हदीसे किसा

             

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घटना का विवरण

अहलेबैत (अ:स) की श्रेष्ठता

अहलेबैत   (अ:स) से जुड़ी हुई दूसरी  दुआएं

अहलेबैत   (अ:स) कौन हैं?

अहलेबैत (अ:स) पर सलवात व सलाम

बिसमिल्ला हिर रहमानिर रहीम

 

 

जाबिर इब्न अब्दुल्लाह अंसारी बीबी फ़ातिमा ज़हरा (स:अ) बिन्ते रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) से रिवायत करते हुए कहते हैं के मैने जनाब फ़ातिमा ज़हरा (स:अ) से सुना है की वो फ़रमा रहीं थीं के एक दिन मेरे बाबा जान रसूले ख़ुदा (स:अ:व:व) मेरे घर तशरीफ़ लाये और फ़रमाने लगे, "सलाम हो तुम पर  फ़ातिमा (स:अ)" मैने जवाब दिया, "आप पर भी सलाम हो" फिर आप ने फ़रमाया :"मै अपन जिस्म में कमज़ोरी महसूस कर रहा हूँ" मै ने अर्ज़ किया की, "बाबा जान ख़ुदा  करे जो आप में कमज़ोरी आये" आप ने फ़रमाया: "ऐ फातिमे (स:अ) मुझे एक यमनी चादर लाकर उढ़ा दो" तब मै यमनी चादर ले आई और मैंने वो बाबा जान क़ो ओढ़ा दी और मै देख रही थी के आपका चेहरा-ए-मुबारक चमक रहा है, जिस तरह चौदहवीं रात क़ो चाँद पूरी तरह चमक रहा हो, फिर एक लम्हा ही गुज़रा था की मेरे बेटे हसन (अ:स) वहां आ गए और बोले, "सलाम हो आप पर ऐ वालिदा मोहतरमा (स:अ)!" मैंने कहा और तुम पर भी सलाम हो ऐ मेरी आँख के तारे और मेरे दिल के टुकड़े - वोह कहने लगे, "अम्मी जान (स:अ), मै आप के यहाँ पाकीज़ा ख़ुशबू महसूस कर रहा हूँ जैसे वोह मेरे नाना जान रसूले ख़ुदा (स:अ:व:व) की ख़ुशबू हो" मैंने कहा, "हाँ तुम्हारे नाना जान चादर ओढ़े हुए हैं" इसपर हसन (अ:स) चादर की तरफ़ बढे और कहा, "सलाम हो आप पर ऐ नाना जान, ऐ ख़ुदा के रसूल! क्या मुझे इजाज़त है के आपके पास चादर में आ जाऊं?" आप ने फ़रमाया, "तुम पर भी सलाम हो ऐ मेरे बेटे और ऐ मेरे हौज़ के मालिक, मै तुम्हें इजाज़त देता हूँ" बस हसन आपके साथ चादर में पहुँच गए! फिर एक लम्हा ही गुज़रा होगा के मेरे बेटे हुसैन (अ:स) भी वहां आ गए और कहने लगे :"सलाम हो आप पर ऐ वालिदा मोहतरमा (स:अ) - तब मैंने कहा, "और तुम पर भी सलाम हो ऐ मेरे बेटे, मेरी आँख के तारे और मेरे कलेजे के टुकड़े" इसपर वो मुझे से कहने लगे, "अम्मी जान (स:अ), मै आप के यहाँ पाकीज़ा ख़ुशबू महसूस कर रहा हूँ जैसे वोह मेरे नाना जान रसूले ख़ुदा (स:अ:व:व) की ख़ुशबू हो" मैंने कहा, "हाँ तुम्हारे नाना जान और भाई जान इस चादर में हैं" बस हुसैन (अ:स) चादर के नज़दीक आये और बोले, "सलाम हो आप पर ऐ नाना जान! सलाम हो आप पर ऐ वो नबी जिसे ख़ुदा ने चुना है - क्या मुझे इजाज़त है के आप दोनों के साथ चादर में दाख़िल हो जाऊं?" आप ने फ़रमाया, "और तुम पर भी सलाम हो ऐ मेरे बेटे, और  मेरी उम्मत की शफ़ा'अत करने वाले, तुम्हें इजाज़त देता हूँ" तब हुसैन (अ:स) ईन दोनों के पास चादर में चले गए, इसके बाद अबुल हसन (अ:स) अली इब्न अबी तालिब (अ:स) भी वहां आ गए और बोले, "सलाम हो आप पर ऐ रसूले ख़ुदा की बेटी!" मैंने कहा, "आप पर भी सलाम हो ऐ अबुल हसन (अ:स), ऐ मोमिनों के अमीर" वो कहने लगे, "ऐ फ़ातिमा (स:अ) मै आप के यहाँ पाकीज़ा ख़ुशबू महसूस कर रहा हूँ, जैसे वो मेरे भाई और मेरे चचाज़ाद, रसूले ख़ुदा की ख़ुशबू हो" मैंने जवाब दिया, "हाँ वो आप के दोनों बेटों समेत चादर के अन्दर हैं" फिर अली (अ:स) चादर के क़रीब हुए और कहा, " सलाम हो आप पर ऐ ख़ुदा के रसूल - क्या मुझे इजाज़त है के मै भी आप तीनों के पास चादर में आ जाऊं?" आप ने इनसे कहा, "और तुम पर भी सलाम हो ऐ मेरे भाई, मेरे क़ायेम मुक़ाम, मेरे जा'नशीन, मेरे अलम'बरदार, मै तुम्हें इजाज़त देता हूँ" बस अली (अ:स) भी चादर में पहुँच गए - फिर मै चादर के नज़दीक आये और मैंने कहा, "सलाम हो आप पर ऐ बाबा जान, ऐ ख़ुदा के रसूल, क्या आप इजाज़त देते हैं के मैन आप के पास चद्दर में आ जाऊं?" आप ने फ़रमाया, "और तुम पर भी सलाम हो मेरी बेटी और मेरी कलेजे की टुकड़ीमैंने तुम्हे इजाज़त दी" तब मै भी चादर में दाख़िल हो गयी! जब हम सब चादर में इकट्ठे हो गए तो मेरे वालिदे गिरामी रसूल अल्लाह (स:अ:व:व) ने चादर के दोनों किनारे