसी भी नेमत की तकज़ीब नहीं करता!

ला बे'शै'इम मिन अल'आइका रब्बा उक़ज़-ज़बो 

لاَ بِشَیءٍ مِّنْ اَلآئِکَ رَبِّ اُکَذِّبُ

5. शेख तुसी (अ:र) कहते हैं, यह सुन्नत है की जुमा के दिन फजर कि नमाज़ के बाद 100 मरतबा दरूद पढ़ें और 100 मरतबा इस्तग़फ़ार करें और फिर क़ुरान की सुराः नबा, कहफ़, सफ़ात या रहमान में से कम से कम किसी एक की तिलावत करें! 

6. सुराः अहक़ाफ़ और सुराः मोमिनून पढ़ें जैसा की ईमाम जाफ़र अल'सादिक़ (अ:स) से रिवायत है की जो शख्स हर शबे जुमा या रोज़े जुमा सुराः अहक़ाफ़ पढ़ेगा तो वोह दुन्या में ख़ौफ व खतरे से महफूज़ रहेगा और क़यामत में बड़ी हवलनाकी से अमन में रहेगा! फिर फ़रमाया की जो शख्स हर जुमा को पाबंदी से सुरह मोमिनून पढ़े तो इसके अमाल का ख़ात्मा खैर व नेकी पर होगा और इसका फ़िरदौस (जन्नत) में अम्बिया व मुर्सलीन के साथ क़याम होगा! 

7. सूरज उगने से पहले 10 मरतबा सुराः क़ाफेरून पढ़ें और फिर दुआ करें तो वोह क़बूल होगी! रिवायत है कीं ईमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ:स) जुमा की सुबह से ज़ोहर तक आयत अल'कुर्सी पढ़ा करते थे और जब नमाज़ों से फ़ारिग होते तो बाद में सुराः क़दर कि तिलावत शुरू करते थे! यह ख्याल रहे की जुमा के दिन आयत अल'कुर्सी पढ़ने की बहुत फ़ज़ीलत ब्यान हुई है! अल्लामा मजलिसी ने फ़रमाया है की अली इब्ने इब्राहीम और कुलिनी कि रिवायत के मुताबिक़ अला तंज़ील आयत अल'कुर्सी ऐसे पढ़ी जा सकती है!  

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

अल्लाह वोह है जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, वोह ज़िन्दा और सारे जहां का मालिक है उसको न ऊंघ आती है न नींद, जो कुछ आसमानों या ज़मीन में है इसकी मिलकियत है! 

अल्लाहो ला इलाहा इल्ला हुवा अल'हैय्यो अल'क़ैय्युमो ला'ता-खोज़ुहो सिनातून व ला'नौम, लहू मा फ़ी अस'समावाते व मा फ़ी अल'अर्ज़ 

اللهُ لاَإِلَہَ إِلاَّ ھُوَ الْحَیُّ الْقَیُّومُ لاَتَأْخُذُہُ سِنَةٌ وَلاَنَوْمٌ لَہُ مَا فِی السَّمٰوَاتِ وَمَا فِی الأَرْضِ۔

 

फिर इन लफ्ज़ों की तिलावत करें!

और जो ज़मीन और आसमान के दरम्यान में है और जो तहतुस'सिरा में है वो पोशीदा और ज़ाहिर है, वोह आगाह है वोह रहमान और रहीम है! 

व मा बैना'हुमा व मा तहता सरा आलिमु अल'ग़ैबे व अल'शहादते अर'रहमान अर'रहीम 

وَمَابَیْنَھُمَا وَمَا تَحْتَ ثَریٰ عَالِمُ الْغَیْبِ وَالشَّھَادَةِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ ۔

 

इसके बाद मन ज़ल लज़ी (مَنْ ذَالَّذِی) से हुम फ़ीहा खालेदून (ھُمْ فِیْھَاخٰالِدُوْنَ) तक आयत अल'कुर्सी और इसके बाद  वल हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलामीन (ھُمْ فِیْھَاخٰالِدُوْنَ) कहें 

8. जुमा को ग़ुस्ल करना सुन्नत मो'कदा है! रिवायत है की रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) ने अमीरुल मोमिनीन (अ:स) से फ़रमाया, "या अली, जुमा के दिन ग़ुस्ल किया करो अगरचेह इस रोज़ की खोराक बेच कर भी पानी हासिल करना और भूका रहना पड़े की इस से बड़ी कोई और सुन्नत नहीं है!" ईमाम जाफर अल'सादिक़ (अ:स) से रिवायत है की  जो शख्स जुमा के रोज़ ग़ुस्ल करके नीचे लिखी हुई दुआ पढ़ेगा तो वो आगे आने वाले जुमा तक गुनाहों से पाक होगा या तिहारत बातिनी कि बदौलत इसके अमाल क़ुबूल होंगे! इसमें एहतियात यह है की  जहां तक मुमकिन हो सके जुमा का ग़ुस्ल तर्क न करे! इसका वक़्त सूरज उगने से लेकर सूरज डूबने तक है और डूबने वाले वक़्त से जितना क़रीब हो बेहतर है!    

मैं गवाही देता हूँ की अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं है जो यकता और ला'सानी है (जिसके जैसा कोई और नहीं है) और गवाही देता हूँ की हज़रत मोहम्मद इसके बन्दे और रसूल हैं

ऐ माबूद मोहम्मद और आले मोहम्मद पर रहमत फ़रमा और मुझे तौबा करने वालों और पाक़ीज़ा लोगों में क़रार दे!

अश'हदो अन ला इलाहा इल्ला अल्लाहो वह'दोहु ला शरीका लहू व अशहदो अन्ना मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलोह 

अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद व अज'अलनी मिना अल' तव्वाबीना व अज'अलनी मिना अल' मुतह'हरीना 

أَشْھَدُ أَنْ لاَ إِلہَ إِلاَّ اللهُ وَحْدَہُ لاَ شَرِیکَ لَہُ، وَأَشْھَدُ أَنَّ مُحَمَّداً عَبْدُہُ وَرَسُولُہُ

اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَاجْعَلْنِی مِنَ التَّوَّابِینَ وَاجْعَلْنِی مِنَ الْمُتَطَھِّرِینَ۔

9. अपने सर को (खतमी से) धोये तो बरस व दीवानगी से महफूज़ रहेगा 

10. इस रोज़ मूंछें और नाख़ून काटने की बड़ी फ़ज़ीलत है, इस से रिज़क़ में बढ़ोतरी होती है और आने वाले जुमा तक गुनाहों से पाक रहेगा और बुरुस व दीवानगी और हिज़ाम से महफूज़ रहेगा! नाख़ून काटते वक़्त नीचे लिखी हुई दुआ पढ़ें! नाख़ून काटने के लिए बायें हाथ को छोटी ऊँगली से शुरू करें और दायें हाथ कि छोटी ऊँगली पर ख़तम करें! पाँव के नाख़ून काटने में भी यही तरतीब रखें और काटे हुए नाखुनो को दफ़न कर दे!    

खुदा के नाम और इस की ज़ात के ज़िक्र से और मोहम्मद व आले मोहम्मद कि सीरत के मुताबिक़ अमल करता हूँ 

बिस्मिल्लाहे व बिल्लाहे व अला सुन'ते मोहम्मदीन व आले मोहम्मद 

بِسْمِ اللهِ وَبِاللهِ وَعَلیٰ سُنْةِ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ۔

11. पाकीज़ा लिबास पहने और खुश्बू लगाये 

12. सदक़ा दे, रिवायत में ही की शबे जुमा व रोज़े जुमा में दिया हुआ सदक़ा आम दिनों के सदक़े के हज़ार बराबर है 

13. अहलो अयाल (अपने ख़ानदान वालों) के लिए अच्छी चीज़ें यानी गोश्त या फल वग़ैरह खरीद कर लाये ताकि वोह जुमा के आने से खुश व शादमान हो सकें

14. नाश्ते में अनार खाये और ज़वाल से पहले कासिनी (एक तरह कि जड़ी बूटी) के 7 पत्ते खाये, इसके बारे में ईमाम मूसा काज़िम (अ:स) का फरमान है की जुमा के रोज़ नाश्ते में एक अनार खाने से 40 दिन तक दिल नूरानी रहेगा और एक अनार खाने से 80 दिन और तीन अनार खाने से 120 दिन दिल नूरानी रहेगा और शैतानी के डर/बहकावे  से दूर करेगा और जिसको शैतान का डर/बहकावा नहीं होगा, वोह अल्लाह की मासियत नहीं करता और जो खुद कि मासियत नहीं करता वोह जन्नत में दाखिल होगा! मिस्बाह में शेख का इरशाद है की रिवायत में शबे जुमा व रोज़े जुमा में अनार खाने कि बड़ी फ़ज़ीलत ब्यान हुई है!

