मग़रिब के नमाज़ के बाद की दुआएं  PDF

 रोज़ाना की दुआ- बाद नमाज़   |   मुश्तरका ताकीबात   |     ईशा के नमाज़ के बाद की दुआएं      नजफ़ अरबी फौन्ट डाउनलोड करें
     

ईमाम जाफ़र अल-सादिक़ (अ:स) से रिवायत है की, " जब सूरज का रंग बदलता है (यानी जब सूरज डूबने वाला होता है), तब तुम अल्लाह सुबहान व त'आला को ज़रूर याद करो! अगर तुम किसी के साथ भी हो या किसी काम में मसरूफ हो तो भी तुम्हें सब कुछ छोड़ कर दुआ करना चाहिए, और वो दुआ यह है : PDF सूरज डूबने के वक़्त मगरिब के नमाज़ से पहले की दुआ

 

 रिवायतों में मिलता है की मगरिब की नमाज़ में बिलकुल भी ताखीर नहीं करनी चाहिए और हेमशा अव्वल वक़्त पर ही पढ़ना चाहिए

 

मगरिब की नमाज़ के अज़ान और अकामत के बीच में यह दुआ पढ़ें

اللَّهُمَّ إِنِّي اسْالُكَ بِإِقْبَالِ لَيْلِكَ

अल्लाहुम्मा इन्नी अस'अलोका बे'इक़्बाले लैलेका

 

وَإِدْبَارِ نَهَارِكَ

व इदबारे नहारेका

 

وَحُضُورِ صَلَوَاتِكَ

व हुज़ूरे सल्वातेका

 

وَاصْوَاتِ دُعَاتِكَ

व अस्वाते दुआतेका

 

وَتَسْبِيحِ مَلاَئِكَتِكَ

व तस्बीहे मलाइकते'का

 

انْ تُصَلِّيَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ

अन्तु सल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मदीन

 

وَانْ تَتُوْبَ عَلَيَّ

व अन'तातूबा अलैय्या

 

إِنَّكَ انْتَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ

इन्नका अन्ता अल्त'तव्वाबो अल'रहीमो

 
   मगरिब की नमाज़ के बाद की दुआएँ

तस्बीहे फ़ातिमा ज़हरा के बाद कहें

إِنَّ اللهَ وَمَلائِکَتَہُ یُصَلُّونَ عَلَی النَّبِیِّ، یَا أَیُّھَا الَّذِینَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَیْہِ وَسَلِّمُوا تَسْلِیماً اَللّٰھُمَّ صَلِّ عَلی مُحَمَّدٍ النَّبِیِّ وَعَلی ذُرِّیَّتِہِ وَعَلی أَھْلِبَیْتِہِ इन्ना अल्लाहा व मलाइकतोहु यसल'लूना अल्न'नबी या अय्योहल लज़ीना आ'मनु सल्लू अलैहे व सल'लमू तसलीमा, अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदीन अल'नबिय्या व अला ज़ूर'रियातेही व अला अहलेबैतेही बे शक अल्लाह और इसके फ़रिश्ते नबी अकरम पर दरूद भेजते हैं, ऐ ईमान लाने वालो तुम भी नबी पर दरूद भेजो और सलाम भेजो जिस तरह सलाम का हक़ है, ख़ुदा वंदा ! (हमारे) नबी-ए-मोहम्मद, इनकी औलाद और इनके अहलेबैत (अ:स) पर रहमत फ़रमा
     

ईमाम मूसा अल-काज़िम (अ:स) से रिवायत है की मगरिब की नमाज़ के बाद, ब़गैर किसी से बात किये, यह दुआ पढ़ें

सात मर्तबा कहें
بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِیمِ، وَلاَحَوْلَ وَلاَقُوَّةَإِلاَّبِاللهِ الْعَلِیِّ الْعَظِیمِ बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम, व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहे अल'अलिय्यो अल'अज़ीम ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूँ) जो रहमान-ओ-रहीम है, खुदाए बुज़ूर्ग व बरतर के इलावा किसी को ताक़त व क़ुव्वत नहीं है

तीन मर्तबा कहें

اَلْحَمْدُ لِلّٰہِ الَّذِی یَفْعَلُ مَا یَشَاءُ وَلاَ یَفْعَلُ مَا یَشَاءُ غَیْرُہُ अलहम्दो लिल'लाहे अल'लज़ी यफ़'अलो मा यशा'ओ गैरोहू हर क़िस्म की तारीफ़ ख़ुदा के लिए है वोह जो चाहता है करता है और उसके सिवा कोई नहीं जो जी चाहे कर सके

