कर्बला का पैग़ाम और कर्बला से मिली सीख

1. अमर बिल मारूफ और नही अनिल-मुनकर का महत्त्व

कर्बला का वाक़या हमें सिखाता है की सीधे रास्ते से न हटना और न ही अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना! आखेरत पर यक़ीन रखना और आखेरत में अपना अंजाम दिमाग में रखना, चाहे दुश्मन कितना ही ताक़तवर हो और चाहे इस से सामना करने के नतीजे कुछ भी हों! हाँ! मगर यह मुकाबला इल्म और शरियत के साथ हो! हिम्मत नहीं हारना और यह न कहना की हम क्या कर सकते हैं चाहे हमारे  दुश्मन (मीडिया और समाज में फैले हुए हों) के सामने हमारी औकात न हो हमें अपना काम करते रहना है और हमें यह हमेशा यक़ीन रखना है की हम इस पर काबू पा सकते हैं और लगातार जंग करते रहना हमारे बस में और ताक़त में है और परीणाम अल्लाह पर छोड़ना है!

2. तक़लीद और आलीम की सुहबत में रहना, न की अपनी राये क़ायेम करना

एक बार अपने रहबर और आलिम पर यक़ीन होने के बाद इसकी राये पर अमल करना बगैर किसी झिझक के और बगैर अपनी राये के फ़िक़ह (इस्लामी क़ानून) की अहमियत बीबी ज़ैनब (स:अ) के हवाले, हमें इस वाक्य में नज़र आती है के जब खैमे जल रहे थे और इमाम वक़्त (अ:स) से मस-अला पूछा जा रहा था!

3. क़ुरान का महत्व :

हत्ता की इमाम हुसैन (अ:स) का सरे-मुबारक नैज़े पर बुलंद है और तिलावत जारी है,

4. दीनी तालीम का महत्त्व और शरीके हयात क़ा चुनाव :

हमें दो मौकों पर नज़र आता है जब इमाम अली (अ:स) ने उम्मुल-बनीन (स:अ) का चुनाव किया हज़रत अब्बास (अ:स) के लिए, और दूसरी जगह पर जहाँ इमाम हुसैन (अ:स) ने यजीदी फौजों को मुखातिब किया के यह ईन के पूर्वजों की तरबियत और गलतियों का नतीजा है की इमाम (अ:स) के मुकाबले पर जंग कर रहे हैं!

5. पति और पत्नी का रिश्ता

कर्बला हमें सिखाती है की पत्नी, पाती के लिए राहत लाये, जैसे इमाम हुसैन (अ:स) की कथनी है की रबाब (स:अ) और सकीना (स:अ) के बगैर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता! पत्नी अपने पती को खुदा का हुक्म मानने से न रोके, जैसे बीबी रबाब (स:अ) ने इमाम हुसैन (अ:स) को न रोका हज़रत असग़र (अ:स) को ले जाने से!  कभी कभार हमारी औरतें अपने पती को अपने बगैर हज पर जाने से रोकती हैं! औरतों को चाहिए की वो अपने पतियों के लिए मददगार बनें और उनकी हिम्मत बढायें हुकूक-अल्लाह (दैविक कर्त्तव्य) और हुकूक-अन्नास (सामाजिक कर्त्तव्य) को पूरा करने में!

6. इल्म (ज्ञान) की अहमियत (महत्त्व):

ताकि जिंदगियां अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक गुजारी जा सकें! इमाम (अ:स) की कुर्बानी का मकसद ज़्यारत अर-ब'ईन में चार अक्षरों में ब्यान किया गया है के " मैं गवाही देता हूँ के कुर्बानी का मुकम्मल (कुल) मकसद बन्दों को जहालत से बचाना था!

7. इखलास (भगवान् का कर्त्तव्य समझ कर, भगवान् की राह में अच्छा काम करो) :   

सिर्फ और सिर्फ अल्लाह के लिए अपनी जिम्मेदारियों को अंजाम देना, बगैर किसी रबा (दिखावे) के, कयामत पर मुकम्मल यक़ीन ही संसारिक फायदों और आराम को कुर्बान करके आखेरत के लिए हमेशा रहने वाला फायेदा हासिल करवा सकता है!

8. जज़्बात (भावनाओं) पर काबू

जब अल्लाह की ख़ातिर अमल हो, इस के साथ अपने जज़्बात (भावना) का प्रदर्शन बगैर सुलह के खुदा की ख़ातिर करो!

9. पर्दा का महत्त्व :

ना-महरमों (जो करीबी रिश्तेदार न हों)  से दूर रहना चाहे वोह करीबी रिश्तेदार ना-महरम हों या करीबी खानदानी दोस्त हों!

10. इमाम सज्जाद (अ:स) ने कहा की मेरा मानने वाला गुनाह से बचे, दाढ़ी न मुडवाये और जुआ न खेले क्योंकि यह यज़ीदी काम हैं और हमें उस दिन की याद दिलाते हैं!

11. नमाज़ का महत्त्व : यह जंग के बीच में भी पढी गयी

12. अज़ादारी और नमाज़ दोनों मुस्तकिल वाजिब हैं, और उनका टकराव नहीं जैसा की इमाम सज्जाद (अ:स) खुद सब से बड़े अजादार भी थे और सब से बड़े आबिद (नमाज़ी) भी!

13. ख़ुदा की मर्ज़ी के आगे झुकना, हर वक़्त, हर जगह पर, इमाम (अ:स) ने सजदा-ए शुक्र बजा लाया जब की वोह मुसीबत में थे, हमें भी चाहिए की पता करें की खुदा की मर्ज़ी क्या है, इस को माँ लेंऔर इस पर अमल करें!