15. जुमा के दिन सैर सपाटे, लोगों के साथ तफ़रीह, ग़लत क़िस्म के लोगों से मिलने जुलने, मसख़रापन करने, लोगों के ऐब निकालने, क़हक़हा लगा कर ज़ोर से हँसने, बेकार बातों और बेकार शेरो शायरी और दुसरे क़िस्म के ग़लत काम करने वालों से दूरी अख्त्यार करे की जिनकी खराबियाँ ब्यान नहीं की जा सकती, बल्कि इसके बजाय खुद को दुनयावी कामों से बचा कर दीनी और मज़हबी मामलों को समझने और उन्हें याद करने में रखे! ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) फरमाते हैं कि इस मुसलमान पर अफ़सोस है जो सात (7) दिनों में जुमा के दिन भी खुद को दीनी मामलों की तालीम हासिल करने में मशग़ूल नहीं रख सका और दुन्या के कामों में फँसा रहा! रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) फरमाते हैं की अगर तुम लोग जुमा के दिन किसी बूढ़े को कुफ्र या जाहिलियत के वाक़्यात और क़िस्स कहानियाँ ब्यान करते देखो तो इस पर पत्थर फेको!

16. एक हज़ार 1000 मरतबा दरूद पढ़ें जैसा की ईमाम मोहम्मद बाक़र (अ:स) फरमाते हैं की मेरे नज़दीक जुमा के दिन मोहम्मद व आले मोहम्मद पर दरूद भेजने से बेहतर कोई इबादत नहीं है!                 

मो'अलिफ़ कहते हैं की अगर 1000 मरतबा दरूद शरीफ पढ़ने कि फुर्सत न हो तो कम से कम 100 मरतबा दरूद पढ़े ताकी क़यामत के दिन इसका चेहरा चमकता हुआ हो! रिवायत में आया है की जो शख्स जुमा के दिन 100 मरतबा दरूद शरीफ और 100 मरतबा अस्तग़'फीरूल्लाहे रब्बी व अतूबो इलैही (اَسْتَغْفِرُاللهَ رَبِّی وَاَتُوْبُ اِلَیْہِ) और 100 मरतबा सुराः तौहीद पढ़े तो इसके गुनाह माफ़ हो जायेंगे! एक और रिवायत में है की जुमा के ज़ोहर और असर के बीच में मोहम्मद व आले मोहम्मद पर सलवात भेजना 70 हज करने के बराबर है!                  

17. रसूल अल्लाह और अइम्मा ताहेरीन (अ:स) कि ज्यारत पढ़े की जिनकी कैफ़ियत ऊपर लिखी हुई है 

18. वालेदैन और दुसरे मोमिनों कि क़ब्रों कि ज्यारत के लिए जाए क्योंकि इसकी बड़ी फ़ज़ीलत ब्यान हुई है! जैसा की ईमाम मोहम्मद बाक़र (अ:स) फरमाते हैं की जुमा के दिन मुर्दों की ज्यारत करो वोह जानते हैं की कौन इनकी ज्यारत के लिए आया है और वोह खुश होते हैं!  

19. दुआए नुदबा पढ़ें और यह दुआ चारों ईदों में पढ़ी जाती है!  

20. जुमा के दिन 20 रक्'अत नाफ़िला-ए-जुमा के अलावा - की जिनके पढ़ने का का तरीक़ा मशहूर उलमाओं के नज़दीक यह है की 6 रक्'अत इस वक़्त पढ़े जब सूरज पूरा निकल आये, फिर 6 रक्'अत चाशत के वक़्त (क़रीबन 10 बजे सुबह) इसके बाद 6 रक्'अत ज़वाल के क़रीब और 2 रक्'अत ज़वाल के बाद फ़रीज़ा से पहले पढ़े या यह की पहली 6 रक्'अत को नमाज़े जुमा या ज़ोहर के बाद इस तरह बजा लाये जिस तरह फ़ुक़हा कि किताबों में ज़िक्र है! इसके अलावा और नमाज़ें भी मनक़ूल हैं जिनकी तादाद बहुत ज़यादा है और यहाँ हम इनमें से कुछ एक नमाज़ों का ज़िक्र करते हैं, अगरचेह इनमें से अक्सर नमाज़ें जुमा के दिन के साथ मखसूस नहीं हैं, लेकिन जुमा के दिन इनकी अदाएगी का सवाब यक़ीनन ज़यादा है!   

पहली नमाज़ : यह नमाज़े कामिला है चुनांचेह शेख, सैय्यद, शहीद, अल्लामा, और दुसरे लोगों ने मातेबर सनदों के साथ ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) से और इन्होने अपने आबा'ए-ताहेरीन से रिवायत कि है की रसूल अल्लाह ने फरमाया, "जो शख्स जुमा के दिन ज़वाल से पहले 4 रक्'अत नमाज़ पढ़े जिसकी हर रक्'अत में 10 मरतबा सुराः हम्द और आयत अल'कुर्सी, सुराः क़ाफेरून, सुराः तौहीद, सुराः फलक, और सुराः नास में से हर सुराः 10 मरतबा पढ़े" एक रिवायत के मुताबिक़ इनके साथ सुराः क़द्र और आयत शहेद'अल्लाहो ( شَھِدَاللهُ ) भी 10 मरतबा पढ़े! यह 4 रक्'अत नमाज़ पढ़ने के बाद 100 मरतबा अस्तग़'फ़ीरूल्लाह (اَسْتَغْفِرُاللهَ) पढ़े और 100 मरतबा यह पढ़े :      

पाक है खुदा और हम्द खुदा ही के लिए है, खुदा के सिवा कोई माबूद नहीं और खुदा बुजुर्गतर है और नहीं कोई क़ुव्वत व ताक़त मगर वोह जो खुदाए बुज़ुर्ग व बरतर से है 

सुब्हान अल्लाहे व अलहम्दो लिल्लाहे व ला इलाहा इल्ला'अल्लाहो व अल्लाहो अकबर, व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहे अल'अलियो अल'अज़ीम  

سُبْحَانَ اللهِ، وَالْحَمْدُ للهِ وَلاَ إِلہَ إِلاَّ اللهُ، وَاللهُ أَکْبَرُ، وَلاَ حَوْلَ وَلاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِاللهِ الْعَلِیِّ الْعَظِیمِ۔

फिर सौ (100) मरतबा दरूद पढ़े, बस जो शख्स इस अमल को बजा लाये तो खुद इसको अहले आसमान, अहले ज़मीन के शर और शैतान के शर से और ज़ालिम हाकिमों के शर से भी महफूज़ रखेगा - इस रिवायत में इसके और भी फायेदे और फज़ीलतों का ज़िक्र हुआ है!

दूसरी नमाज़ : हारिस हमदानी ने अमीरुल मोमिनीन (अ:स) से रिवायत की है की अगर मुमकिन हो तो जुमा के दिन दस (10) रक्'अत नमाज़ पढ़े और रुकु और सजदे अच्छी तरह बजा लाये! इस दौरान में हर रक्'अत के बाद सौ (100) मरतबा "सुब्हान अल्लाहे व बे'हम्देही" ( سُبْحَانَ اللهِ وَبِحَمْدِہ ) पढ़े, इस नमाज़ की भी बहुत ज़यादा फ़ज़ीलत ब्यान कि गई है! 

तीसरी नमाज़ : मातेबर सनद के साथ ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) से मनक़ूल है की जुमा के दिन दो (2) रक्'अत नमाज़ पढ़े, जिसकी पहली रक्'अत में सुरः इब्राहीम और दूसरी रक्'अत में सुराः हजर की तिलावत करे, इस से वोह परेशानी, दीवानगी बल्कि हर बला व आफत से महफूज़ रहेगा!    

21. रोज़े जुमा के अमाल में से एक अमल यह भी है की ज़वाले आफताब (सूरज ढलने) के वक़्त वो दुआ पढ़ें जो ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) ने मोहम्मद बिन मुस्लिम को तालीम फ़रमाई थी! इसे हैम शेख की मिस्बाह से नक़ल कर रहे हैं!

 अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और अल्लाह बुज़ुर्ग व बरतर है, खुदा पाक है और हम्द खुदा ही के लिए है जिसने किसी को अपना बीटा नहीं बनाया और न ही सल्तनत में इसका कोई शरीक

है, न वो कमज़ोर है के कोई इसका सरपरस्त हो और इसकी बड़ाई ब्यान करो जिस तरह बड़ाई ब्यान करने का हक़ है 

ला इलाहा इल्ला अल्लाहो व अल्लाहो अकबर व सुब्हान अल्लाहे व अलहम्दो लिल्लाहे अल'लज़ी लम'यत्ता'ख़िज़ व्लादन व लाम यकुन लहू शरीकुन 

फ़ी अल'मुल्के व लाम यकुन लहू व लिय़ा मिन अल'ज़ल्ला व कब्बर'हो तक़बीरा 

 لاَ إِلہَ إِلاَّ اللهُ، وَاللهُ أَکْبَرُ، وَسُبْحَانَ اللهِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی لَمْ یَتَّخِذْ وَلَداً وَلَمْ یَکُنْ لَہُ شَرِیکٌ

فِی الْمُلْکِ، وَلَمْ یَکُنْ لَہُ وَ لِیٌّ مِنَ الذُّلِّ، وَکَبِّرْھُ تَکْبِیراً۔

फिर यह कहें:  

 ऐ कामिल नेमतों वाले 

मसाएब दूर करने वाले, ऐ जानदारों के पैदा करने वाले, ऐ बुलंद हिम्मतों वाले, ऐ तारीकियाँ दूर करने वाले, ऐ आता व बख्शीश के मालिक,  

दर्द व ग़म को दूर करने वाले, ऐ तारीकियों में खौफ़ज़दा लोगों का साथ देने वाले, ऐ वो आलिम जिस ने ईल्म हासिल नहीं किया, मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमतें नाज़िल फ़रमा और मुझ 

से वो बर्ताव कर के जो तेरे शायाने शान है, ऐ वो जिसका नाम दवा है, जिसका ज़िक्र शफ़ा है, जिसकी अताअत तवनगरी है, इस पर रहम फरमा जिसकी पूँजी उम्मीद और जिसका हथियार 

गिरया है, तू पाक है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, ऐ मेहरबानी करने वाले, ऐ आसमानों और ज़मीन के इजाद करने वाले,  

जलालत व बुज़ुर्गी के मालिक  

या साबेग़ा अल'न-अम या दाफ़े-अ अल' नक़म

या बारेया अल'नसम या अलिय़ा अल' हमम, या मुग़'शिया अल'ज़ल-लमे या ज़ा-अल' जुदे व अल'करमे, या काशेफ़ा अल'ज़र्रा व अल'अलमे    

या मोनेसा अल'मुस'तोहे शीना फ़ी' अल ज़ल'लमे या आलेमन ला यु'अल्लेमो सल्ले आला मोहम्मदीन व आले मोहम्म्दीन व अफ़'अल 

बी मा अन्ता अह'लोहू या मन असमोहु दवा'ओ व ज़िकरो-हु शिफ़ा'ओ व ता'अतोहु ग़ना'ओ इरहम मन रासो मालेही अर'रिजाओ

व सिलाहो'हु अल'बुकाओ, सुब्हानका ला इलाहा इल्ला अन्ता या हन्नानो या मन्नानो या बदी'अस समावाते व अल'अर्ज़ या 

ज़ुल'जलाले व अल'इकरामे     

 یَا سَابِغَ النِّعَمِ، یَا دَافِعَ النِّقَمِ،

یَا بَارِیَ النَّسَمِ، یَا عَلِیَّ الْھِمَمِ، یَا مُغْشِیَ الظُّلَمِ یَا ذَا الْجُودِ وَالْکَرَمِ یَا کَاشِفَ الضُّرِّ وَالْاَلَمِ،

یَا مُؤْنِسَ الْمُسْتَوْحِشِینَ فِی الظُّلَمِ، یَا عَالِماً لاَ یُعَلَّمُ، صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَافْعَلْ

بِی مَا أَ نْتَ أَھْلُہُ ۔ یَامَنِ اسْمُہُ دَوَاءٌ وَذِکْرُہُ شِفاءٌ وَطَاعَتُہُ غَناءٌ اِرْحَمْ مَنْ رَأْسُ مَالِہِ الرَّجَاءُ

وَسِلاَحُہُ الْبُکَاءُ، سُبْحانَکَ لاَ إِلہَ إِلاَّ أَ نْتَ یَا حَنَّانُ یَا مَنَّانُ یَا بَدِیعَ السَّمَاوَاتِ وَالْاَرْضِ یَا 

ذَا الْجَلاَلِ وَالْاِکْرَامِ ۔

22. जुमा के दिन नमाज़े ज़ोहर के फ़रीज़ा में सुराः मुनाफ़ेक़ून और असर के फ़रीज़ा में सुराः जुमा व सुराः तौहीद पढ़ें! शेख सदूक़ (अ:र) ने ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) से रिवायत की है के आप ने फरमाया के जो चीज़ें हर शिया मोमिन पर वाजिब व लाज़िम हैं उनमें से एक यह है इनमें से एक यह है के वो शबे जुमा कि नमाज़ में सुराः जुमा और सुराः आला और जुमा कि नमाज़े ज़ोहर में सुराः जुमा और सुराः मुनाफ़ेक़ून पढ़े! जिस ने यह अमल अंजाम दिया गोया उसने हज़रत रसूल (स:अ:व:व) का अमल अंजाम दिया है और खुदा की तरफ से इसकी जज़ा बहिश्त है! शेख कुलिनी ने हसन से सनद किया है (जो सही'अ) कि तरह है हल्बी से रिवायत की है के मैंने ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) से पुछा अगर मैं जुमा के दिन तनहा नमाज़ पढूँ यानि नमाज़े जुमा न बजा लाऊँ और चार (4) रक्'अत नमाज़े ज़ोहर पढूं तो क्या मैं आवाज़ के साथ क़िर'अत कर सकता हूँ? आप ने फरमाया हाँ, कर सकते हो मगर रोज़े जुमा सुराः जुमा व सुराः मुनाफ़ेक़ून के साथ पढ़ो!

23. शेख तूसी (अ:र) मिस्बाह में जुमा के दिन ज़ोहर के बाद की ताक़ीबात के बारे में ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) से रिवायत करते हैं के जो शख्स रोज़े जुमा बाद सलाम के बाद नीचे लिखी सुराः और आयतों को पढ़े तो वो इस जुमा से आगे आने वाले जुमा तक दुश्मनों के शर और दुसरी आफ़तों से महफूज़ रहेगा, यानि सुराः:हम्द, सुराः:नास, सुराः:फ़लक, सुराः:तौहीद, सुराः:काफेरून सात-सात (7-7) मरतबा पढ़ें और आखिर में सुराः:तौबा में लक़द जा'आ कुम रसूल ( لَقَدجَاءَ کُم رَسُولُ ) से आखिर तक, सुराः हशर के लौ अनज़लना हाज़ल क़ुर'आन ( لَو اَنزَ لناَ ھذَاالقُرآنَ) से आखिर तक, और सुराः:आले इमरान की पाँच आयत इन्ना फ़ी ख़ल'किस समावाते वल अर्ज़ ( اِنّ فی خَلقِ السّمواتِ وَا لاَرضِसे इन्नका ला तुख़'ली-फ़ुल मियाद ( اِ نَّکَ لا تُخلِفُ المِیعَادَ) तक पढ़े!

24. ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) का फ़रमान है की जो शख्स जुमा के रोज़ नमाज़े फ़ज्र या ज़ोहर के बाद कहे :       

ऐ माबूद, मोहम्मद व आले मोहम्मद के लिए अपनी रहमत और अपने फरिश्तों और रसूलों कि दुआएँ मखसूस फरमा दे        

अल्लाहुम्मा अज'अल सलावातेका व सला'वता मला'इकतेका व रोसोलेका अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मदीन 

 اَللّٰھُمَّ اجْعَلْ صَلَواتِکَ وَصَلٰوةَ ملَاٰئِکَتِکَ وَرُسُلِکَ عَلیٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ۔

फिर यह फरमाया जो शख्स नमाज़े फ़ज्र या ज़ोहर के बाद यह कहे तो एक साल तक इसका कोई गुनाह नहीं लिखा जाएगा! 

ऐ माबूद, मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमत फ़रमा और इनके ज़हूर में ताजील फ़रमा          

अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन आले मोहम्मदीन अज्जल फ़रा'जोहुम 

اَللَّھُمَ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَعَجِّل ْفَرَجَھُم۔

तो उसे उस वक़्त तक मौत नहीं आएगी जब तक वो ईमाम ज़माना (अ:त:फ़) का दीदार न कर ले! मो'अलिफ़ कहते हैं की अगर कोई शख्स जुमा के रोज़ नमाज़ें ज़ोहर के बाद पहली दुआ को तीन (3) बार पढ़े तो वो आने वाले जुमा तक सख्तियों से अमां में रहेगा! रिवायत में और भी है के जो शल्स् जुमा के दिन दो नमाज़ों के बीच मोहम्मद (स:अ:व:व) व आले मोहम्मद (अ:स) पर दरूद भेजेगा तो उसको सत्तर (70) रक्'अत नमाज़ के बराबर सवाब हासिल होगा!