फिर यह कहें

 سُبْحانَکَ لاَ إِلہَ إِلاَّ أَنْتَ اغْفِرْلِی ذُنُوبِی کُلَّھا جَمِیعاً، فَإِنَّہُ لاَ یَغْفِرُ الذُّنُوبَ کُلَّھا جَمِیعاً إِلاَّ أَنْتَ सुब्हानका ला ईलाहा इल्ला अन्ता अग़'फ़िरली ज़ूनूबी कुल'लहा जमी'अन, 'इन्नाहु ला यग़'फ़ेरो अल'ज़ूनूबा कुल्लाहा जमी'अन इल्ला अन्ता पाक है तू की तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, मेरे सारे के सारे गुनाह बख्श दे क्योंकि तेरे सिवा कोई और तमाम गुनाहों को बख्शने वाला नहीं है

फिर दो सलामों के साथ मगरिब की 4 रक्'अत नमाज़ नाफ़िला बजा लायें और दरम्यान में किसी से बात न करें ! शेख मुफ़ीद (र:अ) फ़रमाते हैं, " मरवी है की पहले रक्'अत में सुरह अल-काफ़ेरून और दूसरी रक्'अत में सुरह इख्लास और दूसरी दो रक्'अतों में जो सुरह चाहे पढ़ें! अलबत्ता रिवायत है की ईमाम अली नक़ी (अ:स) तीसरी रक्'अत में सुरह अल-हमद के बाद सुरह हदीद की पहली आयत से व हुवा अलैहुम बी'ज़ातिस सुदूर तक औरचौथी रक्'अत में सुरह अल-हमद के बाद सुरह अल-हशर की आयात  लौ अन्ज़ल्नाह अल'कुर'आन से आखरी सुरह पढ़ा करते थे, और मुस्तहब है की हर शब् के नवाफिल के आखरी सज्दा और ख़ास कर शबे जुमा को सात (7) मर्तबा यह दुआ पढ़ते थे

     
اَللّٰھُمَّ إِنِّی أَسْأَلُکَ بِوَجْھِکَ الْکَرِیمِ وَاسْمِکَ الْعَظِیمِ وَمُلْکِ الْقَدِیمِ أَنْ تُصَلِّی عَلیٰمُحَمَّدٍ وَآلِہِ وَأَنْ تَغْفِرَ لِی ذَ نْبِیَ الْعَظِیمَ إِنَّہُ لاَ یَغْفِرُ الْعَظِیمَ إِلاَّ الْعَظِیمُ अल्लाहुम्मा इन्नी अस'अलोका बे-वज'हेका अल'करीमे व इसमेका अल'अज़ीमे व मुल्के अल'क़दीमे अन्तु सल्ले अला मोहम्मदीन व आलेही व अन तग़'फ़िरली दुनबिया अल'अज़ीमा इन्नाहु ला यग़'फ़ेरो अल'अज़ीमा इल्ला अल'अज़ीमो ख़ुदा वंदा ! तेरी ज़ाते करीम, तेरे बुलंद-ओ-बाला नाम और तेरे क़दीम इक़्तदार के वास्ते से मैं सवाल करता हूँ की तू मोहम्मद (स:अव:व) व आले मोहम्मद (अ:स) पर रहमत नाजिल फरमा और मेरे बड़े गुनाह (गुनाहे कबीरा) माफ़ कर दे की बड़े गुनाह को अज़ीम ज़ात ही माफ़ कर सकती है
     
जब मगरिब के नवाफिल से फारिग़ हो जाएँ तो जो चाहे पढ़ें - और फिर 10 मर्तबा कहें
     
مَا شَاءَ الله لاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِاللهِ أَسْتَغْفِرُ اللهَ माशा'अल्लाहो ला क़ुव्वाता इल्ला बिल्लाहे अस्तग'फ़ेरो अल्लाह जो कुछ ख़ुदा चाहे - नहीं कोई ताक़त सिवाए ख़ुदा के - मैं इस से बख्शीश चाहता हूँ 

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फिर कहें

 
 