पकड़े और दायें हाथ से आसमान की तरफ़ इशारा करके फ़रमाया, "ऐ ख़ुदा! यक़ीनन यह हैं मेरे अहलेबैत (अ:स), मेरे ख़ास लोगऔर मेरे हामीइनका गोश्त मेरा गोश्त और इनका ख़ून मेरा ख़ून है, जो इन्हें सताए वो मुझे सताता है, और जो इन्हें रंजीदा करे वो मुझे रंजीदा करता है! जो इनसे लड़े मै भी उस से लडूंगा, जो इनसे सुलह रखे, मै भी उस से सुलह रखूओंगामै इनके दुश्मन का दुश्मन और इनके दोस्त का दोस्त हूँ, क्योंकि वो मुझ से और मै इनसे हूँ! बस ऐ ख़ुदा तू अपनी इनायतें और अपने बरकतें और अपनी रहमत और अपनी बखशिश और अपनी खुशनूदी मेरे और इनके लिये क़रार दे, इनसे नापाकी क़ो दूर रख, इनको पाक कर, बहुत ही पाक", इसपर खुदाये-बुज़ुर्ग-ओ-बरतर ने फ़रमाया, "ऐ मेरे फरिश्तो और ऐ आसमान में रहने वालोबेशक मैंने यह मज़बूत आसमान पैदा नहीं किया, और न फैली हुई ज़मीन चमकता हुआ चाँद, न रौशन'तर सूरजन घुमते हुए सय्यारेन थल्कता हुआ समुन्दर, और न तैरती हुई किश्ती, मगर यह सब चीज़ें ईन पाक नफ्सों की मुहब्बत में पैदा की हैं जो इस चादर के नीचे हैं" इसपर जिब्राइल अमीन (अ:स) ने पुछा, "ऐ परवरदिगार! इस चादर में कौन लोग हैं?" खुदाये-अज़-ओ-जल ने फ़रमाया की वो नबी (स:अ:व:व) के अहलेबैत (अ:स)  और रिसालत का ख़ज़ीना हैं, यह फ़ातिमा (स:अ) और इनके बाबा (स:अ:व:व), इनके शौहर (अस:) इनके दोनों बेटे (अ:स) हैं! तब जिब्राइल (अ:स) ने कहा, "ऐ परवरदिगार! क्या मुझे इजाज़त है की ज़मीन पर उतर जाऊं ताकि इनमे शामिल होकर छठा फ़र्द बन जाऊं?" खुदाये ताला ने फ़रमाया, " हाँ हम ने तुझे इजाज़त दी" बस जिब्राइल ज़मीन पर उअतर आये और अर्ज़ की, "सलाम हो आप पर  ख़ुदा के रसूल! खुदाये बुलंद-ओ-बरतर आप क़ो सलाम कहता है, आप क़ो दुरूद और बुज़ुर्गवारी से ख़ास करता है, और आप से कहता है, मुझे अपने इज़्ज़त-ओ-जलाल की क़सम के बेशक मै ने नहीं पैदा किया मज़बूत आसमान और न फैली हुई ज़मीनन चमकता हुआ चाँद, न रौशन'तर सूरजन घुमते हुए सय्यारेन थल्कता हुआ समुन्दर, और न तैरती हुई किश्ती, मगर सब चीज़ें तुम पाँचों की मुहब्बत में पैदा की हैं और ख़ुदा ने मुझे इजाज़त दी है की आप के साथ चादर में दाख़िल हो जाऊं, तो ऐ ख़ुदा के रसूल क्या आप भी इजाज़त देते हैं?" तब रसूले ख़ुदा बाबा जान (स:अ:व:व) ने फ़रमाया , "यक़ीनन की तुम पर भी हमारा सलाम हो ऐ ख़ुदा की वही के अमीन (अ:स), हाँ मै तुम्हे इजाज़त देता हूँ" फिर जिब्राइल (अ:स) भी हमारे साथ चादर में दाख़िल हो गए और मेरे ख़ुदा आप लोगों क़ो वही भेजता है और कहता है वाक़ई ख़ुदा ने यह इरादा कर लिया है की आप लोगों ए नापाकी क़ो दूर करे ऐ अहलेबैत (अ:स) और आप क़ो पाक-ओ-पाकीज़ा रखे", तब अली (अ:स) ने मेरे बाबा जान से कहा, "ऐ ख़ुदा के रसूल बताइए के हम लोगों का इस चादर के अन्दर आ जाना ख़ुदा के यहाँ क्या फ़ज़ीलत रखता है?" तब हज़रत रसूले ख़ुदा ने फ़रमाया, "इस ख़ुदा की क़सम जिस ने मुझे सच्चा नबी बनाया और लोगों की निजात की ख़ातिर मुझे रिसालत के लिये चुना - अहले ज़मीन की महफ़िलों में से जिस महफ़िल में हमारी यह हदीस ब्यान की जायेगी और इसमें हमारे शिया और दोस्तदार जमा होंगे तो इनपर ख़ुदा की रहमत नाज़िल होगीफ़रिश्ते इनको हल्क़े में ले लेंगे, और  जब वो लोग महफ़िल से रूखसत  होंगे वो इनके लिये बखशिश की दुआ करेंगे", इसपर अली (अ:स) बोले, " ख़ुदा की क़सम हम कामयाब हो गए और रब्बे काबा की क़सम हमारे शिया भी कामयाब होंगे" तब हज़रत रसूल ने दुबारा फ़रमाया, "ऐ अली (अ:स) इस ख़ुदा की क़सम जिस ने मुझे सच्चा नबी बनाया, और लोगों की निजात की ख़ातिर मुझे रिसालत के लिये चुना, अहले ज़मीन की महफ़िलों में से जिस महफ़िल में हमारी यह हदीस ब्यान की जायेगी और इस्मे हमारे शिया और दोस्तदार जमा होंगे तो इनमे जो कोई दुखी होगा ख़ुदा इसका दुख़ दूर कर देगाजो कोई ग़मज़दा होगा ख़ुदा इसके ग़मों से छुटकारा देगाजो कोई हाजत मंद होगा झुदा इसकी हाजत क़ो पूरा कर देगा" तब अली (अ:स) कहने लगे, "'ख़ुदा हमने कामयाबी और बरकत पायी और रब्बे काबा की क़सम की इस तरह हमारे शिया भी दुन्या व आख़ेरत में कामयाब व 'आदत मंद होंगे!