25. "या मन यरहमो मन ला तर'हमोहुल इबाद" (یاَ مَن یَرحَمُ مَن لَا تَرْحَمُہُ العِبَادُ) और अल्लाहुम्मा हाज़ा यौमुम मुबारकों (اَللّٰھُمَّ ھذَا یَومٌ مُّبَارَکٌ ) से शुरू होने वाली दोनों दुआएँ पढ़े! यह दुआ सहीफ़ा कामेल में मौजूद हैं 

26. शेख ने मिस्बाह में अ'ईम्मा (अ:स) से रिवायत की है के जो शख्स रोज़े जुमा बाद से नमाज़े ज़ोहर तक दो (2) रक्'अत नमाज़ पढ़े जिसकी हर रक्'अत में सुराः हम्द के बाद सात (7) मरतबा सुराः तौहीद कि तिलावत करे और नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़े :   

ऐ माबूद, मुझे जन्नत वालों में से क़रार दे जिस को बरकतों ने पुर किया हुआ है जिसको आबाद करने वाले फ़रिश्ते और इनके साथ

हमारे नबी हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) और हमारे बाप इब्राहीम (अ:स) हैं 

अल्लाहुम्मा अज'अलनी मिन अहलिल' जन्नते अल'लती हश'ओहा अल'बराकातोह 

व उम्मारो हा अल'मलाइकतो माआ नबिय्यना मोहम्मदीन सल'अल्लाहो अलैहे व आलेही व आबियना इब्राहीमा  

 اَللّٰھُمَّ اجْعَلْنِی مِنْ أَھْلِ الْجَنَّةِ الَّتِی حَشْوُھَا الْبَرَکَةُ وَعُمَّارُھَاالْمَلائِکَةُمَعَ نَبِیِّنا

مُحَمَّدٍ صَلَّی اللهُ عَلَیْہِ وَآلِہِ وَأَبِینَا إِبْراھِیمَ  ۔

तो इस तक इस जुमा से अगले जुमा तक बला व आफत नहीं पहुंचेगी और क़यामत में रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) और हज़रात इब्राहीम (अ:स) के साथ होगा! अल्लामा मज्लिसी कहते है के अगर ग़ैर सैय्यद इस दुआ को पढ़े तो वोह व आबीना की बजाये व अबीहे कहे  :   

27. रिवायत है की रोज़े जुमा दरूद पढ़ने के बेहतरीन वक़्त नमाज़े असर के बाद है, लिहाज़ा सौ (100) मरतबा कहे : 

ऐ माबूद, मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमत नाज़िल फरमा और इनके ज़हूर में ताजील फरमा  

अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन आले मोहम्मदीन अज्जल फ़रा'जोहुम 

 اَللَّھُمَ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَعَجِّل ْفَرَجَھُم ۔

 

शेख फरमाते हैं के एक रिवायत है के सौ (100) मरतबा यह भी कहना मुस्तहब है : 

खुदा की रहमत और मलाइका व अम्बिया और रसूलों और तमाम मख्लूक़ का दरूद हो मोहम्मद व आले मोहम्मद पर और सलाम हो हज़रत मोहम्मद पर और इन 

सब पर और इनकी रूहों और इनके जिस्मों पर और अल्लाह कि रहमतें और बरकतें हों   

सलवातो अल्लाहे व मलाइकतेही व अंबिया' एही व रोसुलेहि व  जमी'ए खल' केहीं अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मदीन व अस'सलामो अलैही 

व अलैहिम व अला अरवा'हेहिम व अजसा देहीम व रहमत'अल्लाहे व बराकातोहु 

صَلَوَاتُ اللهِ وَمَلاَئِکَتِہِ وَأَنْبِیَائِہِ وَرُسُلِہِ وَجَمِیعِ خَلْقِہِ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ وَالسَّلاَمُ عَلَیْہِ 

وَعَلَیْھِمْ وَعَلَی أَرْواحِھِمْ وَأَجْسادِھِمْ وَرَحْمَةُ اللهِ وَبَرَکَاتُہُ۔

 

शेख जलील इब्न इदरीस ने सराइर् में जामे'अ बज़नती से नक़ल किया है के अबु बसीर का कहना है के मैंने ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) को यह फरमाते हुए सुना : "ज़ोहर व असर के दरम्यान आले मोहम्मद पर दरूद भेजना सत्तर (70) रक्'अत नमाज़ के बराबर है"! जो शख्स रोज़े जुमा असर के बाद मोहम्मद व आले मोहम्मद पर यह सलवात पढ़े तो इसका सवाब इसे जिन और इंसानों के इस दिन के अमाल के बराबर मिलेगा!

 ऐ माबूद! मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमतें फ़रमा के जो तेरे पसंदीदा औसिया हैं अपनी बेहतरीन रहमतों के साथ और इनपर बरकत नाज़िल फ़रमा 

अपनी बेहतरीन बरकतों से और सलाम हो इनपर और इनकी रूहों पर और इनके जिस्मों पर और खुदा कि रहमतें और बरकतें हों 

अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद  अल' औसियाए अल' मर्ज़ी' ईना बे'अफ़ज़ल सलवातेका व बारिक अलैहीम 

बे'अफ़ज़ल बराकातेका व अस'सलामो अलैहिम व अला अरवा'हेहिम व अजसा देहीम व रहमत'अल्लाहे व बराकातोहु  

اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ الْاَوْصِیَاءِ الْمَرْضِیِّینَ بِأَفْضَلِ صَلَوَاتِکَ وَبَارِکْ عَلَیْھِمْ 

بِأَفْضَلِ بَرَکَاتِکَ وَاَلسَّلاَمُ عَلَیْھِمْ وَعَلَی أَرْوَاحِھِمْ وَأَجْسَادِھِمْ وَرَحْمَةُ اللهِ وَبَرَکاتُہُ

 

मो'अलिफ़ कहते हैं : यह सलवात माशा'ईख हदीस कि किताब में बहुत हवालों और बहुत ही ज़यादा फ़ज़ीलतों के साथ नक़ल हुई है, बस इसे दस (10) मरतबा या सात (7) मरतबा पढ़ें तो अफ़ज़ल है क्योंकि ईमाम जाफर सादिक़ (अ:स) का फरमान है के जो शल्स् जुमा के दिन असर कि नमाज़ के बाद अपनी जगह से हरकत करने से पहले अगर इस सलवात को दस (10) मरतबा पढ़े तो इस जुमा से अगले जुमा कि इस घड़ी तक मलाइका इसके लिए फ़ज़ल व रहमत मांगते रहेंगे! इसके इलावा हज़रत से यह रिवायत भी हुई है के जुमे के दिन नमाज़े असर के बाद इस सलवात को सात (7) मरतबा पढ़ो और अल'काफ़ी में शेख कुलिनी (अ:र) ने रिवायत की है के जब रोज़े जुमा नमाज़ पढ़ लो तो यह सलवात पढ़ो:

ऐ माबूद! मोहम्मद व आले मोहम्मद पर रहमतें फ़रमा के जो तेरे पसंदीदा औसिया हैं अपनी बेहतरीन रहमतों के साथ और इनपर बरकत नाज़िल फ़रमा  

अपनी बेहतरीन बरकतों से और सलाम हो इनपर और इनकी रूहों पर और इनके जिस्मों पर और खुदा कि रहमतें और बरकतें हों 

अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मद  अल' औसियाए अल' मर्ज़ी' ईना बे'अफ़ज़ल सलवातेका व बारिक अलैहीम 

बे'अफ़ज़ल बराकातेका व अस'सलामो अलैहे व अलैहिम व रहमत'अल्लाहे व बराकातोहु  

 اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ الْاَوْصِیَاءِ الْمَرْضِیِّینَ بِأَفْضَلِ صَلَوَاتِکَ وَبَارِکْ عَلَیْھِمْ

بِأَفْضَلِ بَرَکَاتِکَ وَاَلسَّلاَمُ عَلَیْہِ وَعَلَیْھِمْ وَرَحْمَةُ اللهِ وَبَرَکاتُہُ۔

इस में शक नहीं के जो स्शख्स नमाज़े असर के बाद सलवात पढ़े तो खुद इसको एक लाख नेकी आता करेगा और इसकी एक लाख बदी (बुराइयाँ) मिटा देगा, इसकी एक लाख हाजत पूरी होगी, और एक लाख दर्जा बुलंद किया जाएगा, इसके अलावा यह रिवायत भी है के जो शख्स सात मरतबा यह सलवात पढ़े तो इसके लिए तमाम इंसानों कि तादाद के बराबर नेकियाँ लिखी जाएंगी और इस रोज़ इसका अमल मक़बूल होगा और वो क़यामत के दिन नूरानी चेहरे के साथ आएगा, इसके अलावा अमाल रोज़े अरफ़ा में एक सलवात है (ज़िल'हिज्ज के महीने का अमाल), जो शल्स् इस सलवात को पढ़े वो मोहम्मद व आले मोहम्मद को खुश करेगा!