اَللَّهُمَّ إِنِّي اسْالُكَ مُوجِبَاتِ رَحْمَتِكَ

अल्लाहुम्मा इन्नी अस'अलोका मौ'जबाते रहमतेका

खुदा वंदा मैं तुझ से सवाल करता हूँ ,

وَعَزَائِمِ مَغْفِرَتِكَ

व अज़ा'ऐमा मग़फ़े'रतेका

तेरी रहमत के वसाएल और तेरी तरफ से यक़ीनी मग्फ़ेरत,

وَٱلنَّجَاةَ مِنَ ٱلنَّارِ

व अल'निजातह मिन अल'नार

आतिशे जहन्नुम से निजात

وَمِنْ كُلِّ بِلِيَّة

व मिन कुल्ले बली'यतिन

बालाओं से बचाने ,

وَٱلْفَوْزَ بِٱلْجَنَّةِ

व अल'फौज़ा बिल'जन्नातेह

जन्नत में दाखिल किये जाने,

وَٱلرِّضْوَانِ في دَارِ ٱلسَّلاَمِ

व अल'रिज़वाना फ़ी दारे अल्स'सलाम

दारुल'इस्लाम में तेरी खुशनूदी हासिल होने,

وَجَوَارِ نَبِيِّكَ مُحَمَّد عَلَيْهِ وَآلِهِ ٱلسَّلاَمُ

व जवारे नबिय्येका मोहम्मदीन अलैहे व आलेही अल्स'सलामो

और तेरे नबी हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) के क़ुर्ब का,

اَللَّهُمَّ مَا بِنَا مِنْ نِعْمَة فَمِنْكَ

अल्लाहुम्मा मा'बना मिन ने'मतिन फ़'मिन्का

ख़ुदा वंदा ! हमारे पास जो नेमत है वोह तेरी तरफ से है,

لاَ إِلٰهَ إِلاَّ انْتَ

ला इलाहा इल्ला अन्ता,

तेरे सिवा कोई माबूद नहीं,

اسْتَغْفِرُكَ وَ اتُوبُ إِلَيْكَ

अस्तग'फ़ेरोका व अतूबो इलैक

मैं तुझ से बख्शीश चाहता हूँ और तेरे हुज़ूर तौबा करता ह

     

हिंदी तर्जुमा : खुदा वंदा मैं तुझ से सवाल करता हूँ - तेरी रहमत के वसाएल और तेरी तरफ से यक़ीनी मग्फ़ेरत, आतिशे जहन्नुम से निजात, बालाओं से बचाने जन्नत में दाखिल किये जाने, दारुल'इस्लाम में तेरी खुशनूदी हासिल होने और तेरे नबी हज़रत मोहम्मद (स:अ:व:व) के क़ुर्ब का, ख़ुदा वंदा ! हमारे पास जो नेमत है वोह तेरी तरफ से है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, मैं तुझ से बख्शीश चाहता हूँ और तेरे हुज़ूर तौबा करता हूँ

इस दुआ को दुसरे फौरमैट में पढ़ें : अल्लाहुम्मा इन्नी अस'अलोका मौ'जबाते रहमतेका व अज़ा'ऐमा मग़फ़े'रतेका व अल'निजातह मिन अल'नार, व मिन कुल्ले बली'यतिन व अल'फौज़ा बिल'जन्नातेह, व अल'रिज़वाना फ़ी दारे अल्स'सलामे, व जवारे नबिय्येका मोहम्मदीन अलैहे व आलेही अल्स'सलामो, अल्लाहुम्मा मा'बना मिन ने'मतिन फ़'मिन्का ला इलाहा इल्ला अन्ता, अस्तग'फ़ेरोका व अतूबो इलैका

     
अमीर अल-मोमिनीन हज़रत इमाम अली (अ:स) से रिवायत है की जो भी शख्स मगरिब की नमाज़ के बाद इन आयाते कुरानी (30:17/18) की तिलावत करेगा, उसे सुबह तक कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और वोह हर क़िस्म की क़ुदरती आफ़तों से महफूज़ रहेगा
     
فَسُبْحَانَ اللَّـهِ حِينَ تُمْسُونَ وَحِينَ تُصْبِحُونَ 'सुबहान अल्लाहे हीना तुम्सूना वहीना तुस्बेहूना इसलिए (तुम) अब अल्लाह की तसबीह करो, जबकि तुम शाम करो और जब सुबह करो

وَلَهُ الْحَمْدُ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَعَشِيًّا وَحِينَ تُظْهِرُون 

व लहू अलहम्दो फ़ी अल्स'समावाते व अल'अरज़े व अशिय्या'अन वहीना तुज़'हेरुना

और उसी के लिए तारीफ़ है आसमानों और ज़मीन में - और पिछले पहर और जब तुम पर दोपहर हो
     