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अल्लाह हुम्मा सल्ले अला मुहम्मा  आले मुहम्मद

بسم الله الرحمن الرحيم

यहाँ  हदीस की अरबी  क़ो हिंदी  में पढ़ें!

बिसमिल्ला हिर रहमानिर रहीम

अल्लाह हुम्मा सल्ले अला मुहम्मा  आले मुहम्मद


अन फ़ा'तिमा'तज़ ज़हरा ( अलय्हस-सलाम ) बिनती रसूलिल-लाही सल-लाल-लाहो अलैहे वसल्लम क़ालत : दख़'अला अलैय-या अबी रसूलुल-लाही ( स' ) फ़ी बा'-ज़िल अय-यामी फ़'क़ाला :
अस-सलामु अलैय-की या फ़ा'तिमा फ़क़ुल-तू :अलैय-कस-सलाम क़ाला : इन-नि अजिदु फ़ी बद'अनी ज़ू'अ'फ़न' फ़क़ुल-तू लहू : उई'इज़'उका बिल-लाही या अ'बता'हु म'अनज़'-ज़ुआ'फ़ि फ़'क़ाला : या फ़ा'ति-मतु ईत-तीनी बिल-कसा-इल-यमा'नी फ़ग'हत-तीनी बिही फ़ अतए-तू'हु बिल-किसा'-इल-यमा'नी  फ़ग'हत-तय-तुहू बिही व सूरतु अन'ज़ुरू इल्य-ही व इज़'आ वजह-हू यातल-लौ का'अन्नाहुल बदरू फ़ी लै'लती तमा'मीही व कमालिह फ़मा कानत इल्ला सा'अतौ-व इज़ा बी वालादियल ह'सनी (अलय्हिस-सलाम) क़द अक़'बला व क़ाला: अस-सलामु अलयकी या उम्माहो फ़क़ुलतू : व अलय'कस-सलामु या क़ुर'रता अय-नी व समरता फ़ूआदी फ़क़ाला : या उम्माहू इन्नी अशुम-मु इन्दाकी रा'इहातिन तय'यिबतिन का'अन्नहा रा'इहतु जददी रसूलिल्लाह फ़'क़ुल्तु : ना'अम इन्ना जद'दका  तहतल किसा फ़'अक़बलल हुसैनु नहवल किसा'ई व क़ाला : अस'सलामु अलैका या जद-दाहू या रसूलल्लाही अत-ज़नु ली अन अदख़ुला मा'का तहतल -किसा क़ाला : व अलैकस सलामु या वलादी व या  साहिबा हौज़ी क़द अज़िन्तु लका फ़'दख़ला माहू तहतल किसा! फ़मा कानत इल्ला सा'अतों व ईज़ा  बी' वलादियल हुसैनी क़द अक़'बला व क़ाला : अस-सलामु अलैकी या उम्माह  फ़क़ुल-तू : व अलैकस सलामु या वलादी व या क़ुर'रता ऐनी व सम'रता फ़ू'आद फ़'क़ाला ली : या उम्माहो इन्नी अ-शुम्मु इन्दाकी रा'इहातिन तय-यिबतन  का'अन्नाहा रा'इहातु जददी रसूलिल्लाह फ़क़ुल-तू : ना'अम  इन्ना जद-दका व अखाका तहतल किसा  फदनल-हुसैनु नहवल किसा'ई व क़ाला : अस-सलामु अलैका या जद'दाहुस सलामु अलैका या  मनीख़-ता'रहुल-लहू अत-ज़नू'ली अन अद-ख़ुला मा'कुमा तहतल किसा फ़'क़ाला : व अलैकस सलामु या वलादी व या शाफ़िया' उम्मती क़द अज़िन्तु लका फ़'दखला मा'हुमा  तहतल किसा फ़'अक़बला  इन्दा  ज़ालिका  अबुल-ह'सनी अली इब्ने अबी तालिब व क़ाला : अस-सलामु अलैकी  या बीनता रसूलिल्लाह फ़क़ुलतू व  अलैकस-सलामु या अबल-हसन व या अमीरल मुमिनीन फ़'क़ाला या फ़ाति'मातु इन्नी अशुममु इन्दकी रा-इहतन तय-यिबतन  का'अन्नहा रा'इहातु अखी वबनिया'म-मी रसूलिल्लाह फ़क़ुल-तू ना'अम हा हुवा मा' वालादयका तहतल किसा फ़'अक्बला अली-युन नहवल किसाइ व क़ाला : अस्सलामु  अलैका या रसूलल्लाही अत-ज़ानु ली अन  अकूना मा'अकुं  तहतल किसा क़ाला लहू : व अलैकस सलामु या अखी व या  वसी'यी व ख़ली-फती व साहिबा  लिवा-ई  क़द अ'ज़िन्तु लक फ़'दख़'अला अली-युन तहतल किसा सुम्मा आ'तय तू  नहवल किसाइ व क़ुल्तु  : अस-सलामु  अलैका  या अबाताह या रसूलल्लाही अता-ज़ानूली  अन अकूना  माकुम  तहतल किसा क़ाला : व अलैकिस सलामु या  बिनती या बज़'अती क़द अज़िन्तु लकी फ़'दख़ल'तू तहतल किसा फल-लमक-तमल-ना जमीअन तहतल किसा-इ  अख्ज़'अ अबी रसूलुल्लाहि बी'तरा'फाईल किसा-इ व औ-मा बियादिहिल-युम-ना इलस-समा-इ व क़ाला : अल्लाहुम्मा इन्ना हा-उला-इ अहलुल'बैते व ख़ा'अस'सती व हा'अम'मती लह'मुहम लहमी व  दम'उहुम दमी युलिमुनी मा यु-लिमुहुम व  यह'ज़ुनुनी मा यह'ज़ुनुहुम अना हरबुल-लीमन हराबहुम व सिल्मुल लीमन  सालाम्हुम व अदू'वुल लीमन आदाहुम व मुहिब-बुल-लीमन अह'अब'बहुम इन-नहुम-मिन-नी व अना मिन्हुम फ़ज-अल सलावातिका व बरकातिका व रहमतिका व  गुफ़रानिका व रिज़वानिका अलय'या व अ'ले-हिम व अज़्हिब अन- हुमुर-रिज-सा व तह'हिरुहुम तत'हीरा फ़ाक़ा'लल-लाहू  अज़'-ज़ा व जल-ला :या मला-इ'कती व या सुक'काना समावाती इन-नी मा ख़लक़तू समाअम मबनी यातव व ला अर्ज़म मद'ही यातव व ला क़मरम मुनीरव व ला शम्सम मुज़ी अतव व ला फ़लाके यदु'रु व ला बहरे यजरी इल्ला  फ़ी महाब्बती हा उलाइल ख़मसतील लज़ीना हुम तहतल किसा फ़क़ालाल अमीनु जिब'राइलू : या रब्बी व मन तहतल कि सा फ़क़ाला अज़-ज़ा व जल्ला : हुम अहलेबैती'न-नुबूवती व मा'दिनुर रिसालाती हुम  फ़तिमतु व अबूहा व बा'लूहा व बनूहा फ़'क़ाला जिबरा'इलू : या रब्बी अता-ज़ानू ली अन अह्बिता इलल अर्ज़ी ली अकूना माहुम सादिसा फ़'क़ाला लहू : ना'अम क़द अज़िन्तु लक फ़'हबतल'अमीनु जिब'राइलू व क़ाला : अस'सलामु अलैका या रसूलाल्लाहिल-अली-युल-आला  युक़-री'उकस  सलामु व य'ख़स' सुका बिल- तहियेती वल इकराम व याक़ूलुका : व इज़्ज़ती व जलाली  इन्नी  मा  ख़लक़तू  समाअम मबनी यत्व व ला अर्ज़म मदही यत्व व ला क़मरम मुनीरण व ला शम्सम मुज़ी'अतव व ला बहरे यजरी वला फुल्कई यसरी इल्ला ली'अज्लिकुम व महब'बतिकुम व क़द अज़ीना ली अन अद'ख़ुला माकुम फ़हल ता'ज़ानु ली  या रसूलल्लाही फ़'क़ाला रसूलुल्लाहि : व अलैकस सलामु या अमीना वह'ईल-लाही ना'अम क़द अज़िन्तु लक फ़'दख़ला   जिबरा'इलू माना तहतल किसा'ई फ़'क़ाला ली अबी : इन्नल'लाहा क़द औ'हा इलैय्कुम य'क़ूलू :इन्नमा युरीदुल'लाहू  ली'यूज़'हिबा अन्कुमुर'रिज्सा अहलाल्बैती व यु'तह'हिराकुम तत'हीरा फ़'क़ाला अली'युल ली'अबी : या रसूलल्लाही  अख़'बीरनी मा ली'जुलूसिना हाज़ा तहतल किसा'इ मिनल फ़ज़ली इंदल लाह फ़'क़ालन नबीयु सल्लल्लाहो अलैहि व आलिहि : वल लज़ी बा'असनी बी'हक़'क़ी नाबीयौ वस''तफानी बीर'रिसा'लती नजीया मा  ज़ुकिरा ख़बा'रुना  हाज़ा  फ़ी  मह्फ़लिम मीम महाफ़िली अहलिल अर्ज़ी व फ़ीही जम'उम  मिन शी'अतिना व मुहिब्बी'ना इल्ला व न'ज़लत अली'हुमुर रह'माह व हफ़'फ़त बिहिमु ला-मला'इकह वसत्ग'फ़ेरत लहुम इला यता'फ़र'रक़ू फ़'क़ाला अली'युन अलैहिस सलामु : इज़ौ वल'लाही फुज़्ना व फाज़ा शी'अतुना व रब्बिल काबा फ़'क़ाला अबी रसूलुल्लाहि सल्लाल'लाहो अलैही व  आलिहि : या  अली'यु वल'लज़ी बा''सानी बिल'हक़'क़ी नबी'यौ  वस''ताफ़ानी बीर'रिसालती नजी'य़ा मा ज़ुकिरा ख़बा'रुना हाज़ा फ़ी  माह'फ़लिम मीम'महाफ़िली अहलिल अर्ज़ी व फ़ीही जम'उम मिन शी'अतिना व मुहिब'बीना व फ़ीहीम मह'मूमुन इल्ला व  फ़र'रजल लाहो हम'महू वला  ग़'मूमुन इल्ला व कशा'फल लाहो ग़म'माहू व ला तालिबू  हा'जतिन  इल्ला  व  क़ज़'अल लाहो हा'जताह फ़'क़ाला अली'युन अलैहिस सलामु इज़ौ वल-लाही फ़ुज़'ना व  सुई'दना व क़ज़ा''लिका  शी'अतुना  फ़ाज़ू  व सुई'दू फ़ीद'दुन्या वल आख़ीरति व रब्बिल का'बा