28. जो शख्स असर के बाद सत्तर (70) मरतबा इस्तग़फ़ार पढ़े तो इसके गुनाह बख्श दिए जायेंगे और वो इस्तग़फ़ार यह है : 

मैं अल्लाह से बख्शीश चाहता हूँ और इसके हुज़ूर तौबा करता हूँ 

अस्तग़'फ़िरो अल्लहा व आतुबो इलैहे 

 اَسْتَغْفِرُاللهَ وَاَتُوْبُ اِلَیٰہ ۔

29. सौ (100) मरतबा सुराः क़द्र पढ़ें, ईमाम मूसा काज़िम (अ:स) से रिवायत है के जुमा के दिन खुद की हज़ार नसीमे रहमत हैं के इनमें से जिस क़द्र चाहे अपने किसी बन्दे को आता करता है! बस जो शख्स जुमा के दिन असर के बाद सौ (100) मरतबा सुराः क़द्र पढ़े तो इसे यह हज़ार रहमत दोगुनी करके इनायत की जायेगी!

30. दुआए अशरात पढ़ें

31. शेख तुसी फरमाते हैं की जुमा के दिन असर से सूरज के डूबने तक दुआ क़बूल होने का वक़्त है, बस इस वक़्त ज़यादा से ज़यादा दुआ किया करें! रिवायत है के दुआ की मंज़ूरी और क़बूलियत का ख़ास वक़्त वो है जब सूरज आधा छुपा और आधा चमक रहा हो! हज़रात फ़ातिमा ज़हरा (स:अ) इसी वक़्त दुआ किया करती थीं! इसलिए इस ख़ास वक़्त में दुआ करना बहुत बेहतर है और मुनासिब है के इनकी क़बूलियत कि घड़ियों में रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) कि दी हुई यह दुआ पढ़ें :      

तू पाक है तेरे सिवा कोई माबूद नहीं ऐ मेहरबानी करने वाले, ऐ एहसान करने वाले, ऐ आसमानों और ज़मीन को इजाद करने वाले, ऐ जलालत व बुज़ुर्गी के मालिक  

सुब्हानका ला इलाहा इल्ला अन्ता या हन्नानो या मन्नानो, या बदी'अस समावाते वल अर्ज़े, या ज़ूल'जलाले वल'इकराम  

 سُبْحَانَکَ لاَإِلہَ إِلاَّأَنْتَ یَاحَنَّانُ یَامَنَّانُ، یَابَدِیعَ السَّمَاوَاتِ وَالْاَرْضِ یَاذَاالْجَلالِ وَالْاِکْرامِ۔

रोज़े जुमा के आखिरी वक़्त में दुआ के क़बूलियत के वक़्त दुआए सीमात पढ़ें! आपको यह मालूम रहे के जुमा का दिन कई मुनासिबतों से ईमाम अल'असर (अ:त:फ़) से ताल्लुक़ रखता है, पहले तो यह कि हज़रत कि विलादत बा'सआदत इसी रोज़ हुई, दुसरे यह के आपका ज़हूर पुर'नूर भी इसी दिन होगा,  दुसरे दिनों के मुक़ाबले इस दिन हज़रत के ज़हूर का इंतज़ार ज़यादा है! जुमा के रोज़ हज़रत की ज्यारत क ज़यारत के पेज पर देखें, इस ज्यारत के चंद जुमले यह हैं :   

यह रोज़े जुमा है और यह वही दिन है जिसमें की इंतज़ार  है और जिस दिन आप के हाथों मोमिनों को आसूदगी होगी

हाज़ा यौमुल जुम'अते व हुवा यौमुका अल मुता'वक़ क़-ओ फ़ीहे ज़हुरोका व अल'फ़र्ज़ो फ़ीहे लिल'मोमिनीना अला यदेका 

 ھذَایَوْمُ الْجُمُعَةِ وَھُوَیَوْمُکَ الْمُتَوَقَّعُ فِیہِ ظُھُورُکَ وَالْفَرَجُ فِیہِ لِلْمُؤْمِنِینَ عَلَی یَدِکَ۔

बल्कि जुमा के रोज़ ईद क़रार पाने और चार ईदों में गिनी जाने की सबसे बड़ी वजह यह है के इस रोज़ ईमाम अल'असर (अ:त:फ़) ज़मीन को कुफ्र व शिर्क कि गंदगी, गुनाहों की ज्यादती और जाबिरों, मुकरों और मुनाफ़िक़ों के वजूद से पाक करेंगे और और आला कलमा-ए-हक़ और इज़हारे दीन व शरीयत के बाईस मोमिनीन के दिल इस दिन रौशन व मुनव्वर और मसरूर होंगे!

और ज़मीन अपने परवरदिगार के नूर से चमक उठेगी

व अश'क़ते अल'अरज़ा बे नूर रब'बहा 

 وَاَشْرَقَتِ الْاَرْضَ بِنُوْرِرَبِھَا۔

बेहतर है के इस दिन सलवात कबीर और साहिब-उल-अम्र (अ:त:फ़) के लिए ईमाम अली रज़ा (अ:स) की फ़रमाई हुई यह दुआ पढ़ें : 

(यह दुआ अमाल सरदाब में ज़िक्र की जायेगी

अल्लाहुम्मा अदफ़ा'अ अन वलीयेका व ख़लीफ़तेका

 اَللّٰھُمَّ ادْفَعْ عَنْ وَلِیِّکَ وَ خَلیفَتِکَ

इसके अलावा क़ायम आले मोहम्मद (अ:स) के ज़माना-ए-ग़ीबत में वो दुआ पढ़ें जो शेख अबु उम्र व उमरवी ने अबु अली इब्न हमाम को लिखवाई थी, चूंकि सलवात कबीर और यह दुआ दोनों बहुत लम्बी हैं लिहाज़ा यहाँ इनकी गुंजाइश नहीं है! शौक़ रखने वाले इस सिलसिले मेंमिस्बाहुल मुतह्जिद और जमालुल सबूअ को पढ़ें! अलबत्ता मुनासिब यह है के हैम यहाँ अबुल हसन ज़राब इस्फ़हानी के तरफ मंसूब सलवात का ज़िक्र करेंगे जिसे शेख व सैय्यद ने जुमा के असर के अमाल में नक़ल फरमाया है! सैय्यद फरमाते हैं के यह सलवात ईमाम ज़माना (अ:त:फ़) से रिवायत हुई है! अगर रोज़े जुमा किसी वजह से जुमा के असर कि दूसरी ताक़ीबात (दुआएं) न पढ़ सकें तो भी इस सलवात का पढ़ना कभी तर्क न करें, इस खसूसियत कि वजह से के जिस से खुद ने हमें आगाह किया है, फिर इन्होने सलवात के साथ इसकी सनद भी नक़ल की है, लेकिन मिस्बाह में शेख ने फरमाया है के यह सलवात हज़रत ईमाम ज़माना (अ:त:फ़) से रिवायत हे के जिसे आपने अबुल हसन ज़राब इस्फ़हानी को मक्का में तालीम फरमाई थी और हम ने इख्तेसार के मद्देनजर इसकी सनद को ज़िक्र नहीं किया और वोह सलवात यह है :    

शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है 

बिस्मिल्लाह अर'रहमान अर'रहीम 

بِسْمِ اللهِ الرَحْمنِ الرَحیمْ

ऐ माबूद! हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) पर रहमत नाज़िल फ़रमा जो रसूलों के सरदार और आखिरी नबी हैं और आलमीन के पालने वाले की हुज्जत हैं 

वोही जो रोज़े मीसाक़ में बर'गुज़ीदा, आलमे ईसबाह में मुन्तखिब, हर आफत से दूर, हर ऐब से 

पाक, निजात के लिए उम्मीदगाह, शिफा'अत का सहारा, के अल्लाह का दीन इन्हीं के सुपुर्द हुआ है! ऐ माबूद!