नमाज़े मगरिब और इशा के दरम्यान, 2 रक्'अत नमाज़ गुफ़ैला पढ़ें - पहली रक्'अत में सुरह अल-हम्द के बाद पढ़ें

     
وَذَا النُّونِ إِذْ ذَھَبَ مُغَاضِباً فَظَنَّ أَنْ لَنْ نَقْدِرَ عَلَیْہِ فَنادَی فِی الظُّلُماتِ أَنْ لاَ إِلہَإِلاَّ أَنْتَ سُبْحَانَکَ إِنِّی کُنْتُ مِنَ الظَّالِمِینَ، فَاسْتَجَبْنَا لَہُ وَنَجَّیْناہُ مِنَ الْغَمِّ وَکَذلِکَ نُنْجِی الْمُؤْمِنِینَ۔ ज़ाअल्न'नूने इद दोहाबा मुग़ा'ज़ेबन फ़'ज़ुन्ना अन-लन नक़'देरा अलैहे फ़'नादा'इ फ़ी अल'ज़ूलूमाते अन ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तो मिन'अल-ज़ालेमीन, 'अस्तन-जब्ना लहू व नजय्या'नहु मिन अल'गम्मे व कज़ालेका नुन'जिय्यी अल'मोमेनीना और जब ज़ाल्नून गुस्से की हालत में चला गया तो इसका गुमान था की हम इसे नहीं पकड़ेंगे, फिर इसने तारीकियों में फरयाद की के तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तू पाक है, बे'शक मैं ही खताकारों में से हूँ तब हम ने इसकी गुज़ारिश कबूल की और इसे अपनी परेशानी से, और हम मोमिनों को इसी तरह निजात देते हैं - और ग़ैब की कुंजियाँ इसी के पास हैं, जिसे इसके सिवा कोई नहीं जानता
     
दूसरी रक्'अत में सुरह अल-हम्द के बाद पढ़ें
     
وَعِنْدَہُ مَفَاتِحُ الْغَیْبِ لاَ یَعْلَمُھَا إِلاَّ ھُوَ وَیَعْلَمُ مَا فِی الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَمَا تَسْقُطُ مِنْ وَرَقَةٍ إِلاَّ یَعْلَمُھا وَلاَ حَبَّةٍ فِی ظُلُماتِ الْاَرْضِ وَلاَ  رَطْبٍ وَلاَ یَابِسٍ إِلاَّ فِی کِتَابٍ مُبِینٍ व इद'दहु मफ़ा'तेहुल ग़ैब ला यअ-लमोहा इल्ला होवा व यालामो मा फ़ी अल'बर्रे व अल'बहरे व मा तस'क़तो मिन वरा'क़तिन इल्ला या'लमोहा व ला हब'बतिन फ़ी ज़ूलुमाते अल'अर्ज़ व ला रत'बिन व ला या'बिस इल्ला फ़ी किताबिन मुबीन इसी को मालूम है जो कुछ खुशकी व तरी में है, कोई पता नहीं करता मगर यह की वोह इसे जानता है और ज़मीन को तारीकियों में कोई दाना नहीं, कोई खुश्क़ व तर नहीं मगर वोह रौशन किताब में मज़कूर है,
     
इसके बाद दुआये कनूत के लिए हाथ उठायें और पढ़ें
     
 اَللّٰھُمَّ انِّی أَسْأَلُکَ بِمَفَاتِحِ الْغَیْبِ الَّتِی لاَ یَعْلَمُہا إِلاّ أَنْتَ أَنْ تُصَلِّیَ عَلَی مُحَمَّدٍ وَآلِہِ وَأَنْ تَفعَل بِی کَذا وَکَذا، अल्लाहुम्मा इन्नी अस'अलोका बे'मफ़ा'तेहुल ग़ैब अल'लती ला या'लमोहा इल्ला अन्ता अन तुसल्ली अला मोहम्मदीन व आलेही व अन'तफ़-अल बी क़ज़ा-व-क़ज़ा (क़ज़ा-व-क़ज़ा की जगह अपनी दुआएं माँगे) ख़ुदा वंदा ! मैं तुझ से कलीद'हाए ग़ैब के वास्ते से सवाल करता हूँ जिसे तेरे सिवा कोई नहीं जानता की मोहम्मद (स:अव:व) व आले मोहम्मद (अ:स) पर रहमत नाजिल फरमा और मेरे हक में यह काम कर दे ((क़ज़ा-व-क़ज़ा की जगह अपनी हाजत ब्यान करें), ऐ माबूद! तू मुझे नेमत अता करने वाला ह
 