अल्लाह हुम्मा सल्ले अला मुहम्मा  आले मुहम्मद

 

हदीसे किसा का विस्तारपूर्वक विवरण :

हदीसे किसा एक विनीत वर्णन है, जो एक परम्परा भी है और एक घटना का विवरण भी, यह उत्कृष्टता का एक भी वर्णन है और समृद्धि का कारण भी! विश्वासियों के बीच ऐसा कोई नहीं जिसे ईन शब्दों या इस धार्मिक हदीस की जानकारी नहीं, यह हदीस बीमार क़ो चिकित्सा प्रदान करने में,  इच्छुक की इच्छाओं को पूरा करने में, आपदाओं में फंसे असहाय व्यक्ति क़ो समर्थन प्रदान करने का माध्यम है, इस तथ्य को भी उस में उल्लेख किया गया है की इसको पढ़ने से अल्लाह की दयालुता प्राप्त होती है, और फ़रिश्ते माफ़ी की दुआ करते है, इसको पढ़ने से विशाल शर्तों क़ो सुनवाई जल्द प्राप्त होती है, जरूरतमंद अपनी जरूरतों को पूरा कर  सकते हैं, और सैकड़ों वर्ष से इस हदीस द्वारा विश्वासियों क़ो गौरव प्रदान हुआ है, और यह क्यों न हो! यह मासूमों (अ:स) और पवित्रता के मालिकों (अ:स) की एक हदीस है, जिसमे सिद्दीका-ए-ताहेरा (स:अ:व:व) का वर्णन है,  पवित्र क़ुरान की तफ़सील है, अल्लाह की रौशनी भरी सभा की एक घटना है, यह विस्मय और आशा है अल्लाह द्वारा प्रदान की गयी गद्दी के निवासियों (अ:स) के लिये, और जो महान और उत्कृष्टत इंसान हैं, और जड़ें पाक हैं!  अगर इन विशिष्टताओं की मौजूदगी में अनुग्रह, समृद्धि और दया की प्राप्ति नहीं होगी तो कब होगी?

 


As per it’s authenticity, Hadeeth-e-Kisa is highly reliable, whose authenticity has been traced by a great honourable Scholar of Bahrain, Sheikh Abdullah Bahrani in his book Awaalim and he saw it written by the pen of Sheikh Jaleel Sayyid Hashim Bahrani – He from Sheikhul Hadeeth Sayyid Majid Bahrani (r.a.), he from Sheikh Hasan ibne Zaynuddin, he from Sheikh Muqaddas Ardbaili (r.a.) he from Sheikh Ali ibne Abdul aalaa al Karki (r.a.), he from Ali ibne Hilal al Jazaaeri, he from Ahmad ibne Fahdal Hilli (r.a.), he from Ali ibne Khazanal Haaeri (r.a.), he from Sheikh Ziauddin Ali ibne Shaheedal Awwal (r.a.), he from Shaheede Awwal (r.a.), he from Fakhrul Muttaqeen (r.a.), he from his revered father Allamah Hilli (r.a.), he from his elder Mohaqqiqe Hilli (r.a.), he from his elder ibne Numma Hilli (r.a.), he from his Sheikh Mohammad ibne Idris Hilli (r.a.), he from ibne Hamza Toosi (r.a.) author of Thaqibul Manaaqib, he from Allamah Mohammad ibne Shahr Aashob (r.a.), he from Allamah Tabrasi (r.a.) author of Ihtejaaj, he from Sheikh Jaleel Hasan ibne Mohammad ibnal Hasanal Toose, he from his revered father Sheikhut Taaif (r.a.), he from his teacher Sheikh Mufiid (r.a.) he from Sheikh ibne Qawliya-e-Qummi (r.a.), he from Sheikh Kulayni (r.a.), he from Ali ibne Ibrahiim (r.a.), he from Ibrahim ibne Hashim (r.a.), he from Ahmad ibne Mohammad ibne Abi Nasral Bazanti (r.a.), he from Qasim ibne Yahya al Jila al Kufi (r.a.), he from Abu Baseer (r.a.), he from Aabaan ibne Taghlab (r.a.), he from Jabir ibne Yazid, he from Jabir ibne Abdullah Ansari and he heard from Siddiqa-e-Tahera (s.a.) that……