मोहम्मद कि ज़ात को बुलंदी, इनकी बुरहान को अज़मत इनकी हुज्जत को कामयाबी, इनके दर्जे को रफ'अत अता फ़रमा, इनके नूर को चमक और इनके चेहरे को रौशनी दे! इनको फज़ीलत 

बुज़ुर्गी, वसीला और बुलंद दर्जा अता फ़रमा,! और इन्हें मुक़ाम महमूद पर फ़ायज़ फ़रमा के इनपर अगले और पिछले सभी रश्क करें, और अमीरुल मोमिनीन (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो रसूलों 

के वारिस, रौशन चेहरे वालों के रहनुमा, वसियों के सरदार और आलमीन के पालने वाले की हुज्जत हैं और हसन (अ:स) इब्ने अली (अ:स)

पर रहमत नाज़िल फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा, रसूलों के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैं 

और हुसैन (अ:स) इब्न अली (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा, मुर्सलीन के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैं

और अली (अ:स) इब्न हुसैन (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवामुर्सलीन के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैं 

और मोहम्मद (अ:स) इब्न अली (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा, मुर्सलीन के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैं 

और जाफ़र (अ:स) इब्न मोहम्मद (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा, मुर्सलीन के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैं 

और मुसा (अ:स) इब्न जाफ़र (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा, मुर्सलीन के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैं, और अली (अ:स) इब्न मूसा (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा

मुर्सलीन के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैंऔर मोहम्मद (अ:स) इब्न अली (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा, मुर्सलीन के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैं 

और अली (अ:स) इब्न मोहम्मद (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा, मुर्सलीन के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैं

और हसन (अ:स) इब्न अली (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा, मुर्सलीन के वारिस, और आलमीन के रब की हुज्जत हैं

और ख़लफ़ हादी व मेहदी (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो मोमिनों के पेशवा, नबियों के वारिस, और आलमीन के 

रब की हुज्जत हैं! ऐ माबूद! हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) और इनके अहलेबैत (अ:स) पर रहमत फ़रमा जो हिदायत करने वाले ईमाम (अ:स), हक़ गो उल्मा

नेकोकार, परहेज़गार, तेरे दीन के सतून, तेरी तौहीद के इरकान, तेरी वही के तर्जुमान, तेरे मख़लूक़ पर तेरी 

हुज्जत और ज़मीन पर तेरे नायब हैं,! जिनको तूने अपनी ज़ात के लिए चुना, अपने बन्दों पर इन्हें बुज़ुर्गी दी, अपने दीन के लिए 

इन्हें पसंद किया, अपनी मारेफ़त में इन्हें ख़सूसियत बख्शी, अपने करम से इन्हें बुज़ुर्ग बनाया! इनको अपनी रहमत के साये में ढांप लिया 

अपनी नेमत से इनकी तरबियत की, अपनी हिकमत कि ग़ज़ा दी और इन्हें अपने नूर का लिबास पहनाया, अपने मलकूत में बुलंद किया और इन्हें    

अपने फरिश्तों से घेरे रखा और अपने नबी के ज़रिये इन्हें इज़'ज़त दी! मोहम्मद पर (स:अ:व:व) और इनकी आल (अ:स) पर तेरी रहमत हो! ऐ माबूद मोहम्मद पर (स:अ:व:व) और अ'इम्मा (अ:स) पर रहमत फ़रमा, वोह रहमत 

जो पाकीज़ा बढ़ने वाली, कसीर, दाएमी और पसंदीदा हो, और सिवाए तेरे कोई इसका अहाता न कर सके, और जो तेरे ही ईल्म सके, और सिवाए तेरे कोई इसका 

अंदाजा न कर सके, और ऐ माबूद! अपने वली पर रहमत फ़रमा जो तेरे अम्र को क़ाएम करना वाला, तेरी शरीयत को ज़िन्दा करने वाला, तेरी तरफ़ बुलाने वाला, तेरी तरफ़ 

रहनुमाई करने वाला, तेरे मख्लूक़ पर तेरी हुज्जत, तेरी ज़मीन पर तेरा ख़लीफ़ा और तेरे बन्दों पर तेरा गवाह है! ऐ माबूद! इसकी नुसरत में इज़ाफा और इसकी उम्र तुलानी 

फ़रमा और  इसकी तुलानी बक़ा से ज़मीन को ज़ीनत दे! ऐ माबूद! इसे हासिदों के ज़ुल्म से बचा, मक्कारों के फ़रेब से महफूज़ रख, इसके बारे में ज़ालिमों 

के इरादे को नाकाम बना दे, इस जाबिरों के हाथों से रिहाई दे! ऐ माबूद! अपने वली को वो चीज़ें दे और इसकी औलाद, इसके शियों, इसकी 

रैय्यत, इसके ख़ास व आम साथियों को इसके दुश्मनों को और तमाम दुन्या वालों को वोह चीज़ें दे जिन से इसकी आँखों को ठंडक और दिल को चैन मिले और इसकी 

बेहतरीन उम्मीदों को दुन्या व  पूरा फार्मा! बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर है! ऐ माबूद! इसके जरिया दीन कि छुपी बातों को ज़ाहिर फ़रमा! इसके हाथों 

अपनी किताब के बदले गए अहकाम ज़िंदा फ़रमा! तेरे अहकाम जो तब्दील हो चुके हैं इसके ज़रिये इन्हें ज़ाहिर फ़रमा के तेरा दीन ताज़ा हो जाए और इस वली के हाथों 

दीन नै शान से पाक व खालिस हो जाए के इसमें कोई शक व शुब्हा न रहे! न इसमें बातिल रहे और न बिद'अत मौजूद हो! ऐ माबूद! अपने वली के 

नूर से तारीकियों को रौशनी दे, इसकी क़ुव्वत से हर बिद'अत को मिटा दे, इसकी ईज़ज़त के वास्ते से हर गुमराही ख़तम कर दे, इसके ज़रिये  

हर जाबिर कि कमर तोड़ दे, इसकी तलवार से हर फ़ितने कि आग बुझा दे, इसके अदल के ज़रिये हर ज़ालिम के ज़ुल्म को ख़तम कर दे! इसके हुक्म को हर हुक्म 

से बाला'तर कर दे, और इसकी सल्तनत के ज़रिये हर सुलतान कोपासत कर दे! ऐ माबूद! अपने वली के हर मुखालिफ को हेच कर दे और इसके 

दुश्मनों को हलाक कर दे, जो इसे धोका दे उसको नाकाम कर दे, जो इसके हक़ का मुन्किर हो इसकी जड़ काट दे, और इसके हुक्म को अहमियत न 

दे जो इसके नूर को बुझाने को कोशिश करता रहे और इसके ज़िक्र को मिटाने कि ईरादा करे, ऐ माबूद मोहम्मद मुस्तफ़ा (स:अ:व:व) पर रहमत फ़रमा और अली 

मुरतज़ा (अ:स), फातिमा ज़हरा (स:अ), हसन मुज्तबा (अ:स) और हुसैन (अ:स) मुस्फ़्फ़ा और आँ'हज़रत के तमाम औसिया पर रहमत फ़रमा! जो रौशन चिराग़ और हिदायत के निशान 

तक़वा के मिनार, मज़बूत रस्सी, पायेदार डोरी और सिरात मुस्तक़ीम हैं! और अपने वली अली (अ:स) पर रहमत फ़रमा! और इनके जानशीनों पर जो इनकी औलाद 

में से ईमाम (अ:स) हैं इनकी उम्रें दराज़ फ़रमा, इनकी मुद्द्त में इज़ाफ़ा कर दे और इनकी तमाम उम्मीदें पूरी फ़रमा जो दुन्या व आख़ेरत से मुत'अल्लिक़ हैं के बेशक 

तू हर चीज़ पर क़ादिर है 

अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन सैय्यदिल मुर्सलीना, व ख़ातिमे अल'नबीएना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीन अल'मुन्ता'जबे फ़ी 

अल'मीसाक़, अल'मुस्तफ़ा फ़ी अज़'ज़ल्लाल, अल'मुतह'हर मिन कुल्ला आ'फ़तिन अल-बरी'ए मिन कुल्ला ऐबिन अल'मुवमम्लो लिल'निजाते 

अल'मुर्तजा लिल'शिफ़ा-अते अल'मुफ़व'वज़ इलैहे दीनो अल्लाहे, अल्लाहुम्मा शर'रफ़ बुन्या'नहु व अज़-ज़म बुरहा'नहु व अफ़'लिज हुज्जातोहु 

व अरफ़ा'अ दरा'जातोहु व आज़ी-अ नूराहो व बैय्याज़ वज'हहु व आतेही अल'फ़ज़ला व अल'फ़ज़ीलते व अल'मन्ज़े लता व अल'वसी'लता व अल'दर्जातह 

अल'रफ़ियातह व अब'असाहु मक़ामन महमूदन यग़'बतोहु बेही अल'अव्वालूना व अल'आख़ेरूना व सल्ले अला अमीरुल मोमिनीना व वारिसे 

अल'मुर्सलीना व क़ायेदिल ग़ुर्रा अल'मुहज-जेलिना व सैय्यदे अल'वसी'इना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला अल'हसन 

इब्न अलीयन ईमाम अल'मोमिनीना व वारिसे अल'मुर्सलीना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला अल'हुसैन इब्न अलीयन 

ईमाम अल'मोमिनीना व वारिसे अल'मुर्सलीना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला इब्न अल'हुसैन ईमाम  

अल'मोमिनीना व वारिसे अल'मुर्सलीना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला मोहम्मद इब्न अलियिन ईमाम अल'मोमिनीना 

व वारिसे अल'मुर्सलीना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला जाफ़र इब्न मोहम्मदीन ईमाम अल'मोमिनीना व वारिसे 

अल'मुर्सलीना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला मूसा इब्न जाफ़र ईमाम अल'मोमिनीना व वारिसे अल'मुर्सलीना 

व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला अली इब्न मूसा ईमाम अल'मोमिनीना व वारिसे अल'मुर्सलीना व हुज्जते

रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला मोहम्मद इब्न अलीयिन ईमाम अल'मोमिनीना व वारिसे अल'मुर्सलीना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना

व सल्ले अला अली इब्न मोहम्मदीन ईमाम अल'मोमिनीना व वारिसे अल'मुर्सलीना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला 

अल'हसन इब्न अलीयिन ईमाम अल'मोमिनीना व वारिसे अल'मुर्सलीना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला अल'ख़ल'फ़े

अल'हादी अल'महदीया ईमाम अल'मोमिनीना व वारिसे अल'मुर्सलीना व हुज्जते रब्बा अल'आलामीना व सल्ले अला

मोहम्मदीन व अहलेबैतेही अल'अ-इम्मते अल'हादीना अल'उलमाए अल'सादेक़ीना अल'अबरार अल'मुत्तक़ीना द'आ-इमे दीनेका व अरकाने 

तौहीदेका व तरा'जेमाते वह'येका व हुजाजेका अला ख़ल'क़ेका व ख़ुल'फ़ायेका फ़ी अर्ज़ेका अल'लज़ीना 

अख़'तर-तहूम ले'नफ़सेका व अस्तफ़ै'तहूम अला इबादेका व अर'तज़ै-तहूम ले-दीनेका व ख़-सस'तहूम बे'मारेफ़तेका व 

जल'लल-तहूम बे-करा'मतेकाव ग़श-शै'तहूम बे'रहमतेका व रब्बै'तहूम बे'नेमतेका व ग़ज़'ज़ै-तहूम बे'हिक्मतेका व अलबस्ता-हुम

नूराका, व रफ़'अतोहुम फ़ी मलकू'तेका व हफ़फ़-तहूम बे'मलाइकतेका व शर्रफ़'तहूम बे'नबियेका सलवातोका अलैही 

व आलेही अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन व अलैहीम सलाता ज़ाकी'यतन नामी'यतन, कसी'रतन दायमा'तन तय्ये'बतन, ला यूहीतो बेहा 

इल्ला अन्ता व ला यस'ओहा इल्ला इल्मोका व ला युह'सीहा आ'अहदो ग़ैरोका, अल्लाहुम्मा व सल्ले आला व ली-याका 

अल'महयी सुन्नताका अल'क़ाइमे बे'अम्रिका अल'दायी इलैका अल'दलील अलैका हुज्जतेका अला खल'क़ेका व 

ख़लीफ़तेका फ़ी अर्ज़ेका व शाहिदेका अला इबादिका, अल्लाहुम्मा अ'ईज़-ज़ा नस'रहु व मुददा फ़ी उमरेह व ज़ैय्याने 

अल'अर्ज़ा बतूल बक़ा'एही, अल्लाहुम्मा अक्फ़ेही बग़'आ अल'हासेदीना, व-अ'इज़हो मिन शर्रा अल'कायदीना व अज़'जुर अन्हो 

इरा'दता अल'ज़ालेमीना व ख़ल'लस-हो मिन ऐदी अल'जब्बारीना, अल्लाहुम्मा आ'तेही फ़ी नफ़सेही व ज़ुर्री'यतेही व शी'अतेही व रैय्यते 

व ख़ासा'तेही व आम्मा'तेही व अदूवेही व जमीए अहली अल'दुन्या मा तुक़र-रबेही ऐ-नहु व तसुर्रा'बेही नफ़साहु व बल्लग़'हु अफ़'ज़ला मा अम्मा'लहू 

फ़ी अल'दुन्या व अल'आख़िरते इन्नका अला कुल्ले शै'इन क़दीर, अल्लाहुम्मा जद'दद बेह मा अम्तहा मिन दीनेका व अह'यी 

बेही मा बुद'दला मिन किताबेका व अज़हर मा ग़ुई'यरा मिन हुक्मेका हत्ता या'ऊदा दीनेका बेहि व अला यदैह 

ग़ज़'ज़न जदीदन ख़ालेसन मुख़'लसन ला शक्का फ़ीहे व ला शुब्हा मा'अहु व ला बातेला इंदाहु व ला बिद'अते ला'दैह 

अल्लाहुम्मा नव्वर बे'नूरेही कुल्ला ज़ुलमतिन व हुद'दा बे'रुक्नेही कुल्ला बिद'अतिन व अहदिम बे'इज़-ज़ेही कुल्ला ज़ला'लतिन व अक़सीम बेहि कुल्ला

जब्बारिन व अख़'मिद बे'सैफ़ेही कुल्ला नारिन व अहलिक बे'अद्लेही जौरा कुल्ला जायरीन व आ'जर हुकमोहु आला कुल्ला हुक्मीन 

व अज़िल्ला बे'सुल्तानेही कुल्ला सुल्तानिन, अल्लाहुम्मा अज़िल्ला कुल्ला मन नावाहो व अहलिक कुल्ला मन आदाहो व अमकुर ब'मन 

कादाहो व अस्ता'सिल मन जह'दहु हक़क़ाहु व अस्ताहाना बे'अमरेह व सा'आ फ़ी इत्तफ़ाए नूरेही व अरादा इख़'मादा ज़िक्रेही

अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन अल'मुस्तफ़ा, व अलीयन अल'मुरतज़ा व फ़ातेमाः अल'ज़हरा व अल'हसन अर'रज़ा 

व अल'हुसैन अल'मुसफ़्फ़ा व जमीए अल'औसियाए मसाबीहे अल'दजा व अ'आलामे अल'हुदा व मनारे अल'तक़ा व अल'उर्वते 

अल'वुस्क़ा व अल'हब्ले अल'मतीने व अस'सिराते अल'मुस्तक़िमे व सल्ले आला वलिय्येका व वुलाते अह्देका व अल'अ-इम्मते मिन 

वुलदेहि व मुद'दफ़ी आ-अ'मारेहीम व ज़द'फ़ी आजालेहिम व बल्लग़'हुम अक़सा आमालेहिम दीनन व दुन्या व आख़ेरा, इन्नका 

आला कुल्ले शै'इन क़दीर 

 

اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ سَیِّدِ الْمُرْسَلِینَ، وَخَاتَمِ النَّبِیِّینَ، وَحُجَّةِ رَبِّ الْعَالَمِینَ،الْمُنْتَجَبِ فِی

الْمِیثَاقِ، الْمُصْطَفی فِی الظِّلالِ، الْمُطَہَّرِ مِنْ کُلِّ آفَةٍ، الْبَرِیءِ مِنْ کُلِّ عَیْبٍ، الْمُؤَمَّلِ لِلنَّجَاةِ،

الْمُرْتَجَی لِلشَّفاعَةِ، الْمُفَوَّضِ إِلَیْہِ دِینُ اللهِ۔ اَللّٰھُمَّ شَرِّفْ بُنْیَانَہُ وَعَظِّمْ بُرْھَانَہُ وَأَ فْلِجْ حُجَّتَہُ

وَارْفَعْ دَرَجَتَہُ وَأَضِیءْ نُورَھُ وَبَیِّضْ وَجْھَہُ وَأَعْطِہِ الْفَضْلَ وَالْفَضِیلَةَ وَالْمَنْزِلَةَ وَالْوَسِیلَةَ وَالدَّرَجَةَ  

الرَّفِیعَةَ وَابْعَثْہُ مَقَاماً مَحْمُوداً یَغْبِطُہُ بِہِ الْاَوَّلُونَ وَالاْخِرُونَ وَصَلِّ عَلَی أَمِیرِ الْمُؤْمِنِینَ، وَوَارِثِ

الْمُرْسَلِینَ وَقَائِدِ الْغُرِّ الْمُحَجَّلِینَ وَسَیِّدِ الْوَصِیِّینَ وَحُجَّةِ رَبِّ الْعَالَمِینَ وَصَلِّ عَلَی الْحَسَنِ

بْنِ عَلِیٍّ إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ وَوَارِثِ الْمُرْسَلِینَ وَحُجَّةِ رَبِّ الْعَالَمِینَ وَصَلِّ عَلَی الْحُسَیْنِ بْنِ عَلِیٍّ

إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ ووَارِثِ الْمُرْسَلِینَ وَحُجَّةِ رَبِّ الْعالَمِینَ وَ صَلِّ عَلَی عَلِیِّ بْنِ الْحُسَیْنِ إِمَامِ

الْمُؤْمِنِینَ وَوَارِثِ الْمُرْسَلِینَ، وَحُجَّةِ رَبِّ الْعالَمِینَ وَصَلِّ عَلَی مُحَمَّدِ بْنِ عَلِیٍّ إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ

وَوَارِثِ الْمُرْسَلِینَ وَحُجَّةِ رَبِّ الْعالَمِینَ وَصَلِّ عَلی جَعْفَرِ بْنِ مُحَمَّدٍ إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ وَوَارِثِ

الْمُرْسَلِینَ وَحُجَّةِ رَبِّ الْعالَمِینَ وَصَلِّ عَلَی مُوسَی بْنِ جَعْفَرٍ إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ وَوَارِثِ الْمُرْسَلِینَ