फिर कहें

 
     
اَللّٰھُمَّ أَنْتَ وَلِیُّ اَلسَّلاَمُ لَمَّا قَضَیْتَھا لِی अल्लाहुम्मा अन्ता वलिय्यो अल्स'सलामो लुम्मा क़जयी'तहा ली और मेरी हाजत पर क़ुदरत रखता है, मेरी हाजत को जानता है, बस मोहम्मद (स:आ:व:व) व आले मोहम्मद (अ:स) के वास्ते से सवाल करता हूँ की मेरी हाजत को पूरी फ़रमा
     
इसके बाद अपनी हाजत तलब करें, रिवायत है की जो यह नमाज़ पढ़ कर हाजत तलब करेगा, उसकी हाजत पूरी हो जायेगी
     
 

फिर पढ़ें

 
  अल्लाहुम्मा अजिरना मिनन नारी सालेमीना व अदखिल्नल जन्नता बे'सलामिन आमेनीना व तवफ़'फ़ना मुस्लेमीना व अल'हीक़ाना  बिस'सालेहीना व सल'लल'लाहो अला मोहम्मदीन व आलिहि अज्मा'इना बे'फ़ज'लिका व रह'मतिका या अरहमर राहेमीन  
     
 

100मर्तबा या 10 मर्तबा पढ़ें

 

  इसको पढने से आप गुनाह करने से महफूज़ रहेंगे, अल्लाह आप से खुश होगा, और आप क़ब्र में बड़ी मुसीबतों से महफूज़ रहेंगे

 

لا اله الا الله ला ईलाहा इलल लाह कोई माबूद नहीं हैं सिवाए अल्लाह
     

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ:स) फरमाते हैं, " जो शख्स मगरिब की नमाज़ के बाद 7 मर्तबा सुरह अल-क़द्र (इन्ना अनज़ल'नाहू) पढ़ कर इस दुआ की तिलावत करेगा वोग सुबह तक अल्लाह की अमान में रहेगा

     

اللَّهُمَّ رَبَّ ٱلسَّمَاوَاتِ ٱلسَّبْعِ وَمَا اظَلَّتْ

अल्लाहुम्मा रब्बा अल्स'समावाते अल्स'सब-ए व मा अज़ल'लत

 

وَرَبَّ ٱلارَضِينَ ٱلسَّبْعِ وَمَا اقَلَّتْ

व रब्बा अल'अर्ज़ीना अल्स'सब-ए व मा अक़ल'लत

 

وَرَبَّ ٱلشَّيَاطِينِ وَمَا اضَلَّتْ

 व रब्बा अल्श'श्यातिनी व मा अज़ल'लत

 

وَرَبَّ ٱلرِّيَاحِ وَمَا ذَرَتْ

व रब्बा अल'रियाही व माज़रत

 

اللَّهُمَّ رَبَّ كُلِّ شَيْءٍ

अल्लाहुम्मा रब्बा कुल्ले शै'इन 

 

وَإِلٰهَ كُلِّ شَيْءٍ

व इलाहा कुल्ले शै'इन 

 

وَمَلِيكَ كُلِّ شَيْءٍ

व मलिका कुल्ले शै'इन

 

انْتَ ٱللَّهُ ٱلْمُقْتَدِرُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ

अन्ता अल्लाहो अल'मुक़'तदेरो अला कुल्ले शै'इन

 

انْتَ ٱللَّهُ ٱلاوَّلُ فَلاَ شَيْءَ قَبْلَكَ

अन्ता अल्लाहो अल-अव्वलो फ़ला शै'इन क़ब'लेका

 

وَانْتَ ٱلآخِرُ فَلاَ شَيْءَ بَعْدَكَ

व अन्ता अल'आख़ेरो फ़ला शै'इन बाअ'दका

 

وَانْتَ ٱلظَّاهِرُ فَلاَ شَيْءَ فَوْقَكَ

व अन्ता अल'ज़ाहेरो फ़ला शै'इन फ़ौ'क़का,

 

وَانْتَ ٱلْبَاطِنُ فَلاَ شَيْءَ دُونَكَ

व अन्ता अल-बातेनो फ़ला शै'इन दू'नका,

 

رَبَّ جَبْرَائِيلَ وَمِيكَائِيلَ وَإِسْرَافِيلَ

रब्बा जिब्रा'ईला व मिका'ईला व ईसरा'फ़ीला,

 

