हज़रत मासूमा (स:अ) : अ'इम्मा मासूमीन (अ:स) की नज़र में
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हज़रत मासूमा (स:अ) : अ'इम्मा मासूमीन (अ:स) की नज़र में
 

इमाम सादीक़ (अ:स) से नक़ल है के आप ने फ़रमाया : ख़ुदा'वंद आलम हरम रखता है और इस का हरम मक्का है! पैग़म्बर (स:अ:व:व) हरम रखते हैं और ईन का हरम मदीना है, अमीरुल मोमिनीन हरम रखते है और इनका हरम कूफ़ा है! 

क़ुम एक कूफ़ा-ए-सग़िर है, जन्नत के आठ दरवाजों में से तीन क़ुम की तरफ़ खुलते हैं, फिर इमाम (अ:स) ने फ़रमाया, मेरी औलाद में से एक औरत जिस की शहादत क़ुम में होगी और इसका नाम फ़ातिमा बिन्त मूसा होगा और इस की शफ़ा'अत से हमारे तमाम शिया जन्नत में दाख़िल हो जायेंगे (बेहार जिल्द 60पेज 288)

'अद, इमाम रज़ा (अ:स) से नक़ल करते हैं के आप ने फ़रमाया ऐ साद जिस ने हज़रत मासूमा (स:अ) की ज़्यारत की इस पर जन्नत वाजिब है!

"सवाब-उल-अमाल" और "अय'युन-नुर-रज़ा" में स'अद बिन 'अद से नक़ल है के मै ने इमाम रज़ा (अ:स) से मासूमा (स:अ) के बारे में पूछा तो आप ने फ़रमाया, हज़रत मासूमा (स:अ) की ज़्यारत का सिला बहिश्त है! (कामिल-उल-ज़्यारात, पेज 324)

इमाम जवाद (अ:स) फ़रमाते हैं के जिस ने मेरी फूफी (स:अ) की ज़्यारत क़ुम में की इस के लिये जन्नत है

इमाम सादीक़ (अ:स) फ़रमाते हैं के जिस ने मासूमा (स:अ) की ज़्यारत इस की शान-व-मंज़लत क़ो जान्ने के बाद की वो जन्नत में जाएगा (बेहार, जिल्द 48पेज 307)

इमाम सादीक़ (अ:स) फ़रमाते हैं की आगाह हो जाओ के मेरा और मेरे बेटों का हरम मेरे बाद क़ुम में है (बेहार-उल-अनवारजिल्द 60, पेज 216)

हज़रत मासूमा (स:अ) का मुक़ाम व मंज़ेलत 

अब यह सवाल ज़हन में आता है के मासूमा (स:अ) क़ो  मासूमा का लक़ब किस ने दिया ?

मासूमा ला लक़ब हज़रत इमाम रज़ा (अ:स) ने अपनी बहन क़ो अता किया, आप इस तरह फ़रमाते हैं, :

"जिस ने मासूमा (स:अ) की ज़्यारत क़ुम में की वो इस तरह है के इस ने मेरी ज़्यारत की (नासीख़ुत-तवारीख़, जिल्द 3पेज 68)

अब जब के यह लक़ब इमाम मासूम (अ:स) ने आप क़ो अता फ़रमाया तो इस का मतलब यह हुआ के आप ईन की हम-रूतबा हैं!

इमाम रज़ा (अ:स) ने एक दूसरी हदीस में फ़रमाया के वो शख्स जो मेरी ज़्यारत पर नहीं आ सकता वो मेरे भाई की ज़्यारत शहर रै में और मेरी बहन की ज़्यारत क़ुम में करे तो वो मेरी ज़्यारत का सवाब हासिल करेगा ( ''दता-तसानीफ़ जिल्द 6पेज 159) 

दूसरा लक़ब जो हज़रत मासूमा (स:अ) का है वो है "करीमः अहलेबैत" यह लक़ब भी एक अज़ीम-उल-मर्तबत आलिमे दीं के ख्व़ाब के ज़रिये इमाम मासूम (अ:स) की ज़बान अक़दस से मालूम हुआ!