Due to the unawareness of this authenticity looking at the starting words roveya an Fatemahtiz Zahra of the narration, objected that, this narration is weak, it’s narrator is not known, and a narration starting with a passive text cannot be relied upon, whereas surely it is not so – Roveya has been used as a brevity or for a honour, otherwise a chain of authenticity is present for the narration, and for it one after another great honourable, authenticating, and reliable scholars’ names are mentioned, after which there remains no place for any doubt or suspicion.

A copy of this Hadeeth has been entered in the book of Allamah Sheikh Mohammad Taqi ibne Mohammad Baqir Yazdi Bafqi, which he has directly traced from Awaalim, and has quoted that, this Hadeeth is present in the book Awaalim, which is in more than 70 volumes, and is secure in the library of Hujjatul Islam Aaqae Mirza Sulayman in Yazd – 11th volume is regarding the events of Siddiqa-e-Tahera (s.a.), and in this itself this noble Hadeeth is found.
Allamah Sheikh Mohammad Saduqi Yazdi (r.a.), quotes that this Hadeeth is quoted in the annotation of Awaalim – But, is, by all means, present in the original book.

The second copy is of the author of Majma-ul-Bahrain, Allama Jaleel Sheikh Fakhruddin Mohammadal Turaehi, which is generally concurrent in our countries, and from this angel there is a distinctive difference in both of them, as in this copy there is no reply along with the Salaam (salutations), whereas in the copy of Awaalim the salaam and it’s reply both are present.

Other than this in the copy of Awaalim some other additions are also there, which are not mentioned in Muntakhabe Turaehi.

Allamah Delmi (r.a.) too in his book Ghurarud Durar has quoted this Hadeeth, and Allamah Sheikh Mohammad Jawad ar Razi has also mentioned in his book Noorul Aafaaq, and from his quotation it is clear that this Hadeeth is in the 11th volume of Awaalim also and in the 13th volume also.

Any way regarding the differences in expressions, it is necessary to hint at some of the specialities, so that the investigators can benefit from these points, and the believers gain from their achievements.

1. In the copy of Awaalim, the reply of the Holy Prophet (s.a.w.a.) for the salaam of everyone coming under the blanket (Kisa) is quoted, which is exactly according to the commands of Islam – And in those copies in which the reply of salaam is not found, is only due to brevity or these scholars have not deemed it as a salaam of benediction, whose reply is obligatory.

2. In the copy of Awaalim, the Holy Prophet (s.a.w.a) has mentioned some additions after every salaam, as per the rules of Islam – For example, for Imam Hasan (a.s.) He replied, Waladee wa saaheba Hawzee, for Imam Husayn (a.s.) Waladee wa shaafe’e ummatee, and for Ali (a.s.) Khalifatee wa saahebal Vaa’a, on which the intellectuals can put more light.

3. In the copy of Awaalim after the collection of all (Panjetan paak) these remarks of the Holy Prophet (s.a.w.a) is also quoted: “O! Lord these are my Ahle Bayt and are my specials, their flesh is my flesh, their blood is my blood, whoever troubles them I am troubled by if, whoever pains them I am pained by it, whoever fights with them I fight with them, and whoever compromises with them I compromise with them, whoever is their enemy is also my enemy, and a friend of them is my friend, they are from me and I am from them, O! Lord please do make Your greetings, mercy and grace and forgiveness and Your will, a part of their state, and keep away from them all the defects and declare their Purity”.

These words are not found in common copies, whence in it is founds the complete series of virtues and excellences.

4. In the copy of Awaalim along with Falakan, Tasree is quoted, whereas in other copies, Yasree and Tasree both are quoted. The word Fulk is singular and plural both.

5. In the last part of the Hadeeth, Awaalim quotes “We rabbil K’abate” as stated by the Holy Prophet (s.a.w.a) after both of his mentions, whereas in other copies it is quoted once only.

In Hadeeth-e-Kisa, such spiritual virtues of Aale Mohammad (a.s.) are found that a person goes on penetrating in them and experiences the ecstasy on their spirituality, and goes on swinging on the eloquence of Siddiqa-e-Tahera (s.a.) – Some parts of this fact has already hinted at initially, and some are hinted now:

The Holy Prophet has not mentioned illness but has mentioned of weakness, and it is quite apparent that the healing of weakness is different from curing illness.
The Holy Prophet’s weakness is related to body, and not the constitution, and an eloquent difference is found in this, as in the constitution head is also included – But a body is excluding the head, which means that the weakness (mentioned) cannot be related to head and brain.

The Ahle Bayt have been as members of the house, for Prophethood, and have been deemed a mine for Messengership, which clearly means that not the house members of the Prophet, but a family of Prophethood, and Allah’s message will be achieved by us from them only.

For the assembly, the word “Shi’a” and “Devotee” both are used, which are well distinguished as per belief (Aqeedah) and deeds (Amal).

In declaring of the “Successful” the promise of the Lord of Ka’bah is mentioned, the example of which is also found in the last moments of the master of the universe.

Lastly it is necessary to make this clear that, in izaa wajhohoo yatalaa laa the word is izaa and not izan – The word izan is used in the last part of the Hadeeth, the difference of which can be orderly sensed by the owners of intellect and literature.

Allaahumma J’alna minhum wah shuma Mohammadinw Wa allehit Taahereen.