وَإِلٰهَ إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ

व आलेही इब्राहीमा व ईस्मा'इला,

 

وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَٱلاسْبَاطِ

व इस्हाक़ा व याक़ूबा, व अल'अस्बाते,

 

اسْالُكَ انْ تُصَلِّيَ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِ مُحَمَّدٍ

अस'अलोका अन'तुसल्ले अला मोहम्मदीन व आले मोहम्मदीन

 

وَانْ تَوَلاَّنِي بِرَحْمَتِكَ

व अन तवल'लनी बे'रहमतेका

 

وَلاَ تُسَلِّطْ عَلَيَّ احَداً مِنْ خَلْقِكَ

व ला तुसल्लत अलैय्या अहदन मं ख़ल'क़ेका,

 

مِمَّنْ لاَ طَاقَةَ لِي بِهِ

मिम्मन ला ता'क़ता ली बेहि,

 

اللَّهُمَّ إِنِّي اتَحَبَّبُ إِلَيْكَ فَحَبِّبْنِي

अल्लाहुम्मा इन्नी अतह'हब-बबो इलैका फ़हब'बबनी,

 

وَفِي ٱلنَّاسِ فَعَزِّزْنِي

व फ़ी अल्नासे फ़'अज़-ज़जनी,

 

وَمِنْ شَرِّ شَّيَاطِينِ ٱلْجِنِّ وَٱلإِنْسِ فَسَلِّمْنِي

व मिन शर्रा'श शयातीने अल'जिन्ने व अल'इन्स फ़ा सल'लमनी

 

يَا رَبَّ ٱلْعَالَمِينَ

या रब्बा अल'आलामीन

 

وَصَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَآلِهِ

व सल्ले अला मोहम्मदीन व आलेही

 

 

     
     
     
     
    सुरह अल-वाक़्या की तिलावत करें
     
     
 
 
 

 

 

 

8. Recite Surah al Waaqi-a'h.

9.Recite Ghufaylah Salat  between Magrib & Isha ( this can be a part  ie 1X2  of Magrib Nafilah)

10. Recite 4 Rak'ats Nafilah (2X2) for Maghrib   four units of prayer, each two separated by a Tasl¢m statement. You should not utter any word between the two parts of the prayer.

According to the Shaykh, it has been narrated that S£rah al-K¡fir£n (No. 109) should be recited in the first unit and S£rah al-Taw¦¢d in the second. In the third and fourth units, it is optional to recite any other S£rah desired.

It has been also narrated that Imam `Al¢ al-Naq¢ (al-H¡d¢) (`a) used to recite, in the third unit (Rak`ah) of this prayer, S£rah al-F¡ti¦ah and the first six verses (ªyahs) of S£rah al-°ad¢d, and in the fourth unit, S£rah al-F¡ti¦ah and the last four verses of S£rah al-°ashr.

It is also recommended to repeat the following  prayer seven times in the last prostration (sajdah) of all supererogatory prayers each night, especially at the night before Friday):

اَللَّهُمَّ إِنِّي اسْالُكَ بِوَجْهِكَ ٱلْكَرِيـمِ

all¡humma inn¢ as'aluka biwajhika alkar¢mi

O Allah, I surely beseech You in the name of Your Honorable Face,

وَٱسْمِكَ ٱلْعَظِيمِ

wasmika al`a¨¢mi

Your Tremendous Name,

وَمُلْكِكَ ٱلْقَدِيـمِ

wa mulkika alqad¢mi

and Your Timeless Kingdom,

انْ تُصَلِّيَ عَلَىٰ مُحَمَّد وَآلِهِ

an tu¥alliya `al¡ mu¦ammadin wa ¡lih¢

to send blessings to Mu¦ammad and his Household

وَ انْ تَغْفِرَ لِي ذَنْبِيَ ٱلْعَظِيمَ

wa an taghfira l¢ dhanbiya al`a¨¢ma

and to forgive my enormous sin;

إِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ ٱلْعَظِيمَ إِلاَّ ٱلْعَظِيمُ

innah£ l¡ yaghfiru al`a¨¢ma ill¡ al`a¨¢mu

for none can forgive the enormous save the All-tremendous (Lord).

When you accomplish the supererogatory prayer, you may say any supplication you like.

You may then repeat the following ten times:

مَا شَاءَ ٱللَّهُ

 sh¡'a all¡hu

Only that which Allah wills shall come to pass!