ख्व़ाब की तफसील इस तरह है के मरहूम अयातुल्लाह सय्यद मोहम्मद मर'अशी नजफ़ी जो के अयातुल्लाह सय्यद शहाबुद्दीन मर'अशी के वालिदे बुज़ुर्गवार थे, इस अज़ीम हस्ती की दिली ख़्वाहिश थी की हज़रत सिद्दीक़ा-ए-ताहिरा (स:अ) की क़ब्रे-अतहर का सही पता मिल जाएआप इस अज़ीम अम्र की ख़ातिर बहुत परेशान रहा करते थे! इस कारण आप ने एक अमल शुरू कर दिया और चालीस रोज़ तक ख़तमे क़ुरान का अमल करते रहे, यहाँ तक की वो दिन भी आ गया के मरहूम ने अपने इस चालीस रोज़ा अमल का इख़तेमाम किया, आप काफ़ी थक चुके थे, लिहाज़ा आप नींद की आग़ोश में चले गए और काफ़ी देर तक आप आराम फ़रमाते रहे! आराम के दौरान आप के इंतज़ार की वो मुबारक घड़ी भी आ पहुंची जिस का इंतज़ार हर शीयाने अली (अ:स) क़ो रहता है, यानी ख्व़ाब के आलम में इमाम बाक़र (अ:स) या इमाम सादीक़ (अ:स) तशरीफ़ ले आये और आप ईन की ज़्यारत से मुशर्रफ़ हुए, इस वक़्त इमाम ने फ़रमाया " करीमः-ए-अहलेबैत" के दामन से मुतमस्सिक हो जाओ"! 

मरहूम अयातुल्लाह सय्यद महमूद मर'अशी नजफ़ी (र:अ) ने समझा के मंज़ूर इमाम (अ:स) हज़रत ज़हरा (स:अ) हैं! मरहूम ने अर्ज़ किया मैन आप पर फ़िदा हो जाऊं ऐ मेरे आक़ा मैंने यह ख़त्म-ए-क़ुरान का अमल इस वजह से किया है की हज़रत ज़हरा (स:अ) की क़ब्र का पक्का पता मालूम हो जाए ताकि बेहतर तरीक़े से इनकी  क़ब्रे अतहर की ज़्यारत कर सकूँ! इस वक़्त इमाम (अ:स) ने फ़रमाया, मेरी मुराद हज़रत मासूमा (स:अ) की क़ब्रे शरीफ़ है जोकि क़ुम में है! फिर इमाम (अ:स) ने फ़रमाया ख़ुदा ने किसी मसलेहत की बुन्याद पर जनाबे ज़हरा (स:अ) की क़ब्र तो मख्फ़ी रखा है और इसी वजह से हज़रत मासूमा (स:अ) की क़ब्र अतहर क़ो तजल्ली'गाह क़ब्र हज़रत ज़हरा (स:अ) क़रार दिया है!

अगर हज़रत ज़हरा (स:अ) की क़ब्रे मुबारक ज़ाहिर होती तो इस पर जिस क़दर नूरानियत व जलालत देखने क़ो मिलती इतनी ही नूरानियत व जलालत ख़ुदावंद करीम ने हज़रत मासूमा (स:अ) की क़ब्रे शरीफ़ क़ो अता की है! 

मरहूम मर'अशी नजफ़ी जैसे ही ख्व़ाब से बेदार हुए आप ने मुसम्मम इरादा कर लिया के जल्द से जल्द बारगाहे मासूमा (स:अ) में हाज़री देंगे ! अपने इस इरादे क़ो पूरा करने के लिये आप ने सफ़र का सामन बांधा और ज़्यारत हज़रत मासूमा (स:अ) की वजह से नजफ़ अशरफ़ क़ो तर्क कर दिया! 

 

अल्लाह हुम्मा सल्ले अला मुहम्मद व आले मुहम्मद                                         

     

            

     

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