 

AAYAT – E – TAT-HEER (Quran 33:33)" Verily Allah's desire is to remove blemish from you, O People of Household (Ahlul-Bayt) and purify you with a perfect purification"
There is no place for any doubt or suspicion in this matter for the rightful persons that, the verse of Tat-heer is descended in the glory of the pure Ahle Bayt (a.s.) (Panjetane 5 Paak-pure) declaring their purity and infallibility – And there is no place in this noble verse for any other lady other these five noble ones – Neither it is related to the wives of the Prophet (s.a.w.a), and nor with the companions of the Messenger (s.a.w.a) – The Shi’a and Sunni Scholars both are unanimous over this fact, and except for some prejudiced no other denies it – On contrary some scholars of the Ahle Sunnat have mentioned such facts and informations regarding this verse, which serves as an eye-opener, and it is therefore judged that knowledge of truth is not a heritage of any one person or association, to whomsoever Allah graces and with whomsoever justice goes along, he can be aware with the realities and then can denominate those realities. Hereunder is mentioned the achievement of one or two great honourable scholars amongst the scholars of Islam.
A personality, amongst one of the great investigators of the twentieth century, is that of Allamah Sayyid Alavi al Huda al Alavi al Hazrami al Jaavi ash Shaafi, has written a book “Al qawlul Fasl fee mal Bani Hashim wa Qureish minal fazl” and has prescribed such virtues of Ahle Bayt (a.s.) that a person remains amazed, and after this has also mentioned the prevailing impiety in Islamic world, injustice and irreligiousness, as, how the Islamic Scholars have deemed the narrations reliable and unreliable, as per their wishes, and how did they unsuccessfully try to put curtains on the virtues of Ahle Bayt (a.s.).
Replying to the answers of some of the prejudiced persons, the noted Allamah writes in the volume 2, page 162 of his book that, Hadeeth-e-Kisa is absolutely correct, and the revelation of the verse of Tat-heer is seen in Sahih Muslim, Sahih Tirmizi, Musnad Ahmad, Mustadrak Hakim, and Sunan Baheeqi and ibne Haban, author of M’ojame Kabeer, Tabari, Nisaai, Tafseer ibne Katheer, ibne Manzar, ibne Abi Hatim, ibne Mardvaiyya, Khateeb ibne Abi Shayba, Tayalsi etc., too hae done the extractions of this Hadeeth.
Deeming it correct are the great honourable scholars of Ahle Sunnat like, Muslim, ibne Abi Hatim, Saleh ibne Mohammad Asadi, ibne Shaheen, Hafiz Ahmad ibne Saleh Misri Hakim, Baheeqi, Hafiz ibne Hajar, ibne Abdul Birr, ibne Taymiya, Sakhavi, Qastalaant, Kamaal, Zarqani, Samhudi, Shawkani – And among the Shi’a scholar all have deemed it correct and reliable, after which there remains no place for doubt and suspicion.
Other than this, among the narrators of this Hadeeth, are 15 companions of the Messenger (s.a.w.a) too, Hazrat Ali (a.s.) Hazrat Hasan (a.s.) Hazrat Husayn (a.s.) Hazrat Abdullah ibne J’afar, ibne Abbas, Umme Salma, Aayesha, S’ad ibne Abi Waqqas, Anas ibne Malik, Abu Saeed Khudri, ibne Mas’ood, Muaqqal ibne Yasar, Wathela ibne Asq’a, Umro ibne Abi Salma, Abul Hamra etc.
After this the noted Allama, has traced this quotation from the Shafe’I Scholars while putting more light on the guidance and meaning of the verse that, the gracious verse is a proof of this matter that the pure Ahle Bayt (a.s.) are the fountainhead of virtues and excellences, and excluding them wherever excellences are found, is all their alms and pretext, just like a slave shares the destination with his master – They were the preferred by the Prophet of Islam, heir, Caliph and are the equals and equivocal of the Holy Qur’an – No one is a part and partner of them in their virtues, the like of their honour was neither achieved by Aale Abbas nor Aale Ja’far – On the contrary even among the children of Ali (a.s.) other than the children of Fatemah no one has attained this honour and excellence. That is why when Allamah Baheeqi stated the narration about Wathela ibne Asq’a that Anta min Ahlee then explained it’s matter that, Wathela has been enjoined with Ahle Bayt (a.s.), which in itself is a best proof of an accomplishing honour and excellence of Ahle Bayt (a.s.).
After this the noted Allamah has quoted a detailed investigation, referring Allamah Samhudi about the meaning and sense of the verse, the summary of which is that nearly 15 specialities are found in the verse, and every speciality is a separate proof of the greatness and virtues of Ahle Bayt (a.s.).
1. The verse is started with the word innama, which itself means that Allah has based His wish in their purity, and this a best proof of their being a fountainhead of piety and graces.
2. The Lord of the worlds has made this arrangement only to state their virtues, except this nowhere (in the Qur’an) this arrangement is to be seen.
3. By mentioning the origin of purity (Tat-heer) additional emphasis has been created in the subject.
4. Using Tat-heeran, as an indefinite article, it has been exhibited that this purity is a special kind of a great purity which cannot be compared to the common purities.
5. The Prophet (s.a.w.a) addressing them as Ahle Bayt (a.s.) and supplicate for purity is a sign that along with the wish of Allah the claim of the Holy Prophet (s.a.w.a) is also functioning, and all are worried about the propagation of the virtues of Ahle Bayt (a.s.).
6. As per the narration of Abu Saeed Khudri, the Holy Prophet (s.a.w.a) too is a participant in the verse, which is an additional proof of the greatness of Ahle Bayt (a.s.).
7. The Holy Prophet (s.a.w.a) has supplicated for the grace, mercy and peace and forgiveness for the Ahle Bayt (a.s.) which is the proof that these very souls are the owners of purity, other wise no other is entitled for these supplications.
8. In every supplication the Holy Prophet (s.a.w.a) has kept himself also a participant in it, so that by this the honour of equality of the Ahle Bayt (a.s.) be adjudged too.
9. The Holy Prophet (s.a.w.a) has also mentioned the descendance of mercy on Janabe Ibrahim a.s. in the supplication, which is the proof of Ahle Bayt a.s. being the heirs and of equal rank of Ibrahim (a.s.).
10. The Holy Prophet (s.a.w.a) praying for peace is a proof that Ahle Bayt (a.s.) are entitled for peace (Salawaat) because the supplication of the Prophet (s.a.w.a) is not rejected.
11. Innahum minni wa anaa minhum is a hint that Ahle Bayt (a.s.) are the partners of the Holy Prophet (s.a.w.a) in all the ranks of virtues and excellences.
12. Wishing for purity and the disappearance of defects, is a separate proof that Ahle Bayt (a.s.) are completely secure from the fire of Hell in the Hereafter.
13. To come and salute everyday on the door of Zahra (s.a.w.a) is a hint that, whose rank and position is high, their character also should be higher, and Ahle Bayt (a.s.) are as such.
14. The mention of the Holy Prophet (s.a.w.a) in the Hadeeth, of himself that, Allah has kept me in a best family, is itself a proof of the Ahle Bayt (a.s.) being best persons.
15. He has, by declaring the purity and equality in excellences made this also clear that, alms are prohibited for Ahle Bayt (a.s.), because alms is dirt of hands and a kind of unclean wealth which is not according to the glory of the beholders of purity.
After this the noted Allamah has quoted this mention of some investigators too that, even if in Ahle Bayt (a.s.) the house and the household all enjoin, but in general application the dwelling householders are not encounted, but only the family members are counted, who always live along with the family, the dwellers can at any time separate themselves from the house – A wife after divorce goes to her own or another husband’s house and mingles in their household, she cannot participate in the Ahle Bayt.
The Holy Qur’an has addressed the wives as Yaa nisaa an Nabiyy, which means it has ascribed them to the Prophet, and has not mentioned their comparison to Ahle Bayt (a.s.) which itself means that Ahle Bayt (a.s.) are something else and wives something else – The Holy Prophet (s.a.w.a) is not a participant with the wives and in Ahle Bayt (a.s.) the Prophet (s.a.w.a) has also participated himself.
In the verse of purity the word Bayt is singular, and is not wives of Ahle Bayt but Ahle Buyoot, meaning of different houses, and Alif and Laam has been enjoined to Bayt, from which it is known that it is some special house.
By mentioning Umme Salamah as Alaa Khayr, and keeping her away from the holy blanket (Kisa) is a proof, that in the verse of purity there is no place for wives, and it has been revealed only for the declaration of the greatness, infallibility, purity and glory of the Panjatan-e-Paak (a.s.).