وَحُجَّةِ رَبِّ الْعالَمِینَ وَصَلِّ عَلَی عَلِیِّ بْنِ مُوسی إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ وَوَارِثِ الْمُرْسَلِینَ وَحُجَّةِ

رَبِّ الْعالَمِینَ وَصَلِّ عَلی مُحَمَّدِ بْنِ عَلِیٍّ إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ وَوَارِثِ الْمُرْسَلِینَ وَحُجَّةِ رَبِّ الْعالَمِینَ

وَصَلِّ عَلَی عَلِیِّ بْنِ مُحَمَّدٍ إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ وَوَارِثِ الْمُرْسَلِینَ وَحُجَّةِ رَبِّ الْعالَمِینَ وَصَلِّ عَلَی 

الْحَسَنِ بْنِ عَلِیٍّ إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ وَوَارِثِ الْمُرْسَلِینَ وَحُجَّةِ رَبِّ الْعالَمِینَ وَصَلِّ عَلَی الْخَلَفِ

الْہٰادِی الْمَھْدِیِّ إِمَامِ الْمُؤْمِنِینَ، وَوَارِثِ الْمُرْسَلِینَ، وَحُجَّةِ رَبِّ الْعالَمِینَ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی

مُحَمَّدٍ وَأَھْلِ بَیْتِہِ الْاَئِمَّةِ الْھَادِینَ الْعُلَماءِ الصَّادِقِینَ الْاَ بْرَارِ الْمُتَّقِینَ دَعَائِمِ دِینِکَ وَأَرْکَانِ

تَوْحِیدِکَ وَتَراجِمَةِ وَحْیِکَ وَحُجَجِکَ عَلَی خَلْقِکَ وَخُلَفَائِکَ فِی أَرْضِکَ الَّذِینَ

اخْتَرْتَھُمْ لِنَفْسِکَ، وَاصْطَفَیْتَھُمْ عَلَی عِبَادِکَ وَارْتَضَیْتَھُمْ لِدِینِکَ وَخَصَصْتَھُمْ بِمَعْرِفَتِکَ وَ

جَلَّلْتَھُمْ بِکَرَامَتِکَ وَغَشَّیْتَھُمْ بِرَحْمَتِکَ وَرَبَّیْتَھُمْ بِنِعْمَتِکَ وَغَذَّیْتَھُمْ بِحِکْمَتِکَ، وَأَلْبَسْتَھُمْ

نُورَکَ، وَرَفَعْتَھُمْ فِی مَلَکُوتِکَ وَحَفَفْتَھُمْ بِملائِکَتِکَ وَشَرَّفْتَھُمْ بِنَبِیِّکَ صَلَوَاتُکَ عَلَیْہِ

وَ آلِہِ اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ وَعَلَیْھِمْ صَلاَةً زَاکِیَةً نَامِیَةً، کَثِیرَةً دَائِمَةً طَیِّبَةً، لاَ یُحِیطُ بِھَا 

إِلاَّ أَ نْتَ، وَلاَ یَسَعُھَا إِلاَّ عِلْمُکَ، وَلاَ یُحْصِیھَا أَحَدٌ غَیْرُکَ ۔ اَللّٰھُمَّ وَصَلِّ عَلَی وَ لِیِّکَ

الْمًحْیِی سُنَّتَکَ الْقَائِمِ بِأَمْرِکَ الدَّاعِی إِلَیْکَ الدَّلِیلِ عَلَیْکَ حُجَّتِکَ عَلَی خَلْقِکَ وَ

خَلِیفَتِکَ فِی أَرْضِکَ وَشَاھِدِکَ عَلَی عِبَادِکَ ۔ اَللّٰھُمَّ أَعِزَّ نَصْرَھُ، وَمُدَّ فِی عُمْرِھِ، وَزَیِّنِ

الْاَرْضَ بِطُولِ بَقائِہِ ۔ اَللّٰھُمَّ أَکْفِہِ بَغْیَ الْحَاسِدِینَ، وَأَعِذْہُ مِنْ شَرِّ الْکَائِدِینَ، وَازْجُرْ عَنْہُ

إِرَادَةَ الظَّالِمِینَ، وَخَلِّصْہُ مِنْ أَیْدِی الْجَبَّارِینَ ۔ اَللّٰھُمَّ أَعْطِہِ فِی نَفْسِہِ وَذُرِّیَّتِہِ وَشِیعَتِہِ وَرَعِیَّتِہِ

وَخَاصَّتِہِ وَعَامَّتِہِ وَعَدُوِّھِ وَجَمِیعِ أَھْلِ الدُّنْیا مَا تُقِرُّ بِہِ عَیْنَہُ وَتَسُرُّ بِہِ نَفْسَہُ وَبَلِّغْہُ أَفْضَلَ مَا أَمَّلَہُ

فِی الدُّنْیَا وَالْاَخِرَةِ إِنَّکَ عَلَی کُلِّ شَیْءٍ قَدِیرٌاَللّٰھُمَّ جَدِّدْ بِہِ مَا امْتَحیٰ مِنْ دِینِکَ، وَأَحْیِ

بِہِ مَا بُدِّلَ مِنْ کِتَابِکَ، وَأَظْھِرْ بِہِ مَاغُیِّرَ مِنْ حُکْمِکَ، حَتَّی یَعُودَ دِینُکَ بِہِ وَعَلَی یَدَیْہِ

غَضّاً جَدِیْداً خَالِصاً مُخْلَصاً، لاَ شَکَّ فِیہِ، وَلاَ شُبْھَةَ مَعَہُ، وَلاَ بَاطِلَ عِنْدَھُ، وَلاَ بِدْعَةَ لَدَیْہِ

اَللّٰھُمَّ نَوِّرْ بِنُورِھِ کُلَّ ظُلْمَةٍ، وَھُدَّ بِرُکْنِہِ کُلَّ بِدْعَةٍ، وَاھْدِمْ بِعِزِّھِ کُلَّ ضَلالَةٍ، وَاقْصِمْ بِہِ کُلَّ

جَبَّارٍ، وَأَخْمِدْ بِسَیْفِہِ کُلَّ نارٍ، وَأَھْلِکْ بِعَدْلِہِ جَوْرَ کُلِّ جَائِرٍ وَأَجْرِ حُکْمَہُ عَلَی کُلِّ حُکْمٍ،

وَأَذِلَّ بِسُلْطانِہِ کُلَّ سُلْطَانٍ ۔ اَللّٰھُمَّ أَذِلَّ کُلَّ مَنْ نَاوَاھُ، وَأَھْلِکْ کُلَّ مَنْ عَادَاھُ، وَامْکُرْ بِمَنْ

کَادَھُ، وَاسْتَأْصِلْ مَنْ جَحَدَھُ حَقَّہُ، وَاسْتَھَانَ بِأَمْرِھِ، وَسَعَی فِی إِطْفَاءِ نُورِھِ، وَأَرَادَ إِخْمَادَ ذِکْرِھِ

اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلَی مُحَمَّدٍ الْمُصْطَفی، وَعَلِیٍّ الْمُرْتَضی وَفاطِمَةَ الزَّھْراءِ وَالْحَسَنِ الرِّضا

وَالْحُسَیْنِ الْمُصَفَّی وَجَمِیعِ الْاَوْصِیَاءِ مَصَابِیحِ الدُّجٰی وَأَعْلامِ الْھُدیٰ وَمَنَارِ التُّقیٰ، وَالْعُرْوَةِ

الْوُثْقیٰ،وَالْحَبْلِ الْمَتِینِ،والصِّراطِ الْمُسْتَقِیمِ وَصَلِّ عَلَی وَ لِیِّکَ وَوُلاَةِ عَھْدِکَ،وَالْاَئِمَّةِ مِنْ

وُلْدِھِ، وَمُدَّ فِی أَعْمارِھِمْ، وَزِدْ فِی آجالِھِمْ، وَبَلِّغْھُمْ أَقْصیٰ آمالِھِمْ دِیناً وَدُنْیا وَآخِرَةً، إِنَّکَ

عَلی کُلِّ شَیْءٍ قَدیرٌ ۔

 

आपको यह पता होना चाहिए कि जुमा कि शब् भी शबे जुमा जैसी ही है और एक रिवायत के मुताबिक़ शबे जुमा में जो दुआएं पढ़ी जाती हैं वो जुमा की रात में भी पढ़ी जा सकती हैं 

नमाज़ के बाद की ताकीबात (दुआ) 

ताकीबात मुश्तरका  दुआ-नमाज़ फ़ज्र के बाद दुआ-नमाज़ ज़ोहर के बाद दुआ-नमाज़  असर के बाद दुआ-नमाज़  मग़रिब  के बाद दुआ-नमाज़ ईशा के बाद

रोज़ाना की दुआ व ज़यारत 

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