لاَ قُوَّةَ إِلاَّ بِٱللَّهِ

 quwwata ill¡ bill¡hi

There is no strength save with Allah.

اَسْتَغْفِرُ ٱللَّهَ

astaghfiru all¡ha

I pray the forgiveness of Allah.

 

 Details of the supererogatory /Nafila  of Magrib prayer

, which consists of four units, each two separately (i.e. you say the taslim statement after the second and fourth units). It is recommended not to say anything (other than supplications) in the space of time between the obligatory and supererogatory sunset prayers. In the first unit of the supererogatory prayer, you may recite Surah al-F¡ti¦ah and Surah al-Kafirun. In the second, you may recite Surah al-Fati¦ah and Surah al-Taw¦¢d. In the third and fourth units, you may recite any Surah you wish although it is highly advisable to recite in the third unit Surah al-Fati¦ah and the following verses, which are the first six verses of Surah al-ad¢d (No. 57):

سَبَّحَ لِلَّهِ مَا فِي ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضِ

sabba¦a lill¡hi m¡ f¢ alssam¡w¡ti wal-ar¤i

Whatever is in the heavens and the earth declares the glory of Allah,

وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ.

wa huwa al`az¢zu al¦ak¢mu

and He is the Mighty, the Wise.

لَهُ مُلْكُ ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضِ

lah£ mulku alssam¡w¡ti wal-ar¤i

His is the kingdom of the heavens and the earth;

يُحْيِي وَيُمِيتُ

yu¦y¢ wa yum¢tu

He gives life and causes death;

وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ.

wa huwa `al¡ kulli shay'in qad¢run

and He has power over all things.

هُوَ ٱلاوَّلُ وَٱلآخِرُ

huwa al-awwalu wal-¡khiru

He is the First and the Last

وَٱلظَّاهِرُ وَٱلْبَاطِنُ

wal¨¨¡hiru walb¡§inu

and the Ascendant (over all) and the Knower of hidden things,

وَهُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ.

wa huwa bikulli shay'in `al¢mun

and He is Cognizant of all things.

هُوَ ٱلَّذِي خَلَقَ ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضَ

huwa alladh¢ khalaqa alssam¡w¡ti wal-ar¤a

He it is who created the heavens and the earth

فِي سِتَّةِ ايَّامٍ

f¢ sittati ayy¡min

in six periods,

ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَىٰ ٱلْعَرْشِ

thumma istaw¡ `al¡ al`arshi

and He is firm in power;

يَعْلَمُ مَا يَلِجُ فِي ٱلارْضِ

ya`lamu m¡ yaliju f¢ al-ar¤i

He knows that which goes deep down into the earth

وَمَا يَخْرُجُ مِنْهَا

wa m¡ yakhruju minh¡

and that which comes forth out of it,

وَمَا يَنْزِلُ مِنْ ٱلسَّمَاءِ

wa m¡ yanzilu min alssam¡'i

and that which comes down from the heaven

وَمَا يَعْرُجُ فِيهَا

wa m¡ ya`ruju f¢h¡

and that which goes up into it,

وَهُوَ مَعَكُمْ ايْنَ مَا كُنْتُمْ

wa huwa ma`akum ayna m¡ kuntum

and He is with you wherever you are;

وَٱللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ.

wall¡hu bim¡ ta`mal£na ba¥¢run

and Allah sees what you do.

لَهُ مُلْكُ ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضِ

lah£ mulku alssam¡w¡ti wal-ar¤i

His is the kingdom of the heavens and the earth;

وَإِلَىٰ اللَّهِ تُرْجَعُ ٱلامُورُ.

wa il¡ all¡hi turja`u al-um£ru

and to Allah are (all) affairs returned.

يُولِجُ ٱللَّيْلَ فِي ٱلنَّهَارِ

y£liju allayla f¢ alnnah¡ri

He causes the night to enter in upon the day,

وَيُولِجُ ٱلنَّهَارَ فِي ٱللَّيْلِ

wa y£liju alnnah¡ra f¢ allayli

and causes the day to enter in upon the night,

وَهُوَ عَلِيمٌ بِذَاتِ ٱلصُّدُورِ.

wa huwa `al¢mun bidh¡ti al¥¥ud£ri

and He is Cognizant of what is in the hearts.