THE COMPANIONS OF KISA
May Allah curse the prejudice, jealousy and enemity of Ahle Bayt (a.s.), as no indisputable fact of Islam remained certain, and at every place the faithfuls of the government created doubts – And who is ignorant of it that, Aayat-e-Tat-heer, is in the glory of the pure Ahle Bayt (a.s.), and by Ahle Bayt it means the five noble souls – But in the olden and modern times such persons are, by all means born whose function is to suspect in realities and to devote the certainties of Islam at the alter of doubts – They wanted to take the help the matter of before and after part of the verse and connect it to the wives of the Prophet (s.a.w.a), and in the meantime have confessed this also that, the circle of Ahle Bayt (a.s.) is far more expansive than wives, and in it there is also a place for Hazrat Ali, Janab-e-Fatemah, Hasan and Husayn (a.s.). As after which such a group was born which eliminated this possibility too, and in his crude ideas established the proofs that the application of Ahle Bayt cannot be to the infallible, by it is meant only the wives of the Holy Prophet (s.a.w.a) – And prepared one or two narrations also in which the narrators have tried to relate the Ahle Bayt to wives, and have overlooked all those Traditions against this, in which a complete explanation or Ahle Bayt was present, and the names of the infallible were quoted, and after which there was no place for doubt and suspicion, on the contrary stopping Umme Salamah itself was a proof that, wives are not a part of it – Anyway, it is the impertinence of times, as the wife of the Holy Prophet (s.a.w.a), who tried to enter was stopped by the Messenger (s.a.w.a), and the mark or sign of the one who was not even present at this moment, was made a participant of the verse from the unknown.
Now, for a study, the references of Ahmad ibne Hambal and his contemporary or the later authentic scholars of Ahle Sunnat are being quoted, who have mentioned Hazrat Ali, Fatemah, Hasan, Husayn (a.s.) name by name and the revelation of the verse in their glory and after which there remains no place for any doubt or refutation:
 1. हाफिज़ अबू दावूद अल तेयासी सुलेमान इब्ने दावूद इब्ने जरूदल बसरी, किताब मुसनद  के लेखक, वौलयूम.8 पेज 274, हैदराबाद से प्रकाशित 

2.      2. अल्लामा  हाफिज़ अबू अब्दुल्लाह अहमद इब्ने मोहम्मद इब्ने हम्बल शय्बानी, मुसनद  के लेखक, वौलयूम 1, पेज 331, कायेरो से प्रकाशित

3.      3. हाफिज़ मोहम्मद इब्ने ईसा तिरमिज़ी, सहीह तिरमिज़ी  के लेखक, इब्ने हजर द्वारा पता लगाया गया

4.      4. हाफिज़ मोहम्मद इब्ने उस्मान इब्ने अबी शयबा कूफ़ी, मुसनद के लेखक फलाकुन नजात के हवाले सेपेज 43.

5.      5. अल्लामा अबू अब्दिर रहमान अहमद इब्ने शोऐबुन निसाई, ख़ासा'इस  के लेखक पेज.4.

6.      6. हाफिज़ मोहम्मद इब्ने जुरैर तबरी, तफसीर  के लेखक, वौलयूम.22, पेज.5. इजिप्ट (मिस्र)  से प्रकाशित.

7.      7. हाफिज़ अब्दुर रहमान इब्ने अबी हातिम मोहम्मद अर'राज़ी, फलाकुन नजात के हवाले से.

8.      8. सुलेमान इब्ने अहमद इब्ने अय्यूब तबरानी, 'ओजम के लेखक, सवाईक के हवाले से

9.      9. अल्लामा जसास एहकामुल क़ुरान के लेखक.

10.  10. हाफिज़ हकीम अबू अब्दिल्लाह मोहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह नेशापूरी, मुस्तदरक  के लेखक वौलयूम.2,पेज.416 वौलयूम.3, पेज.146.वौलयूम.3,पेज.159. वौलयूम.3,पेज.172.

11.  11. अल्लामा  मोहद्दिस अहमद इब्नल हुसेन इब्ने हरूनल मुवाय्द बिल्लाह, अमली  के लेखक पेज 23.

12.  12. हाफ़िज़ अहमद इब्निल हुसेन इब्नल अली अल बहिक़ी, सुनान-ए-कुबरा   के लेखक, वौलयूम.2, पेज.149.

13.  13. अल्लामा हाफ़िज़ अबू बकर  अहमद इब्ने अली सबितल खतीबल बग्दादी.- तारीख़ल  बग़दाद   के लेखक, वौलयूम.10.

14.  14. अल्लामा हाफ़िज़ अबू उम्रो युसूफ इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने मोहम्मद. इब्ने अब्दुल बिर्रल अन्देसी, इस्तिअब   के लेखक वौलयूम.2, पेज.460.

15.  15. अल्लामा मोहद्दिस शेख़ अब्दुल हसन अली इब्ने अहमद अल वहीदी नेशापूरी, असबाबुन नुज़ूल   के लेखक, पेज.267.

16.  16. हाफ़िज़ देलमी, किताब-ए-फिरदौस   के लेखक, सवाईक के हवाले से लिया गया.

17.  17. हाफ़िज़ हुसैन इब्ने उदाश शाफे अल बग्वा, मसाबेहुस सना के लेखक वौलयूम.2, पेज.204.

18.  18. अल्लामा महमूद इब्ने उमर अज़ ज़मख'शरी, कश्शाफ के लेखक वौलयूम.1, पेज.193.

19.  19. अल्लामा क़ाज़ी अबू बकर मोहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने मोहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह अल शुबैली, एहकामुल क़ुरान के लेखक. वौलयूम.2, पेज.166.