 It is also high advisable to recite in the fourth unit of the supererogatory sunset prayer Surah al-Fatihah and the following holy verses, which are the last four verses of Surah al-Hashr (No. 59):

لَوْ انْزَلْنَا هٰذَا ٱلْقُرْآنَ عَلَىٰ جَبَلٍ

law anzaln¡ h¡dh¡ al-qur'¡na `al¡ jabalin

Had We sent down this Qur'an on a mountain,

لَرَايْتَهُ خَاشِعاً مُتَصَدِّعاً مِنْ خَشْيَةِ اللَّهِ

lara'aytah£ kh¡shi`¡n muta¥addi`¡n min khashyati all¡hi

you would certainly have seen it falling down, splitting asunder because of the fear of Allah,

وَتِلْكَ ٱلامْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ

wa tilka al-amth¡lu na¤ribuh¡ lilnn¡si

and We set forth these parables to men

لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ

la`allahum yatafakkar£na

that they may reflect.

هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِي لاَ إِلٰهَ إِلاَّ هُوَ

huwa all¡hu alladh¢ l¡ il¡ha ill¡ huwa

He is Allah besides Whom there is no god;

عَالِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَادَةِ

`¡limu alghaybi walshshah¡dati

the Knower of the unseen and the seen;

هُوَ ٱلرَّحْمٰنُ ٱلرَّحِيمُ

huwa alrra¦m¡nu alrra¦¢mu

He is the Beneficent, the Merciful.

هُوَ ٱللَّهُ ٱلَّذِي لاَ إِلٰهَ إِلاَّ هُوَ

huwa all¡hu alladh¢ l¡ il¡ha ill¡ huwa

He is Allah, besides Whom there is no god;

ٱلْمَلِكُ ٱلْقُدُّوسُ

almaliku alqudd£su

the King, the Holy,

ٱلسَّلاَمُ ٱلْمُؤْمِنُ ٱلْمُهَيْمِنُ

alssal¡mu almu'minu almuhayminu

the Giver of peace, the Granter of security, Guardian over all,

ٱلْعَزِيزُ ٱلْجَبَّارُ ٱلْمُتَكَبِّرُ

al`az¢zu aljabb¡ru almutakabbiru

the Mighty, the Supreme, the Possessor of every greatness.

سُبْحَانَ ٱللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ

sub¦¡na all¡hi `amm¡ yushrik£na

Glory be to Allah from what they set up with Him.

هُوَ ٱللَّهُ ٱلْخَالِقُ ٱلْبَارِئُ ٱلْمُصَوِّرُ

huwa all¡hu alkh¡liqu alb¡ri'u almu¥awwiru

He is Allah the Creator, the Maker, the Fashioner;

لَهُ ٱلاسْمَاءُ ٱلْحُسْنَىٰ

lah£ al-asm¡'u al¦usn¡

His are the most excellent names;

يُسَبِّحُ لَهُ مَا فِي ٱلسَّمَاوَاتِ وَٱلارْضِ

yusabbi¦u lah£ m¡ f¢ alssam¡w¡ti wal-ar¤i

whatever is in the heavens and the earth declares His glory;

وَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلْحَكِيمُ.

wa huwa al`az¢zu al¦ak¢mu

and He is the Mighty, the Wise.

As in other Nafila , it is sufficient to recite Surah al-Fatihah alone in each unit. It is advisable to recite the Surahs with audible voice,

You may then do the Thanksgiving prostration & recite  

شُكْراً شُكْراً شُكْراً

shukran shukran shukran

Thanks, thanks, thanks.

Al-Kulayni has reported Imam alSadiq (`a) as saying: When you finish the nafila sunset prayer, you may pass your hand over your forehead and repeat the following supplicatory prayer three times:

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلَّذِي لاَ إِلٰهَ إِلاََّ هُوَ

bismill¡hi alladh¢ l¡ il¡ha ill¡ huwa

In the Name of Allah save Whom there is no god,

عَالِمُ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَادَةِ

`¡limu alghaybi walshshah¡dati

the Knower of the unseen and the seen,

ٱلرَّحْمٰنُ ٱلرَّحِيمُ

alrra¦m¡nu alrra¦¢mu

the All-beneficent, and the All-merciful.

اللَّهُمَّ اذْهِبْ عَنِّيَ ٱلْهَمَّ وَٱلْحَزَنَ

all¡humma adhhib `anniya alhamma wal¦azana

O Allah, (please) take away from me grief and distress.

 

5.Imam Mohammed Taqi (a.s.) has said that one who recites the Sura Qadr 7 times ..Inna anzalna after the mandatory maghribain prayers, he will remain in the care of Allah till the morning. after this say the following prayer:


            

     

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