20.  20. अब्दुल मुवैद मुवाफ्फ़क इब्ने अहमद अखताब ख़ुतबा ख़वा'रज्म. मनाकिब   के लेखक पेज.35.

21.  21. अल्लामा अली इब्निल हुसैन इब्ने हेब्तुल्लाह दमिशकी, इब्ने असाकीर के नाम से मशहूर,तारीख़े दमिश्क के लेखक.

22.  22. अल्लामा फखरुद्दीन राज़ी, तफ़सीरे मारूफ़ के लेखक.

23.  23. अब्दुल आदात मुबारक इब्ने मोहम्मद इब्ने अत'हीराल जज़री. जमीउल उसूल के लेखक. वौलयूम.1, पेज.101.

24.  24. अल्लामा मोहददिस शेख़ हसन इब्ने अल हुसैन इब्ने अली इब्ने मोहम्मद इब्ने बतरीक़ अल असदी, नहजुल उलूम के लेखक.

25.  25. अल्लामा शेख़ अज़ाद्दीन अबुल हसन अली इब्ने असीरल जज़री. किताब-. उस्दुल ग़ाबा.

26.  26. अल्लामा युसुफ़ अल वाएज़ इब्ने अब्दुल्लाह अल मुश्ताहर्बा इब्ने जौज़ी! ताज़्केरह  खवासुल  आम्मः के लेखक.

27.  27. अल्लामा गंजी शफे, किफायातुत तालिब के लेखक.

28.  28. अल्लामा कमालुद्दीन इब्ने मोहम्मद इब्ने ताल्हा शाफे, मतालिबुस सोउल   के लेखक.

29.  29. अल्लामा शेख़ अबू अब्दुल्लाह मोहम्मद इब्ने अहमद अल अंसारी अल क़र्ताबी, जमीउल  एह्कामिल-ए-क़ुरान   के लेखक

30.  30. अल्लामा शेख़ यहया इब्ने शर'फुद्दीन दमिश्की, शराफुल महज़ब के लेखक

31.  31. अल्लामा क़ाज़ी बैज़वी, तफसीर मा'रूफ़ के लेखक

32.  32. हाफ़िज़ मोहिबुद्दीन अहमद इब्ने अब्दुल्लाह अल बतरी, ज़खा'एरुल उक़बा के लेखक

33.  33. अल्लामा नस्फ़ी, तफ़सीरे मदारिक के लेखक

34.  34. अल्लामा वली'उद्दीन मोहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह अल ख़तीब अल अमरी तबरीज़ी, मिश्कतुल मसबिः के लेखक

35.  35. अल्लामा जलील अबुल फ़िदा इस्माईल इब्ने कसीर दमिश्की, तफसीरे अरूफ़ के लेखक

36.  36. हाफ़िज़ नूरुद्दीन अली इब्ने अबू बकर अल हैज़मी, मजमा'उज़ ज़वा'ईद के लेखक

37.  37. शेख़ुल इमाम अली इब्ने मोहम्मद जो की मशहूर हैं इब्ने सब्बाग़ अल मलिकी के नाम से, अल फुसूल अल मोह्म्मः

38.  38. हाफिज़ शहाबुद्दीन अहमद इब्ने अली इब्ने मोहम्मद इब्ने मोहम्मद इब्ने अली अल अस्क़लानीइब्ने हजर के नाम से मशहूर,असादा के लेखक

39.  39. शमसुद्दीन अबू अब्दिल्लाह मोहम्मद इब्ने अहमद ज़हाबी, तल्खीसुल मुस्तद'रक् के लेखक

40.  40. अल्लामा शेख़  हामिद इब्ने अहमद अल मोहल्ला इमानी, हदा'एक़ल वरदिया के लेखक

41.  41. अल्लामा निजामुद्दीन अल हसनल रज अल कुम्मी, तफसीरे नेशापूरी के लेखक

42.  42. मोहद'दिसे जलील अस सय्यद अताउल्लाह अल हुसैनी, रौज़तुल अहबाब के लेखक

43.  43. अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती, दुर्रे मंसूर के लेखक

44.  44. अल्लामा मुवर्रिख गियासुद्दीन इब्ने हिमामुद्दीन, हबिबुस सैर के लेखक

45.  45. अश'शेख़ अहमद इब्ने हजारील मक्की, सवाएक़े मोहरेक़ा के लेखक

46.  46. अल्लामा मीर मोहम्मद सालेह कश्फ़ी, मनाक़िबे मुर्तज्वी के लेखक

47.  47. मोहद्दिस जलील अलाउद्दीन इब्ने अब्दुल मालिक हिशामुद्दीन, मुत्तक़ी अल हिन्दी के नाम से मशहूर, मूनतख़ब कंज़ुल उम्माल के लेखक

48.  48. अल्लामा मोहम्मद शुर'बैनी अल ख़तीब -  तफसीरे सिराजे मुनीर के लेखक

49.  49. अल्लामा शेख़ मोहम्मद अश शा'फ़े'ई अल-यमानीलेखक मंज़ुमा

50.  50. अल्लामा मुल्ला अली अल-क़ारी, लेखक -शर'हुल फ़की'हिल अकबर

51.  51. अर्जाहुल मतालिब के लेखक

52.  52. अल्लामा बुरहानुद्दीन शा'फ़े', लेखक -सीरातुल जली

53.  53. मोहद्दिस ज़र्कानी - किताबे मारुफ़ के लेखक

54.  54. अल्लामा अब्दुल्लाह इब्ने मोहम्मद इब्ने आमिर

55.  55. अल्लामा शेख़ मोहम्मद सबान मिसरी, अस'आफ़ुर राग़े'बैन के लेखक

56.  56. अल्लामा क़ाज़ी अल हुसैन इब्ने अहमद इब्नल-हुसैन अल यमानी अर रौज़ा अन'नज़ीर

57.  57. अल्लामा शेख़ मोहम्मद इब्ने अली शौकानी - फ़तहुल क़ादिर

58.  58. शहाबुद्दीन महमूद अल आलूसी - रूहुल 'आनी ले लेखक

59.  59. अल्लामा शबलंजी - नूरुल अबसार के लेखक

60.  60. अल्लामा सिद्दीक हसन खां भोपाली, - तशरीफुल बशर के लेखक

61.  61. शेख़ यूसुफ़ इब्ने इस्माइल बहानी, लेखक शरफुल मु'वैद

62.  62. अल्लामा अबू बकर इब्ने शहाबुद्दीन अश'शाफ़े', राष्कतुस सादी

63.  63. अल्लामा सयाद अलावी अल हिदाद सादिक़ी अल हज्रामी अश'शाफ़े', लेखक- अल-उक़ूलाल फ़ासी

 

            

     

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